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संक्षिप्त समाचार

Lokesh Pal July 06, 2026 03:30 6 0

भारत–माली प्रथम व्यापार मंच का शुभारंभ 

भारत और माली ने बढ़ते व्यापार एवं निवेश संबंधों के मध्य द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग को संस्थागत रूप देने के लिए बामाको में प्रथम भारत–माली निर्यात संवर्द्धन मंच का शुभारंभ किया।

मुख्य बिंदु

  • प्रथम व्यापार मंच: “व्यापार एवं रणनीतिक साझेदारियों को सुदृढ़ करना” विषय के अंतर्गत आयोजित किया गया।
  • आयोजन: माली के उद्योग एवं व्यापार मंत्रालय, बामाको स्थित भारतीय दूतावास तथा माली निर्यात संवर्द्धन एजेंसी (APEX-Mali) द्वारा आयोजित।
  • सहभागिता: मंच पर वाणिज्यिक साझेदारियों एवं समझौता ज्ञापनों (MoUs) को बढ़ावा देने के लिए बिजनेस-टू-बिजनेस (B2B), बिजनेस-टू-गवर्नमेंट (B2G) तथा गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट (G2G) बैठकें आयोजित की गईं।
    • APEX-Mali ने “रेडी-मेड बिजनेस प्लान्स” प्रस्तुत किए, जिनमें त्वरित निवेश के अवसरों को रेखांकित किया गया।
  • सहयोग के प्राथमिक क्षेत्र: दोनों देशों ने निम्नलिखित क्षेत्रों में गहन सहयोग की पहचान की:
    • कपास एवं वस्त्र
    • खनन एवं ऊर्जा
    • कृषि-उद्योग एवं शीया (shea) प्रसंस्करण
    • औषधि उद्योग
    • स्वास्थ्य एवं शिक्षा सहित सामाजिक अवसंरचना।
  • प्रमुख अनुरोध
    • माली ने अपने ‘सर्टिफिकेट ऑफ ओरजिन’ (Certificate of Origin) प्रणाली के डिजिटलीकरण तथा स्वीकृत भारतीय औषधीय उत्पादों के शीघ्र पंजीकरण के लिए भारत से सहयोग का अनुरोध किया।
    • भारत ने माली से शीया नट के निर्यात प्रतिबंध की समीक्षा तथा माली में भारतीय नागरिकों एवं निवेशों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का अनुरोध किया।
  • रोडमैप: माली ने अपने विजन माली 2063 के अंतर्गत सुरक्षित एवं अनुकूल व्यावसायिक वातावरण विकसित करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

भारत–माली द्विपक्षीय व्यापार

  • व्यापार में वृद्धि: वित्तीय वर्ष 2025–26 में भारत–माली द्विपक्षीय व्यापार 326.61 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया, जो पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में 55% की वृद्धि को दर्शाता है।
  • शुल्क-मुक्त टैरिफ वरीयता (DFTP) योजना: भारत की शुल्क-मुक्त टैरिफ वरीयता (Duty-Free Tariff Preference–DFTP) योजना ने द्विपक्षीय व्यापार को उल्लेखनीय बढ़ावा दिया है।
  • अप्रयुक्त निर्यात क्षमता: भारतीय बाजार में माली की अप्रयुक्त निर्यात क्षमता का अनुमान 3.96 बिलियन अमेरिकी डॉलर है।
  • माली का भारत को निर्यात: कच्चा कपास, प्रसंस्कृत चमड़ा, काजू, सीसा, गोंद अरबिक तथा तिल।
  • भारत का माली को निर्यात: औषधियाँ, सूती वस्त्र, दोपहिया एवं तिपहिया वाहन तथा साइकिलें।

बरगद (फाइकस बेंगेलेन्सिस)

बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने रेडियोकार्बन डेटिंग के माध्यम से बिहार के मुंगेर स्थित बरगद के वृक्ष की आयु लगभग 700 वर्ष प्रमाणित की है, जिससे यह वैज्ञानिक रूप से दिनांकित विश्व का सबसे प्राचीन बरगद का वृक्ष बन गया है।

