मिस्र में तमिल-ब्राह्मी अभिलेख

12 Feb 2026

संदर्भ

मिस्र की ‘वैली ऑफ द किंग्स’ में स्थित शवाधान स्थलों के भीतर लगभग 30 तमिल ब्राह्मी, प्राकृत और संस्कृत शिलालेखों की पहचान की गई है।

खोज के बारे में

  • स्थान: ये शिलालेख मिस्र के नील घाटी क्षेत्र में स्थित थीबन नेक्रोपोलिस के छह शवाधान स्थलों में पाए गए।
  • मुख्य खोज: शोधकर्ताओं ने शवाधान स्थल परिसरों के भीतर लगभग 30 नए प्रलेखित शिलालेखों की पहचान की है।

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  • लिपि और भाषा: ये शिलालेख तमिल ब्राह्मी के साथ-साथ प्राकृत और संस्कृत में लिखे गए हैं, जो भारतीय आगंतुकों की विविध उपस्थिति को दर्शाते हैं।
  • कालक्रम: इन शिलालेखों को प्रथम से तृतीय शताब्दी ईसवी के बीच का माना गया है, जो भारत–रोमन समुद्री व्यापार के चरम काल से संबंधित है।
  • शिलालेखों की प्रकृति
    • अधिकांश शिलालेख व्यक्तिगत नामों और लघु ‘ग्रैफिटी’ द्वारा निर्मित हैं, जो शवाधान स्थलों की दीवारों, गलियारों और प्रवेश द्वारों पर उत्खनित हुए हैं।
    • भारतीय आगंतुकों ने स्मारक चिह्न के रूप में शवाधान स्थलों के भीतर नाम लिखने की यूनानी परंपरा का पालन किया।

तमिल-ब्राह्मी लिपि के बारे में:

  • तमिल ब्राह्मी, ब्राह्मी लिपि का एक प्रारंभिक रूपांतर है, जिसका उपयोग प्राचीन तमिल लिखने के लिए किया जाता था।

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  • यह लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईसवी तक प्रचलन में थी।
  • प्रारंभिक स्थल: मंगुलम (तमिलनाडु)।
  • अन्य प्रमुख स्थल: पुगालूर, जाम्बई, कोडुमनाल और अरिकामेडु।

  • पहचाने गए नाम
    • सिकै कोऱ्ट्टन: सिकै कोऱ्ट्टन नाम पाँच शवाधान स्थलों में आठ बार दोहराया गया है, जो एक प्रमुख तमिल उपस्थिति का संकेत देता है।
      • ‘सिकै’ शब्द संस्कृत के ‘शिखा’ शब्द से जुड़ा है, जिसका अर्थ चोटी या मुकुट होता है।
      • ‘कोऱ्ट्टन’ शब्द तमिल ‘कोऱ्ट्टम’ (विजय या वध) से व्युत्पन्न है और देवी कोऱ्ट्टवई से संबंधित है।
      • ‘कोऱ्ट्टन’ नाम वर्ष 1995 में बेरेनाइक (लाल सागर का बंदरगाह नगर) में मिले एक मिट्टी के बर्तन के टुकड़े पर पाए गए ‘कोऱ्ट्टपुमान’ में भी मिलता है।
      • यह संगम साहित्य में भी मिलता है, जिसमें ‘पुरानानूरु’ में चेर राजा पिट्टांगोऱ्ट्टन के संदर्भ शामिल हैं।
      • इसी प्रकार के प्रमाण पुगालूर, जो प्राचीन चेर राजधानी थी, के शिलालेखों में भी मिलते हैं, जिनकी तिथि दूसरी या तीसरी शताब्दी ईसवी मानी जाती है।
    • कोपान
      • एक अन्य शिलालेख में “कोपान आया और देखा” (Kopāṉ came and saw) वाक्य दर्ज है, जो आगंतुक-शैली की भित्ति-लेखन परंपरा को दर्शाता है।
      • कोपान नाम तमिलनाडु के अम्मनकोविलपट्टी के शिलालेखों में भी पाया गया है, जो निरंतरता को दर्शाता है।
  • अन्य तमिल नाम: चातन और किरन जैसे नाम भी प्रलेखित किए गए हैं।

