संदर्भ
हाल ही में फ्राँस के राष्ट्रपति ने भारत का दौरा किया और इंडिया AI समिट में भाग लिया। इस अवसर पर दोनों देशों ने ‘होराइजन 2047’ रोडमैप (2023) के तहत अपने संबंधों को ‘विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी’ के रूप में उन्नत किया।
होराइजन 2047: भारत–फ्राँस रणनीतिक रोडमैप
- उद्देश्य: भारत की स्वतंत्रता और राजनयिक संबंधों की शताब्दी मनाते हुए, वर्ष 2047 तक भारत-फ्राँस संबंधों के भविष्य की रूपरेखा तैयार करना।
- अंगीकृत: जुलाई 2023 में, भारतीय प्रधानमंत्री के फ्राँस दौरे के दौरान।
- मुख्य क्षेत्र
- रक्षा: सहयोग को बढ़ाना और संयुक्त परियोजनाओं को सुदृढ़ करना।
- अंतरिक्ष: ISRO–CNES सहयोग को मजबूत करना।
- परमाणु ऊर्जा: जैतापुर परियोजना और मॉड्यूलर रिएक्टरों के माध्यम से सतत् ऊर्जा समाधानों पर ध्यान केंद्रित करना।
- नवाचार और प्रौद्योगिकी: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा और डिजिटल अवसंरचना में प्रगति को बढ़ावा देना।
- सतत् विकास: जलवायु कार्रवाई, ब्लू इकोनॉमी और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना।
- सांस्कृतिक आदान-प्रदान: जन-से-जन संबंधों को सशक्त बनाना।
- इंडो-पैसिफिक: क्षेत्रीय सहयोग के लिए विशिष्ट रोडमैप तैयार करना।
- उद्देश्य: रणनीतिक स्वायत्तता सुनिश्चित करना, वैश्विक चुनौतियों का सामूहिक रूप से सामना करना और नवाचार को बढ़ावा देना।
|
संबंधित तथ्य
- वर्चस्व-विरोधी संरेखण: दोनों नेताओं ने इस साझेदारी को स्पष्ट रूप से “वर्चस्व के विरुद्ध” कदम के रूप में परिभाषित किया।
- कानून के शासन और संप्रभु समानता पर आधारित विश्व व्यवस्था की वकालत करते हुए, भारत और फ्राँस यह संकेत दे रहे हैं कि वे अमेरिका–चीन द्विध्रुवीयता में कनिष्ठ भागीदार नहीं बनेंगे।
- डिजिटल संप्रभुता और नैतिकता: केवल ‘AI केंद्रों’ तक सीमित न रहते हुए, शिखर सम्मेलन में डिजिटल नैतिकता पर विशेष जोर दिया गया।
- पारदर्शी एल्गोरिदम और सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करने वाली AI की आवश्यकता पर फ्राँसीसी राष्ट्रपति का आह्वान भारत–फ्राँस साझेदारी को ‘जिम्मेदार प्रौद्योगिकी” के वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करता है।
फ्राँस के बारे में
- फ्राँस को उसके षट्भुज जैसे आकार (मुख्यभूमि) के कारण जाना जाता है और यह पश्चिमी यूरोप का सबसे बड़ा देश है।
- गोलार्द्धीय स्थिति: फ्राँस उत्तरी और पूर्वी दोनों गोलार्द्धों में अवस्थित है।

- प्रमुख जल सीमाएँ
- उत्तर: इंग्लिश चैनल (ला मांचे) तथा उत्तरी सागर
- पश्चिम: बे ऑफ बिस्के (अटलांटिक महासागर)
- दक्षिण: भूमध्य सागर- विशेष रूप से गल्फ ऑफ लायन
- सीमावर्ती देश
- बेल्जियम- उत्तर में
- लक्जमबर्ग- उत्तर–पूर्व में
- जर्मनी- पूर्व में, राइन नदी के साथ सीमा
- स्विट्जरलैंड- पूर्व में, जूरा पर्वत द्वारा पृथक होती है।
- इटली- दक्षिण–पूर्व में, आल्प्स द्वारा पृथक होती है।
- मोनाको (दक्षिण–पूर्वी एन्क्लेव)
- अंडोरा- दक्षिण–पश्चिम में, पिरेनीज में स्थित
- स्पेन- दक्षिण–पश्चिम में, सीमा पिरेनीज पर्वतमाला के साथ
- रणनीतिक समुद्री ‘चोक प्वाइंट्स’ एवं द्वीप
- डोवर जलडमरूमध्य: इंग्लिश चैनल का सबसे संकरा भाग, जो फ्राँस (कैले) को ब्रिटेन (डोवर) से अलग करता है।
- कोर्सिका: फ्राँस का एक बड़ा भूमध्यसागरीय द्वीप, जो इटली के सार्डिनिया द्वीप के उत्तर में स्थित है।
