भारत 3% संपीडित बायोगैस (CBG) मिश्रण लक्ष्य प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर

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भारत वित्त वर्ष 2026–27 में संपीड़ित प्राकृतिक गैस (CNG) तथा घरेलू पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) के साथ संपीडित बायोगैस (CBG) के अनिवार्य 3% मिश्रण के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर है।
पृष्ठभूमि
- राष्ट्रीय जैवईंधन समन्वय समिति (NBCC) की सिफारिशों के आधार पर भारत ने संपीडित बायोगैस (CBG) मिश्रण के चरणबद्ध लक्ष्य अपनाए हैं— 1% (वित्त वर्ष 2025–26), 3% (वित्त वर्ष 2026–27), 4% (वित्त वर्ष 2027–28) तथा 5% (वित्त वर्ष 2028–29)।
प्रमुख शब्दावली
- संपीडित बायोगैस (CBG): जैविक अपशिष्ट से उत्पादित शुद्धीकृत बायोगैस, जिसके गुण प्राकृतिक गैस के समान होते हैं तथा जिसका उपयोग नवीकरणीय ईंधन के रूप में किया जाता है।
- संपीड़ित प्राकृतिक गैस (CNG): मुख्यतः परिवहन ईंधन के रूप में उपयोग हेतु संपीडित की गई प्राकृतिक गैस।
- पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG): घरेलू, वाणिज्यिक एवं औद्योगिक उपयोग के लिए पाइपलाइनों के माध्यम से आपूर्ति की जाने वाली प्राकृतिक गैस।
वर्तमान स्थिति
- मिश्रण स्तर: CBG मिश्रण स्तर लगभग 2% तक पहुँच चुका है।
- CBG बिक्री: अप्रैल में 0.66 मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रतिदिन (MMSCMD) तथा मई में 0.63 MMSCMD दर्ज की गई।
- प्राकृतिक गैस की खपत: CNG तथा घरेलू PNG की संयुक्त खपत 34–35 मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रतिदिन (MMSCMD) है।
- CBG अवसंरचना
- संचालित संयंत्र: 210 संयंत्र चालू किए जा चुके हैं।
- पाइपलाइन परियोजनाएँ: पेट्रोलियम मंत्रालय के गोबरधन (GOBARdhan) पोर्टल के अनुसार, 324 CBG/बायो-CNG संयंत्रों का निर्माण कार्य प्रगति पर है, 261 संयंत्रों का निर्माण कार्य अभी प्रारंभ होना शेष है।
- अग्रणी राज्य: निर्माणाधीन परियोजनाओं की सर्वाधिक संख्या उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक में है।
महत्त्व
- ऊर्जा सुरक्षा: पश्चिम एशिया के हालिया संघर्षों ने अधिक ऊर्जा सुरक्षा तथा आयात निर्भरता को कम करने की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
- पर्यावरणीय लाभ: CBG मिश्रण में वृद्धि से ऊर्जा आयात में कमी, अपशिष्ट के उपयोग को बढ़ावा, मेथेन उत्सर्जन में कमी तथा फसल अवशेष जलाने की समस्या को नियंत्रित करने में सहायता मिल सकती है।
सुझाए गए उपाय
- फीडस्टॉक आपूर्ति: बायोमास की विश्वसनीय उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए एक सुदृढ़ फीडस्टॉक आश्वासन तंत्र स्थापित किया जाए।
- वित्तीय सहायता: परिचालन एवं रखरखाव लागतों के समर्थन हेतु उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) प्रदान किए जाएँ।
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क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2027
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भारत ने वैश्विक उच्च शिक्षा परिदृश्य में अपनी उपस्थिति को और सुदृढ़ किया है, जिसमें आईआईटी दिल्ली क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2027 में देश का सर्वोच्च रैंक प्राप्त करने वाला संस्थान बनकर उभरा है।
क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2027 के बारे में
- क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग विश्वविद्यालयों की एक वार्षिक वैश्विक रैंकिंग है, जिसे क्यूएस क्वाक्वारेली साइमंड्स (QS Quacquarelli Symonds) द्वारा प्रकाशित किया जाता है।