बरगद (फाइकस बेंघालेन्सिस) के बारे में

  • बरगद मोरेसी (Moraceae) कुल का एक वृक्ष है तथा इसे भारत के राष्ट्रीय वृक्ष के रूप में मान्यता प्राप्त है।
  • प्राकृतिक वितरण: यह भारतीय उपमहाद्वीप का मूल निवासी है, जिसमें भारत, बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान एवं श्रीलंका शामिल हैं, तथा यह उष्णकटिबंधीय दक्षिण एशिया में व्यापक रूप से पाया जाता है।
  • राष्ट्रीय दर्जा: इसे भारत का राष्ट्रीय वृक्ष घोषित किया गया है।
    • यह गुजरात एवं मध्य प्रदेश का राजकीय वृक्ष भी है।
  • विशेषताएँ
    • विकास की प्रकृति: बरगद की शाखाओं से वायवीय सहायक जड़ें निकलती हैं, जो भूमि तक पहुँचकर अतिरिक्त तनों का रूप ले लेती हैं, जिससे यह वृक्ष अत्यधिक विस्तृत क्षेत्र में विस्तृत हो जाता है।
    • पत्तियाँ एवं फल: इसकी पत्तियाँ बड़ी और चमड़े जैसी होती हैं तथा इसमें छोटे साइकोनिया लगते हैं, जिनका परागण प्रजाति-विशिष्ट फिग वास्प के साथ एक विशिष्ट सहजीवी (Mutualistic) संबंध के माध्यम से होता है।
    • पारिस्थितिकी विशेषताएँ: यह वृक्ष पक्षियों, चमगादड़ों, कीटों एवं स्तनधारियों को वर्षभर भोजन एवं आश्रय प्रदान करता है तथा की-स्टोन प्रजाति के रूप में जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • महत्त्व
    • पारिस्थितिकी महत्त्व: बरगद कार्बन अवशोषण को बढ़ाता है, मृदा अपरदन को रोकता है, सूक्ष्म जलवायु में सुधार करता है तथा अपनी विस्तृत कैनोपी एवं जड़ प्रणाली के माध्यम से विविध वन्यजीवों का संरक्षण करता है।
    • सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्त्व: भारतीय परंपराओं में इसे दीर्घायु, ज्ञान एवं अमरत्व का प्रतीक माना जाता है तथा यह सामुदायिक सभाओं एवं धार्मिक अनुष्ठानों का प्रमुख केंद्र रहा है।
    • संरक्षण संबंधी महत्त्व: एक्सेलेरेटर मास स्पेक्ट्रोमेट्री (Accelerator Mass Spectrometry) आधारित रेडियोकार्बन डेटिंग के माध्यम से वृक्षों की आयु का विश्वसनीय आकलन किया जा सकता है, जिससे विरासत वृक्षों एवं ऐतिहासिक परिदृश्यों के संरक्षण को बल मिलता है।

बरगद एक पारिस्थितिकी रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण, सांस्कृतिक रूप से पूजनीय एवं वैज्ञानिक दृष्टि से मूल्यवान विरासत वृक्ष है, जो जैव विविधता, जलवायु अनुकूलन क्षमता तथा भारत की प्राकृतिक धरोहर के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।

पशुजन्य युद्ध अभ्यास (PYA)

पशुपालन एवं डेयरी विभाग ने जूनोटिक (पशुजन्य) रोगों की रोकथाम की तैयारी को सुदृढ़ करने के लिए मध्य प्रदेश में तीसरे राष्ट्रीय-स्तरीय पशुजन्य युद्ध अभ्यास (Pashujanya Yudh Abhyas–PYA) का आयोजन किया।

