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वृद्ध एवं असाध्य रोगग्रस्त बंदियों की अनुकंपा रिहाई

Lokesh Pal July 18, 2026 05:11 6 0

संदर्भ 

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे तीन माह के भीतर वृद्ध एवं असाध्य रूप से बीमार कैदियों की मानवीय आधार पर समयपूर्व रिहाई के लिए एक व्यापक नीति तैयार करें।

संबंधित तथ्य 

  • निर्देशों का कारण: ये निर्देश राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) द्वारा दायर याचिका पर दिए गए, जिसमें अनुकंपा रिहाई के लिए एकसमान नीति के अभाव की ओर ध्यान आकर्षित किया गया। याचिका में यह भी बताया गया कि 31 दिसंबर, 2022 तक भारत की कारागार अधिभोग दर 131% थी तथा बड़ी संख्या में वृद्ध एवं असाध्य रूप से बीमार कैदियों को ऐसे विशेषीकृत चिकित्सा उपचार की आवश्यकता है, जिसे उपलब्ध कराने की क्षमता कारागार प्रशासन के पास नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देश

  • उद्देश्य: समयपूर्व रिहाई अथवा दंड परिहार (Remission) के लिए मानवीय, करुणामूलक एवं समयबद्ध व्यवस्था सुनिश्चित करना तथा कारागारों में भीड़भाड़ को कम करना।
  • पात्रता ढाँचा: प्रत्येक राज्य की नीति में पात्रता मानदंड, प्रक्रियागत ढाँचे तथा निर्णय-निर्माण प्रक्रिया का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।
  • राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों (SLSAs) से परामर्श: नीति का निर्माण SLSAs के परामर्श से किया जाए, ताकि पात्र कैदियों की प्रभावी पहचान एवं संस्थागत समन्वय सुनिश्चित हो सके।
  • असाध्य बीमारी की परिभाषा: न्यायालय ने राज्यों को असाध्य बीमारी की एक समान परिभाषा अपनाने का निर्देश दिया है। इसके लिए विशेष आवश्यकताओं वाले कैदियों पर UNODC हैंडबुक का संदर्भ लिया जाए, जिसमें इसे ऐसी स्थिति बताया गया है, जिसमें चिकित्सकीय रूप से स्वस्थ होने की कोई युक्तिसंगत संभावना न हो तथा मृत्यु की ओर अपरिहार्य प्रगति निश्चित हो।
  • स्वतंत्र चिकित्सकीय बोर्ड: राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को स्वतंत्र चिकित्सकीय बोर्डों का गठन करना होगा, जो असाध्य बीमारी अथवा गंभीर चिकित्सीय संवेदनशीलता के मामलों का परीक्षण एवं प्रमाणन करेंगे, जिसके बाद ही दंड परिहार अथवा समयपूर्व रिहाई पर विचार किया जाएगा।
  • अंडर ट्रायल रिव्यू कमेटीज’ (UTRCs) की भूमिका: न्यायालय ने निर्देश दिया कि UTRCs समय-समय पर वृद्ध, असाध्य रूप से बीमार एवं शारीरिक रूप से अक्षम कैदियों के मामलों की समीक्षा करें तथा जहाँ उपयुक्त हो, जमानत, पैरोल, दंड परिहार अथवा समयपूर्व रिहाई की अनुशंसा करें।
  • डिजिटल निगरानी: केंद्र सरकार को राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) के सहयोग से ई-प्रिजन्स (e-Prisons) पोर्टल संचालित करने का निर्देश दिया गया है, ताकि समय-पूर्व रिहाई के आवेदनों की ऑनलाइन प्रक्रिया, ट्रैकिंग, स्वचालित अलर्ट, अनुपालन निगरानी तथा गोपनीयता सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
  • अनुपालन तंत्र: केंद्र, राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को छह माह के भीतर अनुपालन शपथ-पत्र प्रस्तुत करना होगा, जिसमें पात्र कैदियों की संख्या, रिहा किए गए कैदियों की संख्या तथा लंबित मामलों का विवरण शामिल होगा।

वृद्ध एवं असाध्य रूप से बीमार कैदियों के लिए वर्तमान दंड परिहार व्यवस्था

  • पृथक ‘राष्ट्रीय दंड परिहार नीति’ का अभाव: भारत में वृद्ध अथवा असाध्य रूप से बीमार कैदियों के लिए कोई पृथक राष्ट्रीय दंड परिहार नीति उपलब्ध नहीं है।
  • राज्य-विशिष्ट कारागार नियम: दंड परिहार, पैरोल तथा समयपूर्व रिहाई का संचालन राज्य कारागार नियमों, जेल मैनुअल तथा दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC)/भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के अंतर्गत निर्मित दंड परिहार नीतियों के अनुसार किया जाता है।
  • प्रकरण-आधारित विचार: अत्यधिक आयु, असाध्य बीमारी, गंभीर दिव्यांगता अथवा दीर्घकालिक कारावास को समयपूर्व रिहाई अथवा अनुकंपा रिहाई के आवेदनों पर निर्णय लेते समय शमनकारी कारकों के रूप में माना जा सकता है, बशर्ते कि पात्रता एवं लोक सुरक्षा से संबंधित शर्तें पूरी हों।
  • संवैधानिक शक्तियाँ: राष्ट्रपति (अनुच्छेद-72) एवं राज्यपाल (अनुच्छेद-161) को क्षमादान, दंड परिहार, प्रविलंबन, विराम अथवा लघुकरण प्रदान करने की शक्ति प्राप्त है, जिसमें मानवीय आधार भी सम्मिलित हैं।
  • न्यायिक पर्यवेक्षण: उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि समयपूर्व रिहाई का निर्णय निष्पक्ष, मनमानेपन से मुक्त तथा लागू दंड परिहार नीति एवं संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के बारे में

