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भारत में एथेनॉल मिश्रण: अवसर और चुनौतियाँ

Lokesh Pal July 13, 2026 05:30 5 0

संदर्भ

  • भारत ने अपने मूल लक्ष्य से पहले ही ई-20 ईंधन (E20 Fuel: 20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) का देशव्यापी क्रियान्वयन सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। इसके साथ ही एथेनॉल मिश्रण (Ethanol Blending) देश की ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) रणनीति का एक प्रमुख घटक बन गया है।
  • हालाँकि, इस नीति ने इसकी आर्थिक व्यवहार्यता (Economic Viability), पर्यावरणीय स्थिरता (Environmental Sustainability), कृषि पर प्रभाव तथा उपभोक्ता कल्याण (Consumer Welfare) को लेकर व्यापक बहस को जन्म दिया है, विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में गिरावट के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में।

पृष्ठभूमि

  • एथेनॉल (Ethanol) एक नवीकरणीय जैव-ईंधन (Renewable Biofuel) है, जिसका उत्पादन गन्ने के रस, क्षतिग्रस्त खाद्यान्न, मक्का (Maize) तथा अन्य जैव-आधारित कच्चे पदार्थों (Biomass Feedstocks) से किया जाता है।
  • राष्ट्रीय जैव-ईंधन नीति, 2018 (National Policy on Biofuels, 2018) के अंतर्गत भारत ने 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) प्राप्त करने के लक्ष्य को वर्ष 2030 से घटाकर 2025 कर दिया था, जिसे अब सफलतापूर्वक प्राप्त कर लिया गया है।
  • आयातित जीवाश्म ईंधनों (Fossil Fuels) पर निर्भरता कम करने तथा स्वच्छ परिवहन (Cleaner Transportation) को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पेट्रोल में एथेनॉल का मिश्रण किया जाता है।

एथेनॉल मिश्रण के उद्देश्य

  • ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ बनाना
    • भारत अपनी कच्चे तेल (Crude Oil) की आवश्यकता का लगभग 85% आयात करता है।
    • पेट्रोल में एथेनॉल का अधिक मिश्रण आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता को कम करता है तथा ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) को मजबूत बनाता है।
  • कार्बन उत्सर्जन में कमी
    • एथेनॉल को स्वच्छ दहन (Cleaner-burning) वाला नवीकरणीय ईंधन (Renewable Fuel) माना जाता है।
    • पेट्रोल में एथेनॉल के मिश्रण से ग्रीनहाउस गैसों (Greenhouse Gases) के उत्सर्जन में कमी आती है तथा यह भारत की जलवायु संबंधी प्रतिबद्धताओं (Climate Commitments) को पूरा करने में सहायक है।
  • किसानों की आय में वृद्धि
    • गन्ना, मक्का तथा क्षतिग्रस्त खाद्यान्न जैसे कृषि-आधारित कच्चे पदार्थों (Agricultural Feedstocks) की बढ़ती मांग से किसानों को अतिरिक्त बाज़ार अवसर प्राप्त होने की अपेक्षा है, जिससे उनकी आय बढ़ाने में सहायता मिलेगी।

एथेनॉल मिश्रण के लाभ

  • कच्चे तेल के आयात में कमी: आयातित पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता कम होने से भारत के भुगतान संतुलन (Balance of Payments) में सुधार होता है तथा वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव (Oil Price Shocks) के प्रति देश की संवेदनशीलता कम होती है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा: एथेनॉल भारत के स्वच्छ एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (Clean and Renewable Energy Sources) की ओर संक्रमण में महत्वपूर्ण योगदान देता है तथा सतत विकास (Sustainable Development) को समर्थन प्रदान करता है।
  • ग्रामीण आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन: एथेनॉल उत्पादन के विस्तार से जैव-ईंधन उद्योग (Biofuel Industries), ग्रामीण रोजगार तथा कृषि मूल्य श्रृंखलाओं (Agricultural Value Chains) के विकास के नए अवसर उत्पन्न होते हैं।
  • जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति में सहयोग: जीवाश्म ईंधनों की खपत में कमी से पेरिस समझौते (Paris Agreement) के अंतर्गत भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions – NDCs) को प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

