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जापान का सैन्य पुनरुत्थान और बदलती इंडो-पैसिफिक सुरक्षा व्यवस्था

Lokesh Pal June 08, 2026 05:15 37 0

संदर्भ:

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य आक्रामकता तथा दीर्घकालिक अमेरिकी सुरक्षा गारंटियों पर घटते विश्वास के कारण जापान अपनी द्वितीय विश्व युद्धोत्तर सुरक्षा नीति में व्यापक परिवर्तन करने की दिशा में अग्रसर हो रहा है।

  • जापान धीरे-धीरे अपनी शांतिवादी सुरक्षा नीति से हटकर अधिक सक्रिय एवं सशक्त रक्षा रणनीति की ओर बढ़ रहा है, जो एशिया की भू-राजनीतिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत है।

प्रमुख शब्दावली

  • जापान के संविधान का अनुच्छेद 9: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अपनाया गया एक संवैधानिक प्रावधान, जिसके तहत जापान ने युद्ध को अपने संप्रभु अधिकार के रूप में त्याग दिया तथा आक्रामक सैन्य क्षमताओं के रखरखाव और विस्तार पर प्रतिबंध लगाया।
  • शांगरी – ला संवाद (Shangri-La Dialogue): सिंगापुर में इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ (IISS) द्वारा आयोजित एक वार्षिक रक्षा एवं सुरक्षा सम्मेलन, जिसमें विश्वभर के रक्षा मंत्री, सैन्य अधिकारी तथा रणनीतिक विशेषज्ञ भाग लेते हैं।
  • रणनीतिक अस्पष्टता: विदेश नीति का ऐसा दृष्टिकोण, जिसमें कोई देश कूटनीतिक लचीलापन बनाए रखने के लिए जानबूझकर अपने उद्देश्य या नीतिगत रुख को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने से बचता है।
  • प्रतिरोध: सैन्य क्षमताओं और विश्वसनीय प्रतिशोध की धमकी के माध्यम से विरोधियों को आक्रामक कार्यवाही से रोकने की रणनीति।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: जापान का युद्धोत्तर शांतिवाद

  • द्वितीय विश्व युद्ध के बाद: द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत जापान ने वर्ष 1947 में एक शांतिवादी संविधान अपनाया, जिसके अनुच्छेद 9 के तहत युद्ध का परित्याग किया गया तथा सैन्य विस्तार पर प्रतिबंध लगाया गया, ताकि देश पुनः सैन्यवाद की ओर न लौट सके।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका पर सुरक्षा निर्भरता: जापान ने अमेरिका–जापान सुरक्षा गठबंधन के अंतर्गत अमेरिकी सुरक्षा छत्र पर निर्भरता बनाए रखी, जिससे वह अपने संसाधनों को सैन्य विस्तार के बजाय आर्थिक विकास और तकनीकी प्रगति की ओर केंद्रित कर सका।
  • आर्थिक उन्नति: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कम रक्षा व्यय ने जापान को औद्योगीकरण, प्रौद्योगिकी, व्यापार और अवसंरचना में व्यापक निवेश करने का अवसर प्रदान किया, जिसके परिणामस्वरूप 1980 के दशक तक वह विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया।

जापान पुनः सैन्यीकरण क्यों कर रहा है?

  • चीन का उदय: चीन के तीव्र सैन्य आधुनिकीकरण, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति, दक्षिण एवं पूर्वी चीन सागर में आक्रामक गतिविधियों तथा सेंकाकू द्वीपों (Senkaku Islands) को लेकर विवादों ने जापान की सुरक्षा चिंताओं को और अधिक बढ़ा दिया है।
  • अमेरिकी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को लेकर अनिश्चितता: अमेरिकी सुरक्षा गारंटियों की विश्वसनीयता तथा क्षेत्रीय संकटों में वाशिंगटन की हस्तक्षेप करने की इच्छा को लेकर बढ़ते संदेहों ने जापान को अधिक रणनीतिक स्वायत्तता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है।

