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प्रधानमंत्री मोदी की ‘त्रि-राष्ट्र’ यात्रा: भारत की विकसित होती हिंद-प्रशांत रणनीति

Lokesh Pal July 08, 2026 03:09 4 0

संदर्भ

भारत के प्रधानमंत्री की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड की तीन देशों की यात्रा भारत की विकसित होती इंडो-पैसिफिक नीति को प्रतिबिंबित करती है, जो हिंद महासागर एवं प्रशांत महासागर को एक एकीकृत सामरिक समुद्री क्षेत्र के रूप में मानती है।

संबंधित तथ्य

  • यह यात्रा विजन महासागर (MAHASAGAR) को आगे बढ़ाती है, जो भारत की पूर्ववर्ती सागर (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) रूपरेखा का विस्तार हिंद महासागर से आगे बढ़ाकर व्यापक इंडो-पैसिफिक क्षेत्र तक करती है।

यात्रा की प्रमुख विशेषताएँ

  • इंडोनेशिया: प्रशांत क्षेत्र के लिए भारत का समुद्री प्रवेशद्वार
    • इंडोनेशिया मलक्का, सुंडा तथा लोम्बोक जलडमरूमध्य के निकट एक सामरिक स्थिति में स्थित है, जिनसे होकर भारत का व्यापार तथा ऊर्जा आयात का एक बड़ा भाग गुजरता है।

    • चर्चाओं का मुख्य केंद्र समुद्री सुरक्षा, रक्षा सहयोग, व्यापार, क्रिटिकल मिनरल्स (विशेषकर निकेल), ऊर्जा, अंतरिक्ष, औषधि उद्योग तथा कनेक्टिविटी रहने की अपेक्षा है।
    • निकेल में सहयोग, भारत के बैटरी विनिर्माण, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) पारिस्थितिकी तंत्र तथा स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण को समर्थन प्रदान करता है।
    • यह यात्रा वर्ष 2018 की व्यापक सामरिक साझेदारी तथा सबांग बंदरगाह एवं समुद्री क्षेत्र जागरूकता (MDA) में सहयोग को और सुदृढ़ करती है।

  • ऑस्ट्रेलिया: सामरिक साझेदारी को और सुदृढ़ बनाना
    • भारत और ऑस्ट्रेलिया ने अपने संबंधों को व्यापक सामरिक साझेदारी में परिवर्तित किया है, जिसके अंतर्गत रक्षा, क्रिटिकल मिनरल्स, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, स्वच्छ ऊर्जा तथा व्यापार जैसे क्षेत्रों में सहयोग सम्मिलित है।
    • ऑस्ट्रेलिया ने अपनी राष्ट्रीय रक्षा रणनीति, 2026 में भारत को “शीर्ष-स्तरीय सुरक्षा साझेदार” के रूप में मान्यता प्रदान की है।
    • द्विपक्षीय चर्चाओं में प्रस्तावित व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (CECA), आपूर्ति शृंखला सहनशीलता, क्रिटिकल मिनरल्स तथा क्वाड सहयोग पर विशेष ध्यान दिए जाने की अपेक्षा है।
    • यह साझेदारी मालाबार नौसैनिक अभ्यास तथा क्वाड की समुद्री सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सुरक्षा एवं सार्वजनिक वस्तुओं संबंधी पहलों के माध्यम से और अधिक सुदृढ़ हुई है।
  • न्यूजीलैंड: भारत की प्रशांत क्षेत्र में पहुँच का विस्तार
    • यह यात्रा चार दशकों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की न्यूजीलैंड की पहली यात्रा है।
    • यह हाल के उच्च-स्तरीय आदान-प्रदान तथा भारत–न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते (2026) पर आधारित है।

    • व्यापार, निवेश, पेशेवर गतिशीलता, शिक्षा, कृषि, रक्षा, आपदा प्रबंधन, आतंकवाद-रोधी सहयोग तथा खेल के क्षेत्रों में सहयोग के विस्तार की अपेक्षा है।
    • यह यात्रा भारत–न्यूजीलैंड के खेल संबंधों की शताब्दी (1926–2026) का भी स्मरण कराती है।

