संदर्भ
केंद्रीय बजट 2026-27 में एक नई ‘नारियल प्रोत्साहन योजना’ की घोषणा की गई, जिसका उद्देश्य पुराने, अनुत्पादक नारियल बागानों को पुनर्जीवित करना और तटीय क्षेत्रों में कृषि का विस्तार करना है।
संबंधित तथ्य
- भारत नारियल का सबसे बड़ा उत्पादक देश है, जिसकी वैश्विक उत्पादन में 30.93% हिस्सेदारी है और उत्पादकता के मामले में यह दूसरे स्थान पर है।
- भारत में प्रति वृक्ष उत्पादकता श्रीलंका, फिलीपींस और इंडोनेशिया से अधिक है।
- उदाहरण के लिए: तमिलनाडु के अन्नामलाई जैसे स्थानों में, बौने और लंबे संकरित नारियल के वृक्ष नियमित रूप से प्रति पेड़ 250-300 कच्चे नारियल उत्पादित करते हैं।
नारियल की खेती के लिए कृषि-जलवायु संबंधी आवश्यकताएँ
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| कारक |
आवश्यकता |
| तापमान |
उष्णकटिबंधीय; तापमान सीमा 20–32°C |
| वर्षा |
प्रतिवर्ष 1000–2500 मिमी. |
| मृदा |
अच्छी जल निकासी वाली रेतीली दोमट, लैटेराइट, तटीय जलोढ़ मिट्टी |
| ऊँचाई |
यह समुद्र तल से 600 मीटर की ऊँचाई तक अनुकूल है। |
| नमी |
उच्च आर्द्रता अनुकूल। |
नारियल बागान के बारे में
- वैज्ञानिक नाम: कोकोस न्यूसीफेरा (Cocos Nucifera)। नारियल उष्णकटिबंधीय भारत की एक प्रमुख बागवानी फसल है।
- भारत विश्व में नारियल का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है।
- इसके अनेक उपयोगों के कारण इसे अक्सर “कल्पवृक्ष” (स्वर्ग का वृक्ष) कहा जाता है।
- प्रमुख उत्पादक राज्य
- पारंपरिक क्षेत्र (पश्चिमी तट)
- विस्तारशील/गैर-पारंपरिक क्षेत्र
- आंध्र प्रदेश
- ओडिशा
- गुजरात
- असम
- महाराष्ट्र
- वैश्विक उत्पादन: नारियल का उत्पादन मुख्य रूप से फिजी और समोआ जैसे द्वीपीय और तटीय क्षेत्रों के साथ-साथ फिलीपींस, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे आर्द्र उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में केंद्रित है।
नारियल का आर्थिक महत्त्व
- नारियल पानी: यह एक प्राकृतिक इलेक्ट्रोलाइट युक्त पेय है, जो शरीर में जल की कमी को पूरा करने, पाचन क्रिया को बेहतर बनाने और शारीरिक गतिविधि के बाद शरीर को तरोताजा करने में सहायता करता है, साथ ही हृदय और मांसपेशियों के स्वास्थ्य के लिए पोटेशियम, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट भी प्रदान करता है।
- स्वस्थ वसा (मध्यम-शृंखला ट्राइग्लिसराइड्स): नारियल, मध्यम-शृंखला ट्राइग्लिसराइड्स से भरपूर होता है, जिसके कारण ये सुपाच्य होता है और शरीर को शीघ्र ऊर्जा प्रदान करता है।
- ये वसा चयापचय में सुधार करते हैं, आँतों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं और निरंतर ऊर्जा प्रदान करते हैं।
- नारियल के छिलके का उपयोग हस्तशिल्प और सक्रिय कार्बन उत्पादन में किया जाता है।
- भारत में नारियल का पेड़ 12 मिलियन से अधिक लोगों को खाद्य सुरक्षा और आजीविका के अवसर प्रदान करता है।
सरकारी पहल
- नारियल विकास बोर्ड (CDB): नारियल विकास बोर्ड (कृषि मंत्रालय के अधीन वर्ष 1981 में स्थापित) नारियल और उसके उत्पादों के उत्पादन, उत्पादकता, प्रसंस्करण, मूल्यवर्द्धन तथा विपणन को बढ़ावा देता है, जिसमें किसान कल्याण और निर्यात प्रोत्साहन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
- नारियल प्रौद्योगिकी मिशन: इसका उद्देश्य उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन के बीच संबंधों को मजबूत करना और शुद्ध नारियल तेल, नारियल चिप्स तथा नारियल आधारित पेय पदार्थों जैसे मूल्य वर्द्धित उत्पादों को बढ़ावा देना है।
