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भारतीय राज्यों में राजकोषीय तनाव

Lokesh Pal May 11, 2026 05:00 5 0

संदर्भ:

कई राजनीतिक दल चुनावों के दौरान राज्यों की दीर्घकालिक वित्तीय क्षमता पर विचार किए बिना बड़े कल्याणकारी वादे और मुफ्त सुविधाएँ (फ्रीबीज़) की घोषणा करते हैं। यद्यपि ऐसे वादे चुनाव जीतने में सहायक हो सकते हैं, लेकिन वे अक्सर राज्यों पर ऋण का बोझ बढ़ाते हैं और राजकोषीय स्थिरता को कमजोर करते हैं।

राजकोषीय तनाव’ का अर्थ: राजकोषीय तनाव उस स्थिति को कहा जाता है जब:

  • सरकारी व्यय, राजस्व की तुलना में बहुत अधिक हो जाता है।
  • राज्य अपने खर्चों को पूरा करने के लिए लगातार ऋण लेते रहते हैं।
  • राजस्व का बड़ा हिस्सा पुराने ऋणों और ब्याज के भुगतान में चला जाता है।

इसके परिणामस्वरूप विकासात्मक गतिविधियों के लिए बहुत कम धन बचता है, जैसे:

  • सड़कें
  • अस्पताल
  • शिक्षा
  • बुनियादी ढाँचा

राज्यों पर बढ़ता ऋण

उदाहरण: तमिलनाडु

  • राज्य का ऋण एक दशक में लगभग ₹2.8 लाख करोड़ से बढ़कर ₹10.6 लाख करोड़ हो गया।
  • ऋण-से-GSDP अनुपात लगभग 21.8% से बढ़कर 26.1% हो गया।

FRBM अधिनियम, 2003

राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम के अनुसार:

  • ऋण-से-GDP अनुपात आदर्श रूप से लगभग 20% के आसपास रहना चाहिए।

अत्यधिक ऋण दीर्घकालिक वित्तीय जोखिम उत्पन्न करता है।

बढ़ता ऋण क्यों खतरनाक है?

  • उच्च ब्याज बोझ: राज्य की आय का बड़ा हिस्सा पुराने ऋणों के ब्याज भुगतान में खर्च हो जाता है। इससे विकास संबंधी खर्च कम हो जाता है।
    • उदाहरण: यदि कोई राज्य ₹100 कमाता है, तो उसमें से ₹20–40 केवल ब्याज चुकाने में ही जा सकते हैं।
  • पूंजीगत व्यय में कमी: राज्यों को बुनियादी ढाँचे, औद्योगिक विकास और सार्वजनिक सेवाओं में निवेश करने में कठिनाई होती है।
  • पीढ़ीगत ऋण बोझ (Intergenerational Debt Burden): भविष्य की पीढ़ियों को आज लिए गए ऋणों का भुगतान करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यह पीढ़ीगत समानता (Intergenerational Equity) के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।
  • स्वास्थ्य और शिक्षा पर दबाव: सीमित राजकोषीय क्षमता के कारण सरकार का स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च कम हो जाता है, जिससे स्कूलों की स्थिति खराब होती है, स्वास्थ्य सेवाएँ कमजोर होती हैं, कौशल विकास प्रभावित होता है और अंततः दीर्घकालिक मानव पूँजी निर्माण में बाधा आती है।

राजकोषीय तनाव के प्रमुख कारण

महत्वपूर्ण आर्थिक शब्दावली:

ऋण-से-GSDP अनुपात (Debt-to-GSDP Ratio): राज्य के कुल ऋण की तुलना राज्य के कुल आर्थिक उत्पादन (GSDP) से प्रतिशत के रूप में।

प्रतिबद्ध व्यय (Committed Expenditure): ऐसा व्यय जिसे राज्यों को अनिवार्य रूप से भुगतान करना पड़ता है, जैसे:

  • वेतन
  • पेंशन
  • ब्याज भुगतान

राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation): घाटे और ऋण को कम करने के लिए किए जाने वाले प्रयास।

  • फ्रीबी राजनीति (Freebie Politics): फ्रीबी राजनीति में राजनीतिक दल नकद हस्तांतरण, मुफ्त बिजली, सोने का वितरण और मासिक भत्तों जैसी योजनाओं की घोषणा करते हैं, बिना स्थायी राजस्व स्रोत सुनिश्चित किए, जिससे राज्यों पर राजकोषीय तनाव बढ़ता है।
  • कमजोर राजस्व संग्रहण (Weak Revenue Mobilisation): GST लागू होने के बाद राज्यों की कर लगाने की स्वायत्तता काफी कम हो गई और उनके पास मुख्यतः शराब तथा पेट्रोलियम उत्पादों पर कर लगाने की सीमित शक्ति रह गई, जिससे राजस्व जुटाना और अधिक कठिन हो गया।
  • लगातार राजकोषीय घाटा (Persistent Fiscal Deficit): आय की तुलना में लगातार अधिक खर्च होने के कारण राज्यों को प्रत्येक वर्ष उधार लेना पड़ता है।
  • उधारी की बढ़ती लागत (Rising Cost of Borrowing): बाजार में ब्याज दरें बढ़ गई हैं।
    • अब राज्यों को ऊँची ब्याज दरों पर ऋण मिलता है, जिससे पुनर्भुगतान का बोझ बढ़ता है।

