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सिंधु जल संधि

Lokesh Pal July 06, 2026 02:45 7 0

संदर्भ 

हाल ही में भारत ने स्पष्ट किया है कि सिंधु जल संधि, 1960 तब तक स्थगित रहेगी, जब तक पाकिस्तान सीमा-पार आतंकवाद को स्थायी एवं विश्वसनीय रूप से समर्थन देना बंद नहीं करता है।

  • यह वक्तव्य पहलगाम आतंकवादी हमला (वर्ष 2025) तथा ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान द्वारा संधि को पुनः लागू करने के अनुरोध के संदर्भ में दिया गया।

सिंधु जल संधि (IWT) के बारे में

  • ऐतिहासिक जल-वितरण समझौता: यह संधि वर्ष 1960 में भारत एवं पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित हुई थी। विश्व बैंक ने वार्ताओं को सुगम बनाने वाले हस्ताक्षरकर्ता के रूप में इसमें भाग लिया था। यह विश्व की सबसे दीर्घकालिक अंतर-सीमायी नदी जल संधियों में से एक है।
  • नदियों का आवंटन: पूर्वी नदियाँ (रावी, ब्यास एवं सतलुज) के जल के अप्रतिबंधित उपयोग का अधिकार भारत को दिया गया, जबकि पश्चिमी नदियाँ (सिंधु, झेलम एवं चिनाब) का जल मुख्यतः पाकिस्तान को आवंटित किया गया, हालाँकि संधि में निर्धारित शर्तों के अंतर्गत भारत को सीमित उपयोग की अनुमति है।
  • भारत के अनुमत अधिकार: भारत को पश्चिमी नदियों पर संधि में निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप रन-ऑफ-द-रिवर (Run-of-the-River) जलविद्युत परियोजनाएँ, सिंचाई, नौवहन तथा सीमित जल भंडारण की अनुमति है।
  • संस्थागत व्यवस्था: संधि के अंतर्गत स्थायी सिंधु आयोग (PIC) की स्थापना की गई, जो नियमित आँकड़ों के आदान-प्रदान, निरीक्षण, तकनीकी सहयोग तथा विवादों की रोकथाम का कार्य करता है।
  • विवाद निवारण व्यवस्था: संधि में स्थायी सिंधु आयोग, तटस्थ विशेषज्ञ तथा मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration) के माध्यम से तकनीकी एवं विधिक विवादों के समाधान की चरणबद्ध व्यवस्था का प्रावधान किया गया है।

भारत ने संधि को स्थगित क्यों रखा है?

  • सीमा-पार आतंकवाद: भारत का तर्क है कि यह संधि सद्भावना एवं मैत्री के सिद्धांतों पर आधारित थी, जिनका पाकिस्तान ने सीमा-पार आतंकवाद को समर्थन देकर लगातार उल्लंघन किया है।
    • राष्ट्रीय सुरक्षा पर मंत्रिमंडलीय समिति (CCS) ने पहलगाम आतंकवादी हमला (वर्ष 2025) के बाद सिंधु जल संधि को स्थगित करने का निर्णय लिया तथा जल सहयोग को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखा।
  • बदली हुई परिस्थितियाँ: भारत ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन, जनसंख्या वृद्धि, विकास संबंधी बदलती आवश्यकताओं तथा तकनीकी प्रगति ने उन परिस्थितियों को व्यापक रूप से बदल दिया है, जिनके आधार पर यह संधि की गई थी।
  • संधि से संबंधित विवाद: किशनगंगा जलविद्युत परियोजना एवं रतले जलविद्युत परियोजना जैसे मामलों पर लगातार मतभेद तथा पाकिस्तान द्वारा एक साथ विवाद निवारण के अनेक मंचों का उपयोग किए जाने से संधि के प्रभावी क्रियान्वयन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि: भारत का स्पष्ट मत है कि “पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते”, जिससे यह संकेत मिलता है कि पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को समर्थन जारी रहने की स्थिति में द्विपक्षीय सहयोग सामान्य रूप से जारी नहीं रह सकता है।

संधि के स्थगित रहने के प्रभाव

  • द्विपक्षीय संबंधों पर प्रभाव: संधि के स्थगित रहने से भारत-पाकिस्तान के मध्य राजनयिक तनाव और गहरा हुआ है तथा दोनों देशों के बीच सहयोग के शेष बचे संस्थागत माध्यमों में से एक भी प्रभावहीन हो गया है।
  • पाकिस्तान की जल संबंधी चिंताएँ: पाकिस्तान लगातार यह कहता रहा है कि संधि की पुनर्बहाली उसकी दीर्घकालिक जल एवं कृषि सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।
  • भारत की रणनीतिक बढ़त: इस निर्णय से भारत की रणनीतिक सौदेबाजी क्षमता मजबूत हुई है तथा अपने क्षेत्र में संधि के अंतर्गत अनुमत जल उपयोग का अधिक प्रभावी ढंग से अनुकूलन करने में उसे अधिक लचीलापन प्राप्त हुआ है।
  • अंतरराष्ट्रीय ध्यान: इस घटनाक्रम ने वैश्विक स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है, क्योंकि सिंधु जल संधि को लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय नदी जल प्रबंधन का एक सफल एवं स्थायी उदाहरण माना जाता रहा है।
  • भविष्य की जल कूटनीति: यह घटनाक्रम दर्शाता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, जल सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन तथा अंतर-सीमायी संसाधन प्रबंधन के बीच संबंध लगातार अधिक गहरे होते जा रहे हैं।

निष्कर्ष

सिंधु जल संधि अब ऐसे नए चरण में प्रवेश कर चुकी है, जहाँ जल कूटनीति को राष्ट्रीय सुरक्षा, जलवायु अनुकूलन क्षमता तथा क्षेत्रीय भू-राजनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। संधि को स्थगित रखने का भारत का निर्णय इस बात का संकेत है कि उसकी पड़ोसी नीति में अब आतंकवाद-रोधी रणनीति, राष्ट्रीय रणनीतिक हितों तथा सतत् जल प्रबंधन का अधिक समन्वित दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है।

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