एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका को लेकर विवाद

10 Mar 2026

संदर्भ

निर्धारित सुनवाई से पूर्व, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने “बिना शर्त और पूर्ण क्षमा याचना” जारी की और कक्षा 8 की एक सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक वापस ले ली, जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायपालिका में “भ्रष्टाचार” पर चर्चा करने वाले एक अध्याय की आलोचना की और उसके प्रसार पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था।

विवाद की पृष्ठभूमि

  • नई पाठ्यपुस्तक का प्रकाशन: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद ने हाल ही में चल रहे पाठ्यक्रम संशोधनों के हिस्से के रूप में कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक “एक्सप्लोरिंग सोसायटी: इंडिया एंड बियॉन्ड (भाग II)” प्रस्तुत की।
  • न्यायिक भ्रष्टाचार पर सामग्री: अध्याय IV जिसका शीर्षक “हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका” है, उसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर चर्चा करने वाला एक खंड शामिल था, जिसने तीव्र संस्थागत आपत्तियों को जन्म दिया।
  • सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले का स्वप्रेरणा से संज्ञान लिया और सामग्री को लापरवाह और गैर-जिम्मेदार बताया, साथ ही इसके प्रकाशन, पुनर्मुद्रण और डिजिटल प्रसार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया।
  • एनसीईआरटी की संस्थागत प्रतिक्रिया: न्यायिक जाँच के बाद एनसीईआरटी ने पूरी पाठ्यपुस्तक वापस ले ली और बिना शर्त क्षमा याचना जारी करते हुए शैक्षणिक सामग्री में तार्किकता तथा जिम्मेदारी बनाए रखने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

मुद्दे के संवैधानिक आयाम

  • न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने विद्यालय की पाठ्यपुस्तक में न्यायिक भ्रष्टाचार को शामिल किए जाने को संभावित रूप से न्यायपालिका में सार्वजनिक विश्वास को कमजोर करने वाला माना।
  • सर्वोच्च न्यायालय की स्वप्रेरणा शक्तियाँ
     भारत के संविधान के अनुच्छेद-129 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय है, जिसे स्वप्रेरणा से कार्यवाही शुरू करने तथा न्यायालय की अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति प्राप्त है, ताकि न्यायपालिका के अधिकार की रक्षा की जा सके।
  • न्यायिक अधिकार की सुरक्षा: न्यायपालिका को न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 से वैधानिक संरक्षण प्राप्त है, जो उन कार्यों को दंडित करता है, जो न्यायालयों की प्रतिष्ठा को कम करते हैं या उन्हें बदनाम करते हैं।
  • कार्यपालिका की जवाबदेही: शिक्षा मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त निकाय के रूप में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद इस बात के लिए उत्तरदायी है कि शैक्षणिक सामग्री सटीक और संवैधानिक रूप से संवेदनशील हो।

शैक्षिक शासन में मुद्दे

  • मसौदा तैयार करने के चरण में कमियाँ: विवादास्पद सामग्री की उपस्थिति यह प्रश्न उठाती है कि किस प्रकार व्यक्तिपरक या अपर्याप्त रूप से संदर्भित टिप्पणियाँ पाठ्यपुस्तक के मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया में शामिल हो गईं।
  • सहकर्मी समीक्षा तंत्र की कमजोरी: यह घटना संकेत देती है कि आंतरिक शैक्षणिक समीक्षा प्रणालियाँ संवेदनशील कानूनी और संस्थागत प्रभावों की पहचान करने में विफल रही होंगी।
  • अंतिम स्वीकृति प्रक्रिया में चिंताएँ: एनसीईआरटी नेतृत्व द्वारा सामग्री के प्रारंभिक बचाव की न्यायालय ने आलोचना की और इसे संस्थागत आत्मनिरीक्षण तथा जवाबदेही की कमी के रूप में देखा।

नैतिक और शैक्षणिक निहितार्थ

  • संवेदनशीलता बनाम पारदर्शिता का प्रश्न: एक प्रमुख नैतिक दुविधा यह उभरती है कि क्या विद्यालयी पाठ्यपुस्तकों में भ्रष्टाचार जैसे प्रणालीगत दोषों पर खुलकर चर्चा की जानी चाहिए या युवा विद्यार्थियों के लिए संस्थागत वैधता को सुरक्षित रखने पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
  • प्रशासनिक उत्तरदायित्व और नैतिक आचरण: एनसीईआरटी द्वारा जारी बिना शर्त क्षमा याचना सार्वजनिक संस्थानों की उस नैतिक जिम्मेदारी को दर्शाती है, जिसके अंतर्गत वे त्रुटियों को स्वीकार करते हैं और संस्थागत विश्वसनीयता की रक्षा करते हैं।
  • वस्तुनिष्ठ और तटस्थ शैक्षणिक सामग्री की आवश्यकता: विद्यालयी पाठ्यपुस्तकों में शासन से संबंधित मुद्दों का प्रस्तुतीकरण वस्तुनिष्ठ, तटस्थ और संतुलित होना चाहिए, ताकि शैक्षणिक सामग्री पक्षपातपूर्ण या मत-आधारित न लगे।

एनसीईआरटी के पूर्व संशोधनों के साथ तुलना

  • बार-बार पाठ्यक्रम युक्तिकरण: हाल के वर्षों में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद ने कई पाठ्यक्रम संशोधन और युक्तिकरण अभ्यास किए हैं, जिनसे अक्सर शैक्षणिक बहस उत्पन्न हुई है।
  • न्यायिक हस्तक्षेप की असामान्य प्रकृति: हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सीधे हस्तक्षेप कर पाठ्यपुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना और क्षमा याचना करवाना दुर्लभ है, जिससे यह घटना शैक्षिक शासन पर न्यायिक निगरानी का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण बन गई है।

आगे की राह

  • शैक्षणिक समीक्षा प्रणालियों को मजबूत बनाना: पाठ्यपुस्तक तैयार करने की प्रक्रिया में बहु-स्तरीय शैक्षणिक जाँच और सहकर्मी समीक्षा तंत्र को मजबूत बनाने की आवश्यकता है।
  • संवैधानिक और विधिक विशेषज्ञों की भागीदारी: न्यायपालिका जैसे संस्थानों से संबंधित संवेदनशील विषयों पर संवैधानिक विद्वानों और विधिक विशेषज्ञों से परामर्श शामिल किया जाना चाहिए।
  • संतुलित नागरिक शिक्षा को बढ़ावा देना: शैक्षणिक सामग्री को लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति सम्मान बनाए रखते हुए आलोचनात्मक चिंतन और संवैधानिक साक्षरता को प्रोत्साहित करना चाहिए।

निष्कर्ष

यह प्रकरण शैक्षणिक स्वतंत्रता, शैक्षणिक उत्तरदायित्व और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा के मध्य संतुलन को प्रदर्शित करता है। मुख्य चुनौती संस्थागत कमजोरियों को स्वीकार करने में नहीं है, बल्कि उन्हें आयु-उपयुक्त, साक्ष्य-आधारित और संवैधानिक रूप से संतुलित ढंग से प्रस्तुत करने में है। विश्वसनीय नागरिक शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए पाठ्यपुस्तक समीक्षा तंत्र को कानूनी जाँच और शैक्षणिक पर्यवेक्षण के साथ मजबूत बनाना आवश्यक है।

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