Q. वास्तविक लैंगिक समानता प्राप्त करने के लिए राजनीतिक सशक्तिकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। संसद और राज्य विधानसभाओं के लिए महिला आरक्षण कानून को लागू करने में आने वाली संरचनात्मक और प्रक्रियात्मक चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • संरचनात्मक चुनौतियाँ – संसद
  • संरचनात्मक चुनौतियाँ – राज्य विधानमंडल
  • प्रक्रियात्मक चुनौतियाँ – संसद
  • प्रक्रियात्मक चुनौतियाँ – राज्य विधानमंडल

उत्तर

संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम, 2023 लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान करता है। यह वास्तविक लैंगिक समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है, किंतु इसका क्रियान्वयन जनगणना एवं परिसीमन जैसी प्रक्रियाओं पर निर्भर है, जिससे अनेक संरचनात्मक एवं राजनीतिक चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।

संरचनात्मक चुनौतियाँ – संसद

  • जनगणना और परिसीमन से संबंध: वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना और अनुच्छेद-82 के तहत होने वाले परिसीमन पर आरक्षण निर्भर है, जिससे वर्ष 2034 से पूर्व इसका कार्यान्वयन असंभव लगता है।
    • उदाहरण: वर्ष 2027 में निर्धारित जनगणना और पिछले परिसीमन आयोगों (जैसे- वर्ष 2002-08) को कई वर्ष लगे।
  • उत्तर-दक्षिण सीटों के पुनर्आवंटन में तनाव: परिसीमन से उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों के लिए सीटें बढ़ सकती हैं, जिससे संघीय संतुलन बिगड़ सकता है और कार्यान्वयन का राजनीतीकरण हो सकता है।
  • उच्च सदनों का बहिष्कार: यह अधिनियम राज्यसभा और राज्य विधान परिषदों को बाहर रखता है, जिससे प्रमुख विचार-विमर्श निकायों में महिलाओं की उपस्थिति सीमित हो जाती है।
    • उदाहरण: अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदनों को कोटा प्रदान करने का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है।

संरचनात्मक चुनौतियाँ – राज्य विधानमंडल

  • विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्आवंटन: 4,000 से अधिक विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्सीमांकन करना होगा, जिससे प्रशासनिक और राजनीतिक जटिलताएँ उत्पन्न होंगी।
    • उदाहरण: पूर्व परिसीमन अभ्यासों में राज्यों के बीच कई वर्षों के समन्वय की आवश्यकता पड़ी थी।
  • ओबीसी उप-आरक्षण का अभाव: अनुसूचित/अनुसूचित जनजाति की महिलाओं को उप-कोटा प्राप्त है, जबकि ओबीसी महिलाओं को इससे वंचित रखा गया है, जिससे समानता संबंधी चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
  • चयन-प्रेरित अस्थिरता: आरक्षित सीटों के बार-बार परिसीमन से राज्य स्तर पर निर्वाचन क्षेत्र विकास की निरंतरता बाधित हो सकती है।
    • उदाहरण: 73वें संशोधन के तहत पंचायती राज सीटों के परिसीमन के दौरान भी इसी प्रकार की चिंताएँ उठाई गई थीं।

प्रक्रियात्मक चुनौतियाँ – संसद

  • जनगणना प्रकाशन में लगने वाला समय: गणना, सत्यापन और प्रकाशन में पारंपरिक रूप से 12-18 महीने लगते हैं, जिससे बाद के चरणों में देरी होती है।
    • उदाहरण: जनगणना कार्यों के लिए अधिसूचना से पूर्व चरणबद्ध डेटा सत्यापन की आवश्यकता होती है।
  • परिसीमन आयोग का गठन: राष्ट्रपति जनगणना प्रकाशन के बाद ही आयोग का गठन कर सकते हैं, जिससे प्रक्रियात्मक निर्भरता उत्पन्न होती है।
    • उदाहरण: अनुच्छेद-82 जनगणना के बाद परिसीमन अनिवार्य करता है।
  • नए संवैधानिक संशोधन की संभावित आवश्यकता: आरक्षण को परिसीमन से अलग करने के लिए एक और संशोधन की आवश्यकता होगी, जिसके लिए राजनीतिक सहमति आवश्यक है।

प्रक्रियात्मक चुनौतियाँ – राज्य विधानमंडल

  • राज्यों के बीच समन्वय: विधानसभा सीटों का एक साथ पुनर्निर्धारण करने के लिए राज्य सरकारों और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के साथ व्यापक परामर्श की आवश्यकता होती है।
    • उदाहरण: परिसीमन आयोग (2002) में राज्य स्तरीय सुनवाई लंबी चली।
  • कानूनी चुनौतियाँ और मुकदमेबाजी: रोटेशन नियमों और सीट आवंटन में अस्पष्टता न्यायिक समीक्षा को जन्म दे सकती है, जिससे कार्यान्वयन में बाधा आ सकती है।
  • प्रशासनिक तैयारी: मतदाता सूचियों, निर्वाचन क्षेत्र मानचित्रण और पार्टी स्तर पर उम्मीदवार चयन प्रक्रियाओं को नई सीट संरचनाओं के अनुरूप तेजी से ढालना होगा।
    • उदाहरण: भारत निर्वाचन आयोग के अंतर्गत प्रत्येक आम चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर रसद संबंधी तैयारियाँ की जाती हैं।

निष्कर्ष

वास्तविक लैंगिक समानता को प्रक्रियात्मक क्रम का बंधक नहीं बनाया जा सकता। संसद को आरक्षण को परिसीमन से अलग करने, अस्थायी रूप से सीटों का विस्तार करने, रोटेशन के नियमों को स्पष्ट करने और उप-आरक्षण संबंधी चिंताओं को दूर करने पर विचार करना चाहिए। संवैधानिक जटिलता नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति यह सुनिश्चित करेगी कि प्रतिनिधित्व एक जीवंत लोकतांत्रिक वास्तविकता बन जाए।

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