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भारत का जैव ईंधन: E100, फ्लेक्स-फ्यूल वाहन और सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF)

Lokesh Pal April 25, 2026 03:35 5 0

संदर्भ

वैश्विक ऊर्जा व्यवधानों तथा कच्चे तेल के आयात पर बढ़ती निर्भरता के परिप्रेक्ष्य में भारत एथेनॉल-आधारित ईंधनों तथा स्वच्छ विकल्पों—जैसे E100 ईंधन, फ्लेक्स-फ्यूल वाहन (FFVs) और सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF)—की ओर संक्रमण को तीव्र कर रहा है, ताकि ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ किया जा सके तथा कार्बन उत्सर्जन में कमी लाई जा सके।

मुख्य रणनीति—समेकित जैव-ईंधन आधारित ऊर्जा संक्रमण

  • भारत एक बहु-क्षेत्रीय एवं बहु-ईंधन संक्रमण मॉडल को अपनाते हुए निम्नलिखित का एकीकरण कर रहा है—
    • एथेनॉल (E100, मिश्रण कार्यक्रम)
    • संपीडित जैव-गैस (CBG) सतत (SATAT) पहल के अंतर्गत
    • सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF)
      • यह दृष्टिकोण एक विविधीकृत, घरेलू एवं निम्न-कार्बन ऊर्जा मिश्रण की दिशा में परिवर्तन को दर्शाता है।

सड़क परिवहन स्तंभ—E100 एवं फ्लेक्स-फ्यूल वाहन

भारत पारंपरिक स्थिर मिश्रण मॉडल (जैसे- E20) से आगे बढ़कर फ्लेक्स-फ्यूल वाहन व्यवस्था की ओर अग्रसर है।

  • E100 ईंधन के बारे में: E100 उस ईंधन को संदर्भित करता है, जिसमें लगभग 100 प्रतिशत एथेनॉल की मात्रा होती है, क्योंकि थोड़ी मात्रा में जल, दहन को बेहतर बनाता है।
    • यद्यपि यह जीवाश्म ईंधनों का एक नवीकरणीय विकल्प है, इसमें आर्द्रताग्राही (हाइग्रोस्कोपिक) गुण होते हैं (वायुमंडल से नमी अवशोषित करता है) और यह कुछ धातुओं तथा रबर के लिए अत्यधिक संक्षारक होता है।
  • फ्लेक्स-फ्यूल वाहन प्रौद्योगिकी: मानक इंजनों के विपरीत, ये वाहन एक आंतरिक नियंत्रण मॉड्यूल और विशेष ऑनबोर्ड सेंसर का उपयोग करते हैं, जो एथेनॉल-पेट्रोल अनुपात का पता लगाते हैं।
    • फ्लेक्स-फ्यूल वाहन इस प्रकार डिजाइन किए जाते हैं कि वे शुद्ध पेट्रोल से लेकर E100 तक, एथेनॉल और पेट्रोल के किसी भी मिश्रण पर चल सकें।
    • यह प्रणाली वास्तविक समय में फ्यूल इंजेक्शन और स्पार्क टाइमिंग को स्वतः समायोजित करती है।
  • तकनीकी पुनर्संरचना: इसके अपनाने के लिए ईंधन लाइनों, सील और इंजेक्टरों में संक्षारण-प्रतिरोधी धातुकर्म की आवश्यकता होती है।
    • इसके अतिरिक्त, क्योंकि एथेनॉल का ऊर्जा घनत्व पेट्रोल (मोटर स्पिरिट) की तुलना में लगभग 33 प्रतिशत कम होता है, ऐसे वाहनों में सामान्यतः बड़े ईंधन टैंक की आवश्यकता होती है या अधिक बार ईंधन भरना पड़ता है।

विमानन क्षेत्र का डीकार्बोनाइजेशन – सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF)

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने सतत् विमानन ईंधन (विपणन विनियमन) आदेश, 2001 में संशोधन के माध्यम से विमानन क्षेत्र में हरित उड़ान संबंधी क्षेत्र में संक्रमण हेतु विधिक आधार प्रदान किया है।

  • सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल का स्वरूप: यह विशेष रूप से प्रसंस्कृत विमानन-ग्रेड हाइड्रोकार्बनों से निर्मित ईंधन है, जिसे प्रयुक्त खाद्य तेल, जैवजनित अवशेषों अथवा एथेनॉल जैसे स्रोतों से प्राप्त किया जाता है।
  • “ड्रॉप-इन” क्षमता: यह ईंधन रासायनिक रूप से पारंपरिक जेट ईंधन के समतुल्य होता है तथा वर्तमान विमान इंजनों एवं अवसंरचना के साथ पूर्णतः संगत है, अतः किसी नए हार्डवेयर की आवश्यकता नहीं होती है।
  • मिश्रण संबंधी चरणबद्ध लक्ष्य: अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन के मानकों के अनुरूप भारत ने अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए निम्नलिखित लक्ष्य निर्धारित किए हैं—
    • वर्ष 2027 तक 1 प्रतिशत,
    • वर्ष 2028 तक 2 प्रतिशत,
    • वर्ष 2030 तक 5 प्रतिशत।

फीडस्टॉक का विकास – प्रथम पीढ़ी बनाम द्वितीय पीढ़ी एथेनॉल

जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति का एक महत्त्वपूर्ण घटक फीडस्टॉक का विविधीकरण है, जिसका उद्देश्य “खाद्य बनाम ईंधन” दुविधा का समाधान करना है।

  • प्रथम पीढ़ी एथेनॉल: यह गन्ने के रस, शीरा तथा खाद्य अनाज (टूटा हुआ चावल, मक्का) जैसे खाद्य स्रोतों से उत्पादित किया जाता है। इससे जल संबंधी तनाव और खाद्य सुरक्षा से संबंधित चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
  • द्वितीय पीढ़ी एथेनॉल: यह लिग्नोसेलुलोसिक जैव-आधारित पदार्थों अथवा गैर-खाद्य कृषि अवशेषों (जैसे- धान का पुआल/पराली, कपास के डंठल) से उत्पादित किया जाता है।
  • रणनीतिक महत्त्व: द्वितीय पीढ़ी एथेनॉल की ओर संक्रमण दीर्घकालिक स्थिरता के लिए आवश्यक है, क्योंकि यह उत्तरी भारत में पराली जलाने की समस्या का समाधान करता है तथा एक चक्रीय जैव-अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है।

संकट प्रबंधन और औद्योगिक प्रत्यास्थता

पश्चिम एशिया में ऊर्जा संकट की वर्तमान स्थिति के दौरान अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने हेतु सरकार ने नियामकीय त्वरितीकरण उपायों को लागू किया है।

  • सतत् वैकल्पिक परिवहन और संपीडित जैव-गैस: सतत् पहल के अंतर्गत अपशिष्ट से संपीडित बायोगैस को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे आयातित द्रवीकृत प्राकृतिक गैस पर निर्भरता कम होती है।
  • अवसंरचना विस्तार: पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन ने अभूतपूर्व समय में सैकड़ों संपीडित प्राकृतिक गैस और संपीडित जैव-गैस स्टेशनों की स्वीकृतियों को तीव्र किया है।
  • रणनीतिक प्रतिबंध: अमोनियम नाइट्रेट के निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लागू किया गया, ताकि घरेलू कोयला खनन में प्रयुक्त विस्फोटकों को प्राथमिकता दी जा सके और तापीय विद्युत हेतु कोयला उत्पादन निर्बाध बना रहे।
  • राजकोषीय राहत: ऊर्जा-गहन क्षेत्रों (सिरेमिक, काँच, टायर) के लिए मूल सीमा शुल्क में कमी की गई, जिससे लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति को नियंत्रित किया जा सके।

PWOnlyIAS विशेष

  • वैधानिक आधार: सतत् विमानन ईंधन हेतु विधिक ढाँचा सतत् विमानन ईंधन (विपणन विनियमन) आदेश, 2001 में संशोधन द्वारा सक्षम किया गया।
  • ऑक्टेन बनाम ऊर्जा: एथेनॉल का ऑक्टेन मान अधिक होता है (जो इंजन प्रदर्शन और प्रस्फुटन-रोधी गुणों में सुधार करता है), किंतु इसका ऊर्जा घनत्व पेट्रोल की तुलना में कम होता है (जिससे माइलेज घटता है)।
  • सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल का रासायनिक स्वरूप: यह रासायनिक रूप से एविएशन टरबाइन फ्यूल के समान होता है; यह अल्कोहल नहीं बल्कि एक संश्लेषित हाइड्रोकार्बन है।
  • पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन की भूमिका: यह संगठन उद्योग संवर्द्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग (वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय) के अधीन कार्य करता है तथा गैस वितरण स्टेशनों के लाइसेंसिंग हेतु नोडल एजेंसी है।
  • द्वितीय पीढ़ी फीडस्टॉक: द्वितीय पीढ़ी एथेनॉल में गैर-खाद्य जैव-आधारित पदार्थों का उपयोग किया जाता है, जिससे जल-ऊर्जा-खाद्य अंतर्संबंध से उत्पन्न संघर्ष को कम करने में सहायता मिलती है।

