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PPP 2.0: पूँजी परिसंचरण के माध्यम से अवसंरचना वित्तपोषण

Lokesh Pal July 07, 2026 02:48 6 0

संदर्भ

वर्ष 2047 तक विकसित भारत तथा वर्ष 2070 तक नेट जीरो के लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर भारत को PPP 2.0 ढाँचे (PPP 2.0 Framework) की आवश्यकता है, जो पूँजी परिसंचरण पर बल देते हुए अवसंरचना विकास एवं हरित संक्रमण के लिए दीर्घकालिक एवं सतत् वित्तपोषण एकत्र करने में सहायक हो।

सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के बारे में

  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) सरकार (सार्वजनिक क्षेत्र) एवं निजी संस्था के मध्य सार्वजनिक अवसंरचना अथवा सेवाओं के वित्तपोषण, निर्माण, संचालन एवं रखरखाव हेतु  किया जाने वाला दीर्घकालिक संविदात्मक प्रबंध है।
  • PPP मॉडल में निजी भागीदार द्वारा पूँजी निवेश किया जाता है, निर्धारित जोखिमों का वहन किया जाता है तथा सेवाएँ प्रदान की जाती है, जबकि सरकार नीतिगत समर्थन, विनियमन एवं निगरानी उपलब्ध कराती है।
  • उद्देश्य
    • निजी निवेश के माध्यम से अवसंरचना विकास को बढ़ावा देना।
    • सार्वजनिक सेवाओं के वितरण में दक्षता एवं नवाचार को प्रोत्साहित करना।
    • परियोजना जोखिमों को सरकार एवं निजी क्षेत्र के मध्य साझा करना।
    • सरकार पर वित्तीय भार को कम करना।
    • अवसंरचना विकास में तीव्रता लाना।

सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के प्रमुख मॉडल 

मॉडल अर्थ 
बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOT) निजी संस्था परियोजना का निर्माण करती है, निर्धारित अवधि तक उसका संचालन करती है तथा बाद में उसे सरकार को हस्तांतरित कर देती है।
बिल्ड-ओन-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOOT) निजी भागीदार रियायत अवधि के दौरान परियोजना का स्वामित्व रखता है तथा अवधि समाप्त होने पर उसे सरकार को हस्तांतरित कर देता है।
डिजाइन-बिल्ड-फाइनेंस-ऑपरेट-ट्रांसफर (DBFOT) निजी संस्था परियोजना का डिजाइन तैयार करती है, उसका वित्तपोषण एवं निर्माण तथा संचालन करती है और बाद में उसे सरकार को हस्तांतरित कर देती है।
हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल (HAM) सरकार एवं निजी क्षेत्र संयुक्त रूप से परियोजना का वित्तपोषण करते हैं। सामान्यतः सरकार निर्माण लागत का बड़ा भाग वहन करती है, जबकि निजी भागीदार परियोजना का निर्माण एवं संचालन करता है।
ऑपरेशन एंड मेंटेनेंस (O&M ) निजी कंपनी किसी मौजूदा सार्वजनिक परिसंपत्ति का निर्माण किए बिना उसका संचालन एवं रखरखाव करती है।

PPP 1.0 से प्राप्त प्रमुख सीख 

सफलताएँ

PPP मॉडल ने निम्नलिखित क्षेत्रों में उल्लेखनीय परिवर्तन किया:

  • हवाई अड्डे
  • राष्ट्रीय राजमार्ग
  • बंदरगाह
  • मेट्रो परियोजनाएँ।

इसने 2000 के दशक में अवसंरचना निर्माण की गति को तीव्र किया।

PPP 1.0 को किन समस्याओं का सामना करना पड़ा?

PPP 1.0 की प्रमुख कमजोरी साझेदारी मॉडल में नहीं, बल्कि उसकी त्रुटिपूर्ण वित्तपोषण व्यवस्था में थी, क्योंकि दीर्घकालिक अवसंरचना परिसंपत्तियों का वित्तपोषण अल्पकालिक बैंक ऋणों के माध्यम से किया गया।

मुख्य समस्या: परिसंपत्ति–दायित्व असंतुलन 

  • अवसंरचना परिसंपत्तियाँ 30–50 वर्षों की अवधि में प्रतिफल प्रदान करती हैं।
  • किन्तु उनका वित्तपोषण मुख्यतः निम्नलिखित माध्यमों से किया गया:
    • बैंक ऋण
    • केवल 7–10 वर्षों की अल्प ऋण अवधि।

परिणाम

  • संचालन के प्रारंभिक वर्षों में ऋण पुनर्भुगतान का अत्यधिक भार
  • वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट तथा घरेलू आर्थिक मंदी के कारण राजस्व में कमी।
  • बैंकिंग क्षेत्र में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) में वृद्धि।
  • निवेशकों के विश्वास में कमी, जिसके परिणामस्वरूप PPP आधारित अवसंरचना परियोजनाओं की गति धीमी हुई।

भारत को PPP 2.0 की आवश्यकता क्यों है?

