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आतंकवाद संबंधी आँकड़ों में गिरावट उभरते वैश्विक खतरों को छिपा रही है

Lokesh Pal July 11, 2026 05:15 5 0

संदर्भ

  • वैश्विक आतंकवाद सूचकांक (Global Terrorism Index – GTI) 2025–26 के अनुसार विश्वभर में आतंकवाद से संबंधित मृत्यु के मामलों में कमी आई है, जिससे यह धारणा बनती है कि आतंकवाद कमजोर पड़ रहा है।
  • हालाँकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट आतंकवाद की बदलती प्रकृति को छिपाती है। वर्तमान में आतंकवादी संगठन अधिक विकेंद्रीकृत, प्रौद्योगिकी-सक्षम तथा भौगोलिक रूप से सीमित क्षेत्रों में केंद्रित होते जा रहे हैं।
  • आज वास्तविक चुनौती केवल आतंकी हमलों की संख्या नहीं है, बल्कि आतंकवाद का ऐसे नए स्वरूपों में विकसित होना है, जिन्हें पहचानना और उनका प्रभावी ढंग से मुकाबला करना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो गया है।

आतंकवाद की वैश्विक प्रवृत्तियाँ 

  • वैश्विक आतंकवाद सूचकांक (Global Terrorism Index – GTI) 2025–26 के अनुसार, वर्ष 2025 में आतंकवाद से संबंधित मृत्यु के मामलों में लगभग 28% की कमी दर्ज की गई तथा विश्वभर में लगभग 5,582 लोगों की मृत्यु हुई।
  • रिपोर्ट के अनुसार लगभग 81 देशों में सुरक्षा स्थिति में सुधार हुआ है, जो आतंकवाद-रोधी प्रयासों में प्रगति का संकेत देता है।
  • यद्यपि ये आँकड़े उत्साहजनक प्रतीत होते हैं, लेकिन ये केवल आतंकवाद में संख्यात्मक गिरावट को दर्शाते हैं। ये आतंकवादी खतरों में हो रहे गुणात्मक परिवर्तन को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करते।

आत्मसंतुष्टि का जाल 

  • आतंकवादी घटनाओं में कमी आने से सरकारों और समाज में झूठी सुरक्षा की भावना उत्पन्न हो सकती है।
  • वास्तव में आतंकवाद समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि उसने भौगोलिक और संचालनात्मक रूप से अपना स्वरूप और क्षेत्र बदल लिया है।
  • नीति-निर्माताओं को घटते आँकड़ों को आतंकवाद की स्थायी पराजय का प्रमाण मानने की भूल नहीं करनी चाहिए।
  • आतंकवाद-रोधी रणनीतियों को केवल ऐतिहासिक रुझानों पर निर्भर रहने के बजाय, उभरते खतरों के अनुरूप निरंतर विकसित और अद्यतन किया जाना चाहिए।

आतंकवाद का क्षेत्रीय संकेंद्रण

  • आतंकवाद अब पूरे विश्व में समान रूप से फैला हुआ नहीं है, बल्कि यह कमज़ोर शासन व्यवस्था (Fragile States) और संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों (Conflict-prone Regions) में अधिक केंद्रित होता जा रहा है।
  • वैश्विक स्तर पर आतंकवाद से होने वाली लगभग 70% मौतें केवल पाँच देशों में केंद्रित हैं:
    • पाकिस्तान
    • बुर्किना फासो
    • नाइजीरिया
    • नाइजर
    • कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (Democratic Republic of Congo – DRC)
  • उप-सहारा अफ्रीका का साहेल क्षेत्र आतंकवाद का वैश्विक केंद्र बनकर उभरा है, जहाँ विश्वभर में आतंकवाद से होने वाली आधे से अधिक मौतें दर्ज की जाती हैं।
  • कमज़ोर शासन, राजनीतिक अस्थिरता, गरीबी तथा लगातार चल रहे सशस्त्र संघर्ष ने इन क्षेत्रों में आतंकवादी संगठनों को पनपने और अपने प्रभाव का विस्तार करने का अवसर प्रदान किया है।

आतंकवाद की बदलती प्रकृति 

संगठित आतंकवाद से एकल-हमलावर हमलों की ओर

  • पारंपरिक आतंकवाद में सुव्यवस्थित आतंकवादी संगठन व्यापक योजना के साथ समन्वित हमलों को अंजाम देते थे।
  • आधुनिक आतंकवाद में अब एकल-हमलावर की भूमिका बढ़ती जा रही है, जिनका आतंकवादी संगठनों से औपचारिक संबंध होना आवश्यक नहीं होता।
  • ऐसे व्यक्ति इंटरनेट के माध्यम से कट्टरपंथी बन जाते हैं और सरल तथा आसानी से उपलब्ध हथियारों का उपयोग करके स्वतंत्र रूप से हमले करते हैं।

