//php print_r(get_the_ID()); ?>
Lokesh Pal
July 07, 2026 02:48
6
0
वर्ष 2047 तक विकसित भारत तथा वर्ष 2070 तक नेट जीरो के लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर भारत को PPP 2.0 ढाँचे (PPP 2.0 Framework) की आवश्यकता है, जो पूँजी परिसंचरण पर बल देते हुए अवसंरचना विकास एवं हरित संक्रमण के लिए दीर्घकालिक एवं सतत् वित्तपोषण एकत्र करने में सहायक हो।
PPP मॉडल ने निम्नलिखित क्षेत्रों में उल्लेखनीय परिवर्तन किया:
इसने 2000 के दशक में अवसंरचना निर्माण की गति को तीव्र किया।
PPP 1.0 की प्रमुख कमजोरी साझेदारी मॉडल में नहीं, बल्कि उसकी त्रुटिपूर्ण वित्तपोषण व्यवस्था में थी, क्योंकि दीर्घकालिक अवसंरचना परिसंपत्तियों का वित्तपोषण अल्पकालिक बैंक ऋणों के माध्यम से किया गया।
PPP 2.0 पूँजी एकत्र करने = से आगे बढ़कर पूँजी परिसंचरण पर आधारित व्यवस्था पर आधारित है।
परियोजना के जीवन-चक्र के विभिन्न चरणों में, जोखिम वहन क्षमता के अनुसार अलग-अलग निवेशकों द्वारा वित्तपोषण किया जाना चाहिए।
इस प्रकार, पूँजी एक परियोजना से दूसरी परियोजना में निरंतर प्रवाहित होती रहती है, बजाय इसके कि वह एक ही परियोजना में लंबे समय तक फँसी रहे।
परिसंपत्तियों को अनिश्चितकाल तक अपने पास बनाए रखने के विपरीत—
इस प्रकार निरंतर निवेश चक्र का निर्माण होता है।
अपार संभावनाओं के बावजूद, PPP 2.0 के समक्ष अनेक संरचनात्मक, वित्तीय एवं संस्थागत चुनौतियाँ हैं, जिनका समाधान इसकी दीर्घकालिक सफलता के लिए आवश्यक है।
एक सुदृढ़ PPP 2.0 ढाँचे का केंद्र पूँजी परिसंचरण, वित्तीय नवाचार तथा संस्थागत सुधार होने चाहिए, ताकि भारत की अवसंरचना संबंधी महत्त्वाकांक्षाओं हेतु सतत् वित्तपोषण को सुनिश्चित किया जा सके।
<div class="new-fform">
</div>

Latest Comments