  • अवसंरचना निवेश की अत्यधिक आवश्यकता
    • भारत की अवसंरचना परियोजना पाइपलाइन में 13,000 से अधिक परियोजनाएँ शामिल हैं, जिनका कुल मूल्य लगभग ₹185 लाख करोड़ है।
    • इसके अतिरिक्त निम्नलिखित क्षेत्रों में भी विशाल स्तर पर निवेश की आवश्यकता है:
      • नवीकरणीय ऊर्जा
      • हरित हाइड्रोजन
      • विद्युत पारेषण नेटवर्क
      • जलवायु-सहिष्णु शहर
      • शहरी परिवहन
      • जल अवसंरचना
      • डिजिटल अवसंरचना।
  • वैश्विक संस्थागत पूँजी की उपलब्धता: पेंशन फंड, सॉवरेन वेल्थ फंड तथा बीमा कंपनियों जैसे वैश्विक संस्थागत निवेशक 110 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की दीर्घकालिक पूँजी का प्रबंधन करते हैं। स्थिर, मुद्रास्फीति से संबद्ध तथा पूर्वानुमेय प्रतिफल के कारण अवसंरचना उनके लिए एक आकर्षक परिसंपत्ति वर्ग है।
  • सरकार के सीमित वित्तीय संसाधन: स्वास्थ्य, शिक्षा, रक्षा, कल्याण, कृषि तथा सामाजिक सुरक्षा जैसी प्रतिस्पर्द्धी प्राथमिकताओं के कारण सरकार के वित्तीय संसाधन सीमित हैं। ऐसे में भारत की बढ़ती अवसंरचना आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए निजी निवेश जुटाना अत्यंत आवश्यक हो गया है।

PPP 2.0: नई वित्तपोषण संरचना

PPP 2.0 पूँजी एकत्र करने = से आगे बढ़कर पूँजी परिसंचरण पर आधारित व्यवस्था पर आधारित है।

पूँजी परिसंचरण का अर्थ

परियोजना के जीवन-चक्र के विभिन्न चरणों में, जोखिम वहन क्षमता के अनुसार अलग-अलग निवेशकों द्वारा वित्तपोषण किया जाना चाहिए।

चरणवार वित्तपोषण मॉडल

चरण उपयुक्त वित्तपोषक
परियोजना की तैयारी सरकार
भूमि अधिग्रहण सरकार
निर्माण सरकार + निजी डेवलपर
संचालन चरण इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (InvITs)
परिपक्व परिसंपत्तियाँ पेंशन फंड, बीमा फंड एवं सॉवरेन वेल्थ फंड।

इस प्रकार, पूँजी एक परियोजना से दूसरी परियोजना में निरंतर प्रवाहित होती रहती है, बजाय इसके कि वह एक ही परियोजना में लंबे समय तक फँसी रहे।

सर्कुलर फाइनेंस या चक्रीय वित्तपोषण की अवधारणा

परिसंपत्तियों को अनिश्चितकाल तक अपने पास बनाए रखने के विपरीत—

  • सरकार निर्माण कार्य के लिए वित्तपोषण करती है।
  • डेवलपर प्रोजेक्ट/परियोजना का निर्माण करता है।
  • संचालित परिसंपत्तियों को अवसंरचना निवेश न्यास/इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (InvITs) को हस्तांतरित कर दिया जाता है।
  • डेवलपर अपनी पूँजी वापस प्राप्त करता है।
  • प्राप्त पूँजी का उपयोग नई परियोजनाओं के वित्तपोषण में किया जाता है।

इस प्रकार निरंतर निवेश चक्र का निर्माण होता है।

PPP 2.0 के लाभ

  • आर्थिक लाभ: PPP 2.0 अधिक निजी निवेश आकर्षित करके, पूँजी की लागत कम करके, वित्तीय दक्षता बढ़ाकर तथा अवसंरचना परियोजनाओं की व्यवहार्यता में सुधार करके अवसंरचना विकास को गति प्रदान कर सकता है।
    • अवसंरचना का तीव्र विकास
    • अधिक निजी निवेश
    • पूँजी की कम लागत
    • बेहतर वित्तीय प्रबंधन
    • परियोजनाओं की बेहतर व्यवहार्यता
  • वित्तीय लाभ: पूँजी के पुनर्चक्रण एवं दीर्घकालिक वित्तपोषण को बढ़ावा देकर PPP 2.0 वित्तीय प्रणाली को सुदृढ़ कर सकता है तथा अवसंरचना वित्तपोषण में सुधार ला सकता है।
    • गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) में कमी
    • बेहतर परिसंपत्ति–दायित्व संतुलन
    • सार्वजनिक धन का अधिक दक्ष उपयोग
    • बॉण्ड एवं अवसंरचना वित्त बाजारों का विस्तार।
  • विकासात्मक लाभ: PPP 2.0 सतत्, समावेशी एवं लचीले अवसंरचना विकास को बढ़ावा देकर भारत के दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक है।
    • विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को गति प्रदान करता है।
    • वर्ष 2070 तक नेट जीरो की प्रतिबद्धताओं को समर्थन देता है।
    • लॉजिस्टिक्स प्रतिस्पर्द्धात्मकता में सुधार करता है।
    • रोजगार के अवसर सृजित करता है।
    • सतत् शहरीकरण को बढ़ावा देता है।

