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भारत में नागरिकता का प्रमाण

Lokesh Pal July 06, 2026 05:00 3 0

संदर्भ:

नागरिकता के प्रमाण पर चर्चा तब पुनः आरंभ हो गई, जब विदेश मंत्रालय (MEA) ने 24 जून, 2026 को स्पष्ट किया कि भारतीय पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज़ है, और इसे भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।

  • यह मुद्दा मतदाता सूची संशोधनों, न्यायिक घोषणाओं और नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (CAA), 2019 तथा असम से जुड़े नागरिकता विवादों की पृष्ठभूमि में और अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है।
  • इन घटनाक्रमों ने भारतीय नागरिकता को नियंत्रित करने वाले निर्धारण, दस्तावेज़ीकरण और संवैधानिक सिद्धांतों से संबंधित मूलभूत प्रश्नों को पुनर्जीवित कर दिया है।

पृष्ठभूमि

  • संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 संविधान के प्रारंभ में नागरिकता को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक ढाँचे को निर्धारित करते हैं।
  • अनुच्छेद 11 संसद को कानून के माध्यम से नागरिकता से संबंधित मामलों को विनियमित करने का अधिकार देता है।
  • संसद ने नागरिकता अधिनियम, 1955 लागू किया, जिसमें बदलती जनसांख्यिकीय, राजनीतिक और सुरक्षा चिंताओं को दूर करने के लिए कई बार संशोधन किया गया है।
  • भारत का नागरिकता शासन धीरे-धीरे अपेक्षाकृत समावेशी जन्म-आधारित दृष्टिकोण से हटकर एक अधिक प्रतिबंधात्मक ढाँचे में बदल गया है, जिसमें वंश, प्रवासन स्थिति और राष्ट्रीय सुरक्षा विचार शामिल हैं।

भारत में नागरिकता कानूनों का विकास

  • पहला चरण : जन्म से नागरिकता (Jus Soli)
    • नागरिकता अधिनियम, 1955 ने मुख्य रूप से ज्यूस सोलाई के सिद्धांत का पालन किया, जिसके तहत भारतीय क्षेत्र के भीतर जन्म लेना नागरिकता प्राप्त करने का मुख्य आधार था।
    • यह दृष्टिकोण स्वतंत्रता के ठीक बाद के दौर में भारत के समावेशी संवैधानिक दृष्टिकोण को दर्शाता था।
  • दूसरा चरण : वंशानुगत नागरिकता (ज्यूस सांग्विनिस – Jus Sanguinis)
    • अवैध प्रवासन पर बढ़ती चिंताओं, विशेष रूप से असम में, के कारण धीरे-धीरे ज्यूस सांग्विनिस की ओर बदलाव हुआ, जहाँ माता-पिता की नागरिकता अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई।
    • 1985 के असम समझौते ने प्रवासन इतिहास के आधार पर नागरिकता निर्धारित करने के लिए एक कट-ऑफ तारीख प्रस्तावित की।
  • तीसरा चरण : नागरिकता मानदंडों को कठोर करना
    • नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2003 ने नागरिकता को और अधिक प्रतिबंधित कर दिया, जिसमें यह प्रावधान किया गया कि भारत में पैदा हुआ व्यक्ति नागरिकता के लिए पात्र नहीं होगा यदि उसके माता-पिता में से कोई भी एक अवैध प्रवासी था।
    • इसके परिणामस्वरूप, नागरिकता निर्धारण में वंश, प्रवासन स्थिति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताएँ तेजी से शामिल होने लगीं।

संवैधानिक परिप्रेक्ष्य

  • अनुच्छेद 5-11
    • संविधान के प्रारंभ में नागरिकता को परिभाषित करते हैं।
    • संसद को कानून के माध्यम से नागरिकता को विनियमित करने का अधिकार देते हैं।
  • अनुच्छेद 14
    • नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों को विधि के समक्ष समता तथा विधियों के समान संरक्षण की गारंटी देता है।
  • अनुच्छेद 21
    • जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है, और इसका संरक्षण नागरिकता की स्थिति की चिंता किए बिना प्रत्येक व्यक्ति तक विस्तारित है।
  • संवैधानिक दृष्टिकोण
    • संविधान सभा ने नागरिकता को विशेष रूप से धर्म से जोड़ने के प्रस्तावों को, सचेत रूप से खारिज कर दिया था।
    • संवैधानिक संरचना धर्मनिरपेक्षता, समानता और गैर-भेदभाव के सिद्धांतों को दर्शाती है, जिसका अर्थ है कि अनुच्छेद 11 के तहत संसद की शक्ति मूलभूत संवैधानिक मूल्यों के विस्तार में कार्य करनी चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ

