संक्षेप में समाचार

18 Apr 2026

गेको सर्टोडैक्टाइलस जयादित्याई 

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शोधकर्ताओं की एक टीम ने त्रिपुरा से बेंट-टोड गेको की एक नई प्रजाति सर्टोडैक्टाइलस जयादित्याई’ (Cyrtodactylus Jayadityai) की खोज की है।

संबंधित तथ्य

  • मार्गदर्शक के नाम पर नामकरण: शोधकर्ताओं ने इस नई प्रजाति सर्टोडैक्टाइलस जयादित्याई’ का नाम अपने असम-आधारित हर्पेटोलॉजिस्ट मार्गदर्शक जयादित्य पुरकायस्थ के नाम पर रखा है।
  • प्रकाशन: इस नई प्रजाति का वर्णन करने वाला अध्ययन ‘यूरोपियन जर्नल ऑफ टैक्सोनॉमी’ के नवीनतम संस्करण में प्रकाशित हुआ है, जो एक समकक्ष अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका है।
  • सहयोग: इसमें गुवाहाटी, अगरतला, मिजोरम विश्वविद्यालय तथा मेघालय के संस्थानों के संगठन शामिल रहे।
  • पद्धति: इस प्रजाति की पहचान आकृतिक, सांख्यिकीय तथा आणविक विश्लेषण के माध्यम से की गई।

गेको सर्टोडैक्टाइलस जयादित्याई’ के बारे में 

  • आनुवंशिक रूप से भिन्न: गेको सर्टोडैक्टाइलस जयादित्याई’ आनुवंशिक रूप से विशिष्ट है, जो अपने निकटतम संबंधी सर्टोडैक्टाइलस त्रिपुराएन्सिस’ से माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए के आधार पर लगभग 4.7–5.2% विचलन दर्शाता है।
  • निशाचर: यह मुख्यतः निशाचर है, जो रात में भोजन की तलाश के लिए बाहर निकलता है और दिन में बिलों तथा दरारों में वापस चला जाता है।
  • आवास: यह निम्न भूमि वन क्षेत्रों (Lowland forest patches) में पाया जाता है।
  • वंश: यह सर्टोडैक्टाइलस खासीएन्सिस’ समूह से संबंधित है।
  • संवेदनशीलता आकलन: शोधकर्ताओं ने इसके वितरण और आवासीय व्यवधान के प्रति संवेदनशीलता पर सीमित जानकारी के कारण इसे अपर्याप्त डेटा’ (Data deficient)’ श्रेणी में रखा है, हालाँकि भविष्य के आकलन में इसे संकटग्रस्त के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।

महत्त्व 

  • प्रजाति निर्माण का प्रेरक: यह इंडो-बर्मा क्षेत्र की जटिल जैव-भौगोलिकता को दर्शाता है, जहाँ आवासीय विविधता और भौगोलिक पृथक्करण प्रजाति निर्माण (Speciation) को निरंतर प्रेरित करते हैं।
  • जैव-विविधता में वृद्धि: सर्टोडैक्टाइलस जयादित्याई’ की खोज से पूर्वोत्तर भारत में ‘सर्टोडैक्टाइलस’ प्रजातियों की संख्या बढ़कर 31 हो गई है, जो इस क्षेत्र में अनुसंधान और संरक्षण के लिए एक महत्त्वपूर्ण हॉटस्पॉट के रूप में रेखांकित करता है।

प्रजाति विकास (Speciation) के बारे में

  • यह एक विकासवादी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा नई प्रजातियाँ मौजूदा प्रजातियों से उत्पन्न होती हैं।
  • यह निम्नलिखित कारकों द्वारा प्रेरित होती है:
    • भौगोलिक पृथक्करण (जैसे—पर्वत, नदियाँ)
    • आनुवंशिक उत्परिवर्तन
    • प्राकृतिक चयन
    • पर्यावरणीय भिन्नताएँ।

स्टेट ऑफ इंडियाज बैट्स 2024-25

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भारत के पहले राष्ट्रीय बैट आकलन ने विभिन्न आवासों में पारिस्थितिकी रूप से महत्त्वपूर्ण चमगादड़ प्रजातियों के संरक्षण हेतु बढ़ते खतरों, डेटा की कमी और तात्कालिक आवश्यकता को रेखांकित किया है।

स्टेट ऑफ इंडियाज बैट्स 2024-25’ (State of India’s Bats 2024-25) के बारे में 

  • तैयार किया गया द्वारा: बैट कंजर्वेशन इंटरनेशनल (BCI) तथा नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन (NCF)
  • प्रथम राष्ट्रीय आकलन: अनेक संस्थानों द्वारा किया गया यह व्यापक अध्ययन लगभग 135 चमगादड़ प्रजातियों पर आधारभूत डेटा प्रदान करता है तथा संरक्षण प्राथमिकताओं को रेखांकित करता है।

