Q. 'सामाजिक न्याय' से 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की ओर वैचारिक परिवर्तन भारतीय समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों को किस प्रकार प्रभावित करता है, चर्चा कीजिए। संवैधानिक नैतिकता को संरक्षित करने में महात्मा ज्योतिराव फुले का दृष्टिकोण हमारा मार्गदर्शन कैसे कर सकता है? (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • वैचारिक परिवर्तन: सामाजिक न्याय → सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को समझाइए।
  • वंचित वर्गों पर प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
  • ज्योतिराव फुले की दृष्टि एवं संवैधानिक नैतिकता का वर्णन कीजिए।

उत्तर

भारत की सामाजिक संरचना विभिन्न प्रतिस्पर्धी विचारधाराओं से निर्मित है। सामाजिक न्याय से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ओर हो रहा परिवर्तन समानता, प्रतिनिधित्व और अधिकारों को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करता है, जिससे ज्योतिराव फुले की दृष्टि संवैधानिक नैतिकता की रक्षा के लिए और अधिक प्रासंगिक हो जाती है।

वैचारिक परिवर्तन: सामाजिक न्याय → सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

  • समानता से पहचान की ओर परिवर्तन: असमानताओं को कम करने के बजाय एकीकृत सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा देने पर जोर।
    • उदाहरण: एक समान हिंदू पहचान को बढ़ावा देने से जातिगत वास्तविकताएँ पीछे छूट जाती हैं।
  • संरचनात्मक आलोचना का क्षरण: जाति, वर्ग और पितृसत्ता जैसे मुद्दों को प्रणालीगत समस्या के बजाय विभाजनकारी माना जाता है।
  • वृत्तांत का केंद्रीकरण: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद विविध आवाजों के बजाय एकल कथा को प्राथमिकता देता है।
    • उदाहरण: दलितों जैसे वंचित वर्गों के अनुभव मुख्यधारा की चर्चा में हाशिए पर चले जाते हैं।
  • सुधार के बजाय परंपरा को प्राथमिकता: पारंपरिक सामाजिक संरचनाओं को सांस्कृतिक मूल्यों के रूप में स्वीकार किया जाता है।
    • उदाहरण: रूढ़िवादी सामाजिक व्यवस्था का महिमामंडन।
  • असहमति का अवमूल्यन: असमानताओं पर प्रश्न उठाना राष्ट्र-विरोधी या विघटनकारी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

वंचित वर्गों पर प्रभाव

  • जातिगत उत्पीड़न का निरंतर बने रहना: संरचनात्मक असमानताएँ काफी हद तक अनसुलझी रहती हैं, जिससे जाति आधारित पदानुक्रम सामाजिक जीवन में जारी रहता है।
  • प्रतिनिधित्व का क्षरण: पहचान के समरूपीकरण से वंचित समुदायों के विविध अनुभव दब जाते हैं।
    • उदाहरण: मध्य भारत में खनन परियोजनाओं के कारण जनजातीय विस्थापन से जुड़ी चिंताएँ व्यापक सांस्कृतिक एकता की बहस में दब जाती हैं।
  • लैंगिक असमानता का सुदृढ़ होना: परंपरा के नाम पर पितृसत्तात्मक मानदंडों को वैधता मिलती है, जिससे लैंगिक न्याय की प्रगति सीमित होती है।
    • उदाहरण: कई क्षेत्रों में महिलाएँ अभी भी वेतन असमानता और कार्यस्थल उत्पीड़न का सामना करती हैं।
  • आर्थिक शोषण का बने रहना: वर्ग-आधारित असमानताएँ जारी रहती हैं, क्योंकि आर्थिक मुद्दे पहचान-आधारित राजनीति में पीछे छूट जाते हैं।
    • उदाहरण: ज्योतिराव फुले द्वारा आलोचित जमींदारी शोषण की झलक आज भी महाराष्ट्र और पंजाब में किसानों की ऋणग्रस्तता में दिखाई देती है।
  • समानता पर नीति का घटता फोकस: कल्याणकारी प्राथमिकताएँ कभी-कभी पुनर्वितरण और भौतिक समानता से हटकर प्रतीकात्मक या पहचान-आधारित मुद्दों पर केंद्रित हो जाती हैं।

ज्योतिराव फुले की दृष्टि एवं संवैधानिक नैतिकता 

  • परस्पर जुड़ी असमानताओं की अवधारणा: फुले ने जाति, वर्ग और पितृसत्ता को परस्पर जुड़े हुए दमनकारी तंत्र के रूप में समझा।
    • उदाहरण: ‘गुलामगिरी’ में उन्होंने जातिगत उत्पीड़न की तुलना दास प्रथा से की।
  • पदानुक्रम की तार्किक आलोचना: उन्होंने सामाजिक असमानता और जाति व्यवस्था के धार्मिक या दैवी आधार को अस्वीकार किया।
    • उदाहरण: उन्होंने जाति को धर्म नहीं, बल्कि ऐतिहासिक प्रभुत्व का परिणाम माना।
  • शिक्षा और सशक्तीकरण पर बल: सामाजिक मुक्ति और सुधार के लिए शिक्षा को प्रमुख साधन के रूप में देखा।
    • उदाहरण: सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर महिलाओं की शिक्षा के लिए कार्य।
  • संवैधानिक मूल्यों की आधारशिला: उनके विचारों ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर और आधुनिक संवैधानिक सिद्धांतों को प्रेरित किया।
    • उदाहरण: समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के आदर्श संविधान में परिलक्षित होते हैं।
  • वंचितों को केंद्र में रखना: उन्होंने एक ऐसे न्यायपूर्ण समाज की वकालत की, जो वंचित वर्गों की गरिमा पर आधारित हो।
    • उदाहरण: शूद्रों, अतिशूद्रों और महिलाओं की गरिमा पर विशेष बल।

निष्कर्ष

ज्योतिराव फुले की दृष्टि को पुनर्स्थापित करना आवश्यक है, ताकि संवैधानिक नैतिकता बहुसंख्यक पहचान पर आधारित दृष्टिकोण पर वरीयता प्राप्त कर सके। समानता, गरिमा और न्याय पर आधारित संतुलित दृष्टिकोण ही वंचित वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है और भारत की लोकतांत्रिक तथा बहुलतावादी परंपरा को सुदृढ़ बनाए रख सकता है।

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