पारसी समुदाय में बहिष्कार

28 Mar 2026

संदर्भ

सुप्रीम कोर्ट एक ऐसे मामले की सुनवाई करने जा रहा है जिसमें यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या किसी पारसी महिला को समुदाय से बाहर विवाह करने पर पारसी माना जाना बंद किया जा सकता है? यह वर्ष 2012 से लंबित संवैधानिक प्रश्न को पुनर्जीवित करता है।

संबंधित तथ्य

  • यह मामला दीना बुधराजा की याचिका से संबंधित है, जिन्हें वर्ष 2024 में अपनी दादी के अंतिम संस्कार हेतु अगियारी (Zoroastrian fire temple) में प्रवेश से वंचित कर दिया गया।
  • उन्होंने वर्ष 2009 में विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत एक हिंदू पुरुष से विवाह किया था और धर्म परिवर्तन नहीं किया था, फिर भी उन्हें बताया गया कि यह विवाह ही उन्हें समुदाय से बाहर कर देता है, जैसा कि नागपुर पारसी पंचायती नियमों में प्रावधान है।
  • पारसी पंचायती, धार्मिक एवं सामाजिक मामलों को नियंत्रित करते हैं।
  • नागपुर पारसी पंचायती का नियम 5(2)
    • गैर-पारसी से विवाह करने वाली पारसी महिलाओं को बाहर करता है।
    • उनके बच्चों को धार्मिक पहचान और अगियारी में प्रवेश से वंचित करता है।

बहिष्कार (Excommunication) के बारे में

  • बहिष्कार का अर्थ किसी व्यक्ति को धार्मिक समुदाय या संस्था से औपचारिक रूप से बाहर करना है, जिससे वह धार्मिक प्रथाओं और सामाजिक जीवन में भाग लेने के अधिकार से वंचित हो जाता है।
    • उदाहरण: पारसी संदर्भ में, कुछ पंचायती नियम गैर-पारसी से विवाह करने वाली महिलाओं को अगियारी में प्रवेश से रोकते हैं, जिसे बहिष्कार का रूप माना जाता है।
  • बहिष्कार की प्रमुख विशेषताएँ
    • यह धार्मिक प्राधिकरण या सामुदायिक निकाय द्वारा लिया गया अनुशासनात्मक कदम होता है।
    • व्यक्ति को पूजा स्थलों, अनुष्ठानों या सामुदायिक आयोजनों से वंचित किया जा सकता है।
    • इससे सामाजिक और धार्मिक अलगाव उत्पन्न होता है।

संबंधित संवैधानिक प्रावधान

  • समानता का अधिकार (अनुच्छेद-14): यह नियम अनुच्छेद-14 का उल्लंघन करता है क्योंकि यह केवल लिंग के आधार पर वर्गीकरण करता है।
    • पारसी पुरुष विवाह के बाद अपनी पहचान बनाए रखते हैं, जबकि महिलाओं को बाहर कर दिया जाता है।
  • जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद-21)
    • अनुच्छेद-21 के तहत जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता, गरिमा और स्वायत्तता का हिस्सा है।
    • यह नियम महिलाओं को उनके धार्मिक पहचान और समुदाय तक पहुँच से वंचित करके प्रभावी रूप से दंडित करता है।
  • धर्म की स्वतंत्रता (अनुच्छेद-25)
    • अनुच्छेद-25 धर्म का पालन करने और उसका आचरण करने का अधिकार प्रदान करता है।
    • याचिका में यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या कोई सामुदायिक ट्रस्ट, बिना औपचारिक धर्म परिवर्तन के, किसी व्यक्ति को उसके धर्म का त्याग करने वाला घोषित करने का अधिकार रखता है।
  • विशेष विवाह फ्रेमवर्क
    • विशेष विवाह अधिनियम, 1954 अंतर-धार्मिक विवाहों की अनुमति देता है, जिसमें धर्म परिवर्तन की आवश्यकता नहीं होती है।
    • पंचायत का यह नियम विवाह को धार्मिक पहचान के ह्रास से जोड़कर इस सिद्धांत का विरोध करता है।

