संदर्भ
हाल ही में केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के ‘असंगठित क्षेत्र के उद्यमों के वार्षिक सर्वेक्षण’ (ASUSE) 2025 के निष्कर्षों से यह पता चलता है कि क्या भारत का असंगठित क्षेत्र संरचनात्मक परिवर्तन को दर्शाता है या फिर इसमें अभी भी अनौपचारिकता बनी हुई है।
असंगठित क्षेत्र के उद्यमों के वार्षिक सर्वेक्षण (ASUSE) 2025 के मुख्य निष्कर्ष
- अनौपचारिक क्षेत्र का बढ़ता दायरा: गैर-निगमित गैर-कृषि क्षेत्र में अब 7.92 करोड़ इकाइयाँ शामिल हैं, जो वर्ष 2023–24 के बाद से लगभग 8% की वृद्धि दर्शाती हैं। यह संरचनात्मक परिवर्तन के अभाव में भी छोटी आर्थिक इकाइयों के लगातार प्रवेश, अस्तित्व और विस्तार को दर्शाता है।

- क्षेत्रीय संरचना लगभग अपरिवर्तित बनी हुई है: इकाइयों का वितरण काफी हद तक वैसा ही (लगभग 27% विनिर्माण में, लगभग 31% व्यापार में, और लगभग 42% सेवाओं में) बना हुआ है। यह विनिर्माण-आधारित परिवर्तन की ओर किसी निर्णायक बदलाव के बजाय मौजूदा संरचना के स्थायी रहने का संकेत देता है।
- रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत: यह क्षेत्र 12.81 करोड़ श्रमिकों को सहारा देता है, जो रोजगार में 6.18% की वृद्धि दर्शाता है। यह अधिशेष श्रम को समायोजित करने वाले मुख्य माध्यम के रूप में इसकी भूमिका की पुष्टि करता है, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो औपचारिक रोजगार बाजार से बाहर हैं।
- अनौपचारिक और असुरक्षित रोजगार का बना रहना: रोजगार की स्थिति अभी भी काफी हद तक स्वरोजगार (लगभग 62%) पर निर्भर है, जिसमें केवल लगभग 24% ही वेतनभोगी श्रमिक हैं। यह दर्शाता है कि रोजगार सृजन काफी हद तक अनौपचारिक, असुरक्षित है और अवसर के बजाय आवश्यकता से प्रेरित है।
- रोजगार वृद्धि की प्रकृति अभी भी संकट-प्रेरित: हालाँकि रोजगार बढ़ा है, लेकिन इस पर अभी भी नियमित वेतन-आधारित नौकरियों के बजाय स्वरोजगार और पारिवारिक श्रम का ही वर्चस्व है। यह दर्शाता है कि रोजगार सृजन औपचारिक श्रम बाजार के विस्तार को दर्शाने के बजाय आवश्यकता से प्रेरित बना हुआ है।

- उत्पादन वृद्धि व्यापार और सेवाओं से प्रेरित: इस क्षेत्र ने सकल मूल्य संवर्द्धन (GVA) में 10.9% की वृद्धि दर्ज की, जिसमें व्यापार और सेवाओं का योगदान लगभग 80% रहा है। यह उत्पादकता बढ़ाने वाली विनिर्माण वृद्धि के बजाय कम-मूल्य वाली, माँग-प्रेरित गतिविधियों की ओर परिवर्तन का संकेत देता है।
- सामान्य उत्पादकता और उभरती मंदी: प्रति-श्रमिक GVA में लगभग 4.5% की वृद्धि हुई, जो पहले के 5.6% से कम है। यह उत्पादकता लाभ में आई मंदी को उजागर करता है, जो सीमित तकनीकी अपनाने, पूँजी-गहनता में कमी और स्थिर दक्षता स्तरों की ओर इशारा करता है।
- कमजोर वेतन वृद्धि और आय का असमान वितरण: उत्पादन बढ़ने के बावजूद, वेतन में केवल लगभग 3.88% की वृद्धि हुई। यह दर्शाता है कि आर्थिक वृद्धि से होने वाले लाभ श्रमिकों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुँच पा रहे हैं, जो उनकी सौदेबाजी की सीमित क्षमता और अधिशेष श्रम की स्थितियों को दर्शाता है।

- कम बढोतरी, लेकिन लैंगिक बाधाएँ व्याप्त हैं: महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यमों की हिस्सेदारी मामूली रूप से बढ़कर 27% हो गई है, लेकिन वे अभी भी कम मूल्य वाली और घरेलू गतिविधियों तक ही सीमित हैं; इसकी वजह संरचनात्मक बाधाएँ हैं, जैसे कि ऋण, संपत्ति, आवाजाही और बाजार से जुड़ाव तक सीमित पहुँच।
आर्थिक वृद्धि की प्रकृति-संरचनात्मक रूपांतरण के बिना विस्तार