- यह संस्थानों का मूल्यांकन शैक्षणिक प्रतिष्ठा (Academic Reputation), नियोक्ता प्रतिष्ठा (Employer Reputation), अनुसंधान प्रभाव (Research Impact), अंतरराष्ट्रीयकरण तथा रोजगार-योग्यता जैसे मानकों के आधार पर करती है।
- एमआईटी (MIT) ने विश्व में अपना प्रथम स्थान बरकरार रखा, जबकि इंपीरियल कॉलेज लंदन और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी ने संयुक्त रूप से दूसरा स्थान प्राप्त किया।
क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2027 में भारत का प्रदर्शन
- शीर्ष रैंक: आईआईटी दिल्ली लगातार दूसरे वर्ष भारत का सर्वोच्च रैंक प्राप्त संस्थान बना, जो वैश्विक स्तर पर 118वें स्थान पर पहुँच गया। यह उसका अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।
- आईआईटी बॉम्बे (134), आईआईटी मद्रास (180), आईआईटी खड़गपुर (205) तथा आईआईटी कानपुर (221) भी भारत के शीर्ष रैंक प्राप्त संस्थानों में शामिल रहे।
- अनुसंधान प्रदर्शन: भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) प्रति संकाय उद्धरण (Citations per Faculty) संकेतक में वैश्विक स्तर पर 21वें स्थान पर रहा, जो उसके सशक्त अनुसंधान प्रभाव को दर्शाता है।
- कुल विश्वविद्यालय: रैंकिंग में भारत के 52 विश्वविद्यालय शामिल हैं, जिससे भारत अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, चीन और जर्मनी के बाद विश्व की पाँचवीं सर्वाधिक प्रतिनिधित्व वाली उच्च शिक्षा प्रणाली बन गया है।
- अनुसंधान प्रभाव (उद्धरण), नियोक्ता प्रतिष्ठा तथा स्नातकों की रोजगार-योग्यता भारत के अग्रणी संस्थानों, विशेषकर आईआईटी दिल्ली, के प्रमुख सशक्त पक्ष रहे।
- चुनौतियाँ: भारतीय विश्वविद्यालयों के समक्ष अनुसंधान एवं विकास (R&D) में अपर्याप्त वित्तपोषण, अंतरराष्ट्रीयकरण का निम्न स्तर तथा शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं, जो उन्हें वैश्विक शीर्ष 100 में स्थान प्राप्त करने से सीमित करती हैं।
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विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस 2026
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विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस प्रतिवर्ष 17 जून को वैश्विक स्तर पर मनाया जाता है।
विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस, 2026 के बारे में
- यह दिवस 17 जून, 1994 को पेरिस में संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (United Nations Convention to Combat Desertification-UNCCD) को अपनाए जाने की स्मृति में मनाया जाता है तथा भूमि निम्नीकरण एवं सूखे के विरुद्ध कार्रवाई को प्रोत्साहित करता है।
- उद्देश्य: अंतरराष्ट्रीय सहयोग, सतत् भूमि प्रबंधन तथा सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से भूमि निम्नीकरण और सूखे से निपटने के प्रति जागरूकता बढ़ाना।
- वर्ष 2026 का विषय: “रेंजलैंड्स: रिकग्नाइज. रिस्पेक्ट. रिस्टोर.”(Rangelands: Recognise. Respect. Restore) — रेंजलैंड पारितंत्रों के संरक्षण और पुनर्स्थापन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
- रेंजलैंड्स: प्राकृतिक भू-दृश्य जैसे घासभूमि, सवाना, झाड़ियाँ, मरुस्थल, टुंड्रा तथा चरागाह क्षेत्र, जिनका उपयोग मुख्यतः पशु चारण और वन्यजीव आवास के रूप में किया जाता है।
- रेंजलैंड्स पृथ्वी की 50% से अधिक भूमि सतह को आच्छादित करते हैं, जिससे वे विश्व के सबसे बड़े स्थलीय पारितंत्रों में से एक हैं।
भारत में आयोजन
- नोडल मंत्रालय: पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC), संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (UNCCD) के लिए भारत का राष्ट्रीय नोडल मंत्रालय है तथा मरुस्थलीकरण एवं भूमि निम्नीकरण के विरुद्ध भारत के प्रयासों का समन्वय करता है।