- समुद्री क्षेत्र: अपने क्षेत्रफल के कारण, फ्राँस के पास विश्व का दूसरा सबसे बड़ा विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (EEZ) है (11 मिलियन वर्ग किमी. से अधिक), जिसका अधिकांश भाग हिंद-प्रशांत क्षेत्र में है।
फ्राँस का दूरस्थ क्षेत्र
| क्षेत्र अनुसार |
क्षेत्र |
स्थान विवरण |
| हिंद महासागर |
रियूनियन तथा मायोट |
भारत के साथ ‘संयुक्त रणनीतिक विजन’ की कुंजी |
| दक्षिण अमेरिका |
फ्रेंच गुयाना |
यह ब्राजील और सूरीनाम की सीमाओं से लगता है। यहाँ कौरू अंतरिक्ष केंद्र (ISRO द्वारा उपयोग किया जाता है) स्थित है। |
| कैरेबियन |
ग्वाडेलूप तथा मार्टीनिक |
लेसर एंटिलीज का हिस्सा |
| प्रशांत महासागर |
न्यू कैलेडोनिया तथा फ्रेंच पोलिनेशिया |
निकेल और महत्त्वपूर्ण खनिजों से समृद्ध है। |
- भौतिक सीमाएँ (प्राकृतिक विभाजक)
- पिरेनीज: फ्राँस को स्पेन से अलग करती है।
- आल्प्स: फ्राँस को इटली और स्विट्जरलैंड से अलग करती हैं (मॉन्ट ब्लांक यहाँ का सबसे ऊँचा शिखर है)।
- जुरा पर्वत: फ्राँस को स्विट्जरलैंड से अलग करता है।
- वॉजेस पर्वत: पूर्व में, राइन घाटी के पास स्थित।
- मैसिफ सेंट्रल: दक्षिण-मध्य फ्राँस का प्राचीन उच्चभूमि क्षेत्र।
- महत्त्वपूर्ण नदियाँ
- सेन (Seine): पेरिस से होकर बहती है और इंग्लिश चैनल में मिलती है।
- लॉयर (Loire): फ्राँस की सबसे लंबी नदी; अटलांटिक महासागर में मिलती है।
- रोन (Rhône): स्विट्जरलैंड में उत्पन्न होती है, जिनेवा झील से होकर बहती है और भूमध्यसागर में गिरती है।
- गारोन (Garonne): पायरेनीज में उत्पन्न होती है और गिरोंड संधि (Gironde Estuary) के माध्यम से अटलांटिक महासागर में मिलती है।
|
[/green_button]
शिखर सम्मेलन (2026) के प्रमुख परिणाम
- ‘ईयर ऑफ इनोवेशन 2026’: इसे मुंबई में लॉन्च किया गया, इसका उद्देश्य डीप-टेक, ग्रीन हाइड्रोजन और स्पेस-टेक में सहयोग को बढ़ावा देना है।
- यह भारतीय स्टार्ट-अप्स (जैसे- T-Hub) को फ्राँसीसी स्टार्ट-अप इकोसिस्टम (जैसे- Station F) से जोड़ता है।
- H125 हेलीकॉप्टर फाइनल असेंबली लाइन (FAL): कर्नाटक के वेमागल में टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) और एयरबस द्वारा इसका उद्घाटन किया गया।
- यह भारत की पहली निजी क्षेत्र हेलीकॉप्टर असेंबली प्लांट है, जो आत्मनिर्भर भारत के विजन को दर्शाता है।
- रक्षा सह-उत्पादन: भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और सैफरान के बीच भारत में हैमर (HAMMER) (हाइली एजाइल मॉड्यूलर मुनिशन एक्सटेंडेड रेंज) मिसाइलों के निर्माण के लिए एक ऐतिहासिक संयुक्त उद्यम (JV)।
- भारत–फ्राँस AI स्वास्थ्य केंद्र: AIIMS, नई दिल्ली में स्थापित, इसका उद्देश्य न्यूरोलॉजिकल और संक्रामक रोगों के शीघ्र निदान के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करना।
दोहरे कराधान से बचाव समझौता (DTAA)
- DTAA एक द्विपक्षीय कर संधि है, जो दो देशों के बीच हस्ताक्षरित होती है।
- इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई करदाता (व्यक्ति या कंपनी) एक ही आय पर दोनों देशों में दो बार कर न चुकाए।
|
- DTAA संशोधन प्रोटोकॉल: फ्राँसीसी निवेशकों के लिए कर नियमों को आधुनिक बनाने के लिए दोहरे कराधान से बचाव समझौते (DTAA) में एक अद्यतन किया गया है, जिसमें विशेष रूप से दीर्घकालिक रणनीतिक निवेशों के लिए लाभांश कर दरों को आधा करना शामिल है।
