दल-बदल विरोधी कानून

18 Jun 2026

संदर्भ

हाल ही में एक प्रमुख संवैधानिक संकट उत्पन्न हुआ, जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के साथ विलय करने का प्रयास किया।

  • यह, अप्रैल 2026 में आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसदों द्वारा किए गए समान कदम के साथ मिलकर, दसवीं अनुसूची के अंतर्गत दल विलय (Party mergers) से संबंधित कानूनी अस्पष्टताओं को पुनः केंद्र में ले आया है।

दल-बदल कानून और इसकी आवश्यकता

  • राजनीतिक अर्थ में, दल-बदल से तात्पर्य है कि कोई निर्वाचित विधायक/सांसद अपने मूल राजनीतिक दल को छोड़कर किसी अन्य दल में शामिल हो जाए या स्वतंत्र सदस्य के रूप में बैठने लगे, जिससे विधायी स्थिरता बाधित होती है।
  • आया राम, गया राम” संस्कृति: 1960 और 1970 के दशक में बार-बार दल बदलने की प्रवृत्ति ने भारतीय शासन को प्रभावित किया। यह वाक्यांश वर्ष 1967 में उद्भवित हुआ, जब हरियाणा के विधायक गया लाल ने एक ही दिन में तीन बार अपना दल बदला।
  • जन विश्वास का क्षरण: इस प्रकार के व्यापक हॉर्स ट्रेडिंग (Horse-trading) (नकद या मंत्री पद के बदले राजनीतिक निष्ठा का आदान-प्रदान) ने जनता के विश्वास को कमजोर किया, निर्वाचित बहुमत को गिरा दिया और सीधे तौर पर जनादेश को प्रभावित किया।
  • विधायी उपाय: सरकार की स्थिरता की रक्षा करने और महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक मतदान (जैसे बजट या विश्वास प्रस्ताव) के दौरान दलीय निष्ठा सुनिश्चित करने के लिए, संसद ने 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 के माध्यम से दल-बदल विरोधी कानून लागू किया, जिसके तहत दसवीं अनुसूची जोड़ी गई।

दसवीं अनुसूची के मुख्य प्रावधान

  • अयोग्यता के चार आधार: एक निर्वाचित प्रतिनिधि निम्नलिखित परिस्थितियों में सदन से अयोग्य ठहराया जा सकता है:
    • स्वेच्छा से सदस्यता त्यागना: यदि कोई निर्वाचित सदस्य औपचारिक रूप से त्याग-पत्र दे देता है या उसके बाहरी आचरण से यह संकेत मिलता है कि उसने अपने राजनीतिक दल की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ दी है
    • व्हिप का उल्लंघन: यदि वह अपने मूल दल द्वारा जारी अनिवार्य व्हिप (निर्देश) के विरुद्ध मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है, बिना पूर्व अनुमति के।
    • निर्दलीय सदस्य: यदि कोई निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव के बाद किसी भी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
    • नामित सदस्य: यदि कोई नामित सदस्य सदन में अपनी सीट ग्रहण करने के छह महीने की अवधि समाप्त होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है (पहले छह महीनों के भीतर वह किसी भी दल में शामिल होने के लिए स्वतंत्र होता है)।
  • वैध अपवाद
    • पीठासीन अधिकारी: यदि कोई सदस्य अध्यक्ष (Speaker) या सभापति (Chairperson) के रूप में निर्वाचित होता है, तो वह स्वेच्छा से अपनी दल सदस्यता त्याग सकता है और पद छोड़ने के बाद पुनः इसमें शामिल हो सकता है।
    • दलों का विलय: यदि किसी सदस्य का मूल राजनीतिक दल किसी अन्य दल में विलय हो जाता है और उस विधायी दल के कम-से-कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य इस विलय के पक्ष में हों, तो वह अयोग्यता से बच जाता है।
  • निर्णायक प्राधिकारी
    • पीठासीन अधिकारी: अयोग्यता से संबंधित प्रश्नों का निर्णय पूर्णतः अध्यक्ष (लोकसभा/विधानसभा) या सभापति (राज्यसभा) द्वारा किया जाता है।
    • प्रक्रिया: पीठासीन अधिकारी स्वतः संज्ञान नहीं ले सकते; वे केवल तब कार्यवाही प्रारंभ कर सकते हैं, जब उन्हें सदन के किसी सदस्य से औपचारिक शिकायत प्राप्त हो तथा आरोपित विधायक को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए।
    • समय संबंधी खामी: दसवीं अनुसूची में निर्णय लेने के लिए कोई वैधानिक समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है, जिससे पक्षपाती पीठासीन अधिकारी निर्णय को अनिश्चितकाल तक टाल सकते हैं।

