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‘टॉक्सिक’ कार्य-संस्कृति एवं मनोसामाजिक जोखिम

Lokesh Pal April 25, 2026 03:40 5 0

संदर्भ

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) द्वारा “द साइकोसोशल वर्किंग एनवायरनमेंट: ग्लोबल डेवलपमेंट्स एंड पाथवे फॉर एक्शन”  शीर्षक से एक नई वैश्विक रिपोर्ट जारी की गई है।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • उच्च वैश्विक मृत्यु दर: विश्व भर में प्रतिवर्ष 8,40,000 से अधिक लोगों की मृत्यु मनोसामाजिक जोखिमों से संबंधित स्वास्थ्य स्थितियों के कारण होती है, जिनमें लंबे कार्य घंटे, नौकरी की असुरक्षा और कार्यस्थल उत्पीड़न शामिल हैं।
    • स्वस्थ जीवन वर्षों की उल्लेखनीय हानि: ये जोखिम प्रतिवर्ष लगभग 4.5 करोड़ दिव्यन्गताता-समायोजित जीवन वर्षों की हानि का कारण बनते हैं।
  • महत्त्वपूर्ण आर्थिक प्रभाव: मनोसामाजिक जोखिम कारकों से संबंधित हृदय रोग और मानसिक विकारों का संयुक्त प्रभाव वैश्विक स्तर पर प्रतिवर्ष सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1.37 प्रतिशत हानि का कारण बनता है।
  • लंबे कार्य घंटे एक प्रमुख जोखिम कारक: रिपोर्ट के अनुसार, लंबे कार्य घंटे एक महत्त्वपूर्ण मनोसामाजिक जोखिम कारक हैं, जो हृदय रोग और आघात के बढ़ते जोखिम से जुड़े हैं और यह समस्या व्यापक रूप से विद्यमान है।
    • अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का अनुमान है कि वैश्विक स्तर पर 35 प्रतिशत श्रमिक प्रति सप्ताह 48 घंटे से अधिक कार्य करते हैं।
  • कार्यस्थल उत्पीड़न और हिंसा: उत्पीड़न तथा हिंसा के विभिन्न रूपों के संपर्क में आना एक अन्य प्रमुख चिंता है।
    • अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का अनुमान है कि वैश्विक स्तर पर 23 प्रतिशत श्रमिकों ने अपने कार्यकाल में कम-से-कम एक प्रकार की हिंसा या उत्पीड़न का अनुभव किया है, जिनमें मनोवैज्ञानिक हिंसा सबसे अधिक प्रचलित (18 प्रतिशत) है।

‘टॉक्सिक’ कार्य संस्कृति के बारे में 

  • ‘टॉक्सिक’ कार्य संस्कृति को ऐसे नकारात्मक दृष्टिकोण, व्यवहार और प्रथाओं के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो किसी कर्मचारी के समग्र कल्याण (मानसिक और शारीरिक), नौकरी संबंधी संतुष्टि तथा कंपनी की उत्पादकता को कमजोर करते हैं।
  • भारत में कार्य संस्कृति
    • अधिक कार्यभार वाली कार्यशक्ति: वर्ष 2024 की एक अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा प्रकशित रिपोर्ट के अनुसार, भारत एशिया में सबसे अधिक अधिक-कार्यरत कार्यशक्ति वाला देश है, जहाँ वर्ष 2023 में 50.5 प्रतिशत कर्मचारी प्रति सप्ताह 49 घंटे से अधिक कार्य कर रहे हैं।
    • भारत के स्वास्थ्य और कल्याण में सर्वश्रेष्ठ कार्यस्थल 2023 रिपोर्ट
      • वर्ष 2023 में विभिन्न उद्योगों में कार्यस्थल पर कल्याण की स्थिति में गिरावट देखी गई है, विशेष रूप से मानसिक स्वास्थ्य समर्थन, व्यावसायिक विकास और प्रभावी प्रबंधन एवं सहभागिता में उल्लेखनीय कमी आई है।
      • उच्च रैंक वाले क्षेत्र: निर्माण, अवसंरचना, रियल एस्टेट तथा खुदरा क्षेत्र अग्रणी रहे।
      • निम्न रैंक वाले क्षेत्र: गैर-सरकारी संगठन, शिक्षा और प्रशिक्षण तथा व्यावसायिक सेवाएँ सबसे निम्न स्थान पर रहे।
  • विषाक्त कार्य संस्कृति के लक्षण
    • असमावेशिता: असमानताएँ जो LGBTQ समुदाय, दिव्यांगजन, जाति, धर्म, जेंडर, आयु आदि के आधार पर भेदभाव, पक्षपात और भाई-भतीजावाद के रूप में प्रकट होती हैं।
    • अनैतिक कार्य संस्कृति: अनैतिक आचरण तथा नियामकीय अनुपालन की कमी को बढ़ावा देना।

