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अरावली पर्वतमाला का क्षरण तथा बढ़ता धूल-भरी आँधियों का खतरा

Lokesh Pal June 02, 2026 05:30 17 0

संदर्भ:

अरावली पर्वतमाला थार मरुस्थल और इंडो-गंगा के मैदानों के बीच एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक पारिस्थितिक अवरोध के रूप में कार्य करती है।

  • अरावली पारिस्थितिकी तंत्र के बढ़ते क्षरण ने इसकी सुरक्षात्मक भूमिका को कमजोर कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप उत्तरी भारत में धूल-भरी आँधियों की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि हो रही है।
  • इस प्राकृतिक सुरक्षा कवच के कमजोर होने से पर्यावरणीय सुरक्षा, वायु गुणवत्ता, जैव विविधता और जन-स्वास्थ्य के समक्ष गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न हो रही हैं।

अरावली पर्वतमाला के बारे में

  • अरावली विश्व की सबसे प्राचीन वलित पर्वत प्रणालियों में से एक है, जिसका भूवैज्ञानिक इतिहास 1.5 अरब वर्ष से भी अधिक पुराना माना जाता है।
  • यह पर्वतमाला लगभग 700 किलोमीटर तक विस्तृत है तथा गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली राज्यों से होकर गुजरती है।

पारिस्थितिक महत्व

अरावली कई महत्वपूर्ण पारिस्थितिक कार्य करती है:

  • पवन अवरोधक: थार मरुस्थल से आने वाली धूलयुक्त हवाओं के विरुद्ध प्राकृतिक सुरक्षा कवच का कार्य करती है।
  • धूल अवरोधक: यह उत्तरी भारत की ओर वायु के माध्यम से उड़ने वाली धूल के प्रसार को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • जैव विविधता गलियारा: विविध वनस्पतियों एवं जीव-जंतुओं को आश्रय प्रदान करती है तथा वन्यजीवों की आवाजाही को सुगम बनाती है।
  • भूजल पुनर्भरण क्षेत्र: भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देती है और क्षेत्रीय जल सुरक्षा में योगदान करती है।

अरावली धूल-भरी आँधियों को कैसे रोकती है?

अवरोध प्रभाव

  • यह पर्वतमाला एक भौतिक अवरोध के रूप में कार्य करती है, जो थार मरुस्थल से आने वाली धूल-युक्त हवाओं को इंडो-गंगा के मैदानों में फैलने से रोकती है।
  • यह हवाओं की गति को कम करके तथा उनके प्रवाह की दिशा को परिवर्तित करके मरुस्थलीय धूल के पूर्व की ओर प्रसार को सीमित करती है।

वनस्पति प्रभाव

  • अरावली पर्वतमाला पर स्थित वनस्पति आवरण मृदा को स्थिर बनाए रखने तथा धूल के प्रसार को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • पेड़-पौधे और झाड़ियाँ:
    • वायु की गति को कम करते हैं।
    • वायु में मौजूद धूल कणों को रोकते हैं।
    • मृदा अपरदन को रोकते हैं।
    • पारिस्थितिक स्थिरता को बढ़ाते हैं।

क्षरण के प्रमाण

पर्वतीय संरचनाओं का लुप्त होना

अरावली पर्वतमाला के कई भाग निम्नलिखित कारणों से कथित रूप से नष्ट या लुप्त हो गए हैं:

  • अवैध एवं अत्यधिक खनन
  • अतिक्रमण
  • अस्थिर भूमि उपयोग परिवर्तन

पर्वतमाला में भौगोलिक अंतराल

  • अध्ययनों में अरावली पर्वतमाला की श्रृंखला में अनेक अंतरालों (Gaps) और विच्छेदों (Breaks) की पहचान की गई है।
  • इन अंतरालों के कारण यह प्राकृतिक अवरोध कम प्रभावी हो गया है और धूल-भरी आँधियाँ उत्तरी भारत में अधिक आसानी से प्रवेश कर पाती हैं।

अरावली पर्वतमाला की कमजोर होती प्रणाली के दुष्परिणाम

  • धूल भरी आँधियों की गतिविधि में वृद्धि: अरावली के प्राकृतिक अवरोध के कमजोर होने से थार मरुस्थल की धूल उत्तरी भारत के भीतर अधिक गहराई तक प्रवेश कर सकती है, जिससे धूल भरी आँधियों की आवृत्ति और तीव्रता दोनों में वृद्धि होती है।
  • वायु की गुणवत्ता में गिरावट: मरुस्थलीय धूल के अधिक प्रसार से वातावरण में PM10 तथा अन्य कणीय पदार्थों की मात्रा बढ़ जाती है।
    • इससे श्वसन संबंधी रोग और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ सकती हैं।
  • जलवायु एवं वर्षा पर प्रभाव: वायुमंडलीय धूल निम्न प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है:
    • बादलों का निर्माण
    • सौर विकिरण संतुलन
    • वर्षा वितरण प्रतिरूप
  • मरुस्थलीकरण में वृद्धि: अरावली के प्राकृतिक अवरोध के कमजोर होने से मरुस्थल जैसी परिस्थितियों का विस्तार आसपास के क्षेत्रों में अधिक तेजी से होने लगता है, जिससे मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा मिलता है।
    • उत्पादक भूमि धीरे-धीरे निम्नीकरण के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकती है।
  • जैव विविधता का ह्रास: आवास विखंडन तथा पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण से वन्यजीव आबादी प्रभावित होती है तथा पारिस्थितिक संपर्क कम होता है।

अरावली क्यों संकट में है?

