संदर्भ
भारत में कुपोषण का दोहरा बोझ देखने को मिल रहा है, लगातार कुपोषण के साथ-साथ बच्चों में अधिक वजन और मोटापे में तेजी से वृद्धि हो रही है।
संबंधित तथ्य
- वर्ल्ड ओबेसिटी फेडरेशन द्वारा जारी ‘वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस’ के अनुमान के अनुसार, भारत में 40 मिलियन से अधिक बच्चे या तो अधिक वजन वाले हैं अथवा मोटापे से ग्रस्त हैं।
‘चाइल्डहुड ओबेसिटी’ के बारे में
- ‘चाइल्डहुड ओबेसिटी’ एक ऐसी चिकित्सीय स्थिति है, जिसमें बच्चे के शरीर में अतिरिक्त वसा जमा हो जाती है, जो उसके स्वास्थ्य और कल्याण को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। इसका आकलन आमतौर पर आयु-आधारित बॉडी मास इंडेक्स (BMI) का उपयोग करके किया जाता है, जिसमें बच्चे के वजन की तुलना मानकीकृत विकास चार्ट से की जाती है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, किसी बच्चे को अधिक वजन वाला या मोटापे से ग्रस्त तब माना जाता है, जब उसका BMI-आयु के अनुसार स्वस्थ सीमा से काफी अधिक हो।
चुनौतियाँ
- खराब आहार गुणवत्ता: पोषण स्तर के दोनों छोरों पर मौजूद बच्चों में अक्सर प्रोटीन, विटामिन और आवश्यक खनिजों की कमी होती है।
- इसका परिणाम यह होता है कि अधिक वजन वाले बच्चों में भी प्रछन्न भुखमरी(सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी) पाई जाती है।
- तेजी से बदलता पोषण स्तर: बढ़ते शहरीकरण, गतिहीन जीवनशैली और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की उपलब्धता चाइल्डहुड ओबेसिटी को बढ़ावा दे रही है।
- विकसित देशों के विपरीत, जहाँ आहार में परिवर्तन धीरे-धीरे हुआ, भारत में यह बदलाव पिछले 15 वर्षों में ही हुआ है, जिससे स्वास्थ्य प्रणाली इसके लिए कम तैयार है।
- कुपोषण का दोहरा बोझ: भारतीय बच्चों का एक बड़ा हिस्सा स्वस्थ विकास के लिए पर्याप्त कैलोरी का सेवन नहीं करता है।
- साथ ही, कई बच्चे चीनी, परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट, नमक और अस्वास्थ्यकर वसा से भरपूर आहार का सेवन करते हैं।
बाल्यावस्था में बढ़ते मोटापे के कारण
- गतिहीन जीवनशैली: बच्चों में स्क्रीन का बढ़ता समय और शारीरिक गतिविधि में कमी।
- शहरीकरण और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ: सस्ते, कैलोरी से भरपूर प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की आसान उपलब्धता।
- सीमित पोषण जागरूकता: स्वस्थ आहार और अनुशंसित चीनी सेवन के बारे में विश्वसनीय जानकारी का अभाव।
- पीढ़ी-दर-पीढ़ी पोषण संबंधी कमियाँ: यूनिसेफ के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि बच्चों में पोषण संबंधी कमियाँ अक्सर उनकी माताओं की खराब खान-पान की आदतों का परिणाम होती हैं।
- सामाजिक-आर्थिक कारक: ‘इंडियन पीडियाट्रिक्स’ में प्रकाशित वर्ष 2020 के एक अध्ययन से पता चलता है कि मोटापा अब केवल धनी परिवारों तक ही सीमित नहीं है – स्वस्थ भोजन विकल्पों तक सीमित पहुँच वाले परिवारों के बच्चे अपेक्षाकृत सस्ते, कैलोरी से भरपूर प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर निर्भर हो सकते हैं।
आशय
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, बचपन में अधिक वजन होने से भविष्य में टाइप 2 मधुमेह और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है।
- इसलिए, कुपोषण और मोटापे का एक साथ होना भारत की पहले से ही गंभीर गैर-संक्रामक रोग चुनौती को और भी गंभीर बना सकता है।
सरकारी पहल
- पोषण अभियान: यह बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं में कुपोषण को कम करने का एक प्रमुख कार्यक्रम है, जिसका मुख्य उद्देश्य कैलोरी सेवन और पोषण पूरक आहार पर ध्यान केंद्रित करना है।
- विद्यालय-आधारित जागरूकता: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने विद्यालयों को अनुशंसित चीनी सेवन की जानकारी प्रदर्शित करने का निर्देश दिया है, जिससे स्वस्थ आहार के प्रति जागरूकता को बढ़ावा मिले।
आगे की राह
- जंक फूड पर कठोर नियंत्रण: सरकार को जंक फूड के विज्ञापन, विपणन और उपलब्धता पर, विशेष रूप से स्कूलों के आस-पास, कड़े नियम लागू करने चाहिए।
- महिला सशक्तीकरण और मातृ पोषण: बच्चों के आहार का संबंध माताओं की पोषण संबंधी जागरूकता और स्वास्थ्य से होता है।
- महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और पोषण संबंधी जानकारी तक पहुँच में सुधार से परिवारों की खान-पान की आदतों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आ सकता है।
- एकीकृत जन स्वास्थ्य रणनीति: बचपन के मोटापे से निपटने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, शहरी विकास और खाद्य विनियमन क्षेत्रों को शामिल करते हुए एक समन्वित दृष्टिकोण की आवश्यकता है।