जापान की नई सुरक्षा रणनीति

  • रक्षा व्यय का विस्तार: जापान रक्षा व्यय को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 2% तक बढ़ाने की योजना बना रहा है। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उसका सबसे बड़ा सैन्य विस्तार होगा, जिसके अंतर्गत मिसाइल प्रणालियों, साइबर युद्ध क्षमता, अंतरिक्ष सुरक्षा, नौसैनिक शक्ति तथा वायु रक्षा प्रणालियों में बड़े पैमाने पर निवेश किया जाएगा।
  • रक्षा साझेदारियों को सुदृढ़ बनाना: जापान भारत, ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस, दक्षिण कोरिया तथा ASEAN सदस्य देशों के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यासों, खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान, रक्षा प्रौद्योगिकी सहयोग तथा समुद्री सुरक्षा पहलों के माध्यम से अपनी सुरक्षा एवं रक्षा सहयोग को और गहरा कर रहा है।
  • रक्षा निर्यात नीति में सुधार: रक्षा निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में ढील देकर जापान रणनीतिक साझेदारियों को मजबूत करने, आर्थिक लाभ प्राप्त करने तथा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपने भू-राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने का लक्ष्य रखता है।

हालिया घटनाक्रम

  • जापान–ऑस्ट्रेलिया रक्षा सहयोग: ऑस्ट्रेलिया को उन्नत मोगामी-श्रेणी (Mogami-class) फ्रिगेट उपलब्ध कराने संबंधी जापान का समझौता उसके एक प्रमुख रक्षा निर्यातक के रूप में उभरने को दर्शाता है तथा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के लोकतांत्रिक देशों के बीच गहरे होते रणनीतिक सामंजस्य का संकेत देता है।
  • रक्षा नेटवर्क का विस्तार: जापान फिलीपींस, न्यूज़ीलैंड तथा अन्य इंडो-पैसिफिक साझेदार देशों के साथ सुरक्षा सहयोग का विस्तार कर रहा है, ताकि एक व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना का निर्माण किया जा सके।

ताइवान: मुख्य सुरक्षा चिंता

  • रणनीतिक महत्व: जापान अब ताइवान जलडमरूमध्य में स्थिरता को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक मानता है, क्योंकि ताइवान उसकी दक्षिण-पश्चिमी द्वीपों के काफी निकट स्थित है।
  • जापान का दृष्टिकोण: जापान अभी भी “वन चाइना पॉलिसी” का समर्थन करता है। साथ ही वह ताइवान जलडमरूमध्य में शांति और स्थिरता के महत्व पर अधिक मुखर हो गया है।

चीन की प्रतिक्रिया

  • पुनःसैन्यीकरण पर चिंताएँ: चीन का तर्क है कि जापान की बढ़ती सैन्य क्षमताएँ उसके युद्धोत्तर शांतिवादी सिद्धांतों से विचलन को दर्शाती हैं और इससे क्षेत्रीय स्थिरता को नुकसान पहुँच सकता है।
  • जापान का प्रतिवाद: जापान का कहना है कि उसका सैन्य आधुनिकीकरण पूर्णतः रक्षात्मक प्रकृति का है और यह बदलती क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के प्रति एक आवश्यक प्रतिक्रिया है।