महत्त्व – बहुआयामी प्रभाव

  • रणनीतिक ऊर्जा स्वायत्तता: E100 तथा सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल की दिशा में तीव्रता से अग्रसर होकर भारत पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक अस्थिरता के प्रति अपनी संवेदनशीलता को कम करता है।
    • इससे वैश्विक कच्चे तेल की उच्च कीमतों के कारण चालू खाता घाटे में होने वाली अचानक वृद्धि से अर्थव्यवस्था को संरक्षण मिलता है।
  • कठोर नियंत्रणीय क्षेत्रों का डीकार्बोनाइजेशन: जहाँ यात्री वाहनों में विद्युतीकरण की प्रवृत्ति बढ़ रही है, वहीं विमानन और लंबी दूरी के परिवहन क्षेत्रों का विद्युतीकरण कठिन बना हुआ है।
    • ऐसे में सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल और उच्च मिश्रण वाले जैव ईंधन, बिना मौजूदा विमान एवं इंजन अवसंरचना में व्यापक परिवर्तन किए, डीकार्बोनाइजेशन का व्यवहार्य मार्ग प्रदान करते हैं।
  • कृषि समृद्धि एवं चक्रीय अर्थव्यवस्था: द्वितीय पीढ़ी एथेनॉल की ओर संक्रमण, कृषि अपशिष्ट (जैसे धान का पुआल) को एक पर्यावरणीय समस्या (पराली दहन) से आर्थिक संपदा में परिवर्तित करता है।
    • इससे अपशिष्ट से संपदा मिशन को बढ़ावा मिलता है तथा ग्रामीण आय में वृद्धि होती है।
  • उत्सर्जन दक्षता (ऑक्सीजनयुक्त दहन): एथेनॉल एक ऑक्सीजनयुक्त ईंधन है; इसकी उच्च ऑक्सीजन मात्रा अधिक पूर्ण दहन सुनिश्चित करती है।
    • इससे कार्बन मोनोऑक्साइड तथा पार्टिकुलेट मैटर के उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आती है, जिससे शहरी वायु गुणवत्ता में सुधार होता है।
  • वैश्विक मानकों के अनुरूपता: कॉरपोरेट औसत ईंधन दक्षता मानकों तथा अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन के मानकों के साथ सामंजस्य स्थापित कर भारत यह सुनिश्चित करता है कि उसके निर्माता और विमानन क्षेत्र वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में बने रहें तथा अंतरराष्ट्रीय कार्बन दंड से बच सकें।