चुनौतियाँ 

अपार संभावनाओं के बावजूद, PPP 2.0 के समक्ष अनेक संरचनात्मक, वित्तीय एवं संस्थागत चुनौतियाँ हैं, जिनका समाधान इसकी दीर्घकालिक सफलता के लिए आवश्यक है।

  • भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में विलंब: भूमि अधिग्रहण की धीमी प्रक्रिया से परियोजना की लागत बढ़ती है तथा क्रियान्वयन में देरी होती है।
  • विनियामक अनिश्चितता: नीतियों में बार-बार परिवर्तन से निवेशकों का विश्वास कम होता है।
  • विवाद समाधान तंत्र की कमजोरी: संविदात्मक विवादों के निपटान में देरी से निजी क्षेत्र की भागीदारी हतोत्साहित होती है।
  • सीमित कॉरपोरेट बॉण्ड बाजार: दीर्घकालिक ऋण बाजार के पर्याप्त विकसित न होने से अवसंरचना वित्तपोषण बाधित होता है।
  • पेंशन एवं बीमा फंडों की कम भागीदारी: विनियामक एवं बाजार संबंधी बाधाओं के कारण दीर्घकालिक संस्थागत निवेशकों का निवेश सीमित रहता है।
  • परियोजना तैयारी की सीमित क्षमता: परियोजनाओं के कमजोर डिजाइन एवं व्यवहार्यता आकलन से उनकी सफलता प्रभावित होती है।
  • नीतिगत स्थिरता की आवश्यकता: दीर्घकालिक निजी निवेश आकर्षित करने के लिए स्थिर एवं पूर्वानुमेय नीतिगत वातावरण अत्यंत आवश्यक है।

आगे की राह

एक सुदृढ़ PPP 2.0 ढाँचे का केंद्र पूँजी परिसंचरण, वित्तीय नवाचार तथा संस्थागत सुधार होने चाहिए, ताकि भारत की अवसंरचना संबंधी महत्त्वाकांक्षाओं हेतु सतत् वित्तपोषण को सुनिश्चित किया जा सके।

  • PPP 2.0 को अपनाना: ऐसी पूँजी परिसंचरण प्रणाली की ओर बढ़ना, जिसमें विभिन्न परियोजनाओं के मध्य निवेश का पुनर्चक्रण हो।
  • इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (InvITs) एवं परिसंपत्ति मुद्रीकरण का विस्तार: संचालित अवसंरचना परिसंपत्तियों से पूँजी मुक्त कर उसे नई परियोजनाओं में निवेश करना।
  • अवसंरचना ऋण निधियों (IDFs) को पुनर्जीवित करना: पूर्ण हो चुकी परियोजनाओं के पुनर्वित्तपोषण के लिए दीर्घकालिक पूँजी उपलब्ध कराना।
  • कॉरपोरेट बॉण्ड बाजार को मजबूत बनाना: बॉण्ड बाजार के विकास के माध्यम से दीर्घकालिक अवसंरचना वित्तपोषण को सुदृढ़ करना।
  • संस्थागत निवेशकों की भागीदारी को बढ़ाना: देशी एवं वैश्विक पेंशन फंड, बीमा फंड तथा सॉवरेन वेल्थ फंड के अधिक निवेश को प्रोत्साहित करना।
  • जोखिम-आधारित पुनर्मूल्य निर्धारण एवं पुनर्वित्तपोषण लागू करना: समय के साथ परियोजना के जोखिम कम होने के अनुरूप वित्तपोषण लागत को समायोजित करना।
  • परियोजना प्रशासन को सुदृढ़ करना: परियोजना की तैयारी, संविदा प्रबंधन तथा विवाद समाधान तंत्र में सुधार करना।
  • नीतिगत निश्चितता निर्धारित करना: निवेशकों का विश्वास बढ़ाने के लिए स्थिर एवं पूर्वानुमेय विनियामक ढाँचा बनाए रखना।

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