- गैर-निगमित क्षेत्र की वृद्धि संरचनात्मक परिवर्तन के बजाय पैमाने में विस्तार को दर्शाती है, क्योंकि प्रतिष्ठानों और रोजगार में वृद्धि के साथ-साथ उत्पादकता, औपचारिकीकरण या रोजगार की गुणवत्ता में उसी अनुपात में सुधार नहीं हुआ है।
- यह विस्तार के एक ऐसे स्वरूप का संकेत देता है, जो मुख्य रूप से ‘अस्तित्व संचालित व्यापार’ (Survival-driven Expansion) से प्रेरित है; इसमें उद्यम बिना किसी उच्च-मूल्य वर्द्धित या औपचारिक आर्थिक गतिविधियों में रूपांतरित हुए, लगातार बढ़ते रहते हैं।
असंगठित क्षेत्र के उद्यमों के वार्षिक सर्वेक्षण (ASUSE) के बारे में
- अनौपचारिक क्षेत्र का आधिकारिक सर्वेक्षण: ASUSE, केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा किया जाने वाला एक राष्ट्रव्यापी नमूना सर्वेक्षण है।
- गैर-कृषि अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को शामिल करना: यह विनिर्माण, व्यापार और सेवाओं में कार्यरत उन गैर-निगमित उद्यमों से संबंधित डेटा एकत्र करता है, जिनमें कृषि और निगमित/पंजीकृत फर्मों को शामिल नहीं किया जाता है।
- पैमाने और संरचना का मापन करना: यह प्रतिष्ठानों की संख्या, रोजगार और स्वामित्व के स्वरूपों के संबंध में अनुमान प्रदान करता है, जिससे अनौपचारिक क्षेत्र के आकार और उसकी संरचना का आकलन करने में सहायता मिलती है।
- उत्पादन और उत्पादकता का अवलोकन करना: यह सकल मूल्य संवर्द्धन (GVA), प्राप्तियों और उत्पादकता से संबंधित डेटा एकत्र करता है, जिससे आर्थिक प्रदर्शन और दक्षता का विश्लेषण करना संभव हो पाता है।
- रोजगार की गुणवत्ता का आकलन करना: यह अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार की प्रकृति (स्व-रोजगार बनाम वेतनभोगी कर्मचारी), मजदूरी और कार्य-स्थितियों के संबंध में महत्त्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।
- नीति निर्माण में सहायक: यह MSME, श्रम कल्याण, वित्तीय समावेशन और अर्थव्यवस्था के औपचारीकरण से संबंधित नीतियों को तैयार करने हेतु एक प्रमुख डेटाबेस के रूप में कार्य करता है।
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कार्यबल (Workforce) को समझना
- कार्यबल की अवधारणा: कार्यबल का तात्पर्य उस आर्थिक रूप से सक्रिय जनसंख्या से है, जिसमें वे व्यक्ति शामिल होते हैं, जो या तो नियोजित (रोजगार में) हैं या सक्रिय रूप से रोजगार की तलाश कर रहे हैं।
- यह न केवल श्रम की उपलब्धता को दर्शाता है, बल्कि अर्थव्यवस्था में रोजगार की गुणवत्ता, प्रकृति और स्थितियों को भी प्रतिबिंबित करता है।
- कार्यबल की संरचना: भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में, कार्यबल की विशेषता इसकी दोहरी संरचना है, जिसमें शामिल हैं:-
- एक छोटा, विनियमित औपचारिक क्षेत्र (Formal Sector): जहाँ नियम और कानून लागू होते हैं।
- एक बड़ा, अनियमित अनौपचारिक क्षेत्र (Informal Sector): जिसकी रोजगार में प्रधानता है और जो अधिकांश आबादी को काम देता है।
- कार्यबल का यह दोहरापन उत्पादकता, आय की असमानता और सामाजिक सुरक्षा के अभाव जैसे मुद्दों को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
औपचारिक कार्यबल के बारे में
- परिभाषा: औपचारिक कार्यबल में वे श्रमिक शामिल होते हैं, जो पंजीकृत उद्यमों या संस्थानों में कार्यरत होते हैं। ये संस्थान कानूनी और नियामक ढाँचे के तहत कार्य करते हैं, जो श्रम कानूनों और कराधान प्रणालियों के अनुपालन को सुनिश्चित करते हैं।

- प्रमुख विशेषताएँ