पशुजन्य युद्ध अभ्यास (PYA) के बारे में

  • पशुजन्य युद्ध अभ्यास (PYA) एक राष्ट्रीय-स्तरीय मॉक ड्रिल है, जिसका उद्देश्य पशु स्वास्थ्य आपातस्थितियों एवं जूनोटिक (पशुजन्य) रोगों के प्रकोप से निपटने के लिए भारत की तैयारी को सुदृढ़ करना है।
  • आरंभ: इसका आयोजन नेशनल वन हेल्थ मिशन (National One Health Mission) के अंतर्गत उभरते एवं पुनः उभरते जूनोटिक रोगों के लिए भारत की एकीकृत प्रतिक्रिया प्रणाली को क्रियान्वित करने हेतु किया जाता है।
  • आयोजक: मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के अंतर्गत पशुपालन एवं डेयरी विभाग (DAHD)।
    • इसका आयोजन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC), भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, राज्य सरकारों तथा राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया दल (NJORT) के सहयोग से किया जाता है।
  • उद्देश्य: वन हेल्थ (One Health) दृष्टिकोण के अंतर्गत जूनोटिक रोगों के प्रकोप के प्रबंधन हेतु भारत की तैयारी, समन्वय तंत्र एवं आपातकालीन प्रतिक्रिया क्षमता का मूल्यांकन एवं सुदृढ़ीकरण करना।
  • प्रमुख पहलें
    • वन हेल्थ आधारित अनुकरण : पशु, मानव एवं वन्यजीव क्षेत्रों से संबंधित जूनोटिक रोगों के प्रकोप का अनुकरण कर समन्वित आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र का परीक्षण किया जाता है।
    • संपूर्ण प्रतिक्रिया प्रणाली का परीक्षण: रोग निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी, रिपोर्टिंग, क्षेत्रीय जाँच, प्रयोगशाला निदान, नियंत्रण, जैव-सुरक्षा तथा जनसंचार व्यवस्था का परीक्षण किया जाता है।
    • अंतर-क्षेत्रीय समन्वय: पशु चिकित्सा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, वन्यजीव, खाद्य सुरक्षा, प्रयोगशालाओं एवं जिला प्रशासन के मध्य समन्वय स्थापित कर एकीकृत प्रकोप प्रबंधन सुनिश्चित किया जाता है।

राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया दल (NJORT) के बारे में

  • राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया दल (National Joint Outbreak Response Team–NJORT) वन हेल्थ दृष्टिकोण के अंतर्गत जूनोटिक (पशुजन्य) रोगों के प्रकोप के प्रबंधन के लिए एक बहु-विषयक त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र है।
  • आरंभ: इसकी स्थापना वर्ष 2024 में राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन के अंतर्गत एकीकृत रोग निगरानी एवं आपातकालीन प्रतिक्रिया को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से की गई।
  • भूमिका एवं कार्य
    • त्वरित महामारी विज्ञान (Epidemiological) की जाँच करता है तथा रोग निगरानी, नियंत्रण एवं प्रकोप प्रतिक्रिया का समन्वय करता है।
    • क्षेत्रीय एवं प्रयोगशाला निदान को सुगम बनाता है तथा आवश्यकता पड़ने पर जैव-सुरक्षा स्तर-3 (Bio-Safety Level-3) प्रयोगशालाओं की तैनाती सुनिश्चित करता है।
    • पशुजन्य युद्ध अभ्यास (PYA) एवं विषाणु युद्ध अभ्यास (Vishanu Yuddh Abhyas) जैसे राष्ट्रीय मॉक ड्रिल में भाग लेकर अंतर-क्षेत्रीय तैयारी एवं प्रतिक्रिया क्षमता को सुदृढ़ करता है।

महत्त्व

पशुजन्य युद्ध अभ्यास (PYA) प्रारंभिक पहचान, त्वरित प्रतिक्रिया एवं विभिन्न एजेंसियों के मध्य समन्वय को बेहतर बनाकर भारत के वन हेल्थ ढाँचे को सुदृढ़ करता है तथा जूनोटिक रोगों के विरुद्ध जनस्वास्थ्य, पशुधन एवं खाद्य सुरक्षा की रक्षा सुनिश्चित करता है।

रेडियो टेलीमेट्री
(
Radio Telemetry)

रेडियो टेलीमेट्री डेटा की मदद से रेडियो-टैग किए गए व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध (Z25) की निगरानी की जा रही थी, लेकिन मुदुमलाई टाइगर रिजर्व में एक बिजली की तार (विद्युत संचरण लाइन) से टकराने के कारण उस पक्षी की मृत्यु हो गई।

