प्रश्न की मुख्य माँग
- छठी अनुसूची में शामिल करने की माँग के कारणों का उल्लेख कीजिए।
- छठी अनुसूची प्रदान करने से उत्पन्न चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।
- दुरुपयोग रोकने के लिए सुरक्षा उपाय सुझाइए।
|
उत्तर
वर्ष 2019 में केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद, लद्दाख में संवैधानिक सुरक्षा उपायों की माँग लगातार बढ़ी है। छठी अनुसूची का दर्जा दिए जाने की माँग पहचान, भूमि संरक्षण और सहभागी शासन से जुड़ी चिंताओं को दर्शाती है, विशेषकर एक संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी के संदर्भ में।
छठी अनुसूची में शामिल करने की माँग के कारण
- जनजातीय पहचान की सुरक्षा: लद्दाख की बहुसंख्यक जनजातीय आबादी अपनी संस्कृति और स्वायत्तता को बाहरी प्रभावों से बचाने के लिए संवैधानिक संरक्षण चाहती है।
- उदाहरण: लद्दाख एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (KDA) जैसे संगठन छठी अनुसूची की माँग कर रहे हैं।
- भूमि और संसाधनों की सुरक्षा: केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद जनसांख्यिकीय परिवर्तन और व्यावसायिक हस्तक्षेप का डर बढ़ा है, जिससे भूमि संरक्षण के लिए कानूनी सुरक्षा की माँग उठी है।
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी: विधानसभा के अभाव में लोकतांत्रिक भागीदारी और आवाज़ सीमित हो गई है।
- उदाहरण: लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग सांसदों की माँग।
- पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता: लद्दाख की नाजुक पारिस्थितिकी के कारण विकास संबंधी निर्णयों पर स्थानीय नियंत्रण आवश्यक है।
- उदाहरण: सोनम वांगचुक के आंदोलनों ने क्षेत्र की पर्यावरणीय संवेदनशीलता को उजागर किया है।
- वार्ताओं में धीमी प्रगति: अब तक हुई वार्ताएँ निर्णायक परिणाम नहीं दे पाई हैं, जिससे संवैधानिक गारंटी की माँग और तेज हुई है।
छठी अनुसूची प्रदान करने से उत्पन्न चुनौतियाँ
- प्रशासनिक जटिलता: केंद्रशासित प्रदेश और स्वायत्त परिषदों के बीच दोहरी शासन व्यवस्था से अधिकारों का टकराव हो सकता है।
- उदाहरण: मौजूदा हिल काउंसिलों के साथ अधिकार क्षेत्र को लेकर विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
- सीमित वित्तीय क्षमता: स्वायत्त परिषदों के पास विकास कार्यों के लिए पर्याप्त वित्तीय स्वायत्तता का अभाव हो सकता है।
- उदाहरण: पूर्वोत्तर के स्वायत्त जिला परिषदों की तरह केंद्रीय अनुदानों पर निर्भरता बनी रह सकती है।
- स्थानीय अभिजात वर्ग का प्रभुत्व: परिषदों में स्थानीय प्रभावशाली वर्ग का वर्चस्व बढ़ने का खतरा रहता है, जिससे समान प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।
- रणनीतिक चिंताएँ: लद्दाख एक सीमावर्ती क्षेत्र है, जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे महत्त्वपूर्ण हैं।
- उदाहरण: चीन और पाकिस्तान के निकट होने के कारण अत्यधिक विकेंद्रीकरण में सावधानी आवश्यक है।
- शासन का विखंडन: लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग परिषदों से क्षेत्रीय विभाजन और बढ़ सकता है।
- उदाहरण: दोनों क्षेत्रों के बीच पहले से मौजूद सामाजिक-राजनीतिक भिन्नताएँ और गहरी हो सकती हैं।
दुरुपयोग रोकने के लिए सुरक्षा उपाय
- स्पष्ट विधायी सीमाएँ: केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन और स्वायत्त परिषदों के मध्य शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया जाना चाहिए, ताकि अधिकारों का टकराव न हो।
- उदाहरण: भारतीय संविधान के अनुच्छेद-371 की तरह संरचित प्रावधान।
- वित्तीय जवाबदेही तंत्र: निधियों के उपयोग में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सशक्त तंत्र विकसित किए जाएँ।
- उदाहरण: नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा लेखा-परीक्षण और सार्वजनिक प्रकटीकरण के प्रावधान।
- समावेशी प्रतिनिधित्व के प्रावधान: परिषदों में महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण सुनिश्चित कर कुछ वर्गों के प्रभुत्व को रोका जा सकता है।
- पर्यावरणीय नियामक निगरानी: स्थानीय निर्णयों को राष्ट्रीय पर्यावरणीय लक्ष्यों के अनुरूप रखा जाए।
- उदाहरण: पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) मानकों के साथ समन्वय।
- संसद द्वारा आवधिक समीक्षा: संसदीय समितियों के माध्यम से स्वायत्त निकायों के कार्यों की नियमित समीक्षा कर कमियों को दूर किया जा सकता है।
निष्कर्ष
लद्दाख के संदर्भ में स्वायत्तता और जवाबदेही के बीच संतुलन अत्यंत आवश्यक है। जहाँ छठी अनुसूची में शामिल करना पहचान और शासन से जुड़ी चिंताओं का समाधान कर सकता है, वहीं मजबूत सुरक्षा उपाय और सहकारी संघवाद यह सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य हैं कि समावेशी विकास हो सके और राष्ट्रीय व रणनीतिक हितों से कोई समझौता न हो।
To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.
Latest Comments