  • असम समझौता (2024)
    • सर्वोच्च न्यायालय ने नागरिकता अधिनियम की धारा 6A की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, और नागरिकता को विनियमित करने के संसद के व्यापक अधिकार को मान्यता दी।
    • इसने पिछली टिप्पणियों की भी पुष्टि की, कि बड़े पैमाने पर अवैध प्रवासन राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकता है।
  • एडीआर बनाम भारत संघ वाद (2026)
    • न्यायालय ने स्पष्ट किया, कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) स्वतंत्र रूप से नागरिकता का निर्धारण नहीं कर सकता है।
    • जहाँ भी संदेह उत्पन्न होता है, मामले को स्वयं निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित किए जाने की बजाय सक्षम वैधानिक प्राधिकरण के पास भेजा जाना चाहिए।

प्रमुख मुद्दे

  • एक निर्णायक नागरिकता दस्तावेज़ का अभाव
    • विभिन्न सरकारी दस्तावेज़ अलग-अलग विधिक उद्देश्यों को पूरा करते हैं।
    • आधार पहचान तथा निवास अधिकार सुनिश्चित करता है, मतदाता पहचान पत्र (Voter ID) चुनावी पंजीकरण की पुष्टि करता है, जबकि एक पासपोर्ट अंतरराष्ट्रीय यात्रा की सुविधा प्रदान करता है।
    • किसी एक निर्णायक नागरिकता दस्तावेज़ की अनुपस्थिति सामान्य नागरिकों के लिए विधिक अनिश्चितता उत्पन्न करती है।
  • प्रशासनिक अनिश्चितता
    • व्यक्तियों को नागरिकता स्थापित करने के लिए कई दस्तावेजों को प्रस्तुत करने की आवश्यकता हो सकती है।
    • इससे लंबी प्रशासनिक तथा विधिक प्रक्रियाओं का जोखिम बढ़ जाता है।
  • नागरिकों पर भार
    • नागरिकता को बार-बार सिद्ध करने का व्यावहारिक बोझ आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, प्रवासियों, वरिष्ठ नागरिकों तथा ऐतिहासिक दस्तावेजों की कमी वाले व्यक्तियों को असमान रूप से प्रभावित कर सकता है।
  • मानवाधिकार संबंधी चिंताएँ
    • अनिश्चित नागरिकता स्थिति विधिक पहचान, मतदान अधिकार, रोजगार के अवसर और न्यायिक उपचार तक पहुँच को प्रभावित कर सकती है, जिससे मानव गरिमा प्रभावित होती है।

शासन के लिए महत्त्व

  • संवैधानिक सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करते हुए चुनावी अखंडता को सुदृढ़ करता है।
  • व्यक्तिगत अधिकारों के संरक्षण के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा को संतुलित करता है।
  • नागरिकता प्रशासन में विधि के शासन को सुदृढ़ करता है।
  • पारदर्शी और कानूनी रूप से निश्चित दस्तावेज़ीकरण प्रणालियों के महत्त्व पर प्रकाश डालता है।

आगे की राह

  • एक स्पष्ट वैधानिक ढाँचा स्थापित करना, जो उन दस्तावेजों की पहचान करे जो नागरिकता को निर्णायक रूप से स्थापित करते हैं।
  • नागरिकता सत्यापन के लिए राज्यों में समान प्रशासनिक प्रक्रियाएँ सुनिश्चित करना।
  • अवैध प्रवासन से जुड़ी चिंताओं को दूर करते हुए समानता, धर्मनिरपेक्षता तथा उचित प्रक्रिया के संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना।
  • गोपनीयता और डेटा सुरक्षा की रक्षा करते हुए नागरिक पंजीकरण तथा पहचान डेटाबेस के डिजिटल एकीकरण को बढ़ाना।
  • यह सुनिश्चित करना, कि नागरिकता सत्यापन तंत्र पारदर्शी, सुलभ और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के अनुरूप रहे।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. “नागरिकता अधिकारों को प्राप्त करने का अधिकार है।” हालिया विधिक और राजनीतिक घटनाक्रमों के आलोक में, भारत में नागरिकता के संबंध में बदलते प्रमाण के बोझ तथा मानव गरिमा पर इसके निहितार्थों का विश्लेषण कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

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