मुख्य संवैधानिक संशोधन

  • 52वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1985: इसने दसवीं अनुसूची का सृजन किया।
    • इसमें पैरा 3 शामिल किया गया, जिसने ‘विभाजन’ (Split)” के नाम पर सामूहिक दल-बदल को संरक्षण दिया, बशर्ते कि विधायी दल के कम-से-कम एक-तिहाई (1/3) सदस्य एक साथ दल बदलें।
  • 91वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2003: इसने विभाजन संबंधी अपवाद को पूरी तरह समाप्त कर दिया क्योंकि यह बड़े पैमाने पर दल-बदल को प्रोत्साहित कर रहा था।
    • विलय की सीमा में वृद्धि: अपवाद की सीमा को परिवर्तित करते हुए, संरचनात्मक विलय के लिए दो-तिहाई (2/3) बहुमत आवश्यक किया गया।
    • मंत्रिपरिषद के आकार पर सीमा: मंत्रिपरिषद (प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री सहित) का आकार लोकसभा या राज्य विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15% तक सीमित किया गया (राज्यों के लिए न्यूनतम 12 मंत्री)।
    • दल-बदल करने वालों पर दंड: दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्य घोषित कोई भी सदस्य पुनः निर्वाचित होने तक किसी भी वेतनभोगी राजनीतिक पद धारण करने या मंत्री के रूप में नियुक्त होने के लिए स्वतः अयोग्य हो जाता है।

वर्ष 2003 के बाद विलय के दुरुपयोग में वृद्धि के कारण

  • व्यक्तिगत दल-बदल का समाप्त होना: एक-तिहाई विभाजन संबंधी प्रावधान को हटाने से छोटे पैमाने के व्यक्तिगत दल-बदल समाप्त हो गए, किंतु अनजाने में इससे बड़े और अधिक संगठित राजनीतिक पुनर्संरेखण (Realignments) को बढ़ावा मिला।
  • सामूहिक राजनीतिक अभियांत्रिकी का उदय: व्यक्तिगत स्तर पर दल बदलने के स्थान पर, विधायक अब बड़े पैमाने पर समन्वित दल-बदल करने लगे हैं ताकि अयोग्यता से बचा जा सके।
  • पैरा 4 का दुरुपयोग: विद्रोही गुट दसवीं अनुसूची के पैरा 4 के अंतर्गत विलय प्रावधान का उपयोग दल-बदल विरोधी कार्यवाही से बचने के लिए एक कानूनी ढाल के रूप में करते हैं।
  • दो-तिहाई बहुमत रणनीति: असंतुष्ट समूह विधायी दल के दो-तिहाई (2/3) सदस्यों का समर्थन प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, जिससे वे विलय प्रावधान के तहत संरक्षण का दावा कर सकें।
  • मूल दल को दरकिनार करना: ऐसे गुट अक्सर मूल संगठनात्मक दल की अनदेखी करते हैं और यह तर्क देते हैं कि उनका विधायी बहुमत उन्हें किसी अन्य दल में विलय करने या स्वयं को मूल दल घोषित करने का अधिकार देता है, जैसा कि शिवसेना और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी से जुड़े विवादों में देखा गया है।
  • हाल के उदाहरण: आम आदमी पार्टी (AAP) का राज्यसभा में विभाजन (अप्रैल 2026) और तृणमूल कांग्रेस संकट (जून 2026) यह दर्शाते हैं कि पैरा 4 किस प्रकार कानूनी रूप से संरक्षित दल-बदल का एक प्रमुख माध्यम बनता जा रहा है।

