संसद में वाक् स्वतंत्रता

14 Mar 2026

संदर्भ

लोकसभा अध्यक्ष ने इस बात पर बल दिया कि संसद में वाक् स्वतंत्रता सुनिश्चित है, लेकिन यह संविधान तथा संसद की प्रक्रिया को विनियमित करने वाले नियमों और स्थायी आदेशों के अधीन है।

संबंधित तथ्य

  • उन्होंने भारतीय संविधान के अनुच्छेद-105 का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि संसद में वाक् स्वतंत्रता संसदीय प्रक्रियाओं और स्थायी आदेशों के ढाँचे के भीतर कार्य करती है।
  • अपने पद से हटाने के प्रस्ताव पर हुई बहस के बाद सदन को संबोधित करते हुए अध्यक्ष ने कहा कि विभिन्न दलों के सदस्यों ने दो दिनों में बारह घंटे से अधिक समय तक चर्चा की और अपने विचार तथा चिंताएँ प्रस्तुत कीं।

 भारत में वाक् स्वतंत्रता का अधिकार

  • मुक्त भाषण से तात्पर्य अपने विचारों और मतों को सरकारी सेंसरशिप या दंड के भय के बिना व्यक्त करने के अधिकार से है।

संवैधानिक ढाँचा

  • अनुच्छेद-19(1)(a): यह सभी नागरिकों को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिकार प्रस्तावना में निहित विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के वचन पर आधारित है।
    • यह अधिकार केवल बोले या लिखे शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि रचनात्मक अभिव्यक्ति, पत्रकारिता, डिजिटल सामग्री, फिल्में और सोशल मीडिया पोस्ट को भी शामिल करता है।
  • अनुच्छेद-19(2): राज्य निम्नलिखित हितों में युक्तिसंगत प्रतिबंध लगा सकता है—
    • भारत की सार्वभौमिकता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टता या नैतिकता, न्यायालय की अवमानना, मानहानि, अपराध के लिए उकसावा।

संसद में वाक् स्वतंत्रता के बारे में

  • संसद में वाक् स्वतंत्रता एक संसदीय विशेषाधिकार है, जो संसद सदस्यों (MPs) को बहस और चर्चाओं के दौरान बिना किसी कानूनी कार्रवाई के भय के स्वतंत्र रूप से बोलने की अनुमति देता है।
  • संवैधानिक प्रावधान
    • अनुच्छेद-121: यह संसद में भारत के सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा को प्रतिबंधित करता है, केवल महाभियोग की कार्यवाही के दौरान। इस प्रकार यह विधायी स्वतंत्रता और न्यायिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखता है।
    • अनुच्छेद-105: यह संसद सदस्यों को संसद में कही गई किसी भी बात या दिए गए किसी भी मत के लिए नागरिक या आपराधिक कार्यवाही से प्रतिरक्षा प्रदान करता है।
    • अनुच्छेद-194: इसी प्रकार का प्रावधान राज्य विधानसभाओं के लिए भी भारतीय संविधान के अनुच्छेद-194 के अंतर्गत मौजूद है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • कानूनी कार्यवाही से प्रतिरक्षा: सांसद, संसद में कही गई किसी भी बात या दिए गए किसी भी मत के लिए न्यायालयों में अभियोजन का सामना नहीं कर सकते हैं।
    • सार्वजनिक मुद्दों पर बहस की स्वतंत्रता: सदस्य सरकारी नीतियों की आलोचना कर सकते हैं, राष्ट्रीय मुद्दे उठा सकते हैं और बाहरी दबाव के बिना बहस में भाग ले सकते हैं।
    • संसदीय समितियों पर भी लागू: यह संरक्षण समिति कार्यवाहियों के दौरान दिए गए वक्तव्यों पर भी लागू होता है।

सांसदों की वाक् स्वतंत्रता पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय

  • तेज किरण जैन बनाम एन. संजीव रेड्डी (1970): सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद-105(2) के तहत संसद सदस्यों द्वारा संसद में दिए गए वक्तव्यों के लिए पूर्ण प्रतिरक्षा को बरकरार रखा।
    • न्यायालय ने जोर दिया कि अनुच्छेद में प्रयुक्त शब्द “कुछ भी” का दायरा अत्यंत व्यापक है, जिससे संसदीय भाषण न्यायिक जांच के दायरे से बाहर हो जाता है।
  • पी. वी. नरसिम्हा राव बनाम राज्य (1998): न्यायालय ने निर्णय दिया कि संसद सदस्यों को रिश्वत के मामले में भी अभियोजन से प्रतिरक्षा प्राप्त हो सकती है, यदि कथित कार्य संसद में दिए गए मत या भाषण से सीधे जुड़ा हुआ हो, जैसा कि अनुच्छेद-105(2) के तहत संरक्षित है।
  • राजा राम पाल बनाम माननीय अध्यक्ष, लोकसभा (2007): न्यायालय ने कहा कि संसदीय विशेषाधिकार पूर्ण नहीं हैं और जब संवैधानिक प्रावधानों या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है तो वे न्यायिक समीक्षा के अधीन रहते हैं।
  • कौशल किशोर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023): न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी मंत्री द्वारा दिया गया वक्तव्य स्वतः ही सरकार की आधिकारिक स्थिति नहीं माना जा सकता और जब तक सरकार औपचारिक रूप से उन टिप्पणियों का समर्थन या अंगीकार न करे, तब तक सरकार को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है।