मुख्य निष्कर्ष 

  • अपर्याप्त डेटा’ संबंधी चिंता: लगभग 35 प्रजातियाँ अभी भी आकलित नहीं हैं या अपर्याप्त डेटा (Data deficient) की श्रेणी में हैं, जो अनुसंधान में बड़े अंतर को दर्शाता है।
  • स्थानिकता एवं संकट स्थिति: लगभग 135 प्रजातियों में से 16 स्थानिक हैं तथा 7 IUCN के अनुसार संकटग्रस्त हैं, जिनमें गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered) प्रजातियाँ भी शामिल हैं।
  • अनुसंधान में क्षेत्रीय असंतुलन: अधिकांश अध्ययन पश्चिमी घाट में केंद्रित हैं, जबकि पूर्वोत्तर, हिमालय और द्वीपीय क्षेत्र अपेक्षाकृत कम अध्ययनित हैं।
  • नीतिगत एवं अनुसंधान सिफारिशें: अनुसंधान विस्तार, अंतर-एजेंसी समन्वय तथा जूनोटिक रोगों की निगरानी में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
  • जागरूकता एवं धारणा में परिवर्तन: कोविड-19 महामारी के बाद सामाजिक उपेक्षा को दूर करने तथा चमगादड़ों के पारिस्थितिकी महत्त्व की पहचान पर बल दिया गया है।

चमगादड़’ के बारे में

  • चमगादड़ उड़ने वाले एकमात्र स्तनधारी हैं, जो पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • मुख्य विशेषताएँ 
    • भौतिक विशेषताएँ: पंख लंबी उँगलियों पर फैली त्वचा झिल्ली से बने होते हैं।
    • आहार विविधता: इनमें फल, कीट तथा छोटे कशेरुकी शामिल होते हैं।
    • आवास: ये गुफाओं, पेड़ों तथा मानव-निर्मित संरचनाओं जैसे भवनों और स्मारकों में रहते हैं।
    • इकोलोकेशन (Echolocation): अनेक प्रजातियाँ ध्वनि तरंगों का उपयोग नेविगेशन और शिकार के लिए करती हैं।
    • रात्रिचर प्रकृति: ये मुख्यतः रात्रि में सक्रिय रहते हैं।
  • भारत में चमगादड़ों के उदाहरण (IUCN स्थिति) 
    • कोलार लीफ-नोज्ड बैट: हिप्पोसाइडेरोस हाइपोफिलस (Hipposideros hypophyllus) (गंभीर रूप से संकटग्रस्त)।
    • सलीम अली का फलाहारी चमगादड़: लैटिडेन्स सलीमअली (Latidens salimalii) (लुप्तप्राय)।
    • निकोबार लीफ-नोज्ड बैट: हिप्पोसाइडेरोस निकोबारुले (Hipposideros nicobarulae) (संकटग्रस्त)।
    • इंडियन फ्लाइंग फॉक्स: प्टेरोपस जिगैन्टियस (Hipposideros nicobarulae)  (कम चिंताग्रस्त)।
  • चमगादड़ की आबादी के लिए खतरे 
    • आवास ह्रास: शहरीकरण, वनों की कटाई और भूमि-उपयोग परिवर्तन से आवास तथा भोजन स्रोत नष्ट होते हैं।
    • जलवायु परिवर्तन एवं प्रदूषण: पारिस्थितिकी तंत्र में परिवर्तन से भोजन उपलब्धता और जीवित रहने की क्षमता प्रभावित होती है।
    • मानव उत्पीड़न: रोग प्रसार की धारणा के कारण शिकार किया जाता है।
    • अवसंरचना प्रभाव: नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएँ तथा खनन गतिविधियाँ आवास को प्रभावित करती हैं।
  • चमगादड़ संरक्षण में चुनौतियाँ 
    • अनुसंधान अंतराल: सीमित वैज्ञानिक डेटा और अनुमतियों में देरी संरक्षण प्रयासों को बाधित करती है।
    • नीतिगत उपेक्षा: अन्य वन्यजीवों की तुलना में चमगादड़ों को कम प्राथमिकता मिलती है।
    • जन-धारणाएँ: रोगों से जोड़ने वाली नकारात्मक धारणा संरक्षण प्रयासों के समर्थन को कम करती है।