- रोजगार सुरक्षा और कानूनी संरक्षण: श्रमिकों के पास आमतौर पर लिखित अनुबंध और परिभाषित भूमिकाएँ होती हैं। उन्हें मनमानी बर्खास्तगी के विरुद्ध कानूनी सुरक्षा प्राप्त होती है।
- नियमित और अनुमानित आय: वेतन निश्चित होता है, समय पर मिलता है और अक्सर मुद्रास्फीति के साथ समायोजित होता है, जो आर्थिक स्थिरता प्रदान करता है।
- सामाजिक सुरक्षा कवरेज: भविष्य निधि (PF), पेंशन, स्वास्थ्य बीमा, ग्रेच्युटी और सवैतनिक अवकाश तक पहुँच, जो दीर्घकालिक कल्याण सुनिश्चित करती है।
- उत्पादकता और कौशल का उच्च स्तर: औपचारिक रोजगार बेहतर तकनीक, प्रशिक्षण और पूँजी गहनता से जुड़ा होता है, जिससे कार्यकुशलता बढ़ती है।
- संस्थागत एकीकरण: श्रमिक संगठित आपूर्ति शृंखलाओं और वित्तीय प्रणालियों का हिस्सा होते हैं, जो उनके कॅरियर में उन्नति को सक्षम बनाता है।
- डेटा और रुझान
- सीमित रोजगार हिस्सेदारी: कुल रोजगार में औपचारिक कार्यबल की हिस्सेदारी केवल 7-10% है, जो इसकी सीमित श्रम अवशोषण क्षमता को दर्शाता है।
- उच्च आउटपुट योगदान: अपने छोटे आकार के बावजूद, औपचारिक क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में असमान रूप से बड़ा योगदान देता है, जो इसकी उच्च उत्पादकता को दर्शाता है।
- क्रमिक औपचारीकरण: पेरोल डेटा (जैसे- EPFO नामांकन) औपचारिक नौकरियों के निर्माण में वृद्धि का संकेत देते हैं, हालाँकि इसकी गति धीमी और असमान बनी हुई है।
- संविदाकरण (Contractualisation) की बढ़ती प्रवृत्ति: अनुबंधात्मक (Contractual) और गिग अर्थव्यवस्था पर बढ़ती निर्भरता औपचारिक और अनौपचारिक कार्य के बीच की सीमा को कम कर रही है।
अनौपचारिक कार्यबल के बारे में
- परिभाषा: अनौपचारिक कार्यबल में वे श्रमिक शामिल होते हैं, जो अपंजीकृत, अनियमित और अक्सर छोटे पैमाने की आर्थिक गतिविधियों में लगे होते हैं। इनमें औपचारिक मान्यता और संस्थागत सुरक्षा उपायों (Institutional Safeguards) का अभाव होता है।
- प्रमुख विशेषताएँ
- नौकरी की सुरक्षा का अभाव: रोजगार अक्सर आकस्मिक, मौसमी या स्व-प्रेरित होता है, जिसमें नौकरी छूटने का जोखिम बहुत अधिक होता है।
- अनियमित और कम आय: आय अस्थिर होती है और अक्सर निर्वाह स्तर से नीचे होती है, जिसमें वेतन सुरक्षा का कोई तंत्र नहीं होता है।
- सामाजिक सुरक्षा का अभाव: श्रमिक पेंशन, बीमा, मातृत्व लाभ और कार्यस्थल सुरक्षा मानकों से वंचित रहते हैं।
- स्वरोजगार की प्रधानता: श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा ‘अपना खुद का व्यवसाय करने वाले’ (Own-account workers) या पारिवारिक श्रम है, जो संकट-प्रेरित रोजगार को दर्शाता है।
- कम उत्पादकता और पूँजी की कमी: ऋण, प्रौद्योगिकी और बाजारों तक सीमित पहुँच के कारण उत्पादकता स्थिर बनी रहती है।
- डेटा और रुझान
- प्रमुख रोजगार हिस्सेदारी: कुल रोजगार में अनौपचारिक कार्यबल की हिस्सेदारी लगभग 80-90% है, जो इसे आजीविका का प्राथमिक स्रोत बनाती है।
- विशाल उद्यम आधार: ASUSE 2025 के अनुसार, इस क्षेत्र में 7.92 करोड़ प्रतिष्ठान शामिल हैं, जो इसके बड़े पैमाने और बिखराव को दर्शाता है।
- सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता: यह क्षेत्र 12.81 करोड़ श्रमिकों को रोजगार देता है, जो श्रम अवशोषक के रूप में इसकी भूमिका को उजागर करता है।
- स्वरोजगार का दबदबा: लगभग 62% श्रमिक स्व-नियोजित हैं, जो आवश्यकता-आधारित रोजगार पैटर्न का संकेत देते हैं।
- निम्न उत्पादकता स्तर: प्रति श्रमिक सकल मूल्य वर्द्धित (GVA) लगभग ₹1.56 लाख (लगभग 4.5% वृद्धि) है, जो स्थिर दक्षता और सीमित तकनीकी प्रगति को दर्शाता है।