- ‘वार्षिक स्तर पर विदेश मंत्रियों का समग्र संवाद’: ‘होराइजन 2047’ रोडमैप की प्रगति की नियमित समीक्षा के लिए।
- सशस्त्र बलों की पारस्परिक तैनाती: एक समझौता जिसके तहत दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों को एक-दूसरे की स्थल सेनाओं में तैनात किया जा सके, जिससे लॉजिस्टिक और संचालनात्मक समन्वय मजबूत हो।
- सांस्कृतिक अवसंरचना: लोथल में राष्ट्रीय समुद्री धरोहर परिसर (NMHC) पर सहयोग और फ्राँस में स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र का उद्घाटन किया गया।
- परिवहन संपर्क: भारत की उच्च-गति रेल नेटवर्क के लिए फ्राँस एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में उभर रहा है।
संबंधों की बहुआयामी संरचना
- ऐतिहासिक और राजनीतिक आधार
- रणनीतिक निरंतरता: वर्ष 1947 में कूटनीतिक संबंधों की स्थापना के बाद से फ्राँस भारत का सबसे भरोसेमंद साझेदार रहा है।
- विशेष रूप से वर्ष 1998 में फ्राँस, भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी पर हस्ताक्षर करने वाला पहला देश बना और पोखरण-द्वितीय परमाणु परीक्षणों के बाद भारत की सुरक्षा आवश्यकताओं को समझते हुए प्रतिबंध लगाने से इनकार किया।
- वैश्विक महत्त्वाकांक्षाओं के लिए समर्थन: फ्राँस, सुधारित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की सदस्यता के लिए सबसे मुखर समर्थकों में शामिल रहा है।
भारत–फ्राँस संबंधों का इतिहास
- प्रारंभिक संबंध (17वीं–18वीं शताब्दी)
- औपनिवेशिक उपस्थिति: 17वीं शताब्दी में फ्राँस ने भारत में अपनी उपस्थिति स्थापित की और व्यापार व क्षेत्रीय नियंत्रण के लिए ब्रिटिश तथा पुर्तगालियों के साथ प्रतिस्पर्द्धा की।
- फ्राँसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना वर्ष 1664 में हुई। इसके बाद पुदुचेरी (तत्कालीन पांडिचेरी), चंद्रनगर, माहे, यनम और कराईकल में व्यापारिक केंद्र स्थापित किए गए।
- आंग्ल–फ्राँसीसी प्रतिद्वंद्विता: दक्षिण भारत पर नियंत्रण के लिए ब्रिटिश और फ्राँसीसी ईस्ट इंडिया कंपनियों के बीच वर्ष 1746 से वर्ष 1763 के दौरान कर्नाटक युद्ध लड़े गए।
- इन संघर्षों में अंततः फ्राँस की पराजय हुई, जिसके परिणामस्वरूप भारत में उसकी क्षेत्रीय महत्त्वाकांक्षाओं का पतन हो गया।
- स्वतंत्रता के बाद का काल (1947–1990 का दशक)
- कूटनीतिक संबंध: भारत और फ्राँस ने भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद, वर्ष 1947 में औपचारिक कूटनीतिक संबंध स्थापित किए।
- शीतयुद्ध के दौरान फ्राँस ने भारत की गुटनिरपेक्ष नीति का समर्थन किया और सोवियत संघ के साथ भारत के निकट संबंधों के बावजूद संतुलित दृष्टिकोण बनाए रखा।
- सांस्कृतिक संबंध: वर्ष 1955 में स्थापित फ्रेंच इंस्टिट्यूट ऑफ पुदुचेरी तथा भारत में एलायंस फ्राँसेज के व्यापक नेटवर्क ने सांस्कृतिक और शैक्षणिक आदान–प्रदान को बढ़ावा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- आर्थिक सहयोग: ऊर्जा, विमानन और अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में फ्राँस भारत के औद्योगिकीकरण प्रयासों का एक प्रमुख साझेदार बनकर उभरा।
- रणनीतिक साझेदारी (वर्ष 1998–वर्तमान)
- ऐतिहासिक समझौता: वर्ष 1998 में भारत और फ्राँस ने अपनी पहली रणनीतिक साझेदारी पर हस्ताक्षर किए, जिससे द्विपक्षीय संबंधों के एक नए युग की शुरुआत हुई। यह किसी भी देश के साथ भारत की पहली रणनीतिक साझेदारी थी।