चमगादड़ और रोगों से संबंध 

  • चमगादड़ों का विकास लगभग 5 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ, जहाँ दीर्घकालिक ‘होस्ट-वायरस को-इवॉल्यूशन’  (Host-virus co-evolution) ने उन्हें बिना गंभीर बीमारी के वायरस वहन करने की क्षमता प्रदान की।
  • विशिष्ट विशेषताएँ जैसे—प्रवास, बड़े झुंडों में रहना, मिश्रित-प्रजाति आवास, लंबा जीवनकाल वायरस के बने रहने और प्रसार को सुगम बनाते हैं।
  • उदाहरण 
    • निपाह वायरस: संक्रमित फलों या खजूर के रस के माध्यम से संचरित; फलाहारी चमगादड़ (टेरोपस  वंश)
    • मारबर्ग वायरस: फलाहारी चमगादड़ों (Rousettus) द्वारा प्रसारित; यह गंभीर रक्तस्रावी ज्वर उत्पन्न करता है।
    • कोरोनावायरस: चमगादड़ों (विशेषकर हॉर्सशू बैट्स) में पाया जाता है; श्वसन संबंधी रोग उत्पन्न करता है और मनुष्यों में संक्रमण फैल सकता है।

सर्वेक्षण का महत्त्व 

  • नीतिगत मार्गदर्शन: लक्षित संरक्षण रणनीतियों के लिए साक्ष्य-आधार प्रदान करता है।
  • पारिस्थितिकी महत्त्व की पहचान: परागण, कीट नियंत्रण और बीज प्रसार में चमगादड़ों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है।
  • भविष्य के जोखिमों की रोकथाम: जूनोटिक रोगों तथा पारिस्थितिकी संतुलन की बेहतर समझ विकसित करने में सहायक।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) प्रशासन एवं आर्थिक समूह  (AIGEG)

सरकार ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के विनियमन और प्रोत्साहन के लिए एक समन्वित, ‘संपूर्ण-सरकार दृष्टिकोण’ (Whole-of-government approach) सुनिश्चित करने हेतु कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) प्रशासन एवं आर्थिक समूह (AIGEG) का गठन किया है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) प्रशासन एवं आर्थिक समूह (AIGEG) के बारे में

  • AIGEG एक उच्च-स्तरीय अंतर-मंत्रालयी निकाय है, जिसे भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के शासन, नीतिगत समन्वय तथा रणनीतिक दिशा प्रदान करने के लिए केंद्रीय संस्थागत तंत्र के रूप में स्थापित किया गया है।
  • नोडल मंत्रालय: इसका गठन इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा किया गया है, ताकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता शासन संबंधी दिशा-निर्देशों तथा आर्थिक सर्वेक्षण की अनुशंसाओं को लागू किया जा सके।
  • उद्देश्य: विभिन्न मंत्रालयों की नीतियों का समन्वय कर संपूर्ण-सरकार दृष्टिकोण सुनिश्चित करना, उत्तरदायी कृत्रिम बुद्धिमत्ता नवाचार को बढ़ावा देना तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग से उत्पन्न श्रम बाजार में व्यवधान और सामाजिक स्थिरता संबंधी चुनौतियों का समाधान करना।
  • संरचना
    • अध्यक्ष: इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी, रेल तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्री (श्री अश्विनी वैष्णव)।
    • उपाध्यक्ष: राज्य मंत्री, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी तथा वाणिज्य एवं उद्योग (श्री जितिन प्रसाद)।
    • अन्य सदस्य: प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार, मुख्य आर्थिक सलाहकार तथा नीति आयोग के प्रतिनिधि, जो विज्ञान, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • कार्यप्रणाली: यह भारत के कृत्रिम बुद्धिमत्ता शासन ढाँचे के अंतर्गत एक शीर्ष अंतर-मंत्रालयी निकाय के रूप में कार्य करेगा।
    • इसे तकनीकी और नियामकीय मार्गदर्शन हेतु एक प्रौद्योगिकी एवं नीति विशेषज्ञ समिति (TPEC) द्वारा समर्थन प्राप्त होगा।
  • कार्यादेश (Key Terms of Reference)
    • नीति एवं शासन ढाँचा: यह एक समन्वित राष्ट्रीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता रणनीति विकसित करता है तथा विभिन्न मंत्रालयों, नियामकों और संस्थानों के मध्य संपूर्ण-सरकार दृष्टिकोण के माध्यम से समन्वय सुनिश्चित करता है।
    • नैतिक एवं उत्तरदायी कृत्रिम बुद्धिमत्ता: यह सुरक्षित, पारदर्शी, उत्तरदायी और समावेशी AI प्रणालियों को बढ़ावा देता है तथा पूर्वाग्रह, गोपनीयता संबंधी चिंताओं एवं दुरुपयोग जैसे जोखिमों का समाधान करता है।
    • आर्थिक एवं नियामकीय समन्वय: यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता के रोजगार और कौशल विकास पर प्रभाव का आकलन करता है तथा प्रभावी शासन हेतु नियामकीय मानकों तथा संस्थागत तंत्र की सिफारिश करता है।
    • नवाचार एवं वैश्विक सहभागिता: यह AI नवाचार और स्टार्ट-अप्स को प्रोत्साहित करता है तथा वैश्विक रुझानों, उभरते जोखिमों एवं AI शासन की सर्वोत्तम प्रथाओं पर निगरानी रखता है।

