संदर्भ
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मीडिया रिपोर्टों के आधार पर स्वतः संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य की पारिस्थितिकी को खतरे में डाल रही अवैध रेत खनन की गतिविधियों पर ध्यान दिया।
संबंधित तथ्य
- न्यायालय ने उल्लेख किया कि व्यापक स्तर पर रेत खनन के कारण घड़ियाल की आबादी को अपने मूल आवास से हटाकर अन्य स्थानों पर स्थानांतरित करना पड़ा, लेकिन बाद में मध्य प्रदेश में बनाए गए नए आवास क्षेत्र भी खनन से प्रभावित हो गए।
- इससे पहले राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने वर्ष 2022 की रिपोर्ट “डिगिंग अप द चंबल” पर संज्ञान लेते हुए अधिकारियों को अवैध खनन की निगरानी करने और उसे रोकने के निर्देश दिए थे।
- इस रिपोर्ट में संगठित रेत माफियाओं की भूमिका को रेखांकित किया गया, जो ट्रैक्टर-ट्रॉली और बिना पंजीकृत वाहनों का उपयोग करके रेत का अवैध उत्खनन और परिवहन करते हैं।
- कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच कमजोर प्रवर्तन और समन्वय की कमी के कारण खनन माफिया वन अधिकारियों के विरुद्ध आक्रामक रूप से कार्य करने में सक्षम हो गए हैं।
- भौगोलिक परिस्थितियाँ—जैसे कम वर्षा और मुक्त रेत तट खनन गतिविधियों को पूरे वर्ष जारी रखने में सहायक बनती हैं।
घड़ियाल के बारे में
- वैज्ञानिक नाम: गैवियालिस गैंगेटिकस
- आकृति: घड़ियाल में लैंगिक द्विरूपता पाई जाती है।
- इनका थूथन लंबा और पतला होता है तथा इसमें आपस में जुड़ी हुई नुकीले दाँत पंक्तियों में पाए जाते हैं।
- नर घड़ियाल के थूथन के सिरे पर उल्टे घड़े जैसा गोल उभार होता है, जिससे इसका नाम घड़ियाल पड़ा है।

- आहार: इनका मुख्य आहार मछलियाँ हैं, जिससे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने में सहायक मिलती है।
- धार्मिक महत्त्व: भारतीय पौराणिक कथाओं में इसे प्रायः देवी गंगा के दिव्य वाहन के रूप में दर्शाया जाता है।
- वितरण: ऐतिहासिक रूप से घड़ियाल का विस्तार सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र और महानदी-ब्रह्मणी-बैतरनी नदी प्रणालियों तक था, जो भारत, भूटान, बांग्लादेश, नेपाल और पाकिस्तान में विस्तृत थीं।
- वर्तमान वितरण: वर्तमान में इनकी प्रमुख आबादी गंगा नदी की तीन सहायक नदियों में पाई जाती है, भारत में चंबल और गिरवा नदियाँ तथा नेपाल में राप्ती-नारायणी नदी।
- प्रजनन अवधि: नवंबर से जनवरी के बीच प्रजनन होता है, जबकि मार्च से मई के बीच रेत के तटों और द्वीपों पर प्रजनन करते हैं।
- पारिस्थितिकी तंत्र में भूमिका: मृत जीवों को खाकर यह नदियों को स्वच्छ बनाए रखने में सहायक होते हैं।
घड़ियाल की आबादी के लिए खतरे
- ऐतिहासिक खतरे: खाल, अंडों और पारंपरिक औषधियों के लिए अत्यधिक शिकार किया जाता है।
- आधुनिक खतरे
- आवास विनाश: बाँधों का निर्माण, सिंचाई नहरें, नदी के मार्ग में परिवर्तन और रेत खनन।
- प्रदूषण: औद्योगिक और कृषि अपशिष्ट के कारण नदी पारिस्थितिकी तंत्र की हानि।