- साझेदारी के स्तंभ: यह साझेदारी तीन प्रमुख स्तंभों (रक्षा एवं सुरक्षा, नागरिक परमाणु सहयोग और अंतरिक्ष सहयोग) पर आधारित है।
- रक्षा सहयोग: फ्राँस एक विश्वसनीय रक्षा साझेदार रहा है, जिसने मिराज 2000 लड़ाकू विमान और स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बियों जैसे उन्नत सैन्य उपकरण उपलब्ध कराए हैं।
- नागरिक परमाणु सहयोग: वर्ष 2008 के भारत–अमेरिका परमाणु समझौते के बाद भारत के नागरिक परमाणु कार्यक्रम को समर्थन देने में फ्राँस ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
21वीं सदी में प्रमुख उपलब्धियाँ
- वर्ष 2008: फ्राँस ने परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) में भारत को छूट दिलाने में समर्थन किया, जिससे भारत को वैश्विक स्तर पर नागरिक परमाणु व्यापार में भागीदारी का मार्ग प्रशस्त हुआ।
- वर्ष 2015: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्राँस यात्रा के दौरान नवीकरणीय ऊर्जा, शहरी विकास और आतंकवाद-रोधी सहयोग को सुदृढ़ करने पर सहमति बनी।
- वर्ष 2016: राफेल विमान सौदे पर हस्ताक्षर हुए, जिसने रक्षा सहयोग में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर स्थापित किया।
- वर्ष 2018: फ्राँसीसी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान हिंद महासागर क्षेत्र में सहयोग के लिए संयुक्त रणनीतिक दृष्टि को अपनाया गया।
- वर्ष 2023: रणनीतिक साझेदारी की 25वीं वर्षगाँठ मनाई गई और अगले 25 वर्षों के लिए दिशा तय करने वाला ‘होराइजन 2047’ रोडमैप अपनाया गया।
|
- रक्षा और रणनीतिक सहयोग: ‘संप्रभु’ स्तंभ: ‘रक्षा’ इस गठबंधन की आधारशिला है, जो खरीदार–विक्रेता मॉडल से आगे बढ़कर संयुक्त अभिकल्पना और संयुक्त उत्पादन के ढाँचे में रूपांतरित हो रही है।
- नौसैनिक एवं वायु शक्ति: 36 राफेल विमानों से आगे बढ़ते हुए, साझेदारी में अब 26 राफेल–मरीन विमानों की आपूर्ति तथा स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बियों (कलवरी श्रेणी) का निरंतर स्वदेशीकरण शामिल है।
- अंतर-संचालन क्षमता: वरुण (नौसेना), गरुड़ (वायु सेना) और शक्ति (थल सेना) जैसे उच्च-जटिलता वाले संयुक्त सैन्य अभ्यासों का नियमित आयोजन।
- उदाहरण: सैफरान (Safran)–HAL साझेदारी के तहत AMCA (उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान) कार्यक्रम के लिए उच्च-थ्रस्ट इंजनों का सह-विकास।
- इंडो–पैसिफिक समन्वय और समुद्री सुरक्षा: रियूनियन द्वीप और मायोट जैसे क्षेत्रों के साथ एक ‘रेजिडेंट पॉवर’ के रूप में, फ्राँस पश्चिमी हिंद महासागर में भारत का प्रमुख साझेदार है।
- समुद्री क्षेत्रीय जागरूकता (MDA): उपग्रह आँकड़ों और नौसैनिक सुविधाओं के संयुक्त उपयोग से गैर-पारंपरिक खतरों (समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ना) की निगरानी तथा मुक्त, खुला और समावेशी इंडो–पैसिफिक सुनिश्चित करना।
- नागरिक परमाणु, ऊर्जा और अंतरिक्ष सहयोग
- परमाणु पुनर्जागरण: जैतापुर परमाणु विद्युत परियोजना के प्रति पुनः प्रतिबद्धता तथा स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के लिए लघु मॉड्यूलर रिएक्टरों पर फोकस करना।
- अंतरिक्ष क्षेत्र: ISRO और CNES के बीच त्रिशना जलवायु उपग्रह तथा गगनयान (मानव अंतरिक्ष उड़ान) मिशन पर सहयोग करना।
यह साझेदारी क्यों महत्त्वपूर्ण है?
