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भारत में गरीबी: गरीबी का मापन और समझ

Lokesh Pal May 30, 2026 05:00 11 0

संदर्भ:

भारत ने हाल के वर्षों में आधिकारिक रूप से अपनी गरीबी रेखा को अद्यतन नहीं किया है। इसलिए शोधकर्ताओं ने रंगराजन समिति की कार्यप्रणाली तथा नवीनतम उपभोग व्यय आँकड़ों का उपयोग करके गरीबी का अनुमान लगाने का प्रयास किया है।

गरीबी का मापन कैसे किया जाता है?

  • गरीबी का मापन गरीबी रेखा के माध्यम से किया जाता है, जो भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा जैसी आवश्यक वस्तुओं एवं सेवाओं की एक न्यूनतम टोकरी खरीदने के लिए आवश्यक न्यूनतम व्यय को दर्शाती है।
  • गरीबी रेखा का निर्धारण मासिक प्रति व्यक्ति उपभोक्ता व्यय (Monthly Per Capita Consumer Expenditure – MPCE) के आधार पर किया जाता है। जिन व्यक्तियों का उपभोग व्यय निर्धारित सीमा (Threshold) से कम होता है, उन्हें गरीब की श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है।

प्रमुख गरीबी आकलन समितियाँ 

समिति  वर्ष 
अलघ समिति (Alagh Committee) 1979
लकड़ावाला समिति (Lakdawala Committee) 1993
तेंदुलकर समिति (Tendulkar Committee) 2009
रंगराजन समिति (Rangarajan Committee) 2014

रंगराजन समिति की कार्यप्रणाली

समिति ने गरीबी रेखाओं को औसत उपभोग व्यय के साथ सम्मलित किया 

  • ग्रामीण गरीबी रेखा = औसत ग्रामीण मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय (MPCE) का 68%
  • शहरी गरीबी रेखा = औसत शहरी मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय (MPCE) का 54%

नवीनतम आँकड़ों का उपयोग करते हुए, शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया है कि:

क्षेत्र 

गरीबी रेखा (प्रति माह)

ग्रामीण 

₹2,802

शहरी 

₹3,778

इसके विपरीत, वर्ष 2011–12 में रंगराजन समिति द्वारा निर्धारित गरीबी रेखा सीमा निम्नलिखित थी:

क्षेत्र  गरीबी रेखा (2011–12)
ग्रामीण  ₹972
शहरी  ₹1,407

यह वृद्धि मुद्रास्फीति तथा बदलते जीवन-स्तर को प्रतिबिंबित करती है।

गरीबी के अनुमानों में अंतर क्यों है?

  • अद्यतन रंगराजन समिति पद्धति का उपयोग करते हुए शोधकर्ताओं का अनुमान है कि भारत की लगभग 27% आबादी अभी भी गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रही है, जो लगभग 37 करोड़ लोगों के बराबर है।
  • इसके विपरीत, सरकार विश्व बैंक के गरीबी मानकों पर आधारित तथा खाद्य सब्सिडी और प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण जैसी कल्याणकारी योजनाओं के प्रभाव को शामिल करते हुए अनुमान लगाती है कि वर्ष 2023–24 में गरीबी दर 2.3% रह गई है, जो वर्ष 2011–12 में 22% थी।

क्रय शक्ति समता (PPP) की भूमिका

  • विश्व बैंक की गरीबी रेखा क्रय शक्ति समता (PPP) पर आधारित होती है, जो विभिन्न देशों में जीवन-यापन की लागत के सापेक्ष आय का समायोजन करती है।
  • PPP के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका में 3 डॉलर की क्रय शक्ति भारत में लगभग ₹60–₹70 मूल्य की वस्तुओं और सेवाओं की खरीद के बराबर हो सकती है, क्योंकि भारत में अनेक वस्तुएँ और सेवाएँ अपेक्षाकृत सस्ती हैं।
  • फलस्वरूप, PPP आधारित अंतरराष्ट्रीय गरीबी अनुमान सामान्यतः घरेलू गरीबी अनुमानों की तुलना में कम होते हैं, क्योंकि घरेलू गरीबी अनुमान देश-विशिष्ट उपभोग पैटर्न और व्यय आवश्यकताओं के आधार पर निर्धारित किए जाते हैं।

UPSC मुख्य परीक्षा हेतु गरीबी से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य 

  • गरीबी का संकेन्द्रण: केवल चार राज्य—उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल—भारत की लगभग 40% जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन देश की लगभग 48% गरीब आबादी इन्हीं राज्यों में निवास करती है।
  • अत्यधिक गरीबी वाले राज्य: झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में अनुमानतः 45% से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करती है, जो विकास में निरंतर बनी हुई क्षेत्रीय असमानताओं को दर्शाती है।

कम गरीबी वाले राज्य

  • पंजाब, हरियाणा, गोवा, सिक्किम, त्रिपुरा तथा कई दक्षिणी राज्यों में अपेक्षाकृत कम गरीबी पाई जाती है, जिसका कारण बेहतर सामाजिक-आर्थिक सूचक हैं।

गरीबी क्यों बनी रहती है?