रेडियो टेलीमेट्री के बारे में

  • रेडियो टेलीमेट्री एक दूरस्थ निगरानी तकनीक है, जिसमें टैग किए गए विषयों से रेडियो तरंगों के माध्यम से डेटा रिसीवर तक प्रेषित किया जाता है, जिससे वास्तविक समय में निगरानी एवं विश्लेषण संभव होता है।
  • कार्यप्रणाली
    • सेंसर एवं रेडियो ट्रांसमीटर: निगरानी किए जा रहे जीव पर लगाया गया रेडियो ट्रांसमीटर स्थान अथवा शारीरिक मानकों जैसी जानकारी रिकॉर्ड कर उसे रेडियो सिग्नल्स में परिवर्तित करता है।
      • रेडियो सिग्नल्स विद्युत-चुंबकीय तरंगें (3 kHz–300 GHz) होती हैं, जो प्रकाश की गति से संचरित होती हैं तथा अपनी आयाम (Amplitude) या आवृत्ति (Frequency) में परिवर्तन करके एंटिना द्वारा डिकोड किए जाने योग्य सूचना का वायरलेस संचार करती हैं।
    • संकेतों का प्रसारण: ट्रांसमीटर एंटिना के माध्यम से इनकोडेड (Encoded) रेडियो संकेत प्रसारित करता है, जिससे दूरस्थ अथवा दुर्गम क्षेत्रों में भी डेटा का संचार संभव होता है।
    • प्राप्ति एवं विश्लेषण: रिसीवर इन सिग्नल्स को प्राप्त कर डिकोड करता है तथा उन्हें गतिविधि, व्यवहार एवं पर्यावरणीय परिस्थितियों की निगरानी हेतु उपयोगी जानकारी में परिवर्तित करता है।
  • अनुप्रयोग
    • वन्यजीव संरक्षण: रेडियो टेलीमेट्री संकटग्रस्त वन्यजीवों के प्रवास, आवास उपयोग, प्रजनन व्यवहार एवं जीवित रहने की निगरानी कर वैज्ञानिक संरक्षण एवं प्रजाति पुनर्स्थापन में सहायता करती है।
    • स्वास्थ्य सेवा: अस्पतालों में रोगियों की हृदय गति एवं अन्य महत्त्वपूर्ण शारीरिक संकेतों की निरंतर निगरानी बिना उनकी गतिविधियों को सीमित किए की जाती है।
    • एयरोस्पेस एवं औद्योगिक निगरानी: यह विमान प्रदर्शन, पाइपलाइनों, विद्युत अवसंरचना तथा अन्य महत्त्वपूर्ण अभियांत्रिकी प्रणालियों की वास्तविक समय में निगरानी को सक्षम बनाता है।

व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध के बारे में

  • व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध (Gyps bengalensis) भारतीय उपमहाद्वीप का एक बड़ा मृतभक्षी (Scavenging) पक्षी है, जो पशुओं के शवों का अपघटन करके महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकी भूमिका निभाता है।
  • विशेषताएँ
    • इसकी पहचान इसकी सफेद पीठ (White Rump), हल्के रंग के निचले पंखों (Underwing Coverts) और शव खाने (मृतभक्षण) के अनुकूल पंखरहित सिर से होती है।
    • यह मुख्यतः मृत पशुओं के शव (Carrion) को भोज्य पदार्थ के रूप में उपयोग करता है, जिससे संक्रामक रोगों के प्रसार को रोकने में सहायता मिलती है।
  • आवास: यह दक्षिण एशिया में खुले वन, घासभूमि, कृषि परिदृश्य तथा मानव बस्तियों के निकट पाए जाने वाले क्षेत्रों में निवास करता है।

संरक्षण स्थिति

  • IUCN रेड लिस्ट: गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered)।
  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: अनुसूची-I 
  • CITES: परिशिष्ट-II 
  • प्रमुख खतरे: इसकी संख्या में गिरावट का प्रमुख कारण डाइक्लोफेनाक नामक पशु-चिकित्सीय दवा से होने वाला विषाक्त प्रभाव है। इसके अतिरिक्त आवास विनाश, भोजन की कमी तथा विद्युत संचरण लाइनों से करंट लगना भी प्रमुख खतरे हैं।

महत्त्व

व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध पशुओं के शवों का शीघ्र निपटान करके रोगों के प्रसार को कम करता है तथा पारिस्थितिकी संतुलन एवं जनस्वास्थ्य बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।