मुख्य मुद्दे

  • लिंग-आधारित भेदभाव: यह नियम समान परिस्थितियों में पुरुषों और महिलाओं के साथ अलग व्यवहार करता है, जिससे पितृसत्तात्मक मानदंडों को बढ़ावा मिलता है।
  • पहचान बनाम धर्म: ‘पारसी’ को एक जातीय पहचान और ‘जोरोएस्ट्रियन’ को एक धार्मिक पहचान के रूप में देखने का अंतर इस बहस का केंद्रीय बिंदु है।
    • याचिका में तर्क दिया गया है कि जन्म-आधारित पहचान को विवाह के माध्यम से समाप्त नहीं किया जा सकता है।
  • धार्मिक निकायों का अधिकार: यह मामला इस बात पर प्रश्न उठाता है कि सामुदायिक संस्थाएँ सदस्यता और पहचान को किस सीमा तक विनियमित कर सकती हैं।

न्यायिक दृष्टिकोण

  • जमशेद कंगा मामला (2011): बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कहा कि बहिष्कार का जोरोएस्ट्रियन धर्म में कोई स्थान नहीं है।
  • न्यायालय सामान्यतः धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते, परंतु मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर हस्तक्षेप करते हैं।

आगे की राह

  • संवैधानिक मूल्यों के अनुरूपता: भेदभावपूर्ण प्रथाओं की समीक्षा करके यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि धार्मिक प्रथाएँ अनुच्छेद-14 के अंतर्गत समानता और गरिमा के सिद्धांतों के अनुरूप हों।
  • संवैधानिक नैतिकता का अनुप्रयोग: न्यायपालिका को इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य के मामले की तरह संवैधानिक नैतिकता लागू करते हुए बहिष्कारी प्रथाओं को निरस्त करना चाहिए।
  • धार्मिक स्वायत्तता की सीमाओं का निर्धारण: अनुच्छेद-26 के दायरे को स्पष्ट किया जाना चाहिए ताकि सामुदायिक अधिकार व्यक्तिगत मौलिक अधिकारों पर हावी न हों।
  • सामुदायिक-आधारित सुधार को प्रोत्साहन: समुदायों के भीतर आंतरिक सुधारों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जैसा कि दिल्ली और कोलकाता के कुछ पारसी पंचायतों द्वारा अपनाई गई समावेशी प्रथाओं में देखा गया है।

भारत में पारसी समुदाय

उत्पत्ति

  • पारसी, जोरोएस्ट्रियन धर्म के अनुयायी हैं, जिसकी स्थापना जोरोस्टर द्वारा की गई थी।
  • वे 8वीं शताब्दी में धार्मिक उत्पीड़न से बचने हेतु फारस से भारत आए और गुजरात के संजान में बसे।

धार्मिक एवं सांस्कृतिक विशेषताएँ

  • वे अगियारी (फायर टेम्पल) में पूजा करते हैं, जहाँ अग्नि पवित्र मानी जाती है।
  • मुख्य सिद्धांत: सद्विचार, सद्वचन, सद्कर्म (Good Thoughts, Good Words, Good Deeds)।
  • जनसंख्या स्थिति: भारत के सबसे छोटे धार्मिक अल्पसंख्यकों में से एक (~60,000, जनगणना 2011)।
  • मुख्यतः मुंबई और गुजरात में केंद्रित।
  • कम प्रजनन दर, वृद्ध होती जनसंख्या और घटती संख्या जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे है।

आर्थिक एवं सामाजिक योगदान

  • भारत के औद्योगीकरण और परोपकार में महत्त्वपूर्ण योगदान।
  • प्रमुख व्यक्तित्व
    • जमशेदजी टाटा
    • दादाभाई नौरोजी।
  • उच्च साक्षरता, उद्यमिता और परोपकारी संस्थानों के लिए प्रसिद्ध।

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