कार्यान्वयन में चुनौतियाँ

  • व्हिप संबंधी निर्देश: व्हिप एक बाध्यकारी दलीय निर्देश है। आश्चर्यजनक रूप से, व्हिप का पद न तो भारत के संविधान, न ही सदन के नियमों, और न ही किसी संसदीय विधि में उल्लिखित है।
    • यह पूर्णतः संसदीय परंपराओं पर आधारित होकर कार्य करता है।
  • पारदर्शिता का अभाव: आंतरिक पार्टी व्हिप अक्सर अस्पष्ट या ठीक से संप्रेषित नहीं होते, जिससे सदन में यह विवाद उत्पन्न होता है कि क्या सदस्यों को सही रूप से सूचना दी गई थी।
  • पक्षपातपूर्ण अध्यक्षीय कार्यप्रणाली: अध्यक्ष अपने राजनीतिक दल से विरलतम स्थिति में ही इस्तीफा देते हैं, जिससे वे अक्सर पक्षपातपूर्ण रुख प्रदर्शित करते हैं और दल-बदल मामलों को वर्षों तक लंबित रखते हैं, जिससे सत्तारूढ़ पक्ष को लाभ मिलता है।
  • न्यायिक पुनरावलोकन बनाम स्वायत्तता: यद्यपि न्यायालयों के पास न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति होती है, वे सामान्यतः अंतिम आदेश से पहले हस्तक्षेप करने से बचते हैं, जिससे विधायी स्वायत्तता बनी रहती है, परंतु समयबद्ध न्याय प्रभावित होता है।

सर्वोच्च न्यायालय के महत्त्वपूर्ण निर्णय

  • किहोतो होलोहान बनाम जाचिल्हू (1993): सर्वोच्च न्यायालय ने दसवीं अनुसूची की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।
    • महत्त्वपूर्ण रूप से, इसने यह निर्णय दिया कि अध्यक्ष का निर्णय न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन होगा, विशेषकर दुर्भावना, विकृत निर्णय या अधिकार क्षेत्र संबंधी त्रुटियों के आधार पर।
  • रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ (1994): न्यायालय ने स्पष्ट किया कि स्वेच्छा से सदस्यता त्यागना” केवल औपचारिक त्याग-पत्र तक सीमित नहीं है।
    • सदस्य के सदन के बाहर के आचरण (जैसे- विरोधी रैलियों में भाग लेना, संयुक्त विपक्षी घोषणाओं पर हस्ताक्षर करना) के आधार पर भी दल-बदल का अनुमान लगाया जा सकता है।
  • केइशम मेघचंद्र सिंह बनाम अध्यक्ष, मणिपुर (2020): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि पीठासीन अधिकारी को अयोग्यता याचिका पर सामान्यतः तीन माह के भीतर निर्णय लेना चाहिए, सिवाय असाधारण परिस्थितियों के।
    • इसने यह भी दृढ़ता से अनुशंसा की कि अध्यक्ष की निर्णयात्मक भूमिका को सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की अध्यक्षता वाले एक स्वतंत्र न्यायाधिकरण से प्रतिस्थापित किया जाए।