प्रमुख चिंताएँ एवं चुनौतियाँ

आर्थिक चुनौतियाँ

1. एथेनॉल मिश्रित ईंधन महँगा पड़ सकता है

  • जब अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमत लगभग 70 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल से कम रहती है, तब एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (Ethanol-blended Petrol) पारंपरिक पेट्रोल की तुलना में अधिक महँगा हो सकता है।
  • ऐसी स्थिति में उपभोक्ताओं को वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।

2. किसानों तक लाभ पूरी तरह नहीं पहुँचता

  • यह नीति इस धारणा पर आधारित है कि एथेनॉल की बढ़ती मांग से किसानों की आय में वृद्धि होगी।
  • किंतु आर्थिक लाभ का एक बड़ा हिस्सा चीनी मिलों (Sugar Mills) और एथेनॉल आसवन संयंत्रों (Ethanol Distilleries) को प्राप्त होता है, जबकि किसानों को अक्सर केवल सीमित अतिरिक्त लाभ ही मिल पाता है।

तकनीकी चुनौतियाँ

पुराने वाहनों के साथ अनुकूलता (Compatibility) की समस्या

  • ई-20 (E20) अनुकूल इंजनों के आने से पहले निर्मित अनेक वाहनों में इंजन का घिसाव (Engine Wear), पुर्जों का क्षरण (Component Deterioration) तथा ईंधन दक्षता (Fuel Efficiency) में कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • यद्यपि इन चिंताओं की पुष्टि के लिए अभी और वैज्ञानिक अध्ययन एवं सत्यापन की आवश्यकता है, फिर भी उपभोक्ताओं द्वारा इस प्रकार की समस्याओं की व्यापक रूप से रिपोर्ट की गई है।

कृषि एवं पर्यावरणीय चुनौतियाँ

  • अत्यधिक जल खपत (High Water Consumption)
    • एथेनॉल उत्पादन के लिए प्रमुख कच्चे पदार्थ के रूप में प्रयुक्त गन्ना (Sugarcane) अत्यधिक जल-गहन (Water-intensive) फसल है।
    • गन्ने की खेती के विस्तार से भारत के पहले से ही दबावग्रस्त भूजल संसाधनों (Groundwater Resources) पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
  • अस्थिर फसल प्रतिरूप (Unsustainable Cropping Patterns) को बढ़ावा
    • एथेनॉल नीति सूखा-प्रवण (Drought-prone) क्षेत्रों में भी अधिक जल की आवश्यकता वाली फसलों की खेती को प्रोत्साहित करती है, जिससे क्षेत्रीय जल संकट (Water Scarcity) और गंभीर हो सकता है।
  • मृदा क्षरण (Soil Degradation)
    • गन्ने की निरंतर खेती से एकल फसल प्रणाली (Monoculture) को बढ़ावा मिलता है, उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग होता है तथा धीरे-धीरे मृदा उर्वरता (Soil Fertility) में गिरावट आती है।

खाद्य सुरक्षा संबंधी चिंताएँ

  • खाद्य बनाम ईंधन (Food versus Fuel) की दुविधा
    • ऐसे देश में, जहाँ खाद्य असुरक्षा (Food Insecurity) और कुपोषण (Malnutrition) अब भी विद्यमान हैं, खाद्य फसलों को ईंधन उत्पादन की ओर मोड़ना नैतिक (Ethical) एवं विकासात्मक (Developmental) चिंताएँ उत्पन्न करता है।
    • जैव-ईंधन (Biofuel) के उत्पादन के लिए खाद्य योग्य कृषि उपज (Edible Agricultural Produce) का उपयोग दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा (Food Security) को प्रभावित कर सकता है।

कृषि आय संबंधी चिंताएँ

  • केवल एथेनॉल से किसानों की आय दोगुनी नहीं हो सकती
    • किसानों की कम आय के प्रमुख कारणों में कटाई के बाद होने वाली हानि (Post-harvest Losses), सीमित बाज़ार पहुँच (Limited Market Access) तथा मजबूरी में कम कीमत पर बिक्री (Distress Sales) शामिल हैं।
    • एथेनॉल मिश्रण (Ethanol Blending) की नीति भारतीय कृषि को प्रभावित करने वाली इन संरचनात्मक समस्याओं (Structural Problems) का प्रत्यक्ष समाधान नहीं करती।