टिप्पणियों का विलोपन

  • टिप्पणियों का विलोपन उस प्रक्रिया को कहते हैं, जिसमें किसी सदस्य के भाषण के विशिष्ट शब्दों या अंशों को आधिकारिक संसदीय अभिलेखों से हटा दिया जाता है, यदि उन्हें अनुचित या आपत्तिजनक माना जाए।
  • जब किसी टिप्पणी को विलोपित कर दिया जाता है, तो वह संसद की आधिकारिक कार्यवाही या अभिलेखों में दिखाई नहीं देती।
  • लोकसभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमावली का नियम 380 अध्यक्ष को यह अधिकार देता है कि यदि बहस के दौरान प्रयुक्त शब्द या अभिव्यक्ति अशोभनीय, मानहानिकारक या असंसदीय हों, तो वे उन्हें अभिलेख से हटाने का आदेश दे सकते हैं।

वाक् से संबंधित संसदीय नियम

  • असंसदीय टिप्पणियों को हटाना: लोकसभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमावली के नियम 380 के तहत अध्यक्ष को यह अधिकार है कि वे आधिकारिक अभिलेख से ऐसे शब्द या अभिव्यक्तियाँ हटा दें, जो मानहानिकारक, अशोभनीय, असंसदीय या गरिमा के विरुद्ध हों।
  • न्यायालय में लंबित मामलों पर प्रतिबंध: सदस्यों को सामान्यतः उन मुद्दों पर चर्चा करने की अनुमति नहीं होती है, जो न्यायालय में विचाराधीन (Sub Judice) हों, ताकि न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप न हो।
  • व्यक्तिगत आरोपों पर सीमा: किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध मानहानिकारक या अपराध-संबंधी आरोप अध्यक्ष को पूर्व सूचना दिए बिना नहीं लगाए जा सकते, जिससे संसदीय बहस में निष्पक्षता और जिम्मेदारी बनी रहती है।
  • उच्च संवैधानिक पदों की गरिमा की रक्षा: सदस्यों को उच्च संवैधानिक पद धारण करने वाले व्यक्तियों के आचरण के बारे में नकारात्मक टिप्पणी करने से प्रतिबंधित किया गया है।
  • सदस्यों के बीच सम्मान: संसदीय नियम अन्य सदस्यों की सद्भावना या मंशा पर प्रश्न उठाने को हतोत्साहित करते हैं, जिससे बहस के दौरान मर्यादा और आपसी सम्मान बना रहता है।

चुनौतियाँ

  • विशेषाधिकार का दुरुपयोग: सांसद कभी-कभी बहस के दौरान असत्यापित या राजनीतिक रूप से प्रेरित आरोप लगा सकते हैं।
    • उदाहरण: संसदीय बहस के दौरान की गई कुछ टिप्पणियों को नियम 380 के तहत अध्यक्ष द्वारा मानहानिकारक या असंसदीय होने के कारण बाद में अभिलेख से हटा दिया गया।
  • बार-बार व्यवधान: विरोध, नारेबाजी और सदन के वेल (Well of the House) में आना सार्थक बहस को कम कर देता है।
    • उदाहरण: लोकसभा और राज्यसभा के कई सत्रों में बार-बार व्यवधान के कारण कार्य समय का बड़ा हिस्सा नष्ट हुआ है।
  • प्रतिरक्षा और जवाबदेही के बीच संतुलन: भारत के संविधान के अनुच्छेद-105 के तहत पूर्ण संरक्षण कभी-कभी मानहानिकारक बयानों के लिए कानूनी जवाबदेही को सीमित कर सकता है।
    • उदाहरण: तेज किरण जैन बनाम एन. संजीव रेड्डी मामले के निर्णय में कहा गया कि न्यायालय संसद में दिए गए बयानों पर प्रश्न नहीं उठा सकते हैं।
  • बहस की गुणवत्ता में गिरावट: बढ़ती राजनीतिक ध्रुवीकरण रचनात्मक चर्चा से ध्यान हटाकर दलगत टकराव की ओर ले जा सकता है।
    • उदाहरण: हाल के वर्षों में कई संसदीय बहसें सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोक-झोंक के कारण स्थगित हुई हैं।

आगे की राह

  • संसदीय नैतिकता और आचार संहिता को सुदृढ़ करना: संसद में सांसदों के भाषण के लिए स्पष्ट नैतिक मानक निर्धारित होने चाहिए।
    • उदाहरण: लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति द्वारा नियमों का कड़ाई से पालन सदन की मर्यादा बनाए रखने में सहायक हो सकता है।
  • साक्ष्य-आधारित बहस को प्रोत्साहित करना: सदस्यों को मुद्दे उठाते समय आँकड़ों, समिति रिपोर्टों और शोध का उपयोग करना चाहिए।
    • उदाहरण: संसदीय स्थायी समितियों की रिपोर्टों को बहस के दौरान विश्वसनीय स्रोत के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
  • सांसदों के लिए क्षमता निर्माण: प्रशिक्षण कार्यक्रम विधायी बहस और नीति-निर्माण की गुणवत्ता को सुधार सकते हैं।
    • उदाहरण: संसद के नए सदस्यों के लिए संसदीय अध्ययन और प्रशिक्षण ब्यूरो द्वारा आयोजित अभिमुखीकरण कार्यक्रम।

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