कम-प्रौद्योगिकी हथियारों के उदाहरण

  • चाकू
  • वाहन
  • स्थानीय स्तर पर निर्मित आग्नेयास्त्र
  • अस्थायी या स्वनिर्मित हथियार

इस परिवर्तन के कारण आतंकवादी हमले पहले की तुलना में कम पूर्वानुमेय हो गए हैं तथा उन्हें रोकना खुफिया एजेंसियों के लिए अधिक कठिन हो गया है।

डिजिटल कट्टरपंथीकरण

  • इंटरनेट आतंकवादी संगठनों के लिए भर्ती और वैचारिक ब्रेनवॉश/वैचारिक दीक्षा का प्रमुख माध्यम बन गया है।
  • ऑनलाइन इको चैंबर्स व्यक्तियों को बार-बार उग्रवादी विचारधाराओं (Extremist Narratives) के संपर्क में लाकर उनके कट्टरपंथी विश्वासों को और मजबूत करते हैं।
  • आतंकवादी संगठन अब बढ़ते हुए निम्नलिखित डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं—
    • एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफ़ॉर्म
    • सोशल मीडिया
    • डार्क वेब नेटवर्क
  • डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र के कारण उग्रवादी प्रचार राष्ट्रीय सीमाओं से परे अत्यंत तेज़ी से फैलता है, जिससे कट्टरपंथीकरण एक वैश्विक चुनौती बन गया है।

आधुनिक आतंकवाद के प्रमुख प्रेरक कारक

राजनीतिक अस्थिरता और राज्य का पतन 

  • आतंकवाद से संबंधित लगभग 99% मौतें उन देशों में होती हैं जो पहले से ही सशस्त्र संघर्ष या गृहयुद्ध (Civil Wars) से प्रभावित हैं।
  • राज्य की कमज़ोर संस्थाएँ सुरक्षा शून्य उत्पन्न करती हैं, जिसका लाभ आतंकवादी संगठन उठाते हैं।
  • इस्लामिक स्टेट (Islamic State – IS) तथा JNIM जैसे संगठन उन क्षेत्रों में, जहाँ सरकारों का नियंत्रण कमजोर पड़ जाता है, वैकल्पिक शासन और सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराते हैं तथा अपना प्रभाव बढ़ाते हैं।

छिद्रयुक्त सीमाएँ

  • आधुनिक आतंकवाद का स्वरूप तेजी से सीमा-केंद्रित होता जा रहा है।
  • लगभग 60% आतंकवादी हमले अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से 100 किमी के भीतर होते हैं।
  • कमज़ोर सीमा प्रबंधन आतंकवादियों को निम्नलिखित सुविधाएँ प्रदान करता है—
    • हमलों के बाद सीमा पार भाग जाना।
    • हथियार, मादक पदार्थ तथा वित्तीय संसाधनों की तस्करी करना।
    • सीमा-पार लॉजिस्टिक नेटवर्क स्थापित करना।
  • जहाँ प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर होता है, ऐसे सीमावर्ती क्षेत्र आतंकवादी गतिविधियों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं।

कमज़ोर शासन व्यवस्था

  • कमजोर प्रशासनिक संस्थाएँ कानून-व्यवस्था बनाए रखने की राज्य की क्षमता को कम कर देती हैं।
  • खराब शासन व्यवस्था के परिणामस्वरूप अक्सर निम्नलिखित समस्याएँ उत्पन्न होती हैं—
    • सीमित सार्वजनिक सेवाएँ
    • जनता का कम विश्वास
    • उच्च बेरोज़गारी सामाजिक असंतोष एवं शिकायतें
  • आतंकवादी संगठन इन परिस्थितियों का लाभ उठाकर स्थानीय आबादी की भर्ती करते हैं तथा अपना प्रभाव बढ़ाते हैं।

आधुनिक आतंकवाद के सामाजिक-आर्थिक एवं उभरते आयाम

सामाजिक-आर्थिक हाशियाकरण 

  • गरीबी, बेरोज़गारी तथा शिक्षा के अवसरों की कमी लोगों को उग्रवादी विचारधाराओं के प्रति अधिक संवेदनशील बना देती है।
  • उग्रवादी संगठन स्थानीय असंतोष का लाभ उठाकर लोगों को सुरक्षा, पहचान तथा आर्थिक सहायता का आश्वासन देकर अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

प्रमुख आतंकवादी नेटवर्क

वर्तमान में वैश्विक आतंकवाद कुछ प्रमुख संगठनों के इर्द-गिर्द अधिक केंद्रित होता जा रहा है, जिनमें प्रमुख हैं—

  • इस्लामिक स्टेट (IS)
  • जमात नसर अल-इस्लाम वल मुस्लिमीन (Jama’at Nasr al-Islam wal Muslimin)
  • तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (Tehrik-i-Taliban Pakistan – TTP)
  • लश्कर-ए-तैयबा (Lashkar-e-Taiba – LeT)
  • अल-शबाब (Al-Shabaab)
  • खुफिया एजेंसियों (Intelligence Agencies) को इन संगठनों की निरंतर निगरानी करते हुए नए उभरते उग्रवादी नेटवर्कों के प्रति भी सतर्क रहना आवश्यक है।