- रणनीतिक स्वायत्तता: दोनों देश स्वतंत्र निर्णय लेने के अपने अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। भारत के लिए फ्राँस वैश्विक उत्तर (ग्लोबल नॉर्थ) तक पहुँच का सेतु है, जबकि फ्राँस के लिए भारत वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) का प्रवेश द्वार है।
- प्रौद्योगिकीय संप्रभुता: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर और जेट इंजन जैसी महत्त्वपूर्ण तकनीकों के सह-विकास के माध्यम से दोनों देश अस्थिर वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भरता कम करते हैं।
- जलवायु नेतृत्व: अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन के सह-संस्थापक के रूप में, दोनों देश पेरिस समझौते और हरित वित्त पर वैश्विक विमर्श का नेतृत्व करते हैं।
- आतंकवाद-रोधी एकजुटता: 26/11 स्मारक (ताज महल पैलेस) पर श्रद्धांजलि यह दोहराती है कि यह साझेदारी वैश्विक आतंकवाद के विरुद्ध साझा और अडिग रुख पर आधारित है।
- जनभागीदारी: गेटवे ऑफ इंडिया पर ‘ईयर ऑफ इनोवेशन 2026’ का शुभारंभ और सिनेमा-थीम आधारित भोज (सिनेमा को सेतु के रूप में) यह दर्शाते हैं कि यह गठबंधन संस्कृति और रचनात्मक उद्योगों को आर्थिक प्रेरक के रूप में उपयोग कर रहा है।
- स्वास्थ्य एवं युवा सहभागिता: मरीन ड्राइव पर प्रतीकात्मक जॉगिंग जैसे कदम ‘लाइफस्टाइल कूटनीति” का उदाहरण हैं, जो युवाओं को लक्षित करते हुए स्वास्थ्य और फिटनेस का सकारात्मक संदेश देते हैं।
समाधान की आवश्यकता वाले प्रमुख चुनौतियाँ और चिंताएँ
- आर्थिक असंतुलन: रणनीतिक गहराई के बावजूद, द्विपक्षीय व्यापार (लगभग 15.5 अरब डॉलर) अब भी जर्मनी या अमेरिका के साथ भारत के व्यापार की तुलना में काफी कम है।
- कार्यान्वयन में बाधाएँ: नागरिक परमाणु क्षति दायित्व अधिनियम (2010) के तहत कानूनी जटिलताओं के कारण जैतापुर परियोजना एक दशक से अधिक समय से विलंबित रही है।
- भू-राजनीतिक भिन्नताएँ: इंडो-पैसिफिक पर समान दृष्टिकोण होने के बावजूद, रूस–यूक्रेन संघर्ष को लेकर मतभेद बने हुए हैं, जहाँ फ्राँस की नाटो प्रतिबद्धताएँ हैं, वहीं भारत बहु-संरेखण की नीति अपनाता है।
आगे की राह
- औद्योगिक एकीकरण: H125 हेलीकॉप्टर में ‘मेक इन इंडिया’ की सफलता को आगे बढ़ाते हुए, उसे पनडुब्बी ड्रोन और साइबर सुरक्षा प्रणालियों तक विस्तारित करना।
- जन-से-जन संपर्क: विशेष वीजा व्यवस्थाओं और विश्वविद्यालय साझेदारियों के माध्यम से वर्ष 2030 तक फ्राँस में 30,000 भारतीय छात्रों के लक्ष्य को प्राप्त करना।
- त्रिपक्षीय सहयोग: क्षेत्रीय सुरक्षा प्रबंधन के लिए, तनाव को बढ़ाए बिना, भारत–फ्राँस–UAE और भारत–फ्राँस–ऑस्ट्रेलिया ढाँचों को सुदृढ़ करना।
निष्कर्ष
भारत–फ्राँस संबंध अब केवल एक कूटनीतिक व्यवस्था नहीं रहे, बल्कि एक रणनीतिक आवश्यकता बन चुके हैं। एक “जनभागीदारी” के रूप में यह स्थिरता का प्रतीक है और यह सिद्ध करता है कि विश्वास तथा साझा तकनीकी महत्त्वाकांक्षा मिलकर एक सुदृढ़, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का निर्माण कर सकती है।