मनोसामाजिक जोखिमों के बारे में

मनोसामाजिक जोखिम उन पहलुओं को संदर्भित करते हैं, जो कार्य वातावरण, कार्य के प्रकार और संगठनात्मक संस्कृति से संबंधित होते हैं तथा किसी कर्मचारी के मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक कल्याण को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। ये जोखिम रसायनों या मशीनरी जैसे भौतिक खतरों से उत्पन्न नहीं होते, बल्कि इस बात से उत्पन्न होते हैं कि कार्य को किस प्रकार संरचित, प्रबंधित और कर्मचारियों द्वारा अनुभव किया जाता है।

    • मान्यता या सराहना का अभाव: कर्मचारियों को उनके कार्य और प्रगति के लिए मूल्यांकन और सराहना की आवश्यकता होती है, जिसके अभाव में कंपनी और कर्मचारी दोनों की उत्पादकता में कमी आती है।
    • उच्च कर्मचारी परिवर्तन दर: सूक्ष्म आक्रामकता और कार्यस्थल की राजनीति के कारण कर्मचारियों का निरंतर आना-जाना अनुपस्थिति और उच्च परिवर्तन दर को बढ़ाता है।

‘टॉक्सिक’ कार्य संस्कृति और मनोसामाजिक जोखिमों से उत्पन्न चुनौतियाँ

  • श्रम विनियमों का कमजोर प्रवर्तन: मौजूदा श्रम कानूनों के बावजूद कार्यस्थल सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य मानकों का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पाता, विशेषकर असंगठित क्षेत्र में।
    • भारत में गिग श्रमिक और डिलीवरी कर्मी प्रायः प्रतिदिन 12–14 घंटे कार्य करते हैं, बिना विनियमित सुरक्षा के, जिससे तनाव और अतिश्रम बढ़ता है।
  • लंबे कार्य घंटों और अतिश्रम की व्यापकता: अत्यधिक कार्य घंटे सामान्य हो गए हैं, जिससे हृदय संबंधी रोगों और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ता है।
    • भारत एशिया में सबसे अधिक अधिक-कार्यरत जनसंख्या वाले देशों में है, जहाँ 50 प्रतिशत से अधिक कर्मचारी प्रति सप्ताह 49 घंटे से अधिक कार्य करते हैं, विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी और कॉरपोरेट क्षेत्रों में।
  • कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य समर्थन का अभाव: अनेक संगठनों में परामर्श सेवाएँ, तनाव प्रबंधन प्रणाली और कल्याण कार्यक्रम जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं का अभाव है।
    • रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2023 में कार्यस्थल पर कल्याण की स्थिति  में गिरावट देखी गई, विशेषकर मानसिक स्वास्थ्य समर्थन और कर्मचारी सहभागिता के क्षेत्रों में।
  • कार्यस्थल उत्पीड़न और भेदभाव: धमकाने, उत्पीड़न और भेदभाव (लिंग, जाति या पहचान के आधार पर) से युक्त विषाक्त वातावरण अब भी विद्यमान है।
    • खुदरा और निर्माण जैसे क्षेत्रों में कार्यस्थल उत्पीड़न के मामले तथा नियुक्ति और पदोन्नति में सूक्ष्म भेदभाव देखने को मिलता है।
  • सामूहिक सौदेबाजी और श्रमिक प्रतिनिधित्व की कमजोरी: सीमित संघटन और कमजोर श्रमिक अभिव्यक्ति के कारण उचित कार्य परिस्थितियों पर वार्ता और शिकायतों के समाधान की क्षमता घटती है।
    • उभरते हुए क्षेत्रों जैसे प्लेटफॉर्म/गिग अर्थव्यवस्था में श्रमिकों के औपचारिक संगठन नहीं होते, जिससे वे नौकरी असुरक्षा और शोषण के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।