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के अंतर्गत वाटरशेड विकास घटक (WDC–PMKSY 2.0) के परियोजना क्षेत्रों में सतत् भूमि एवं जल प्रबंधन को बढ़ावा देने हेतु इस दिवस का आयोजन किया गया।
- 1,444 नए वाटरशेड कार्यों (जैसे— चेक डैम, परकोलेशन टैंक एवं फार्म पॉण्ड) का उद्घाटन किया गया।
- “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान के अंतर्गत 51,299 पौधे लगाए गए, जिससे वनीकरण एवं पारिस्थितिकीय पुनर्स्थापन को बढ़ावा मिला।
- नागरिकों ने “विकसित भारत के लिए, आइए सूखा-मुक्त भारत का निर्माण करें” विषय पर शपथ ग्रहण की।
वाटरशेड विकास घटक (WDC)–प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) 2.0 के बारे में
- WDC–PMKSY 2.0 एक वाटरशेड विकास कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य निम्नीकृत भूमि का पुनर्स्थापन, जल सुरक्षा में सुधार तथा जलवायु-सहिष्णु कृषि को सुदृढ़ करना है।
- नोडल एजेंसी: इसका क्रियान्वयन ग्रामीण विकास मंत्रालय के अंतर्गत भूमि संसाधन विभाग (Department of Land Resources) द्वारा किया जाता है।
- उद्देश्य: सामुदायिक-आधारित प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के माध्यम से वाटरशेड क्षेत्रों का विकास करना।
- यह जलवायु अनुकूलन क्षमता, सूखा शमन, आजीविका संवर्द्धन तथा सतत् ग्रामीण विकास को प्रोत्साहित करता है।
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यू.एस. पैसिफिक कमांड (USPACOM)
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संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने सैन्य कमांड का नाम यू.एस. इंडो-पैसिफिक कमांड (USINDOPACOM) से पुनः यू.एस. पैसिफिक कमांड (USPACOM) कर दिया है।
यू.एस. पैसिफिक कमांड (USPACOM) के बारे में
- USPACOM संयुक्त राज्य अमेरिका के सशस्त्र बलों की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी भौगोलिक एकीकृत लड़ाकू कमान है, जिसका मुख्यालय हवाई (Hawaii) में स्थित है।
- स्थापना: इसकी स्थापना 1 जनवरी, 1947 को राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन द्वारा प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अभियानों की निगरानी हेतु की गई थी।
- विकास: यह कमान सात दशकों से अधिक समय तक USPACOM के रूप में कार्यरत रही, जिसे 2018 में हिंद महासागर तथा इंडो-पैसिफिक अवधारणा के रणनीतिक महत्त्व को रेखांकित करने के लिए USINDOPACOM नाम दिया गया था।
- कमांड के अंतर्गत क्षेत्र
- भौगोलिक अधिकार-क्षेत्र: USPACOM का दायरा पृथ्वी की लगभग आधी सतह पर विस्तृत है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिमी तट से भारत की पश्चिमी सीमा तक तथा आर्कटिक से अंटार्कटिका तक विस्तृत है।
- रणनीतिक कवरेज: यह कमान एशिया-प्रशांत क्षेत्र के प्रमुख समुद्री मार्गों, महत्त्वपूर्ण व्यापार गलियारों तथा अनेक रणनीतिक संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी करती है।
- प्रमुख दायित्व
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- क्षेत्रीय सुरक्षा: USPACOM प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी क्षेत्र, नागरिकों तथा रणनीतिक हितों की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी है।
- संयुक्त सैन्य अभियान: यह अमेरिकी सेना (Army), नौसेना, वायु सेना, मरीन कॉर्प्स (Marine Corps) तथा स्पेस फोर्स (Space Force) के अभियानों का एकीकरण और समन्वय करता है।
- सुरक्षा साझेदारियाँ: यह कमान क्षेत्रीय साझेदारों और सहयोगी देशों के साथ सैन्य अभ्यास, अंतर-संचालनीयता कार्यक्रम तथा क्षमता-निर्माण पहलों का संचालन करती है।