समाधान किए जाने योग्य चुनौतियाँ

  • ऊर्जा घनत्व में अंतर: एथेनॉल का ऊर्जा घनत्व पेट्रोल की तुलना में लगभग 33 प्रतिशत कम होता है।
    • उपभोक्ताओं के लिए इसका अर्थ कम माइलेज है, जिससे अपनाने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, जब तक कि एथेनॉल की कीमत को पेट्रोल की तुलना में पर्याप्त रूप से कम न रखा जाए ताकि प्रति किलोमीटर लागत में समानता प्राप्त हो सके।
  • जल-ऊर्जा-खाद्य अंतर्संबंध: प्रथम पीढ़ी एथेनॉल (गन्ना और खाद्य अनाज से) पर अत्यधिक निर्भरता भूजल के क्षरण और खाद्य कीमतों में वृद्धि का कारण बन सकती है।
    • ईंधन आवश्यकताओं और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना एक संवेदनशील चुनौती है।
  • अवसंरचनात्मक और सामग्री संबंधी बाधाएँ: E100 की ओर संक्रमण के लिए ईंधन आपूर्ति शृंखला का व्यापक पुनर्गठन आवश्यक है।
    • एथेनॉल आर्द्रताग्राही होता है (जल को अवशोषित करता है) और इसका पेट्रोलियम हेतु निर्मित वर्तमान पाइपलाइनों से परिवहन नहीं किया जा सकता, जिसके कारण विशेषीकृत और महँगी लॉजिस्टिक व्यवस्था की आवश्यकता होती है।
  • राजकोषीय असमानता: वर्तमान में विद्युत वाहन को 5 प्रतिशत वस्तु एवं सेवा कर का लाभ प्राप्त है, जबकि फ्लेक्स-फ्यूल वाहन पर अधिक कर भार (लगभग 28 प्रतिशत तथा उपकर) लागू होता है।
    • यह कर अंतर निर्माताओं और मध्यम वर्गीय उपभोक्ताओं को फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के चयन से हतोत्साहित करता है।
  • फीडस्टॉक आपूर्ति शृंखला की विस्तार क्षमता: यद्यपि द्वितीय पीढ़ी एथेनॉल पर्यावरण की दृष्टि से लाभकारी है, किंतु बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उत्पादन हेतु आवश्यक प्रौद्योगिकी (जैसे बरगढ़ रिफाइनरी) अभी प्रारंभिक अवस्था में है और इसके लिए उच्च पूँजी निवेश की आवश्यकता होती है।

आगे की राह

  • कर संरचना का युक्तीकरण: सरकार को ‘फ्लेक्स-फ्यूल’ आधारित वाहनों के लिए चरणबद्ध वस्तु एवं सेवा कर संरचना पर विचार करना चाहिए, जिससे इन्हें पारंपरिक आंतरिक दहन इंजन और विद्युत वाहनों की सीमा के बीच में रखा जा सके, ताकि पारितंत्र के परिपक्व होने तक इनके उपयोग को प्रोत्साहन मिल सके।
  • द्वितीय एवं तृतीय पीढ़ी जैव ईंधनों को बढ़ावा: नीतिगत ध्यान को प्रथम पीढ़ी से हटाकर द्वितीय पीढ़ी (फसल अवशेष आधारित) तथा तृतीय पीढ़ी (शैवाल आधारित) जैव ईंधनों की ओर निर्णायक रूप से स्थानांतरित किया जाना चाहिए, जिससे खाद्य सुरक्षा की रक्षा हो तथा ऊर्जा क्षेत्र का ‘वाटर फुटप्रिंट’ कम किया जा सके।
  • अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहन: उच्च संपीडन क्षमता वाले फ्लेक्स-फ्यूल आधारित इंजनों के स्वदेशी विकास हेतु व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण प्रदान किया जाना चाहिए, जिससे ऊर्जा घनत्व समस्या का समाधान हो सके और ‘फ्लेक्स-फ्यूल’ आधारित वाहन पेट्रोल वाहनों के समान दक्ष बन सकें।
  • समर्पित जैव-ईंधन गलियारे: लॉजिस्टिक बाधाओं को दूर करने हेतु भारत को समर्पित एथेनॉल पाइपलाइन तथा हरित रेल गलियारे विकसित करने चाहिए, जो अधिशेष गन्ना उत्पादक राज्यों (जैसे- उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र) को देश के अन्य भागों से जोड़ें।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: भारत की अध्यक्षता में प्रारंभ वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन का उपयोग करते हुए ‘सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल’ आधारित मिश्रण तथा कार्बन क्रेडिट तंत्र पर सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान किया जाना चाहिए, जिससे भारत उभरती वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा व्यवस्था में नेतृत्व कर सके।

निष्कर्ष 

भारत द्वारा E100 ईंधन, फ्लेक्स-फ्यूल वाहन, सतत् विमानन ईंधन तथा संपीडित जैव-गैस को बढ़ावा देना ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु लक्ष्यों और ग्रामीण परिवर्तन के रणनीतिक समन्वय को दर्शाता है। इसकी सफलता प्रौद्योगिकी नवाचार, सतत् फीडस्टॉक उपलब्धता तथा स्थिर नीतिगत समर्थन पर निर्भर करेगी, जिससे यह संक्रमण आर्थिक रूप से व्यवहार्य, पर्यावरणीय रूप से सतत् और वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्द्धी बन सके।

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