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भारत में शिशु देखभाल केंद्रों (क्रेच) से संबंधित नियम

Lokesh Pal July 06, 2026 03:00 6 0

संदर्भ 

हाल ही में, बंगलूरू स्थित कैपजेमिनी (Capgemini) परिसर के भीतर संचालित ‘लिटिल बड्स डे केयर सेंटर’ में छोटे बच्चों के साथ कथित दुर्व्यवहार की घटना ने बाल सुरक्षा, देखभालकर्ताओं की जवाबदेही तथा भारत में क्रेच संबंधी नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न की हैं।

संबंधित तथ्य

  • वर्ष 2024 में जारी राष्ट्रीय न्यूनतम मानक एवं प्रोटोकॉल का उद्देश्य बाल देखभाल को केवल अनौपचारिक पारिवारिक जिम्मेदारी से आगे बढ़ाकर संगठित संस्थागत सहायता प्रणाली के रूप में विकसित करना है, जिससे भारत के सामाजिक अवसंरचना तंत्र को सुदृढ़ किया जा सके तथा महिलाओं की श्रमबल भागीदारी में वृद्धि को प्रोत्साहन मिल सके।

क्रेच (Crèche) एवं नियामक ढाँचे के बारे में

  • परिभाषा: क्रेच (Crèche) एक बाल देखभाल केंद्र है, जहाँ कार्यरत माता-पिता अथवा अभिभावकों की अनुपस्थिति में 6 माह या उससे अधिक आयु के बच्चों के लिए सुरक्षित, संरक्षित एवं पोषणकारी वातावरण उपलब्ध कराया जाता है। इसके साथ ही पोषण, स्वास्थ्य सेवाएँ तथा प्रारंभिक बाल देखभाल एवं शिक्षा (ECCE) भी प्रदान की जाती है।
  • वर्ष 2024 के राष्ट्रीय मानक: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MWCD) ने श्रम एवं रोजगार मंत्रालय (MoLE) के परामर्श से राष्ट्रीय न्यूनतम मानक एवं प्रोटोकॉल, 2024 जारी किए, जिनमें सभी बाल देखभाल केंद्रों के लिए न्यूनतम मानक निर्धारित किए गए हैं।
  • उद्देश्य: इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य महिला-नेतृत्व वाले विकास को बढ़ावा देना, महिला श्रमबल भागीदारी (FLFP) में वृद्धि करना, गुणवत्तापूर्ण बाल देखभाल सेवाओं का संस्थानीकरण करना तथा बाल देखभाल क्षेत्र में रोजगार के अवसरों का सृजन करना है।
  • क्रियान्वयन: ये मानक वर्तमान में परामर्शात्मक स्वरूप के हैं तथा राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों से अपेक्षा की गई है कि वे अपने-अपने नियामक ढाँचों के माध्यम से इन्हें अपनाएँ अथवा और अधिक सुदृढ़ करें।
  • हालिया उदाहरण: बंगलूरू स्थित लिटिल बड्स डे केयर सेंटर की घटना के बाद इन मानकों को सभी राज्यों में विधिक रूप से बाध्यकारी बनाए जाने की माँग पुनः तेज हो गई है।

अवसंरचना, सुरक्षा एवं बाल संरक्षण संबंधी मानदंड:

