संदर्भ
केंद्रीय बजट 2026–27 में मजबूत देखभाल पारितंत्र के निर्माण का प्रस्ताव रखा गया है। इसके अंतर्गत राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढाँचा के तहत जेरियाट्रिक देखभाल (वृद्धजन देखभाल), मूलभूत देखभाल तथा संबद्ध कौशलों में 1.5 लाख बहु-कौशलयुक्त देखभालकर्ताओं को प्रशिक्षित करने की योजना है।
संबंधित तथ्य
- हालाँकि यह प्रस्ताव 50 लाख से अधिक महिला कार्यकर्ताओं की स्थिति को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं करता, जिनमें आशा कार्यकर्ता और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता शामिल हैं। ये कार्यकर्ता भारत की कल्याणकारी प्रणाली को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, फिर भी उन्हें औपचारिक कर्मचारी के बजाय अभी भी “स्वयंसेवक” के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढाँचा (NSQF) के बारे में
- परिभाषा: राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढाँचा एक क्षमता आधारित ढाँचा है, जो योग्यता को ज्ञान, कौशल और अभिरुचि के स्तरों के आधार पर व्यवस्थित करता है।
- प्रारंभ: इसे भारत सरकार द्वारा वर्ष 2013 में अधिसूचित किया गया था, ताकि व्यावसायिक शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण और औपचारिक शिक्षा को एक एकीकृत राष्ट्रीय संरचना में समाहित किया जा सके।
- संरचना: इस ढाँचे में 10 स्तर शामिल हैं, जो मूलभूत कौशल प्रमाणन से लेकर उन्नत व्यावसायिक दक्षताओं तक विस्तृत हैं। यह व्यवस्था शिक्षा और प्रशिक्षण के विभिन्न मार्गों के बीच ऊर्ध्वाधर तथा क्षैतिज गतिशीलता को संभव बनाती है।
- संस्थागत तंत्र: इसे राष्ट्रीय कौशल विकास अभिकरण द्वारा लागू किया जाता है, जो कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है।
- मुख्य उद्देश्य: कौशलों का मानकीकरण सुनिश्चित करना, पूर्व अर्जित अधिगम की मान्यता को बढ़ावा देना तथा राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त योग्यताओं के माध्यम से रोजगार योग्यता को बढ़ाना।
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केयर इकॉनोमी के बारे में
- परिभाषा: केयर इकनोमी में वे आर्थिक गतिविधियाँ और सेवाएँ शामिल होती हैं, जो व्यक्तियों की शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करती हैं। इसमें विशेष रूप से बच्चे, वृद्धजन, बीमार व्यक्ति और दिव्यांगजन शामिल होते हैं। वर्तमान समय में इसे मानव विकास और सामाजिक सुरक्षा के एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ के रूप में मान्यता दी जा रही है।
- भुगतान आधारित देखभाल कार्य: इसमें वे औपचारिक सेवाएँ शामिल होती हैं, जिनके लिए वेतन या पारिश्रमिक दिया जाता है। उदाहरण के लिए चिकित्सक, नर्स, देखभालकर्ता, बाल देखभाल प्रदाता और घरेलू कामगार द्वारा स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण क्षेत्रों में प्रदान की जाने वाली सेवाएँ।
- गैर-भुगतान आधारित देखभाल कार्य: यह उन गैर-वेतनभोगी देखभाल और घरेलू कार्यों को दर्शाता है, जो प्रायः महिलाओं द्वारा परिवारों के भीतर किए जाते हैं, जैसे- बाल देखभाल, वृद्धजन देखभाल, भोजन बनाना और घर का प्रबंधन। ये कार्य सामान्यतः सकल घरेलू उत्पाद की गणना और राष्ट्रीय लेखा प्रणालियों में पर्याप्त रूप से परिलक्षित नहीं होते।