- कमजोर वेतन वृद्धि: वेतन वृद्धि धीमी (लगभग 3.88%) बनी हुई है, जो आय के खराब हस्तांतरण को इंगित करती है।
- लैंगिक अनौपचारिकता: महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यमों की हिस्सेदारी लगभग 27% है, लेकिन वे कम मूल्य वाली गतिविधियों में केंद्रित हैं, जो संरचनात्मक बाधाओं को दर्शाती हैं।
माँग-आधारित बनाम उत्पादकता-आधारित वृद्धि
- अनौपचारिक क्षेत्र का विकास पथ तेजी से उपभोग-संचालित (Consumption-driven) होता प्रतीत हो रहा है, जो स्थानीय व्यापार और सेवाओं के आस-पास केंद्रित है, जो तात्कालिक माँग की स्थितियों के प्रति प्रतिक्रिया देते हैं।
- यह उत्पादकता-प्रेरित (Productivity-led) वृद्धि पथ से भिन्न है, जिसके लिए पूँजीगत सुदृढ़ीकरण, तकनीकी उन्नयन और औपचारिक उत्पादन प्रणालियों के साथ मजबूत एकीकरण की आवश्यकता होती है।
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औपचारिक और अनौपचारिक कार्यबल के बीच अंतर्संबंध
औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्र अलग-थलग होने के बजाय आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं।
- श्रम बफर कार्य: अनौपचारिक क्षेत्र उस अतिरिक्त श्रम को समायोजित कर लेता है, जिसे औपचारिक रोजगार में जगह नहीं मिल पाती है।
- औपचारिक क्षेत्र के लिए लागत दक्षता: कंपनियाँ अक्सर आउटसोर्सिंग, अनुबंध श्रम और आपूर्ति शृंखलाओं के माध्यम से अनौपचारिक श्रमिकों पर निर्भर रहती हैं।
- माँग: अनौपचारिक श्रमिक स्थानीय उपभोग की माँग को बनाए रखते हैं, जो बदले में औपचारिक उत्पादन को समर्थन प्रदान करता है।
- यह एक सहजीवी लेकिन असमान संबंध बनाता है, जहाँ जोखिमों को अनौपचारिक श्रमिकों पर स्थानांतरित कर दिया जाता है।
अनौपचारिक क्षेत्र का महत्त्व
- रोजगार सृजन का आधार: अनौपचारिक क्षेत्र भारत में रोजगार के प्राथमिक स्रोत के रूप में कार्य करता है, जिसमें कुल कार्यबल का लगभग 85-90% हिस्सा लगा हुआ है।
- ASUSE 2025 के अनुसार, असंगठित क्षेत्र 12.81 करोड़ श्रमिकों को रोजगार देता है, जो विशेष रूप से कम कुशल और प्रवासी श्रमिकों के लिए अतिरिक्त श्रम के सबसे बड़े अवशोषक के रूप में इसकी भूमिका को रेखांकित करता है।
- अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान: कम उत्पादकता के बावजूद, अनौपचारिक क्षेत्र उत्पादन, रोजगार और स्थानीय आर्थिक चक्र में पर्याप्त योगदान देता है, जिससे यह आर्थिक गतिविधियों का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ बन जाता है।
- मुरादाबाद के पीतल उद्योग और तिरुपुर के परिधान उद्योग जैसे क्लस्टर यह दर्शाते हैं कि कैसे अनौपचारिक उद्यम उत्पादन, निर्यात और स्थानीय उद्योगों को समर्थन देते हैं।
- संवेदनशील आबादी के लिए सुरक्षा जाल: यह क्षेत्र प्रवासियों, महिलाओं और हाशिए पर रहने वाले समूहों के लिए आजीविका सुरक्षा जाल के रूप में कार्य करता है, जिनके पास औपचारिक रोजगार तक पहुँच नहीं है।
- कोविड-19 महामारी जैसे संकटों के दौरान, अनौपचारिक कार्य ने एक वैकल्पिक रोजगार तंत्र के रूप में कार्य किया, जिसने वापस लौटने वाले प्रवासी श्रमिकों को सहारा दिया।
- सूक्ष्म-उद्यमिता को बढ़ावा: प्रवेश की कम बाधाओं और न्यूनतम पूँजी आवश्यकताओं के कारण अनौपचारिक क्षेत्र स्वरोजगार और जमीनी स्तर की उद्यमिता को बढ़ावा देता है।
- किराना स्टोर, स्ट्रीट वेंडिंग और घर-आधारित उद्यम जैसी गतिविधियाँ आजीविका के विविधीकरण को सक्षम बनाती हैं।