  • अवसंरचना संबंधी मानक: क्रेच अधिमानतः भूतल पर स्थित होना चाहिए तथा वहाँ पर्याप्त वेंटिलेशन, प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षित खिड़कियाँ, बच्चों के अनुकूल फर्नीचर, विश्राम क्षेत्र, खेल क्षेत्र तथा दिव्यांग बच्चों के लिए बाधा-रहित पहुँच की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • स्वास्थ्य एवं स्वच्छता: केंद्र में सुरक्षित पेयजल, स्वच्छ रसोई, पौष्टिक भोजन, जल उपलब्धता युक्त बच्चों के अनुकूल शौचालय, नियमित स्वच्छता तथा आयु के अनुरूप शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
  • सुरक्षा उपाय: क्लोज्ड-सर्किट टेलीविजन (CCTV) निगरानी अनिवार्य है तथा जहाँ संभव हो, अभिभावकों को इसकी पहुँच उपलब्ध कराई जानी चाहिए। आपातकालीन संपर्क नंबर, प्राथमिक उपचार की सुविधा, अग्नि सुरक्षा उपकरण तथा बच्चों के लिए सुरक्षित परिसर अनिवार्य हैं।
  • सरकारी निगरानी: प्रत्येक पंजीकृत क्रेच की जानकारी स्थानीय पुलिस, महिला एवं बाल विकास विभाग तथा श्रम विभाग को दी जानी चाहिए, ताकि नियमित निगरानी एवं आपातकालीन स्थिति में त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
  • हालिया चिंता: बंगलूरू की घटना ने यह उजागर किया है कि निर्धारित सुरक्षा मानकों के बावजूद वास्तविक समय की निगरानी, CCTV की प्रभावी निगरानी तथा नियमित निरीक्षण में गंभीर कमियाँ बनी हुई हैं।

कार्मिक, प्रशासन एवं संस्थागत निगरानी

  • कार्मिकों की योग्यता: प्रत्येक 20–25 बच्चों पर कम-से-कम एक क्रेच पर्यवेक्षक (न्यूनतम 12वीं उत्तीर्ण) तथा एक क्रेच सहायक (न्यूनतम 10वीं उत्तीर्ण) होना चाहिए। प्रशिक्षित बाल देखभाल अथवा नर्सिंग पेशेवरों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • पृष्ठभूमि सत्यापन: बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए देखभालकर्ताओं की नियुक्ति से पहले पुलिस सत्यापन, चरित्र प्रमाण-पत्र तथा चिकित्सीय स्वास्थ्य प्रमाण-पत्र अनिवार्य हैं।
  • महिला देखभालकर्ता: दिशा-निर्देशों के अनुसार, बाल देखभाल संबंधी जिम्मेदारियों के लिए केवल महिला देखभालकर्ताओं को नियुक्त करने की अनुशंसा की गई है।
  • क्रेच प्रशासनिक समिति (CAC): प्रत्येक क्रेच में प्रशासकों, पर्यवेक्षकों तथा अभिभावकों के प्रतिनिधियों को सम्मिलित करते हुए क्रेच प्रशासनिक समिति का गठन किया जाना चाहिए, जो प्रबंधन, सुरक्षा, शिकायत निवारण तथा गुणवत्ता मानकों की निगरानी करेगी।
  • उभरती चुनौती: अनेक निजी डे-केयर केंद्रों में देखभालकर्ताओं को कड़े सत्यापन के बिना आउटसोर्स करने की प्रवृत्ति एक गंभीर चिंता के रूप में सामने आई है।

श्रम कानून संबंधी प्रावधान एवं महिलाओं का रोजगार

  • वैधानिक प्रावधान: सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 तथा व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियाँ संहिता, 2020 के अनुसार 50 या उससे अधिक श्रमिकों को नियोजित करने वाले प्रतिष्ठानों के लिए क्रेच की व्यवस्था करना अनिवार्य है। यह सुविधा स्वयं अथवा साझा/सामान्य क्रेच के माध्यम से उपलब्ध कराई जा सकती है।
  • कार्यरत माताओं के अधिकार: महिला कर्मचारियों को स्तनपान एवं विश्राम अवधि सहित प्रतिदिन चार बार क्रेच जाने का अधिकार प्राप्त है।
  • साझा क्रेच मॉडल: छोटे प्रतिष्ठान सरकारी एजेंसियों, निजी संस्थाओं अथवा गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के सहयोग से साझा क्रेच स्थापित कर सकते हैं।
  • नीतिगत उद्देश्य: इन प्रावधानों का उद्देश्य महिलाओं पर बाल देखभाल के बोझ को कम करना, कार्यबल में उनकी निरंतर भागीदारी सुनिश्चित करना तथा महिला श्रमबल भागीदारी (FLFP) में वृद्धि करना है।
  • क्रियान्वयन में कमी: श्रमिक संगठनों के अनुसार विशेष रूप से निजी प्रतिष्ठानों एवं छोटे नियोक्ताओं द्वारा इन प्रावधानों का व्यापक स्तर पर पालन नहीं किया जा रहा है।