- मानवीय सहायता: USPACOM क्षेत्र में आपदा राहत, आपातकालीन प्रतिक्रिया तथा मानवीय सहायता अभियानों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
संयुक्त राज्य अमेरिका की विभिन्न भौगोलिक कमान
- यू.एस. पैसिफिक कमांड (USPACOM): इसका मुख्यालय हवाई में स्थित है; यह इंडो-एशिया-प्रशांत क्षेत्र को कवर करती है, जिसका विस्तार भारत के तटों तक है।
- यू.एस. यूरोपियन कमांड (USEUCOM): इसका मुख्यालय जर्मनी में स्थित है; यह यूरोप, मध्य पूर्व के कुछ भागों तथा यूरेशिया में अमेरिकी अभियानों की देख-रेख करती है और नाटो (NATO) के साथ समन्वय में कार्य करती है।
- यू.एस. सेंट्रल कमांड (CENTCOM): इसका मुख्यालय फ्लोरिडा में स्थित है; यह मध्य पूर्व, मध्य एशिया तथा दक्षिण एशिया के कुछ भागों में अभियानों का संचालन करती है।
- यू.एस. सदर्न कमांड (SOUTHCOM): इसका मुख्यालय फ्लोरिडा में स्थित है; यह मध्य अमेरिका, दक्षिण अमेरिका तथा कैरेबियाई क्षेत्र के लिए उत्तरदायी है।
- यू.एस. नॉर्दर्न कमांड (USNORTHCOM): इसका मुख्यालय कोलोराडो में स्थित है; यह मुख्यतः उत्तरी अमेरिका की मातृभूमि सुरक्षा पर केंद्रित है, जिसमें महाद्वीपीय संयुक्त राज्य अमेरिका, अलास्का तथा कनाडा शामिल हैं।
- यू.एस. अफ्रीका कमांड (USAFRICOM): इसका मुख्यालय जर्मनी में स्थित है; यह अफ्रीकी महाद्वीप में सैन्य अभियानों का संचालन तथा रक्षा क्षमताओं के निर्माण का कार्य करती है।
- यू.एस. स्पेस कमांड (USSPACECOM): इसका मुख्यालय कोलोराडो में स्थित है; यह अंतरिक्ष में, अंतरिक्ष से तथा अंतरिक्ष के लिए अभियानों का संचालन करती है।
इस नाम परिवर्तन से संयुक्त राज्य अमेरिका की बदलती रणनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत मिलता है तथा इसका प्रभाव क्षेत्रीय सुरक्षा गतिशीलताओं पर पड़ सकता है, विशेषकर चीन, इंडो-पैसिफिक अवधारणा तथा भारत की रणनीतिक भूमिका के संदर्भ में। |
रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट (RELOS)
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भारत और रूस ने वर्ष 2025 में रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट (RELOS) को क्रियान्वित किया, जिससे स्थायी सैनिक तैनाती की अनुमति दिए बिना दोनों देशों के बीच सैन्य लॉजिस्टिक सहयोग को सुदृढ़ किया गया।
रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट (RELOS) के बारे में
- रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट (RELOS) भारत और रूस के बीच एक द्विपक्षीय लॉजिस्टिक सहायता समझौता है, जो पारस्परिक रूप से सहमत गतिविधियों के दौरान सैन्य सुविधाओं, आपूर्तियों तथा तकनीकी सहायता तक पारस्परिक पहुँच प्रदान करता है।
- उद्देश्य: लॉजिस्टिक सहयोग को सरल बनाना, परिचालन दक्षता में सुधार करना तथा दोनों देशों के सशस्त्र बलों के बीच रक्षा अंतर-संचालनीयता को सुदृढ़ करना।
- समझौते के प्रमुख प्रावधान
- सैन्य सुविधाओं तक पारस्परिक पहुँच: RELOS भारतीय और रूसी सैन्य कर्मियों को स्वीकृत गतिविधियों के दौरान लॉजिस्टिक सहायता हेतु निर्दिष्ट बंदरगाहों, वायुसेना अड्डों तथा सैन्य सुविधाओं तक पहुँच प्रदान करता है।
- लॉजिस्टिक एवं तकनीकी सहायता: समझौते के अंतर्गत ईंधन, भोजन, जल, परिवहन, स्पेयर पार्ट्स, रखरखाव, मरम्मत सेवाएँ, चिकित्सा सहायता, संचार सेवाएँ तथा अन्य लॉजिस्टिक आवश्यकताओं की व्यवस्था शामिल है।
- संयुक्त गतिविधियों के दौरान सहायता: यह समझौता संयुक्त सैन्य अभ्यासों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों, पोर्ट कॉल, सैन्य यात्राओं, मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) अभियानों तथा अन्य पारस्परिक रूप से सहमत मिशनों पर लागू होता है।