- स्थानीय माँग और आर्थिक चक्र को समर्थन: अनौपचारिक उद्यम विशेष रूप से ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में स्थानीय माँग और उपभोग चक्र को बनाए रखते हैं।
- वे वस्तुओं और सेवाओं की अंतिम छोर तक डिलीवरी प्रदान करते हैं, जिससे जमीनी अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।
- आर्थिक संकट के दौरान ‘शॉक एब्जॉर्बर’: यह क्षेत्र एक आर्थिक ‘शॉक एब्जॉर्बर’ के रूप में कार्य करता है, जो मंदी के दौरान लचीले रोजगार के अवसर प्रदान करता है।
- आर्थिक तनाव की अवधि में श्रमिक अक्सर गिग वर्क, डिलीवरी सेवाओं और छोटे व्यापार जैसी अनौपचारिक गतिविधियों की ओर रुख करते हैं।
- लचीलापन: अनौपचारिक क्षेत्र आजीविका के अवसर, अनुकूलन क्षमता और आर्थिक लचीलापन प्रदान करता है, विशेष रूप से मंदी तथा रोजगार संकट के दौरान।
- साथ ही, यही अनौपचारिकता सीमित विकास क्षमता, कमजोर सामाजिक सुरक्षा और औपचारिक सहायता प्रणालियों से अलगाव का कारण बनती है, जिससे यह एक आर्थिक सहारा और एक संरचनात्मक बाधा दोनों बन जाता है।
अनौपचारिक क्षेत्र की चुनौतियाँ
- निरंतर अनौपचारिकता और संरचनात्मक स्थिरता: एक मौलिक चुनौती अनौपचारिकता का निरंतर प्रभुत्व है, जहाँ 90% से अधिक श्रमिक औपचारिक रोजगार व्यवस्था से बाहर हैं। यह सीमित संरचनात्मक परिवर्तन और पर्याप्त रोजगार उत्पन्न करने में औपचारिक क्षेत्र की अक्षमता को दर्शाता है।
- कम उत्पादकता और ‘मिसिंग मिडल’ (Missing Middle) का जाल: पूँजी, प्रौद्योगिकी और कौशल तक सीमित पहुँच के कारण यह क्षेत्र निम्न उत्पादकता स्तर (₹1.56 लाख प्रति श्रमिक GVA, ASUSE 2025) से जूझ रहा है।
- ‘लघु उद्यमों’ (Dwarf Enterprises) की प्रधानता और मध्यम आकार की फर्मों की अनुपस्थिति बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था के लाभों को रोकती है और क्षेत्र को कम मूल्य वाले चक्रों में फँसा देती है।
- रोजगार की खराब गुणवत्ता और अनिश्चित प्रकृति: रोजगार काफी हद तक अनौपचारिक, असुरक्षित और अनियमित है। लिखित अनुबंधों, नौकरी की सुरक्षा और सुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों के अभाव के कारण आजीविका अनिश्चित बनी रहती है, विशेष रूप से दैनिक वेतन भोगी और निर्माण श्रमिकों के मध्य।
- सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी संरक्षण का अभाव: श्रमिकों के एक विशाल बहुमत के पास पेंशन, बीमा, स्वास्थ्य देखभाल और सवैतनिक अवकाश तक पहुँच नहीं है।
- यह उन्हें आय और स्वास्थ्य संबंधी झटकों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाता है, जैसा कि कोविड-19 संकट के दौरान स्पष्ट हुआ था।
- आय की असुरक्षा और विकास के लाभों का कमजोर हस्तांतरण: वेतन कम और अस्थिर बना हुआ है। ASUSE 2025 के अनुसार वेतन वृद्धि केवल ~3.88% रही, जो उत्पादन वृद्धि से कम है।
- यह श्रम की सौदेबाजी की कमजोर क्षमता को दर्शाता है, जहाँ आर्थिक लाभ श्रमिकों तक पहुँचने के बजाय उद्यम स्तर पर ही केंद्रित रह जाते हैं।
- ऋण, बाजार और विस्तार तक सीमित पहुँच: संपार्श्विक और औपचारिक रिकॉर्ड की कमी के कारण अनौपचारिक उद्यमों को संस्थागत वित्त प्राप्त करने में बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जिससे उन्हें अनौपचारिक ऋण पर निर्भर होना पड़ता है।
- इसके अतिरिक्त, विखंडित स्वामित्व संरचनाएँ उनकी प्रतिस्पर्द्धात्मकता और दीर्घकालिक विस्तार को प्रतिबंधित करती हैं।
- लैंगिक बाधाएँ और असमान अवसर: महिलाओं को संपत्ति, ऋण और बाजारों तक सीमित पहुँच जैसी संरचनात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