भारत के लिए निहितार्थ

  • इंडो-पैसिफिक शक्ति संतुलन को मजबूत करना: सैन्य रूप से अधिक शक्तिशाली जापान चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में सहयोग कर सकता है तथा एशिया में अधिक स्थिर, बहुध्रुवीय सुरक्षा व्यवस्था के निर्माण में योगदान दे सकता है।
  • भारत–जापान रणनीतिक साझेदारी का विस्तार: जापान के सुरक्षा परिवर्तन से भारत के साथ समुद्री सुरक्षा, रक्षा प्रौद्योगिकी, आपूर्ति-श्रृंखला लचीलापन तथा उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्रों में गहन सहयोग के अवसर उत्पन्न होते हैं। यह सहयोग क्वाड्रिलैटरल सिक्योरिटी डायलॉग (QUAD), भारत–जापान 2+2 वार्ता तथा इंडो-पैसिफिक ओशन्स इनिशिएटिव जैसे मंचों के माध्यम से और मजबूत हो सकता है।
  • रक्षा औद्योगिक सहयोग: जापान की रक्षा नीति में बदलाव भारत के साथ रक्षा विनिर्माण, जहाज निर्माण, सेमीकंडक्टर उत्पादन तथा दोहरे उपयोग वाली प्रौद्योगिकियों के क्षेत्रों में सहयोग के नए अवसर निर्मित करते है।

चुनौतियाँ

  • जापान में विद्यमान घरेलू बाधाएँ: प्रबल शांतिवादी जनमत तथा संवैधानिक सीमाएँ, विशेष रूप से अनुच्छेद 9, जापान के सैन्य परिवर्तन की गति और दायरे को अब भी सीमित करती हैं।
  • क्षेत्रीय चिंताएँ: चीन और उत्तर कोरिया जापान के सैन्य विस्तार को संदेह की दृष्टि से देखते हैं, जिससे पूर्वी एशिया में संभावित हथियारों की दौड़ और तनाव में वृद्धि को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं।
  • आर्थिक बोझ: जापान की वृद्ध होती जनसंख्या, श्रम की कमी और बढ़ते राजकोषीय दबावों के बीच बढ़े हुए रक्षा व्यय को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

आगे की राह

  • भारत–जापान रणनीतिक अभिसरण को मजबूत करना: भारत और जापान को रक्षा, समुद्री तथा प्रौद्योगिकीय सहयोग को और गहरा करना चाहिए, साथ ही रक्षा औद्योगिक साझेदारियों का भी विस्तार करना चाहिए।
  • स्वतंत्र, खुला और समावेशी इंडो-पैसिफिक को बढ़ावा देना: दोनों देशों को अंतरराष्ट्रीय कानून, नौवहन की स्वतंत्रता का पालन करना चाहिए तथा क्षेत्रीय संस्थाओं को मजबूत करना चाहिए ताकि नियम-आधारित व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके।
  • क्षेत्रीय सुरक्षा नेटवर्क का निर्माण: भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया तथा ASEAN देशों जैसे मध्यम शक्तियों के बीच अधिक सहयोग क्षेत्रीय लचीलापन और सामूहिक सुरक्षा को मजबूत कर सकता है।
  • प्रतिरोध तथा संवाद के बीच संतुलन स्थापित करना: आक्रामकता को रोकने के लिए विश्वसनीय रक्षा क्षमताओं को बनाए रखते हुए, क्षेत्रीय देशों को चीन के साथ कूटनीतिक संवाद और विश्वास-निर्माण उपायों को जारी रखना चाहिए ताकि संघर्ष को रोका जा सके।

निष्कर्ष

  • जापान का सैन्य पुनरुत्थान एक बदलते इंडो-पैसिफिक सुरक्षा परिवेश के प्रति उसकी रणनीतिक अनुकूलन प्रक्रिया को दर्शाता है, जो चीन के उदय और अमेरिका की प्रतिबद्धताओं को लेकर अनिश्चितता से चिह्नित है।
  • भारत के लिए एक अधिक सशक्त और सक्रिय जापान, रणनीतिक साझेदारियों को मजबूत करने तथा एक स्थिर, बहुध्रुवीय और नियम-आधारित क्षेत्रीय व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: जापान का एक सैन्य रूप से न्यूनतावादी से एक सक्रिय सुरक्षा साझेदार में परिवर्तन एशिया के शक्ति संतुलन में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है। इस परिवर्तन को प्रेरित करने वाले कारकों का विश्लेषण कीजिए तथा इंडो-पैसिफिक में भारत की विदेश नीति के लिए इसके रणनीतिक निहितार्थों पर चर्चा कीजिए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

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