- वायुक्षेत्र एवं हवाई अड्डा उपयोग: दोनों देशों के सैन्य विमान परिचालन एवं लॉजिस्टिक उद्देश्यों के लिए निर्दिष्ट वायुक्षेत्र तथा हवाई अड्डा अवसंरचना का उपयोग कर सकते हैं।
- स्थायी तैनाती नहीं: RELOS एक-दूसरे के क्षेत्र में सैनिकों की स्थायी तैनाती, सैन्य अड्डों की स्थापना या सैन्य संसाधनों की दीर्घकालिक तैनाती की अनुमति नहीं देता। सभी तैनातियाँ अस्थायी तथा गतिविधि-विशिष्ट होंगी।
- एग्रीमेंट की अवधि: यह एग्रीमेंट पाँच वर्षों के लिए वैध है तथा बदलती रणनीतिक आवश्यकताओं और पारस्परिक सहमति के आधार पर इसमें संशोधन किया जा सकता है।
RELOS का महत्त्व
- परिचालन पहुँच में वृद्धि: यह समझौता भारतीय और रूसी नौसैनिक तथा वायु सैन्य संसाधनों को लॉजिस्टिक एवं रखरखाव सुविधाओं तक आसान पहुँच प्रदान करके लंबी अवधि की तैनाती को सक्षम बनाता है।
- रक्षा सहयोग को सुदृढ़ करना: RELOS सैन्य सहयोग को बढ़ाता है तथा भारत और रूस के बीच दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत बनाता है।
- आर्कटिक सहयोग का विस्तार: यह समझौता भारत को आर्कटिक क्षेत्र में रूसी सुविधाओं तक पहुँच प्रदान करता है, जिससे उभरते समुद्री मार्गों, कनेक्टिविटी-सुविधाओं तथा संसाधन अन्वेषण में भविष्य के सहयोग को समर्थन मिलता है।
- रणनीतिक गतिशीलता को बढ़ावा: सुव्यवस्थित लॉजिस्टिक प्रक्रियाएँ परिचालन विलंब को कम करती हैं, मिशनों की दीर्घकालिक क्षमता में सुधार करती हैं तथा दूरस्थ क्षेत्रों में सैन्य तत्परता को बढ़ाती हैं।
रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट (RELOS) लॉजिस्टिक अंतर-संचालनीयता, परिचालन लचीलेपन तथा रणनीतिक पहुँच को बढ़ाकर भारत-रूस रक्षा सहयोग को सुदृढ़ करता है, जबकि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की नीति को भी बनाए रखता है। |
अभ्यास पिच ब्लैक
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भारतीय वायु सेना ऑस्ट्रेलिया में आयोजित होने वाले अभ्यास पिच ब्लैक 2026 में 19 साझेदार देशों की वायु सेनाओं के साथ भाग लेगी।
अभ्यास पिच ब्लैक (Exercise Pitch Black) के बारे में
- अभ्यास पिच ब्लैक एक द्विवार्षिक (Biennial) बहुराष्ट्रीय वायु युद्ध अभ्यास है तथा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के सबसे महत्त्वपूर्ण वायु युद्ध अभ्यासों में से एक है।
- “पिच ब्लैक” नाम ऑस्ट्रेलिया के विशाल एवं विरल जनसंख्या वाले क्षेत्रों में आयोजित रात्रिकालीन फलस्वरुप फ्लाइंग अभियानों (Night-time Flying Operations) पर विशेष बल दिए जाने के कारण रखा गया है।
- आयोजक: रॉयल ऑस्ट्रेलियन एयर फोर्स (RAAF)।
- यह RAAF का प्रमुख अंतरराष्ट्रीय फ्लाइंग अभ्यास तथा सबसे बड़ा बहुराष्ट्रीय वायु युद्ध अभ्यास है।
- वर्ष 2026 का संस्करण
- स्थान एवं समय-सारिणी: अभ्यास पिच ब्लैक 2026 का आयोजन 20 जुलाई से 7 अगस्त, 2026 तक उत्तरी ऑस्ट्रेलिया स्थित RAAF बेस डार्विन, टिंडल और एंबरली में किया जाएगा।
- प्रतिभागी: इस अभ्यास में 19 देश, 100 से अधिक विमान तथा लगभग 4,400 सैन्य कर्मी भाग लेंगे।
- भाग लेने वाले देश: भारत, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, फ्राँस, जापान, कनाडा, सिंगापुर, इंडोनेशिया, मलेशिया, कोरिया गणराज्य, न्यूज़ीलैंड, थाईलैंड, स्पेन, स्वीडन, फिनलैंड, फिलीपींस, पापुआ न्यू गिनी तथा ब्रुनेई।
- महत्त्व: यह अभ्यास सैन्य साझेदारियों को सुदृढ़ करता है, सामूहिक सैन्य तैयारी को बढ़ाता है, क्षेत्रीय स्थिरता को प्रोत्साहित करता है तथा इंडो-पैसिफिक और साझेदार देशों की वायु सेनाओं के बीच अंतर-संचालनीयता में सुधार करता है।
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