जिन चुनौतियों का समाधान आवश्यक है:

  • राज्य स्तर पर कमजोर क्रियान्वयन: चूँकि वर्ष 2024 के दिशा-निर्देश परामर्शात्मक हैं, इसलिए उनका पालन विभिन्न राज्यों में अलग-अलग स्तर पर हो रहा है।
  • कमजोर नियामक निगरानी: आकस्मिक निरीक्षण, लाइसेंस संबंधी लेखा-परीक्षण तथा अनुपालन की निगरानी पर्याप्त नहीं है।
  • कॉरपोरेट स्तर पर अनुपालन का अभाव: अनेक पात्र प्रतिष्ठान वैधानिक दायित्व होने के बावजूद अनिवार्य क्रेच सुविधा उपलब्ध नहीं करा रहे हैं।
  • कार्मिकों का अपर्याप्त सत्यापन: कमजोर पृष्ठभूमि सत्यापन तथा आउटसोर्स भर्ती के कारण बाल दुर्व्यवहार का जोखिम बढ़ जाता है।
  • आपातकालीन तैयारी का अभाव: अनेक क्रेचों में निकटवर्ती अस्पतालों, बाल संरक्षण इकाइयों तथा आपातकालीन सेवाओं के साथ औपचारिक समन्वय व्यवस्था नहीं है।

आगे की राह

  • विधिक आधार को सुदृढ़ बनाना: राज्यों को वर्ष 2024 के राष्ट्रीय न्यूनतम मानकों को विधिक रूप से बाध्यकारी नियमों में परिवर्तित करना चाहिए तथा अनुपालन न करने पर स्पष्ट दंड का प्रावधान करना चाहिए।
  • प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी: छेड़छाड़-रोधी CCTV प्रणाली, अभिभावकों के लिए सुरक्षित डिजिटल पहुँच तथा डिजिटल अनुपालन रिपोर्टिंग सुनिश्चित की जाए।
  • नियमित आकस्मिक निरीक्षण: पुलिस, श्रम विभाग तथा महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा संयुक्त रूप से नियमित आकस्मिक निरीक्षण किए जाएँ।
  • राष्ट्रीय देखभालकर्ता रजिस्ट्री: प्रमाणित बाल देखभाल पेशेवरों का डिजिटल डेटाबेस विकसित किया जाए, जिसमें अनिवार्य प्रशिक्षण तथा दोषी व्यक्तियों को ब्लैकलिस्ट में डालने की व्यवस्था हो।
  • गुणवत्तापूर्ण बाल देखभाल का विस्तार: मिशन शक्ति के अंतर्गत पालना योजना के माध्यम से आंगनवाड़ी-सह-क्रेच (AWCCs) का विस्तार तेज किया जाए तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए साझा क्रेच मॉडल को प्रोत्साहित किया जाए।

निष्कर्ष

सुरक्षित एवं सुदृढ़ रूप से विनियमित क्रेच केवल कल्याणकारी सुविधाएँ नहीं हैं, बल्कि बाल विकास, महिला सशक्तीकरण तथा समावेशी आर्थिक विकास की आधारभूत संस्थाएँ हैं। बंगलूरू की घटना यह स्पष्ट करती है कि केवल दिशा-निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं है; बल्कि प्रभावी क्रियान्वयन, व्यावसायिक मानक, नियमित निगरानी तथा बाल-केंद्रित प्रशासन बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने एवं संस्थागत बाल देखभाल के प्रति जनविश्वास को पुनर्स्थापित करने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

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