चुनौतियाँ 

  • प्रौद्योगिकी-संचालित आतंकवाद: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, एन्क्रिप्टेड संचार, क्रिप्टोकरेंसी तथा ड्रोन जैसी प्रौद्योगिकियाँ आतंकवादी संगठनों की संचालन क्षमता को लगातार बढ़ा रही हैं।
  • भू-राजनीतिक संघर्ष: पश्चिम एशिया, यूक्रेन तथा अन्य अस्थिर क्षेत्रों में जारी संघर्ष उग्रवादी संगठनों के लिए नए अवसर उत्पन्न कर सकते हैं।
  • बड़े पैमाने पर विस्थापन : शरणार्थी संकट तथा बलपूर्वक पलायन की घटनाएँ सुरक्षा संबंधी जोखिमों को बढ़ा सकती हैं, यदि आतंकवादी संगठन विस्थापित आबादी का दुरुपयोग करें।
  • आतंकवादी संगठनों का विखंडन: बड़े आतंकवादी संगठन अब छोटे-छोटे विकेंद्रीकृत नेटवर्कों में विभाजित होते जा रहे हैं, जिससे उनकी निगरानी और निष्क्रिय करना सुरक्षा एजेंसियों के लिए पहले की तुलना में अधिक कठिन हो गया है।

भारत के लिए निहितार्थ

  • भारत एक सामरिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील पड़ोस में स्थित है तथा उसकी सीमाएँ ऐसे क्षेत्रों से लगती हैं जो आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता से प्रभावित हैं।
  • सीमा-पार आतंकवाद आज भी भारत की सबसे गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौतियों में से एक बना हुआ है।
  • ऑनलाइन कट्टरपंथीकरण में वृद्धि देश की आंतरिक सुरक्षा एजेंसियों के समक्ष नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर रही है।
  • भारत की आतंकवाद-रोधी रणनीति को पारंपरिक सीमा-पार खतरों के साथ-साथ उभरते डिजिटल खतरों का भी प्रभावी ढंग से सामना करना होगा।
  • अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद की रोकथाम के लिए पड़ोसी देशों के साथ खुफिया सहयोग को और अधिक सुदृढ़ बनाना अत्यंत आवश्यक है।

आगे की राह 

  • सीमा प्रबंधन को सुदृढ़ बनाना: सीमा-पार घुसपैठ को रोकने के लिए एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली, उन्नत निगरानी प्रौद्योगिकियों तथा सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय को लागू किया जाना चाहिए।
  • खुफिया समन्वय को मजबूत करना: खुफिया एजेंसियों को रियल-टाइम सूचना साझाकरण, पूर्वानुमानात्मक विश्लेषण तथा विभिन्न एजेंसियों के बीच सहयोग को सुदृढ़ करना चाहिए, ताकि उभरते खतरों की प्रारंभिक अवस्था में ही पहचान की जा सके।
  • डिजिटल कट्टरपंथीकरण का मुकाबला: सरकारों को प्रौद्योगिकी कंपनियों के साथ मिलकर उग्रवादी सामग्री की पहचान और उसे हटाने के साथ-साथ ऑनलाइन विश्वसनीय प्रतिवाद को भी बढ़ावा देना चाहिए।
  • संवेदनशील क्षेत्रों में सुशासन को बढ़ावा: स्थानीय शासन, न्यायिक संस्थाओं, पुलिस व्यवस्था तथा सार्वजनिक सेवाओं को मजबूत बनाकर उन परिस्थितियों को कम किया जा सकता है, जिनमें आतंकवादी संगठन पनपते हैं।
  • सामाजिक-आर्थिक शिकायतों का समाधान: शिक्षा, रोजगार सृजन, कौशल विकास तथा सामुदायिक सहभागिता में निवेश करके उग्रवादी विचारधाराओं के आकर्षण को कम किया जा सकता है।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सुदृढ़ करना: आतंकवाद के वित्तपोषण (Terrorism Financing) तथा सीमा-पार आतंकवादी नेटवर्कों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए देशों को संयुक्त राष्ट्र, वित्तीय कार्रवाई कार्यबल तथा द्विपक्षीय खुफिया सूचना-साझाकरण व्यवस्थाओं जैसे तंत्रों के माध्यम से सहयोग को और गहरा करना चाहिए।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न 

प्रश्न: आतंकवाद-रोधी रणनीति को केवल प्रतिक्रियात्मक सुरक्षा उपायों तक सीमित न रहकर निवारक सुशासन, विकास तथा डिजिटल विनियमन की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। समकालीन वैश्विक परिप्रेक्ष्य में इसका परीक्षण कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

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