- हालाँकि ~27% उद्यम महिलाओं के स्वामित्व में हैं (ASUSE 2025), फिर भी वे कम मूल्य वाली, गृह-आधारित गतिविधियों में केंद्रित हैं, जो उनकी आर्थिक गतिशीलता को सीमित करता है।
- घरेलू और वैश्विक झटकों के प्रति उच्च संवेदनशीलता: यह क्षेत्र मुद्रास्फीति, ईंधन की कीमतों में वृद्धि और वैश्विक व्यवधानों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। चूँकि व्यापार और सेवाएँ GVA में ~80% का योगदान करती हैं, इसलिए ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स की बढ़ती लागत सीधे उनके लाभ को कम कर देती है।
- इसके अलावा, वैश्विक आर्थिक संकट (जैसे- तेल की कीमतों में वृद्धि) बहुत तेजी से इनको प्रभावित करते हैं, जिससे अनौपचारिक आजीविका अत्यंत संवेदनशील हो जाती है।
अनौपचारिक क्षेत्र के लिए वैश्विक कार्य और पहलें
- अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) और उचित कार्य एजेंडा: ILO ‘डेसेंट वर्क एजेंडा’ (उचित कार्य एजेंडा) को बढ़ावा देता है, जो औपचारीकरण, सामाजिक सुरक्षा और श्रम अधिकारों पर केंद्रित है।
- ‘सिफारिश 204′ (अनौपचारिक से औपचारिक अर्थव्यवस्था में संक्रमण) जैसे उपकरण नीति निर्माण में देशों का मार्गदर्शन करते हैं।
- सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा ढाँचा: विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के नेतृत्व में वैश्विक प्रयास सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों को बढ़ावा देते हैं, जिनमें अनौपचारिक श्रमिकों के लिए नकद हस्तांतरण, स्वास्थ्य कवरेज और पेंशन शामिल हैं।
- सतत् विकास लक्ष्य (SDGs): संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास लक्ष्य 8 (उचित कार्य और आर्थिक विकास) के तहत उत्पादक रोजगार, औपचारीकरण और श्रम अधिकारों के संरक्षण पर जोर देता है, विशेष रूप से अनौपचारिक श्रमिकों के लिए।
- वित्तीय समावेशन पहल: ‘ग्लोबल पार्टनरशिप फॉर फाइनेंशियल इंक्लूजन’ (GPFI) जैसे वैश्विक कार्यक्रम लघु और अनौपचारिक उद्यमों के लिए डिजिटल भुगतान, सूक्ष्म वित्त और ऋण तक पहुँच को बढ़ावा देते हैं।
- सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) को समर्थन: अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम (IFC) और UNDP जैसी संस्थाएँ वैश्विक स्तर पर अनौपचारिक उद्यमों की क्षमता निर्माण, वित्त तक पहुँच और बाजार एकीकरण का समर्थन करती हैं।
- डिजिटलीकरण और औपचारीकरण के प्रयास: अनौपचारिक श्रमिकों को औपचारिक अर्थव्यवस्था में लाने के लिए देश तेजी से डिजिटल ID सिस्टम, ई-पेमेंट और ई-गवर्नेंस प्लेटफॉर्म अपना रहे हैं।
- उदाहरण के लिए, ब्राजील के ‘कैडास्ट्रो यूनिक’ (Cadastro Único) और केन्या के मोबाइल मनी इकोसिस्टम (M-Pesa) ने वित्तीय समावेशन और कल्याण वितरण में सुधार किया है।
- लैंगिक-केंद्रित हस्तक्षेप: यू.एन वुमेन (UN Women) के नेतृत्व में वैश्विक पहल अनौपचारिक श्रम के ‘नारीकरण’ (Feminisation) को पहचानते हुए वित्त, कौशल और सामाजिक सुरक्षा तक पहुँच के माध्यम से अनौपचारिक क्षेत्र में महिलाओं को सशक्त बनाने पर ध्यान केंद्रित करती है।
अनौपचारिक क्षेत्र के लिए भारत द्वारा की गई पहलें
- डिजिटल पहचान और सामाजिक सुरक्षा संरचना
- ई-श्रम पोर्टल (e-Shram Portal): इस पर 31.48 करोड़ से अधिक असंगठित श्रमिकों का पंजीकरण हो चुका है, जो लक्षित कल्याणकारी वितरण के लिए एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करता है।
- यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (UAN): यह विशेष रूप से प्रवासी श्रमिकों के लिए लाभों की पोर्टेबिलिटी (हस्तांतरणीयता) सुनिश्चित करता है।
- वन-स्टॉप-सॉल्यूशन (2024): यह 14 से अधिक योजनाओं को एकीकृत करता है, जबकि मोबाइल ऐप (2025) वास्तविक समय में पहुँच सक्षम बनाता है।
- यह पोर्टेबल और तकनीक-आधारित सामाजिक सुरक्षा की ओर बदलाव को दर्शाता है।
- वित्तीय समावेशन और ऋण सहायता
- पीएम स्वनिधि (PM SVANidhi): यह स्ट्रीट वेंडर्स को ऋण सीमा (₹15 हजार–₹50 हजार) और UPI-लिंक्ड क्रेडिट कार्ड प्रदान करता है, जिसे वर्ष 2030 तक बढ़ा दिया गया है।
- पीएम विश्वकर्मा: यह टूलकिट, प्रशिक्षण और रियायती ऋण (₹3 लाख तक) के माध्यम से कारीगरों का समर्थन करता है।
- मुद्रा (MUDRA) और JAM ट्रिनिटी: ये बिना किसी संपार्श्विक मुक्त ऋण और वित्तीय समावेशन को सक्षम बनाते हैं।
- यह ‘मिसिंग मिडल’ (Missing Middle) को लक्षित करता है और अनौपचारिक ऋण बाजारों पर निर्भरता कम करता है।
- औपचारीकरण और बाजार एकीकरण
- उद्यम पंजीकरण (Udyam Registration): यह औपचारिक प्रणालियों में MSME के जुड़ने की प्रक्रिया को सरल बनाता है।
- वस्तु एवं सेवा कर (GST): यह कर प्रणाली के माध्यम से औपचारीकरण को प्रोत्साहित करता है।
- गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM): यह बाजार तक पहुँच और सार्वजनिक खरीद के अवसर प्रदान करता है।
- इसका उद्देश्य अनौपचारिक उद्यमों को औपचारिक मूल्य शृंखलाओं में एकीकृत करना है।
- श्रम सुधार और कानूनी संरक्षण
- सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020: यह ‘गिग’ और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को मान्यता देती है और सामाजिक सुरक्षा कवरेज को सक्षम बनाती है।
- अनौपचारिक श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा कोष की स्थापना।
- मजदूरी संहिता: इसके तहत वैधानिक न्यूनतम मजदूरी (Statutory floor Wage) की शुरुआत।
- यह श्रम अधिकारों और सुरक्षा के सार्वभौमीकरण की दिशा में एक कदम है।
- सामाजिक सुरक्षा, पेंशन और बीमा कवरेज
- प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन (PM-SYM): सरकारी योगदान के साथ ₹3,000/माह पेंशन सुनिश्चित करती है।
- प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (PMJJBY): सस्ती जीवन बीमा सुविधा प्रदान करती है।
- यह दीर्घकालिक आय सुरक्षा और जोखिम संरक्षण को मजबूत करता है।
- आजीविका संवर्द्धन, कौशल और महिला सशक्तीकरण
- मनरेगा (MGNREGA) और राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (NULM): रोजगार और स्वरोजगार के अवसर प्रदान करते हैं।
- प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY): कौशल और उत्पादकता को बढ़ाती है।
- लखपति दीदी और ड्रोन दीदी पहल: महिला नेतृत्व वाली उद्यमिता और तकनीक-आधारित आजीविका को बढ़ावा देती है।
- डिजिटल फुटप्रिंट और ‘परोक्ष औपचारीकरण’ (Shadow Formalization)
- पारंपरिक पंजीकरण से परे, UPI और डिजिटल इंडिया क्रांति ने एक ‘परोक्ष औपचारीकरण’ (Shadow Formalization) उत्पन्न किया है।
- वर्ष 2026 तक, करोड़ों असंगठित इकाइयों के पास एक सत्यापन योग्य डिजिटल लेन-देन रिकॉर्ड मौजूद है।
- इस डेटा-समृद्ध इकोसिस्टम का उपयोग अकाउंट एग्रीगेटर (AA) फ्रेमवर्क के माध्यम से किया जा रहा है, ताकि क्षेत्र को कैश-फ्लो-बेस्ड लेंडिंग (Cash-flow-based lending) की ओर ले जाया जा सके। इससे भौतिक गारंटी (जैसे- भूमि या स्वर्ण) पर ऐतिहासिक निर्भरता कम होगी, जिसका अधिकांश अनौपचारिक श्रमिकों के पास अभाव होता है।
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आगे की राह