- नारियल ताड़ बीमा योजना: यह योजना नारियल किसानों को प्राकृतिक आपदाओं और कीट/रोगों के प्रकोप से होने वाली हानि से बीमा प्रदान करती है, जिससे वित्तीय जोखिम कम होते हैं।
- नारियल प्रोत्साहन योजना: इसका उद्देश्य पुराने और अनुत्पादक नारियल के वृक्षों को अधिक उपज देने वाली किस्मों से परिवर्तित करना है, ताकि कृषि उत्पादन और दीर्घकालिक स्थिरता में सुधार हो सके।
- इसका मार्गदर्शन नारियल विकास बोर्ड द्वारा किया जाएगा।
चुनौतियाँ
- वैश्विक नेतृत्व के बावजूद घरेलू स्तर पर उच्च कीमतें: भारत, नारियल का विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है, फिर भी मजबूत आंतरिक माँग और आपूर्ति संबंधी बाधाओं के कारण घरेलू कीमतें अंतरराष्ट्रीय कीमतों से काफी अधिक बनी हुई हैं।
- बढ़ता तापमान और जलवायु तनाव: वृक्षारोपण क्षेत्रों में तापमान वर्ष 2050 तक 1.6–2.1 डिग्री सेल्सियस और वर्ष 2070 तक 3.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने का अनुमान है, जिससे वाष्प दाब की कमी के कारण सूखे का तनाव बढ़ेगा।
- आंतरिक क्षेत्रों की घटती उपयुक्तता: विभिन्न अध्ययनों से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप आने वाले दशकों में प्रायद्वीपीय भारत के बड़े हिस्से, जिनमें कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के कुछ भाग, तमिलनाडु का दक्षिणी आंतरिक क्षेत्र और पूर्वी तट शामिल हैं, नारियल की कृषि के लिए कम उपयुक्त हो सकते हैं।
- नीति का त्रुटिपूर्ण कार्यान्वयन
- सब्सिडी योजनाओं का अतिव्यापी होना: नारियल विकास बोर्ड पहले से ही नारियल मूल्यवर्द्धन के लिए 25% पूँजी सब्सिडी प्रदान करता है, जिससे राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की समान योजना निरर्थक हो जाती है, विशेष रूप से इसके अतिरिक्त निरीक्षण और अनुपालन आवश्यकताओं को देखते हुए।
- उच्च निवेश और अनुपालन संबंधी बाधाएँ: राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड का ₹150 करोड़ का क्लस्टर विकास कार्यक्रम उच्च निवेश और अनुपालन संबंधी बाधाओं के कारण सफल नहीं हो सका, जिससे FPOs और सहकारी समितियों को सार्थक भागीदारी से वंचित रखा गया।
आगे की राह
- ‘मदर पाम गार्डन’ की स्थापना: राज्य के बागवानी विभागों और विश्वविद्यालयों के स्वामित्व वाली विशाल भूमि का उपयोग मदर पाम गार्डन स्थापित करने के लिए किया जा सकता है।
- जलवायु-प्रतिरोधी किस्मों के लिए अनुसंधान को सुदृढ़ बनाना: इसी प्रकार, राज्य को CPCRI और तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में अनुसंधान को सुदृढ़ बनाने पर विचार करना चाहिए, ताकि वे गर्मी सहन करने वाली, सूखा प्रतिरोधी और रोग प्रतिरोधी किस्मों की पहचान और संकरण कर सकें।
- बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), सहकारी समितियों और विश्वसनीय निजी नर्सरियों को भी इन प्रतिरोधी पौधों के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए सक्षम बनाया जाना चाहिए।
- बड़े क्लस्टरों से पायलट-आधारित मॉडलों की ओर परिवर्तन: बड़े, केंद्रीय रूप से डिजाइन किए गए क्लस्टरों के बजाय, अमूल या ITC जैसी कंपनियों के साथ विपणन साझेदारी वाले छोटे सहकारी पायलट मॉडल को टिपटूर (बॉल कोपरा), अन्नामलाई (कच्चे नारियल) और पोलाची (नारियल तेल) जैसे विशिष्ट केंद्रों में परीक्षण किया जाना चाहिए।