संगम काल के प्रमुख तमिल बंदरगाह

  • मुजिरिस (मुचिरी)
  • कोरकई
  • अरिकामेडु
  • कावेरीपट्टिनम (पुहार)

लाल सागर के तट पर स्थित मिस्र के महत्त्वपूर्ण बंदरगाह

  • बेरेनाइक
  • मायोस होर्मोस

  • व्यापार और गतिशीलता के संबंध
    • भारत–रोमन व्यापार नेटवर्क: ये शिलालेख लाल सागर और नील मार्गों के माध्यम से प्राचीन तमिलगम और रोमन साम्राज्य के बीच समुद्री व्यापार के प्रमाण को मजबूत करते हैं।
    • व्यापारी गतिशीलता: आगंतुक संभवतः व्यापारी, नाविक या मध्यस्थ थे, जो स्थापित वाणिज्यिक मार्गों पर यात्रा करते थे।
    • संगम संबंध: संगम साहित्य और चेर शिलालेखों से मिलते-जुलते नाम साहित्यिक और पुरातात्त्विक संबंधों को सुदृढ़ करते हैं।
  • ऐतिहासिक महत्त्व
    • सांस्कृतिक संपर्क: ये खोजें व्यापार से आगे बढ़कर सभ्यताओं के बीच संपर्क को दर्शाती हैं, जिनमें तीर्थ-जैसी यात्राएँ और सांस्कृतिक जिज्ञासा भी शामिल है।
    • भौगोलिक विस्तार: शोध का ध्यान लाल सागर पर स्थित बंदरगाहों से बढ़कर नील घाटी तक विस्तृत है, जिससे भारतीय गतिशीलता की स्थानिक समझ व्यापक हुई है।
    • तमिल समुद्री विरासत: ये खोजें मालाबार और कोरोमंडल तटों से जुड़े प्राचीन तमिल व्यापारियों की वैश्विक पहुँच की पुष्टि करती हैं।
    • अभिलेखीय महत्त्व: ये शिलालेख प्राचीन काल में भारतीयों के ‘फिरौनकालीन’ शवाधान स्थलों में भौतिक उपस्थिति का दुर्लभ प्राथमिक प्रमाण प्रदान करते हैं।

‘वैली ऑफ द किंग्स’ के बारे में

  • अवस्थिति: ‘वैली ऑफ द किंग्स’ ऊपरी मिस्र में नील नदी के पश्चिम में (आधुनिक लक्सर के पास) स्थित एक लंबी और सँकरी घाटी है।

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  • काल अवधि: यह 18वीं, 19वीं और 20वीं वंशों (1539–1075 ईसा पूर्व) के फिरऔनों का शवाधान स्थल रहा है।
  • यूनेस्को मान्यता: वर्ष 1979 में यूनेस्को ने इसे प्राचीन ‘थीब्स’ परिसर के अंतर्गत विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी।
  • शवाधान स्थल संबंधी स्थापत्य
    • शवाधान स्थल पर्वतीय चट्टानों को काटकर निर्मित किए गए थे और इनमें आमतौर पर ढलान युक्त गलियारे होते थे।
    • इन गलियारों में लुटेरों को भ्रमित और रोकने के लिए गहरे मोड़ बनाए जाते थे।
    • इस स्थापत्य में स्तंभयुक्त सभागार, वेस्टीब्यूल, भंडारण कक्ष और पत्थर के ताबूत वाला शवाधान कक्ष शामिल होता था।
  • प्रमुख शवाधान स्थल
    • राजाओं के अलावा, घाटी में रानियों, उच्च पदस्थ अधिकारियों और रामेसेस द्वितीय के कई पुत्रों के शवाधान स्थल भी हैं।
    • सबसे लंबा शवाधान स्थल (शवाधान स्थल संख्या 20) रानी हत्शेपसुत का है, जो लगभग 700 फीट तक चट्टान में विस्तृत है।
    • सबसे बड़ा और जटिल शवाधान स्थल (शवाधान स्थल संख्या 5) रामेसेस द्वितीय के अनेक पुत्रों के लिए निर्मित किए गए थे, जिसमें दो स्तरों पर दर्जनों कक्ष निर्मित हैं।

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