सुझाए गए सुधार (Suggested Reforms)

1. द्वितीय पीढ़ी (2G) एथेनॉल को बढ़ावा दिया जाए

  • द्वितीय पीढ़ी (2G) एथेनॉल के उत्पादन पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए, जो गैर-खाद्य जैव-अपशिष्ट (Non-food Biomass) से निर्मित होता है, जैसे—
    • फसल अवशेष (Crop Residues)
    • धान का पुआल (Rice Straw)
    • गेहूँ का भूसा (Wheat Straw)
    • मूंगफली के छिलके (Groundnut Shells)
  • यह दृष्टिकोण खाद्य बनाम ईंधन (Food versus Fuel)” के संघर्ष को कम करने के साथ-साथ पराली जलाने (Stubble Burning) एवं वायु प्रदूषण की समस्या के समाधान में भी सहायक होगा।

2. अनुसंधान एवं विकास (Research and Development) में निवेश बढ़ाया जाए

  • सरकार को अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास (Technology Development) तथा पूंजीगत सब्सिडी (Capital Subsidies) को प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि वर्तमान में महँगे 2G एथेनॉल के उत्पादन की लागत कम की जा सके।

3. संसाधन-कुशल (Resource-Efficient) कच्चे पदार्थों को अपनाया जाए

  • एथेनॉल उत्पादन को धीरे-धीरे कम जल-गहन (Less Water-intensive) फसलों तथा कृषि अवशेषों (Agricultural Residues) की ओर स्थानांतरित किया जाना चाहिए, जिससे संसाधनों के कुशल उपयोग (Resource-use Efficiency) को बढ़ावा मिले।

4. कृषि की संरचनात्मक समस्याओं का समाधान किया जाए

सरकारी हस्तक्षेप निम्नलिखित क्षेत्रों पर केंद्रित होना चाहिए—

  • कटाई के बाद होने वाली हानि (Post-harvest Losses) में कमी
  • बाज़ार तक पहुँच (Market Access) में सुधार
  • कृषि आपूर्ति शृंखलाओं (Agricultural Supply Chains) को सुदृढ़ बनाना
  • किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य (Better Price Realisation) सुनिश्चित करना
  • ये सुधार केवल एथेनॉल की मांग पर निर्भर रहने की तुलना में किसानों की आय बढ़ाने में अधिक प्रभावी सिद्ध होंगे।

5. लचीली एथेनॉल मिश्रण नीति (Flexible Blending Policy) अपनाई जाए

  • एथेनॉल मिश्रण के अनुपात (Blending Ratio) की समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों, घरेलू कच्चे माल (Feedstock) की उपलब्धता तथा उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए समीक्षा की जानी चाहिए।
  • ऐसी लचीली नीति (Flexible Approach) से ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security), आर्थिक दक्षता (Economic Efficiency) तथा उपभोक्ता कल्याण (Consumer Welfare) के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकेगा।

निष्कर्ष

  • एथेनॉल मिश्रण (Ethanol Blending) भारत की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) को सुदृढ़ करने, कार्बन उत्सर्जन (Carbon Emissions) में कमी लाने तथा नवीकरणीय ईंधनों (Renewable Fuels) को बढ़ावा देने की रणनीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।
  • हालाँकि, इस कार्यक्रम की दीर्घकालिक स्थिरता (Long-term Sustainability) इस बात पर निर्भर करेगी कि आर्थिक दक्षता (Economic Efficiency), उपभोक्ताओं के हित (Consumer Interests), जल संरक्षण (Water Conservation) तथा खाद्य सुरक्षा (Food Security) के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित किया जाता है।

मुख्य परीक्षा

प्रश्न: जलवायु परिवर्तन के प्रति भारतीय कृषि की संवेदनशीलताओं को देखते हुए, जैव-ईंधन (Biofuel) उत्पादन की ओर बढ़ते कदमों को खाद्य सुरक्षा (Food Security) तथा जल संसाधन प्रबंधन (Water Resource Management) के साथ संतुलित करना आवश्यक है। समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

(10 अंक, 150 शब्द)

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