समितियों द्वारा प्रमुख सिफारिशें

  • दिनेश गोस्वामी समिति (1990): इसने सिफारिश की कि अयोग्यता को सख्ती से केवल उन मामलों तक सीमित किया जाना चाहिए, जहाँ कोई सदस्य स्वेच्छा से त्याग-पत्र दे या केवल महत्त्वपूर्ण मतों (जैसे अविश्वास प्रस्ताव, धन विधेयक, या राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव) पर व्हिप का उल्लंघन करे।
  • हाशिम अब्दुल हलीम समिति (1994): स्वेच्छा से सदस्यता त्यागना” की एक व्यापक कानूनी परिभाषा देने का आग्रह किया तथा यह सिफारिश की कि निष्कासित सदस्यों को कार्यकाल के दौरान किसी नए दल में शामिल होने या सरकारी पद धारण करने से रोका जाए।
  • 170वीं विधि आयोग रिपोर्ट (1999): पैरा 4 (विलय अपवाद) को पूर्णतः हटाने की वकालत की। इसने तर्क दिया कि किसी भी आंतरिक विवाद की स्थिति में तत्काल अयोग्यता होनी चाहिए, जिससे प्रतिनिधियों को जनता से नया जनादेश प्राप्त करना पड़े।
  • राष्ट्रीय संविधान समीक्षा आयोग (NCRWC) (2002): इसने सुझाव दिया कि दल-बदल करने वालों को पूरे विधायी कार्यकाल के दौरान किसी भी लोक पद या मंत्री पद धारण करने से वंचित किया जाए।
  • द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC): इसने सिफारिश की कि दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता निर्धारित करने की शक्ति अध्यक्ष से हटाकर राष्ट्रपति या राज्यपाल को दी जानी चाहिए, जो भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की बाध्यकारी सलाह पर कार्य करें।

दल-बदल का वैश्विक प्रबंधन

  • संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम: इन लोकतंत्रों में औपचारिक दल-बदल विरोधी कानून नहीं हैं। जबकि यूनाइटेड किंगडम में मतदान अनुशासन बनाए रखने के लिए एक सशक्त व्हिप प्रणाली का उपयोग किया जाता है, परंतु क्रॉस-वोटिंग या दल बदलने पर कानूनी अयोग्यता नहीं होती, बल्कि राजनीतिक या दलीय दंड (जैसे व्हिप खोना या कॉकस से निष्कासन) दिए जाते हैं।
  • कनाडा: यहाँ अनुशासन को पार्टी कॉकस’ के भीतर सख्ती से नियंत्रित किया जाता है। दल-बदल या पार्टी लाइन के विरुद्ध जाने पर सदस्य को संसदीय दल से निष्कासित कर दिया जाता है, जिससे वह स्वतंत्र सदस्य के रूप में बैठता है, किंतु वह अपनी सदस्यता बनाए रखता है।
  • दक्षिण अफ्रीका: पश्चिमी देशों के विपरीत, दक्षिण अफ्रीका में एक स्पष्ट संवैधानिक ढाँचा है, जो कार्यकाल के दौरान दल बदलने वाले किसी भी सदस्य को अयोग्य ठहराता है, जो भारत के कठोर मॉडल के समान है और दलीय अखंडता को प्राथमिकता देता है।

आगे की राह

  • कठोर समय-सीमा का संहिताकरण: प्रणालीगत देरी को रोकने के लिए दल-बदल मामलों के निपटान हेतु चार सप्ताह की वैधानिक समय-सीमा निर्धारित की जानी चाहिए। यदि अध्यक्ष इस अवधि के भीतर निर्णय देने में विफल रहते हैं, तो आरोपित सदस्य को न्यायिक अपील लंबित रहने तक अयोग्य माना जाना चाहिए।
  • सार्वजनिक नोटिस को अनिवार्य बनाना: संचार संबंधी विवादों को समाप्त करने के लिए सभी आधिकारिक पार्टी व्हिप को मतदान से पूर्व सत्यापित सार्वजनिक प्लेटफॉर्म या डिजिटल विधानसभा पोर्टल पर अनिवार्य रूप से प्रकाशित किया जाना चाहिए।
  • निर्णयन प्रक्रिया में सुधार: अध्यक्ष के ऐतिहासिक पद से शक्तियाँ छीनने के बजाय, संरचनात्मक सुधारों का ध्यान पारदर्शिता सुनिश्चित करने, सर्वोच्च न्यायालय तक प्रत्यक्ष अपील के मार्ग प्रदान करने तथा दल-बदल मामलों की पूरी प्रक्रिया को जनता के लिए पूर्णतः खुला और पारदर्शी बनाने पर होना चाहिए।
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