नामेरी टाइगर रिजर्व 

नामेरी टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या वर्ष 2022 में 3 से बढ़कर 2025 में 12 हो गई है, जो भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा सत्यापित एक महत्त्वपूर्ण संरक्षण उपलब्धि है।

नामेरी टाइगर रिजर्व के बारे में

  • यह असम के सोनितपुर जिले में स्थित जैव विविधता से समृद्ध संरक्षित क्षेत्र है, जो सोनितपुर एलीफेंट रिजर्व का हिस्सा है।
    • यह बाघों, हाथियों, दुर्लभ पक्षियों तथा पूर्वी हिमालय की वनस्पतियों एवं जीव-जंतुओं का महत्त्वपूर्ण आवास है।
  • स्थापना: इसे 1978 में आरक्षित वन (Reserve Forest) घोषित किया गया, वर्ष 1985 में वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuary) अधिसूचित किया गया तथा वर्ष 1998 में राष्ट्रीय उद्यान (National Park) का दर्जा प्रदान किया गया।
    • वर्ष 2000 में प्रोजेक्ट टाइगर के अंतर्गत टाइगर रिजर्व घोषित किया गया, जिससे यह असम का दूसरा टाइगर रिजर्व बना।
  • अवस्थिति: यह असम के सोनितपुर जिले में पूर्वी हिमालय की तलहटी में स्थित है।
    • जिया-भराली नदी इसकी दक्षिणी सीमा बनाती है तथा रिजर्व के पारिस्थितिकी तंत्र को पोषित करती है।
  • समीपवर्ती टाइगर रिजर्व: इसकी उत्तरी सीमा अरुणाचल प्रदेश के पक्के (पाखुई) टाइगर रिजर्व से जुड़ी हुई है।
    • दोनों मिलकर पारिस्थितिकी रूप से जुड़े अंतर-राज्यीय बाघ एवं हाथी परिदृश्य का निर्माण करते हैं।
  • बाघों की स्थिति: ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन (AITE), 2022 के अनुसार बाघों की संख्या 3 थी, जो वर्ष 2025 में बढ़कर 12 हो गई। इसकी पुष्टि भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने की है।
    • स्थानीय स्तर पर विलुप्त होने के बाद नामेरी के सैटेलाइट कोर क्षेत्र सोनाई रूपाई वन्यजीव अभयारण्य में भी बाघों का सफलतापूर्वक पुनर्प्रवेश (Reintroduction) कराया गया है।

रिजर्व की प्रमुख विशेषताएँ

  • वनस्पति: यहाँ मुख्य रूप से असम घाटी के उष्णकटिबंधीय सदाबहार एवं अर्द्ध-सदाबहार वन पाए जाते हैं।
    • इसके अतिरिक्त यहाँ आर्द्र पर्णपाती वन, बाँस वन, बेंत वन तथा नदी तटीय घासभूमियाँ भी विद्यमान हैं।
  • जलवायु: यहाँ उपोष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु पाई जाती है, जिसमें अधिक वर्षा एवं आर्द्रता होती है।
    • यहाँ का जल तंत्र (Hydrology) जिया-भराली, बोर-डिकोराई एवं डीजी नदियों द्वारा पोषित होता है।
  • वन्यजीव
    • स्तनधारी: बंगाल टाइगर, एशियाई हाथी, क्लाउडेड लेपर्ड, तेंदुआ, ढोल (जंगली कुत्ता), गौर तथा स्लॉथ भालू
    • पक्षी: संकटग्रस्त व्हाइट-विंग्ड वुड डक (असम का राजकीय पक्षी), ग्रेट हॉर्नबिल तथा 370 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ।
    • जलीय जीव: यह गोल्डन महासीर का भी आवास है, जो एक मीठे जल की महत्त्वपूर्ण गेम फिश (Game Fish) है।
  • महत्त्व: नामेरी टाइगर रिजर्व पूर्वी हिमालय की जैव विविधता का संरक्षण करता है, अंतर-राज्यीय वन्यजीव गलियारों को सुदृढ़ बनाता है तथा व्हाइट-विंग्ड वुड डक एवं बंगाल टाइगर जैसी वैश्विक स्तर पर संकटग्रस्त प्रजातियों की रक्षा करता है।

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