महत्त्व

AIGEG भारत की कृत्रिम बुद्धिमत्ता शासन संरचना को संस्थागत समन्वय स्थापित कर सुदृढ़ करता है, नैतिक और समावेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकास सुनिश्चित करता है तथा प्रौद्योगिकीय प्रगति को आर्थिक एवं श्रम संबंधी वास्तविकताओं के साथ संरेखित करता है।

लांजिया साओरा’ जनजाति 

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ओडिशा की लांजिया साओरा जनजाति एक ऐसी स्थिति को दर्शाती है, जहाँ पारंपरिक सांस्कृतिक प्रथाएँ आधुनिक प्रभावों के अनुरूप बदल रही हैं, साथ ही अपनी पहचान को बनाए रखने का प्रयास कर रही हैं।

लांजिया साओरा समुदाय के बारे में 

  • लांजिया साओरा एक अत्यंत संवेदनशील जनजातीय समूह (PVTG) है, जो अपनी गहरी सांस्कृतिक परंपराओं और प्रकृति-केंद्रित जीवनशैली के लिए जाना जाता है।
  • आवास: यह मुख्यतः ओडिशा के वनाच्छादित और पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करते हैं, विशेष रूप से रायगड़ा और गजपति जिलों में, जो पूर्वी घाट में स्थित हैं।
  • विशिष्ट संस्कृति
    • प्रकृति-केंद्रित विश्वास प्रणाली: इनका वैश्विक दृष्टिकोण प्रकृति से गहराई से जुड़ा हुआ है तथा इनके अनुष्ठान वनों एवं प्राकृतिक शक्तियों के साथ सामंजस्य को दर्शाते हैं।
    • संगीत और नृत्य परंपराएँ: संगीत, ढोल-वादन और नृत्य इनके दैनिक जीवन, अनुष्ठानों तथा त्योहारों का अभिन्न हिस्सा हैं।
    • विशिष्ट शरीर अलंकरण: पारंपरिक रूप से ये बड़े धातु के आभूषण पहनते हैं, जो कानों के आभूषणों में लगाए जाते हैं, यह पहचान और सहनशीलता का प्रतीक है।
    • गोदना परंपरा: ज्यामितीय और प्राकृतिक रूपांकनों वाले स्थायी गोदने आध्यात्मिक और सुरक्षात्मक उद्देश्यों के लिए बनाए जाते हैं, हालाँकि नई पीढ़ी अब अस्थायी डिजाइनों को प्राथमिकता देती है।
  • जनजाति के समक्ष चुनौतियाँ
    • सांस्कृतिक क्षरण: आधुनिकता के प्रभाव से पारंपरिक प्रथाओं में कमी और परिवर्तन हो रहा है।
    • आर्थिक संवेदनशीलता: स्थानांतरित कृषि और संग्रहण पर निर्भरता के कारण आर्थिक सुरक्षा सीमित है।
    • आवासीय दबाव: वनों की कटाई और विकासात्मक गतिविधियाँ इनके प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को खतरे में डाल रही हैं।

विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTGs) के बारे में

  • PVTGs, अनुसूचित जनजातियों के भीतर सर्वाधिक हाशिए पर स्थित समूह हैं, जिन्हें उनकी अत्यधिक संवेदनशीलता और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के कारण पहचाना जाता है।
  • पहचान के मानदंड: सरकार ने 1970 के दशक में ढेबर आयोग द्वारा स्थापित निम्नलिखित मानदंडों के आधार पर PVTG की पहचान की है:
    • कृषि-पूर्व प्रौद्योगिकी स्तर (जैसे—स्थानांतरण कृषि, शिकार एवं संग्रहण)
    • जनसंख्या वृद्धि की स्थिरता या गिरावट
    • अत्यंत निम्न साक्षरता दर
    • निर्वाह-आधारित अर्थव्यवस्था।
  • भारत में PVTGs की कुल संख्या: भारत में विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में कुल 75 चिह्नित PVTG समुदाय हैं।
    • ओडिशा की स्थिति: ओडिशा में भारत में PVTGs की संख्या सर्वाधिक है, जहाँ 13 समुदाय पाए जाते हैं, जिनमें लांजिया साओरा भी शामिल है।