- देखभाल संबंधी सेवाओं का भारतीय मॉडल: भारत में ऐतिहासिक रूप से समुदाय आधारित “स्वयंसेवक मॉडल” के माध्यम से कल्याणकारी सेवाएँ प्रदान की जाती रही हैं। इसके अंतर्गत मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता तथा आंगनवाड़ी कार्यकर्ता जैसी कर्मी एकीकृत बाल विकास सेवा और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन जैसे कार्यक्रमों के तहत कार्य करती हैं।
- हालाँकि इस व्यवस्था ने कम वित्तीय व्यय में बड़े पैमाने पर जमीनी स्तर पर सेवा वितरण को संभव बनाया है, लेकिन इसके परिणामस्वरूप देखभाल श्रम का अवमूल्यन और अनौपचारीकरण भी संस्थागत रूप से स्थापित हो गया है, क्योंकि इसे पेशेवर कार्य के बजाय सामाजिक कर्तव्य के रूप में देखा गया है।
| पक्ष |
आशा कार्यकर्ता |
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता |
| कार्यक्रम |
मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता कार्यक्रम। |
एकीकृत बाल विकास सेवा। |
| प्रारंभ और मंत्रालय |
वर्ष 2005 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत प्रारंभ। |
वर्ष 1975 में महिला और बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत प्रारंभ। |
| मुख्य भूमिका |
सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली और ग्रामीण समुदायों के बीच संपर्क स्थापित करना। |
पोषण सेवाएँ, प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और पूर्व-प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना। |
| मुख्य कार्य |
टीकाकरण को बढ़ावा देना, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं का समर्थन करना, संस्थागत प्रसव को प्रोत्साहित करना तथा स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता फैलाना। |
पूरक पोषण प्रदान करना, बच्चों की वृद्धि की निगरानी करना, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा देना तथा टीकाकरण कार्यक्रमों में सहयोग करना। |
| लक्षित लाभार्थी |
गर्भवती महिलाएँ, नवजात शिशु, बच्चे और ग्रामीण परिवार। |
0 से 6 वर्ष तक के बच्चे, गर्भवती महिलाएँ और स्तनपान कराने वाली माताएँ। |
| रोजगार की प्रकृति |
स्वयंसेवी कार्यकर्ता के रूप में माना जाता है और प्रोत्साहन राशि या मानदेय प्राप्त होता है। |
मानद कार्यकर्ता के रूप में माना जाता है और मानदेय प्राप्त होता है। |
| महत्त्व |
स्वास्थ्य सेवाओं की अंतिम स्तर तक पहुँच सुनिश्चित करना। |
बाल पोषण और प्रारंभिक बाल्यावस्था विकास कार्यक्रमों की आधारशिला |
महिला श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) के बारे में
- संदर्भ: महिला श्रम बल भागीदारी दर उस अनुपात को मापती है, जिसमें यह देखा जाता है कि किसी निर्धारित जनसंख्या में कितनी महिलाएँ रोज़गार में लगी हुई हैं या सक्रिय रूप से रोजगार की तलाश कर रही हैं।
- ऐतिहासिक रूप से, भारत की महिला श्रम बल भागीदारी दर में वर्ष 2004–05 के बाद से लगातार गिरावट देखी गई थी। हालाँकि, हाल के वर्षों में इसमें एक महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक परिवर्तन देखने को मिला है।
- हाल के आँकड़े और प्रवृत्तियाँ: आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के नवीनतम मासिक बुलेटिन तथा आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 के अनुसार:-
- राष्ट्रीय महिला श्रम बल भागीदारी दर: जनवरी 2026 तक महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर 35.1 प्रतिशत है (15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग के लिए)।
- ग्रामीण बनाम शहरी: ग्रामीण महिला श्रम बल भागीदारी दर 39.7 प्रतिशत (जो मुख्य रूप से कृषि कार्यों में भागीदारी के कारण है)।