तीन देशों की यात्रा का महत्त्व

  • भारत की विकसित होती इंडो-पैसिफिक रणनीति का प्रतिबिंब: यह यात्रा भारत के सिद्धांत-आधारित इंडो-पैसिफिक दृष्टिकोण से द्विपक्षीय सहयोग पर केंद्रित साझेदारी-आधारित रणनीति की ओर बढ़ते परिवर्तन को प्रदर्शित करती है।
  • विजन महासागर (MAHASAGAR) का क्रियान्वयन: यह यात्रा विजन महासागर (MAHASAGAR) को व्यावहारिक सहयोग में परिवर्तित करते हुए पूर्वी हिंद महासागर तथा प्रशांत महासागर में साझेदारियों को सुदृढ़ करती है।
  • समुद्री सुरक्षा को सुदृढ़ करना: समुद्री क्षेत्र जागरूकता (MDA), नौसैनिक अभ्यासों तथा समुद्री संचार मार्गों (SLOCs) की सुरक्षा में सहयोग को बढ़ावा देकर स्वतंत्र, खुले, समावेशी एवं नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक को सुदृढ़ किया जाता है।
  • आपूर्ति शृंखला की सहनशीलता को बढ़ावा: महत्त्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals), स्वच्छ ऊर्जा, व्यापार विविधीकरण तथा लॉजिस्टिक्स में साझेदारी सामरिक आपूर्ति शृंखलाओं की संवेदनशीलता को कम करती है।
  • भारत की ब्लू इकोनॉमी (Blue Economy) एवं ऊर्जा सुरक्षा को समर्थन: समुद्री संचार मार्गों (SLOCs) के प्रमुख मार्गों की सुरक्षा, भारत के व्यापार, ऊर्जा आयात तथा व्यापक ब्लू इकोनॉमी (Blue Economy) संबंधी हितों की रक्षा करती है।
  • भारत के क्षेत्रीय प्रभाव को सुदृढ़ करना: यह यात्रा दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संगठन (ASEAN), क्वाड (Quad) तथा दक्षिण प्रशांत के साथ भारत की सामरिक सहभागिता का विस्तार करती है तथा इंडो-पैसिफिक में एक प्रमुख समुद्री शक्ति के रूप में उसकी भूमिका को सुदृढ़ करती है।

PWOnlyIAS विशेष

विजन महासागर (MAHASAGAR) के बारे में

  • घोषणा: वर्ष 2025 में भारत द्वारा वैश्विक दक्षिण (Global South) तथा इंडो-पैसिफिक के लिए एक विस्तारित समुद्री परिकल्पना के रूप में प्रस्तुत किया गया।
  • पूर्ण रूप: ‘क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक एवं समग्र उन्नति’ (MAHASAGAR)।
  • सागर (SAGAR) का विकास: सागर (SAGAR) अर्थात् क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास की परिकल्पना का विस्तार हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) से व्यापक इंडो-पैसिफिक तक करता है, जो भारत के विकसित होते समुद्री एवं सामरिक दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करता है।
  • प्रमुख स्तंभ: समुद्री सुरक्षा, सुरक्षित एवं सहनशील आपूर्ति शृंखलाओं, संपर्क, ब्लू इकोनॉमी (Blue Economy), आपदा सहनशीलता, क्षमता निर्माण, सतत् विकास तथा समावेशी क्षेत्रीय साझेदारियों को प्रोत्साहित करता है।
  • सामरिक उद्देश्य: अंतरराष्ट्रीय विधि, विशेषकर समुद्र के विधि पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS) पर आधारित स्वतंत्र, खुले, समावेशी, सुरक्षित एवं नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक की भारत की परिकल्पना को सुदृढ़ करना।