  • शहरीकरण: बस्तियों और शहरी अवसंरचना के तीव्र विस्तार ने इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ा दिया है।
  • वनों की कटाई: स्थानीय (देशज) वनस्पति के हटने से मिट्टी की स्थिरता कमजोर हुई है तथा धूल कणों को रोकने और नियंत्रित करने की अरावली पर्वतमाला की क्षमता में कमी आई है।
  • अवसंरचनात्मक विकास: सड़कों, राजमार्गों तथा निर्माण परियोजनाओं ने प्राकृतिक आवासों (Habitats) को खंडित किया है और पारिस्थितिक निरंतरता (Ecological Continuity) को बाधित किया है।
  • अवैध और अत्यधिक खनन: बड़े पैमाने पर निष्कर्षण:
    • ग्रेनाइट
    • सिलिका
    • निर्माण सामग्री

इससे पर्वतमाला की संरचनात्मक अखंडता को गंभीर क्षति पहुँची है।

अरावली ग्रीन वॉल परियोजना

  • उद्देश्य: अरावली क्षेत्र में एक सतत हरित पारिस्थितिक अवरोध का निर्माण करना, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बहाल हो तथा मरुस्थलीकरण का मुकाबला किया जा सके।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • बड़े पैमाने पर वनीकरण एवं पुनर्वनीकरण
    • क्षतिग्रस्त भूमि का पुनर्स्थापन
    • स्थानीय पारिस्थितिक परिस्थितियों के अनुकूल देशी पौधों का उपयोग
    • जलवायु एवं पर्यावरणीय दबावों के विरुद्ध पारिस्थितिकी तंत्र की लचीलापन क्षमता में वृद्धि

आगे की राह 

  • अरावली ग्रीन वॉल परियोजना को तेज़ी से लागू करना: देशी वनस्पतियों के माध्यम से वनीकरण कार्यक्रमों को समयबद्ध तरीके से लागू किया जाए ताकि पारिस्थितिक अवरोध मजबूत हो सके।
  • पारिस्थितिक अंतरालों की पुनर्बहाली: अरावली पर्वतमाला के भीतर स्थित संवेदनशील अंतरालों की पहचान कर उनका पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन किया जाए, ताकि धूल भरी आँधियों के प्रसार और उनके आवागमन को कम किया जा सके।
  • खनन गतिविधियों का कड़ा विनियमन: अवैध खनन तथा पर्यावरणीय उल्लंघनों पर रोक लगाने के लिए निगरानी, कानून-प्रवर्तन और अनुपालन तंत्र को सुदृढ़ बनाया जाए।
  • सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना: संरक्षण, वनीकरण तथा संसाधनों के सतत प्रबंधन से संबंधित पहलों में स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
  •  परिदृश्य-स्तरीय पारिस्थितिक पुनर्स्थापन: केवल वृक्षारोपण अभियानों तक सीमित न रहकर संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली पर ध्यान दिया जाए ताकि दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित हो सके।

निष्कर्ष

  • अरावली पर्वतमाला उत्तरी भारत की प्राकृतिक पर्यावरणीय सुरक्षा ढाल है, जो क्षेत्र को धूल-भरी आँधियों, मरुस्थलीकरण, जैव विविधता ह्रास तथा पारिस्थितिक क्षरण से बचाती है।
  • इसका निरंतर विनाश वायु गुणवत्ता, जलवायु स्थिरता, कृषि, जल सुरक्षा तथा जन-स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर रहा है।
  • अरावली पर्वतमाला के संरक्षण और पुनर्स्थापन को एक सामरिक पर्यावरणीय प्राथमिकता के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसके लिए सरकारों, स्थानीय समुदायों तथा संरक्षण एजेंसियों के समन्वित और संयुक्त प्रयास आवश्यक हैं।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: अरावली पर्वतमाला केवल एक भूवैज्ञानिक अवशेष नहीं है, बल्कि घनी आबादी वाले इंडो-गंगा के मैदानों के लिए एक महत्वपूर्ण जलवायवीय सुरक्षा कवच भी है। हाल के पर्यावरणीय क्षरण तथा मानसून-पूर्व धूल-भरी आँधियों की बढ़ती आवृत्ति के संदर्भ में इस कथन का परीक्षण कीजिए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

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