- मत्स्यन गतिविधियाँ: गिल नेट के कारण दुर्घटनावश मौतें, यहाँ तक कि संरक्षित क्षेत्रों में भी।
घड़ियाल की संरक्षण स्थिति
- राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में वर्ष 2024 में 2,456 घड़ियाल दर्ज किए गए, जो संरक्षण प्रयासों की सफलता को दर्शाते हैं।
- घड़ियाल की आबादी 1950–60 के दशक के बीच लगभग 80% तक घट गई थी, लेकिन बाद में वर्ष 1997 तक इसमें धीरे-धीरे सुधार देखा गया।
- वर्ष 1997 से 2006 के बीच आबादी में फिर गिरावट आई और वयस्क घड़ियालों की संख्या 436 से घटकर 182 रह गई, जो लगभग 58% की कमी को दर्शाती है।
- घड़ियाल म्याँमार और भूटान में विलुप्त हो चुके हैं, जबकि पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश में इनकी छोटी और अनिश्चित आबादी पाई जाती है।
भारत में संरक्षण प्रयास
- कैप्टिव ब्रीडिंग (1975–1982): हैचलिंग (नवजात घड़ियाल) हेतु 16 प्रजनन केंद्र स्थापित किए गए।
- पंजाब में पुनर्प्रवेश (2017–2020): घड़ियालों को सतलुज और ब्यास नदियों में दोबारा छोड़ा गया।
- मुख्य अभयारण्य: राष्ट्रीय चंबल, कतरनिया घाट (उत्तर प्रदेश), सोन नदी (मध्य प्रदेश) और सतकोसिया घाटी (ओडिशा)।
- खतरों का प्रबंधन: अवैध रेत खनन पर प्रतिबंध लगाया गया, प्रदूषण की निगरानी की गई और मत्स्यन संबंधी नियम लागू किए गए।
- समुदाय की भागीदारी: स्थानीय समुदायों को आवास संरक्षण और जागरूकता कार्यक्रमों में शामिल किया गया, ताकि मानव-वन्यजीव संघर्ष कम हो सके।
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य (NCS) के बारे में
- यह चंबल नदी पर राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के सीमा क्षेत्र के पास अवस्थित है।
- इसे पहली बार वर्ष 1978 में मध्य प्रदेश में घोषित किया गया और अब यह एक लंबा तथा संकीर्ण पारिस्थितिकी आरक्षित क्षेत्र है, जिसका संयुक्त प्रबंधन मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान द्वारा किया जाता है।
- यह चंबल नदी के 435 किलोमीटर लंबे क्षेत्र की रक्षा करता है, जो भारत की सबसे स्वच्छ नदियों में से एक मानी जाती है।
- यहाँ 290 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें इंडियन स्किमर भी शामिल है, जिसकी भारत की लगभग 80% आबादी यहीं पाई जाती है।
- यह घड़ियालों के लिए एक महत्त्वपूर्ण प्रजनन स्थल के रूप में कार्य करता है और अन्य राज्यों में उनकी आबादी को पुनर्जीवित करने में मदद करता है।
भारत में पाए जाने वाली मगरमच्छ प्रजातियों की संरक्षण स्थिति
| प्रजाति |
वैज्ञानिक नाम |
आवास |
IUCN स्थिति |
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची |
| घड़ियाल |
गेवियालिस गैंगेटिकस |
मीठे पानी की नदियाँ (चंबल, गंगा, ब्रह्मपुत्र) |
अति संकटग्रस्त |
अनुसूची I |
| मगरमच्छ (मगर) |
क्रोकोडायलस पैलस्ट्रिस |
मीठे पानी की झीलें, नदियाँ, दलदली क्षेत्र |
सुभेद्य |
अनुसूची I |
| खारे पानी का मगरमच्छ |
क्रोकोडायलस पोरोसस |
मुहाने, तटीय मैंग्रोव, खारा जल |
निकट चिंताग्रस्त |
अनुसूची I |