- गणना से उद्यम सुदृढ़ीकरण की ओर: नीति को केवल उद्यमों की गिनती करने से हटकर उत्पादकता, प्रतिस्पर्द्धात्मकता, ऋण पहुँच और बाजार एकीकरण को बढ़ाकर उन्हें मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
- प्रोत्साहन-संचालित और विकल्प-आधारित औपचारीकरण: औपचारीकरण को “मजबूरी की अनौपचारिकता” से “पसंद की औपचारिकता” में परिवर्तित करना चाहिए। इसके लिए सरल अनुपालन, उद्यम पंजीकरण के माध्यम से लाभ, अधिमान्य खरीद (Preferential Procurement) और ‘प्लग-एंड-प्ले’ बुनियादी ढाँचे जैसे प्रोत्साहन तंत्र अपनाने चाहिए।
- सार्वभौमिक, पोर्टेबल और टिकाऊ सामाजिक सुरक्षा: ई-श्रम पोर्टल का उपयोग करके व्यापक सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों को मजबूत करना और प्रवासी श्रमिकों के लिए लाभों की पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित करना आवश्यक है।
- इसके साथ ही, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ‘सामाजिक सुरक्षा उपकर’ जैसे नवीन वित्तपोषण के माध्यम से सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 के तहत सामाजिक सुरक्षा कोष को क्रियाशील बनाना चाहिए।
- किफायती ऋण तक पहुँच का विस्तार: अनौपचारिक ऋण चैनलों पर निर्भरता कम करने के लिए ऋण गारंटी, फिनटेक समाधान और डिजिटल क्रेडिट हिस्ट्री के समर्थन से प्रधानमंत्री मुद्रा योजना जैसी योजनाओं के माध्यम से संस्थागत ऋण प्रवाह में सुधार करना चाहिए।
- उत्पादकता-प्रेरित विकास और कौशल विकास: प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना जैसी पहलों और क्लस्टर-आधारित औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र के माध्यम से कौशल विकास, डिजिटलीकरण और प्रौद्योगिकी अपना कर ‘निम्न-उत्पादकता चक्र’ को तोड़ना चाहिए।
- औपचारिक मूल्य शृंखलाओं और बाजारों के साथ एकीकरण: अनौपचारिक उद्यमों को औपचारिक आपूर्ति शृंखलाओं से जोड़कर, ‘गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस’ (GeM) जैसे प्लेटफॉर्मों का लाभ उठाकर और क्लस्टर-आधारित विकास मॉडल को बढ़ावा देकर बाजार पहुँच और विस्तार क्षमता को बढ़ाना चाहिए।
- उचित कार्य और शहरी रोजगार सुरक्षा सुनिश्चित करना: उचित वेतन, नौकरी की सुरक्षा और सुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों के माध्यम से रोजगार की गुणवत्ता में सुधार करना चाहिए।
- साथ ही, शहरी अनौपचारिक श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करने हेतु (मनरेगा के आधार पर) एक ‘शहरी रोजगार गारंटी योजना’ की संभावनाओं को तलाशना चाहिए।
- लैंगिक-समावेशी और आर्थिक संकटों के प्रति लचीला ढाँचा: लक्षित ऋण, कौशल और संपत्ति तक पहुँच के माध्यम से महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण को बढ़ावा देना चाहिए। इसके साथ ही, आय स्थिरीकरण और विविधीकरण रणनीतियों के माध्यम से बाहरी झटकों (मुद्रास्फीति, ईंधन लागत, माँग में व्यवधान) के प्रति लचीलापन विकसित करना चाहिए।
निष्कर्ष
5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और ‘विकसित भारत’ की ओर भारत की यात्रा केवल ‘सर्वाइवलिस्ट’ (केवल जीवित रहने के लिए संघर्ष करने वाले) श्रम के भरोसे पूरी नहीं की जा सकती है। मजबूरी में अनौपचारिक क्षेत्र में रहने के बजाय स्वेच्छा से औपचारिक क्षेत्र में आने के इस बदलाव के लिए नीतिगत दृष्टिकोण को बदलना होगा। अब फोकस केवल ‘गरीबों के संरक्षण’ पर ही नहीं, बल्कि ‘श्रमिकों के उत्पादक सशक्तिकरण’ पर केंद्रित करने की आवश्यकता है।