आगे की राह

  • कार्य संगठन में सुधार: अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट ने कार्य संगठन के संरचनात्मक और निरंतर पहलुओं जैसे कार्यभार, कार्य पर नियंत्रण, पूर्वानुमेयता, भागीदारी तथा संगठनात्मक न्याय पर अधिक ध्यान देने की अनुशंसा की है, जिससे एक अधिक समग्र निवारक दृष्टिकोण को प्रोत्साहन मिल सके।
  • नीति–व्यवहार संबंधी अंतराल को समाप्त करना: रिपोर्ट ने अनुसंधान, नीति और कार्यस्थल व्यवहार के बीच मजबूत संबंध स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया है तथा यह भी उल्लेख किया है कि सामूहिक सौदेबाजी और सामाजिक संवाद कानूनी प्रावधानों को क्षेत्रीय और कार्यस्थल स्तर पर लागू करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • निगरानी और मूल्यांकन तंत्र को सुदृढ़ करना: उन्नत निगरानी और सर्वेक्षण अधिक प्रणालीगत नीति मूल्यांकन तथा कार्य संगठन में सुधार हेतु व्यावहारिक और सहभागी दृष्टिकोणों का विकास प्रभावी प्रथाओं को अपनाने में सहायता कर सकता है तथा अधिक सुरक्षित एवं स्वस्थ मनोसामाजिक कार्य वातावरण सुनिश्चित कर सकता है।
  • सहभागी और व्यावहारिक कार्यस्थल सुधार: यह स्थिति से निपटने के लिए सरकार और उद्योग दोनों स्तरों पर नीतिगत हस्तक्षेपों की अनुशंसा करता है, साथ ही कार्यबल के सामूहिकीकरण को सशक्त बनाने पर भी बल देता है।

भारत में स्वस्थ कार्य संस्कृति को बढ़ावा देने हेतु सरकारी पहलें 

पहल / कानून (Initiative / Law) मुख्य विशेषताएँ  कार्य-संस्कृति से प्रासंगिकता 
श्रम संहिताएँ (2019–2020) 29 श्रम कानूनों का 4 संहिताओं में समेकन (वेतन, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा, व्यावसायिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य)। अनुपालन को सरल बनाता है, बेहतर कार्य परिस्थितियाँ एवं श्रमिक संरक्षण सुनिश्चित करता है।
व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशाएँ संहिता, 2020 कार्य-घंटों, सुरक्षा मानकों एवं कल्याण प्रावधानों का विनियमन सुरक्षित, मानवीय एवं विनियमित कार्यस्थलों को प्रोत्साहित करता है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 मातृत्व लाभ, बीमा, पेंशन (गिग श्रमिकों सहित) प्रदान करता है। नौकरी की असुरक्षा एवं वित्तीय तनाव को कम करता है।
POSH अधिनियम, 2013 आंतरिक शिकायत समिति (ICC) एवं उत्पीड़न के लिए शिकायत निवारण तंत्र अनिवार्य विशेषकर महिलाओं के लिए सुरक्षित एवं समावेशी कार्य वातावरण सुनिश्चित करता है।
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NMHP) मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता एवं परामर्श सेवाओं को बढ़ावा कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य एवं तनाव प्रबंधन को समर्थन
ई-श्रम पोर्टल (2021) असंगठित श्रमिकों का राष्ट्रीय डेटाबेस रोजगार सुरक्षा एवं सामाजिक संरक्षण को सुदृढ़ करता है।
कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं पर्यावरण पर राष्ट्रीय नीति (2009) निवारक सुरक्षा संस्कृति एवं श्रमिक सहभागिता पर बल स्वस्थ एवं सहभागी कार्य-संस्कृति को प्रोत्साहित करता है।
CPGRAMS (शिकायत पोर्टल) ऑनलाइन शिकायत निवारण तंत्र कार्यस्थल पर जवाबदेही एवं पारदर्शिता को बढ़ाता है।

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