भारत की इंडो-पैसिफिक नीति के बारे में

  • इंडो-पैसिफिक एक भू-सामरिक एवं भू-आर्थिक क्षेत्र है, जो अफ्रीका के पूर्वी तट, हिंद महासागर से प्रशांत महासागर तक विस्तृत है तथा एशिया, अफ्रीका एवं ओशिनिया की अर्थव्यवस्थाओं एवं सुरक्षा हितों को जोड़ता है।
  • भारत की इंडो-पैसिफिक नीति एक सामरिक परिकल्पना है, जिसका उद्देश्य समुद्री सुरक्षा, संपर्क, आर्थिक सहयोग तथा क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देते हुए स्वतंत्र, खुले, समावेशी, नियम-आधारित, सुरक्षित एवं समृद्ध इंडो-पैसिफिक को प्रोत्साहित करना है।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • स्वतंत्र, खुला एवं समावेशी इंडो-पैसिफिक: नौवहन की स्वतंत्रता, अंतरराष्ट्रीय विधि (UNCLOS, 1982) के सम्मान, विवादों के शांतिपूर्ण समाधान तथा किसी विशिष्ट देश को लक्ष्य बनाए बिना समावेशी क्षेत्रीय व्यवस्था का समर्थन करता है।
    • आसियान की केंद्रीयता (ASEAN): दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों के संगठन (ASEAN) को इंडो-पैसिफिक संरचना का आधार मानते हुए इंडो-पैसिफिक पर आसियान दृष्टिकोण (AOIP) का समर्थन करता है।
    • समुद्री सुरक्षा: समुद्री क्षेत्र जागरूकता (MDA), समुद्री डकैती-रोधी प्रयासों, मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR), खोज एवं बचाव तथा ब्लू इकोनॉमी (Blue Economy) में सहयोग को सुदृढ़ करता है।
    • नियम-आधारित व्यवस्था: अंतरराष्ट्रीय विधि, संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता तथा विशेष रूप से दक्षिण चीन सागर में नौवहन एवं उड़ान की स्वतंत्रता का समर्थन करता है।
    • संपर्क एवं आर्थिक सहयोग: सहनशील आपूर्ति शृंखलाओं, व्यापार, डिजिटल संपर्क, महत्त्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals), स्वच्छ ऊर्जा तथा उच्च गुणवत्ता वाली अवसंरचना को प्रोत्साहित करता है।
  • प्रमुख स्तंभ
    • सागर (SAGAR): क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास, 2015 में घोषित भारत की समुद्री परिकल्पना, जो हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में सुरक्षा, क्षमता निर्माण तथा क्षेत्रीय सहयोग पर केंद्रित है।
    • महासागर (MAHASAGAR): क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक एवं समग्र उन्नति, वर्ष 2025 में घोषित भारत की विस्तारित समुद्री परिकल्पना, जो भारत की समुद्री परिकल्पना का विस्तार हिंद महासागर से व्यापक इंडो-पैसिफिक तक करती है।
    • एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy): दक्षिण-पूर्व एशिया तथा व्यापक इंडो-पैसिफिक के साथ सामरिक, आर्थिक एवं संपर्क संबंधों को सुदृढ़ करती है।
    • हिंद-प्रशांत महासागर पहल (IPOI): वर्ष 2019 में प्रारंभ, जिसका केंद्र समुद्री सुरक्षा, समुद्री पारिस्थितिकी, समुद्री संसाधन, क्षमता निर्माण, आपदा जोखिम न्यूनीकरण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा व्यापार संपर्क है।
  • प्रमुख साझेदार
    • क्वाड (Quad): भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ समुद्री सुरक्षा, महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों, आपूर्ति शृंखलाओं, साइबर सुरक्षा तथा मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) में सहयोग।
    • दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संगठन (ASEAN): आर्थिक, संपर्क तथा समुद्री पहलों के माध्यम से व्यापक सहभागिता, साथ ही आसियान की केंद्रीयता का समर्थन।
    • हिंद महासागर के साझेदार: हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) के देशों, जिनमें श्रीलंका, मालदीव, मॉरीशस, सेशेल्स, इंडोनेशिया तथा फ्राँस सम्मिलित हैं, के साथ सहयोग को सुदृढ़ करना।
    • प्रशांत क्षेत्र के साझेदार: ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान तथा प्रशांत द्वीपीय देशों (PICs) के साथ सामरिक संबंधों को सुदृढ़ करना।

भारत के लिए इंडो-पैसिफिक का महत्त्व

  • समुद्री व्यापार का केंद्र: इसमें समुद्री संचार मार्ग (SLOCs) सम्मिलित हैं, जिनसे होकर भारत का अधिकांश व्यापार, ऊर्जा आयात तथा वाणिज्यिक नौवहन संचालित होता है।
  • सामरिक सुरक्षा: समुद्री सुरक्षा, नौवहन की स्वतंत्रता, क्षेत्रीय स्थिरता तथा महत्त्वपूर्ण समुद्रतलीय अवसंरचना की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
  • आर्थिक महत्त्व: यह भारत की आर्थिक वृद्धि, ब्लू इकोनॉमी (Blue Economy), वैश्विक मूल्य शृंखलाओं तथा सहनशील महत्त्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाओं को समर्थन प्रदान करता है।
  • भू-राजनीतिक महत्त्व: यह दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संगठन (ASEAN), क्वाड (Quad), हिंद महासागर तटीय देशों तथा प्रशांत द्वीपीय देशों (PICs) के साथ भारत की सहभागिता का प्रमुख क्षेत्र है, जिससे क्षेत्रीय सहयोग एवं सामरिक साझेदारियाँ सुदृढ़ होती हैं।
  • वैश्विक दक्षिण के साथ सहभागिता: यह समावेशी एवं माँग-आधारित समुद्री सहयोग के माध्यम से वैश्विक दक्षिण (Global South) के विश्वसनीय विकास साझेदार एवं सशक्त आवाज के रूप में भारत की भूमिका को आगे बढ़ाने का एक महत्त्वपूर्ण मंच है।

निष्कर्ष

यह तीन देशों की यात्रा इस तथ्य को रेखांकित करती है कि भारत अब इंडो-पैसिफिक को केवल एक सामरिक अवधारणा के रूप में नहीं, बल्कि समुद्री सहयोग, आर्थिक सहनशीलता तथा सामरिक साझेदारियों के लिए एक परिचालन क्षेत्र के रूप में देख रहा है। इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड के साथ संबंधों को सुदृढ़ करते हुए भारत एक प्रमुख समुद्री हितधारक तथा स्वतंत्र, खुले, समावेशी एवं समृद्ध इंडो-पैसिफिक के निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण योगदानकर्ता के रूप में अपनी भूमिका को निरंतर सुदृढ़ कर रहा है।

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