  • निर्वाह कृषि: किसानों का एक बड़ा वर्ग निर्वाह कृषि करता है, जिसमें उत्पादन केवल परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित रहता है तथा बिक्री और आय-सृजन के लिए बहुत कम अधिशेष उपलब्ध होता है।
  • संसाधन अभिशाप: खनिजों और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य गरीब बने हुए हैं, क्योंकि संसाधनों के दोहन से प्राप्त लाभ मुख्यतः सरकारों और कंपनियों को मिलता है, जबकि स्थानीय समुदाय पर्यावरणीय क्षति और सामाजिक लागतों का भार वहन करते हैं।
  • उच्च आश्रित अनुपात: जहाँ कम कार्यशील आबादी को बड़ी आश्रित आबादी का भरण-पोषण करना पड़ता है, वहाँ गरीबी बनी रहती है। इससे परिवारों की बचत और निवेश क्षमता में कमी आती है।
  • गैर-कृषि रोजगार का अभाव: विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में रोजगार के सीमित विस्तार के कारण लोग कम उत्पादकता वाली कृषि पर निर्भर रहने के लिए विवश हो जाते हैं।
  • स्थायी गरीबी: खराब शिक्षा, अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएँ, कम उत्पादकता तथा आर्थिक अवसरों तक सीमित पहुँच के कारण गरीबी एक आत्म-पोषित चक्र का रूप ले लेती है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रहती है।

गिनी गुणांक: एक महत्वपूर्ण अवलोकन

गिनी गुणांक किसी समाज में आय की असमानता को मापने का एक महत्वपूर्ण सूचकांक है।

  • गिनी = 0 पूर्ण समानता को दर्शाता है, जहाँ समाज के प्रत्येक व्यक्ति की आय समान होती है।
  • गिनी = 1 पूर्ण असमानता को दर्शाता है, जहाँ समाज की समस्त आय केवल एक ही व्यक्ति के पास केंद्रित होती है।
  • दिलचस्प बात यह है कि कई गरीब राज्यों में आय-असमानता अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। इसका कारण यह नहीं है कि संपत्ति समान रूप से वितरित है, बल्कि यह है कि वहाँ कुल संपत्ति और आय का स्तर ही अत्यंत निम्न है।

समाधान

  • जिला खनिज प्रतिष्ठान (DMF) निधियों का बेहतर उपयोग: खनन रॉयल्टी से प्राप्त जिला खनिज प्रतिष्ठान (DMF) निधियों का निवेश विद्यालयों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, पोषण कार्यक्रमों तथा कौशल विकास पहलों में किया जाना चाहिए, ताकि स्थानीय स्तर पर मानव विकास के परिणामों में सुधार हो सके।
  • मूल्य संवर्धन को प्रोत्साहन: कच्चे कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण के माध्यम से अधिक आय अर्जित की जा सकती है। उदाहरणार्थ:
    • दूध → चीज़/पनीर
    • फल → प्रसंस्कृत उत्पाद
    • शहद → पैकेट वाला शहद
  • कृषि सुधार: गरीबी में कमी लाने के लिए निम्नलिखित कृषि सुधार आवश्यक हैं:
    • उन्नत बीज
    • कृषि उत्पादकता में वृद्धि
    • सहकारी खेती
    • उच्च-मूल्य वाली फसलों की ओर विविधीकरण
    • बागवानी और फूलों की खेती/पुष्पोत्पादन (Floriculture) का विस्तार
  • मूल्य स्थिरीकरण तंत्र: किसानों को इनके माध्यम से सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए:
    • न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)
    • आय-सहायता उपाय
    • कीमतों में गिरावट के दौरान सरकारी बाजार हस्तक्षेप
  • CSR आधारित स्थानीय विकास: कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) निधियों का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, आधारभूत संरचना तथा कौशल प्रशिक्षण में निवेश के माध्यम से स्थानीय विकास को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है, विशेषकर आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: सामाजिक सुरक्षा तंत्र के व्यापक विस्तार के बावजूद भारत में गरीबी अभी भी स्थायी, संरचनात्मक तथा क्षेत्रीय बनी हुई है। इसके कारणों का विश्लेषण कीजिए तथा प्रवासन से परे लक्षित हस्तक्षेपों का सुझाव दीजिए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

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