  • NALSA एक वैधानिक प्राधिकरण है, जिसकी स्थापना विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत की गई थी। यह अधिनियम 9 नवंबर, 1995 से प्रभावी हुआ था।
  • उद्देश्य: संविधान के अनुच्छेद-39A के अनुरूप कमजोर एवं वंचित वर्गों को निःशुल्क एवं सक्षम विधिक सेवाएँ उपलब्ध कराना तथा न्याय तक समान पहुँच सुनिश्चित करना।
  • संरचना: भारत के मुख्य न्यायाधीश इसके संरक्षक-प्रमुख होते हैं, जबकि सर्वोच्च न्यायालय के कार्यरत अथवा सेवानिवृत्त न्यायाधीश कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं।

राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों (SLSAs) के बारे में:

  • SLSAs प्रत्येक राज्य में विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत गठित वैधानिक निकाय हैं।
  • उद्देश्य: राज्य स्तर पर NALSA की नीतियों एवं कार्यक्रमों का क्रियान्वयन करना तथा पात्र व्यक्तियों को निःशुल्क विधिक सहायता एवं विधिक प्रतिनिधित्व उपलब्ध कराना।
  • संरचना: उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इसके संरक्षक-प्रमुख होते हैं, जबकि उच्च न्यायालय के कार्यरत अथवा सेवानिवृत्त न्यायाधीश कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं।

भारत में पूर्व पहलें

  • मॉडल कारागार मैनुअल, 2016: गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा जारी इस मैनुअल में मानवीय आधार पर पात्र वृद्ध, दुर्बल एवं असाध्य रूप से बीमार कैदियों के लिए समयपूर्व रिहाई, पैरोल तथा फर्लो की अनुशंसा की गई है।
  • कारागार/सुधारात्मक प्रशासन सुधार: सातवीं अनुसूची की राज्य सूची (प्रविष्टि 4) के अंतर्गत कारागार एवं उनमें निरुद्ध व्यक्ति राज्य विषय हैं।
    • केंद्र सरकार समय-समय पर कारागार प्रशासन में सुधार, भीड़भाड़ कम करने तथा सुधारात्मक सेवाओं को सुदृढ़ करने के लिए परामर्श जारी करती रही है।
  • अंडर ट्रायल रिव्यू कमेटियाँ (UTRCs): सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद वर्ष 2015 में गठित UTRCs पात्र विचाराधीन कैदियों के मामलों की समय-समय पर समीक्षा कर जमानत की अनुशंसा करती हैं, जिससे कारागारों में भीड़भाड़ कम करने में सहायता मिलती है।
  • ई-प्रिजन्स (e-Prisons) परियोजना: इंटरऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (ICJS) के अंतर्गत लागू इस परियोजना के माध्यम से कारागार प्रशासन का डिजिटलीकरण किया गया है। इसके तहत कैदियों का अभिलेख प्रबंधन, मामलों की निगरानी तथा पारदर्शिता सुनिश्चित की जाती है।
  • कारागार सुधारों पर सर्वोच्च न्यायालय: 1,382 कारागारों में अमानवीय परिस्थितियाँ (2016–17) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कारागारों में भीड़भाड़, विधिक सहायता, स्वास्थ्य सेवाओं, स्वच्छता तथा पात्र कैदियों की समयबद्ध रिहाई सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न निर्देश जारी किए थे।

वैश्विक पहलें एवं मानक

  • कैदियों के साथ व्यवहार के लिए संयुक्त राष्ट्र के न्यूनतम मानक नियम (नेल्सन मंडेला नियम): संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वर्ष 2015 में अपनाए गए इन नियमों में कैदियों के स्वास्थ्य, गरिमा एवं मानवीय व्यवहार के अधिकार को मान्यता दी गई है, जिसमें गंभीर रूप से बीमार कैदियों के लिए उपयुक्त चिकित्सीय देखभाल भी शामिल है।
  • विशेष आवश्यकताओं वाले कैदियों के संबंध में UNODC हैंडबुक: संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय (UNODC) ने असाध्य बीमारी, गंभीर दिव्यांगता अथवा अत्यधिक आयु से ग्रस्त कैदियों के लिए, जहाँ लोक सुरक्षा के अनुरूप हो, अनुकंपा अथवा समयपूर्व रिहाई की अनुशंसा की है।

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