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Lokesh Pal
June 15, 2026 02:00
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भारत में बाल यौन शोषण की लगातार कम रिपोर्टिंग, जिसे कोयम्बटूर के हालिया सुलूर मामले ने उजागर किया है, गहन व्यवस्थागत अक्षमताओं, विधि प्रवर्तन में जनता के अविश्वास और साक्ष्य-आधारित, आघात-सचेत (trauma-informed) संस्थागत प्रतिक्रियाओं की गंभीर कमी को उजागर करती है।
बाल यौन शोषण के संस्थागत अदृश्यता को समाप्त करने के लिए प्रतिक्रियावादी, दंडात्मक कानूनों से व्यापक व्यवस्थागत सुधारों की ओर बढ़ने की आवश्यकता है। वास्तविक बाल संरक्षण के लिए आवश्यक जनविश्वास को बहाल करने हेतु आघात-सचेत पुलिसिंग, साक्ष्य-आधारित न्यायिक प्रबंधन और बाल-सुरक्षित शहरी नियोजन की आवश्यकता है।
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