SEZ धोलरा में चिप निर्माण संयंत्र

भारत की पहली सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन (Fab) इकाई गुजरात के धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र (Dholera SEZ) में स्थापित की गई है, जो घरेलू चिप निर्माण और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

धोलेरा SEZ में चिप फैब्रिकेशन प्लांट के बारे में

  • भारत की पहली सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन (Fab) सुविधा धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र में स्थापित की जा रही है, जिसे इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी/आईटीईएस और चिप निर्माण पर केंद्रित एक क्षेत्र-विशिष्ट विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) के रूप में विकसित किया जा रहा है।
  • बजट आवंटन एवं विकासकर्ता: इस परियोजना का विकास टाटा सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग प्राइवेट लिमिटेड द्वारा लगभग ₹91,000 करोड़ के अनुमानित निवेश के साथ किया जा रहा है, जिसे SEZ नीति सुधारों का समर्थन प्राप्त है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • एकीकृत उच्च-प्रौद्योगिकी अवसंरचना: यह SEZ 66 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में विस्तृत है तथा इसमें सेमीकंडक्टर निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और आईटी-सक्षम सेवाओं के लिए उन्नत अवसंरचना उपलब्ध है।
    • रोजगार एवं औद्योगिक विस्तार: इस परियोजना से लगभग 21,000 रोजगार सृजित होने की संभावना है, जिससे उच्च-कौशल रोजगार और औद्योगिक क्षमता में वृद्धि होगी।
    • नीतिगत समर्थन एवं सुधार: यह परियोजना SEZ नियमों में किए गए सुधारों से सक्षम हुई है, जैसे—भूमि आवश्यकता में कमी, लचीले नियम तथा घरेलू बिक्री की अनुमति, जिससे निवेश अधिक आकर्षक बना है।
  • महत्त्व
    • रणनीतिक आत्मनिर्भरता: यह परियोजना सेमीकंडक्टर आयात पर निर्भरता को कम करती है तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में भारत की स्थिति को सुदृढ़ करती है।
    • आर्थिक एवं तकनीकी विकास: यह नवाचार को प्रोत्साहित करती है, घरेलू मूल्य शृंखला को मजबूत करती है तथा भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण केंद्र के रूप में उभरने में सहायता करती है।
    • भू-राजनीतिक महत्त्व: यह वैश्विक व्यवधानों के प्रति लचीलापन बढ़ाती है तथा तकनीकी संप्रभुता की दिशा में भारत के प्रयासों के अनुरूप है।

सेमीकंडक्टर फैब इकाई (Fabrication Plant) के बारे में 

  • सेमीकंडक्टर फैब एक अत्यंत उन्नत विनिर्माण सुविधा है, जिसमें इंटीग्रेटेड सर्किट (चिप्स) तथा सिलिकॉन वेफर का उत्पादन किया जाता है, जो इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के आवश्यक घटक हैं।
  • मुख्य विशेषताएँ 
    • जटिल एवं समय-साध्य विनिर्माण: चिप उत्पादन एक बहु-चरणीय प्रक्रिया है (जैसे—डिपोजिशन, फोटोलीथोग्राफी, एचिंग, परीक्षण, पैकेजिंग), जिसमें नैनो-स्तरीय सटीकता आवश्यक होती है और यह प्रक्रिया 3 माह से अधिक समय लेती है।
    • क्लीन रूम वातावरण: फैब अत्यंत नियंत्रित क्लीन रूम” में संचालित होते हैं, जहाँ धूल, तापमान, आर्द्रता और कंपन पर कठोर नियंत्रण होता है, क्योंकि सूक्ष्म कण भी चिप को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
    • उच्च पूँजी एवं प्रौद्योगिकी आधारित: एक फैब स्थापित करने के लिए $3–20 अरब डॉलर तक का भारी निवेश आवश्यक होता है, जिसमें लेजर, रोबोटिक्स और सटीक ऑप्टिक्स जैसे महँगे उपकरण शामिल होते हैं।
    • वेफर आधारित उत्पादन प्रणाली: चिप्स का उत्पादन सिलिकॉन वेफर (100 मिमी.–300 मिमी.) पर किया जाता है। बड़े वेफर अधिक चिप्स उत्पन्न करते हैं, जिससे प्रति इकाई लागत कम होती है, लेकिन इसके लिए अधिक निवेश तथा उन्नत अवसंरचना की आवश्यकता होती है।

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