केंद्र की भूमिका

  • वित्त आयोग: यह केंद्र और राज्यों के बीच करों के वितरण तथा राज्यों के बीच संसाधनों के आवंटन की सिफारिश करता है।
  • संविधान का अनुच्छेद 293: यदि किसी राज्य ने पहले ही केंद्र से ऋण लिया है, तो आगे उधार लेने के लिए उसे केंद्र की अनुमति आवश्यक होती है। यह एक राजकोषीय नियंत्रण तंत्र के रूप में कार्य करता है।
  • केंद्र प्रायोजित योजनाएँ: इन योजनाओं में केंद्र राज्यों के साथ व्यय का बोझ साझा करता है।
  • विशेष वित्तीय सहायता: कोविड -19 जैसे संकटों और GST क्षतिपूर्ति चरण के दौरान केंद्र सरकार ब्याज-मुक्त ऋण और वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

आगे की राह

  • ऋण पुनर्गठन (Debt Restructuring): ऋण पुनर्गठन के अंतर्गत ऋण चुकाने की अवधि बढ़ाई जाती है तथा ब्याज देनदारियों को कम किया जाता है, ताकि राज्यों पर वित्तीय बोझ कम हो सके।
  • परिसंपत्ति मुद्रीकरण (Asset Monetisation): राज्यों को राजस्व उत्पन्न करने के लिए अनुपयोगी भूमि और परिसंपत्तियों को पट्टे पर देना चाहिए।
  • रणनीतिक विनिवेश (Strategic Disinvestment): घाटे में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) में सुधार किया जाना चाहिए तथा आवश्यकता होने पर उन्हें बेचा या बंद किया जाना चाहिए।
  • कर प्रशासन में सुधार (Improve Tax Administration): तकनीक का उपयोग करके बेहतर कर संग्रह, अधिक दक्षता और कर लीकेज में कमी सुनिश्चित की जा सकती है।
  • सब्सिडी का युक्तिकरण (Rationalisation of Subsidies): केवल उन्हीं सब्सिडियों को जारी रखा जाना चाहिए जो सकारात्मक परिणाम उत्पन्न करती हैं।
  • परिणाम-आधारित बजटिंग (Outcome-Based Budgeting): सरकारी व्यय का उद्देश्य मापनीय परिणामों पर केंद्रित होना चाहिए।

निष्कर्ष

  • सतत विकास के लिए राजकोषीय अनुशासन अत्यंत आवश्यक है। लोकलुभावन राजनीति अल्पकालिक चुनावी लाभ प्रदान कर सकती है, लेकिन अत्यधिक ऋण शासन, विकास और आर्थिक स्थिरता को कमजोर करता है।
  • राज्यों को सहकारी संघवाद और विवेकपूर्ण वित्तीय प्रबंधन के माध्यम से कल्याणकारी योजनाओं और राजकोषीय उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करना चाहिए।

प्रारंभिक परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य 

संविधान का अनुच्छेद 293: यदि किसी राज्य सरकार पर केंद्र सरकार का कोई पूर्व ऋण बकाया है, तो वह केंद्र की पूर्व अनुमति के बिना बाजार से ऋण नहीं ले सकता।

एन.के. सिंह समिति — FRBM समीक्षा 

  • सरकार के लिए संयुक्त ऋण-से-GDP अनुपात 60% रखने की सिफारिश की गई।
    • 40% — केंद्र सरकार के लिए
    • 20% — राज्य सरकारों के लिए

विशेष श्रेणी के राज्य (Special Category States) — असम एवं अन्य

  • केंद्र से अधिक अनुदान का हिस्सा प्राप्त करते हैं। इससे बाजार से उधार लेने पर निर्भरता कम होती है और सामान्य श्रेणी के राज्यों की तुलना में ब्याज का बोझ घट जाता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: भारतीय राज्यों के ऋण-से-GDP अनुपात में लगातार वृद्धि न केवल उनकी दीर्घकालिक राजकोषीय स्थिरता के लिए खतरा है, बल्कि यह सहकारी संघवाद के सिद्धांतों को भी कमजोर करती है। बढ़ते ऋण बोझ के संरचनात्मक कारणों का विश्लेषण कीजिए तथा राज्य स्तर पर राजकोषीय समेकन के लिए व्यावहारिक उपाय सुझाइए।

(10 अंक, 150 शब्द)

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