- शहरी महिला श्रम बल भागीदारी दर: 25.5 प्रतिशत (जो शहरी क्षेत्रों में बने हुए अंतर को दर्शाती है)।
- ऐतिहासिक उछाल: जहाँ वर्ष 2017–18 में यह भागीदारी केवल 23.3 प्रतिशत थी, वहीं यह बढ़कर 2022–23 में 37.0 प्रतिशत हो गई और दिसंबर 2025 में 35.3 प्रतिशत का वार्षिक उच्च स्तर दर्ज किया गया।
- कृषि क्षेत्र का महिलाओं की ओर बढ़ता झुकाव: महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि मुख्य रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में हुए परिवर्तन से जुड़ी हुई है।
- कृषि क्षेत्र में हिस्सेदारी: आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2022–23 तथा वर्ष 2025 की प्रवृत्तियों के अनुसार, कृषि क्षेत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और अब कार्यरत महिलाओं में से 64 प्रतिशत से अधिक महिलाएँ इस क्षेत्र में कार्यरत हैं।
- स्व-रोजगार: यह वृद्धि मुख्य रूप से स्व-रोजगार से प्रेरित है (जैसे स्वयं का कार्य करने वाली या पारिवारिक उद्यमों में सहयोग करने वाली), जो ग्रामीण महिलाओं के रोजगार का लगभग 63.2 प्रतिशत हिस्सा है।
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भारत में केयर इकनोमी से संबंधित प्रमुख आँकड़े
- समय उपयोग में असमानता: राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा किए गए वर्ष 2024 के समय उपयोग सर्वेक्षण के अनुसार, 15–59 वर्ष आयु वर्ग की भारतीय महिलाएँ प्रतिदिन औसतन 140 मिनट बिना वेतन वाले देखभाल कार्यों में व्यतीत करती हैं, जबकि इसी आयु वर्ग के पुरुष केवल 74 मिनट का योगदान देते हैं।

- कार्यबल का आकार: भारत के अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रमों का संचालन लगभग 10.4 लाख आशा कार्यकर्ताओं और 25 लाख से अधिक आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं तथा सहायिकाओं द्वारा किया जाता है।
- आर्थिक योगदान: शोध से संकेत मिलता है कि यदि बिना वेतन वाले देखभाल कार्य को न्यूनतम मजदूरी के आधार पर आर्थिक मूल्य दिया जाए, तो यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 15 प्रतिशत से 20 प्रतिशत तक योगदान कर सकता है।
बिना वेतन वाले घरेलू कार्यों के आर्थिक मूल्य का अनुमान लगाने की विधियाँ
- अवसर लागत विधि (GOC): इस दृष्टिकोण में बिना वेतन वाले श्रम का मूल्य इस आधार पर निकाला जाता है कि जब व्यक्ति बिना वेतन वाले घरेलू कार्यों में समय लगाते हैं, तो वे भुगतान वाले कार्यों से मिलने वाले संभावित आर्थिक लाभ का त्याग करते हैं।
- अर्थात् यह अनुमान लगाया जाता है कि यदि वे उसी समय को भुगतान वाले कार्य में लगाते, तो वे कितना कमा सकते थे।
- प्रतिस्थापन लागत विधि (RCM): इस विधि में यह गणना की जाती है कि यदि घरेलू बिना वेतन वाले कार्यों को करने के लिए किसी व्यक्ति को नियुक्त करना पड़े, तो उस पर कितना खर्च आएगा।
- इस प्रकार समाज को उन कार्यों के लिए कितना व्यय करना पड़ेगा, यदि वे कार्य भुगतान प्राप्त करने वाले श्रमिकों द्वारा किए जाएँ।
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सशक्त केयर इकनोमी की आवश्यकता
- जनसांख्यिकीय परिवर्तन: भारत में वृद्ध जनसंख्या में वृद्धि देखी जा रही है। पारंपरिक संयुक्त परिवार व्यवस्था के स्थान पर एकल परिवारों के बढ़ने के साथ ही वृद्धजनों की विशेष देखभाल प्रदान करने के लिए एक औपचारिक केयर इकनोमी आवश्यक हो जाती है।
- वर्तमान में भारत की लगभग 12 प्रतिशत जनसंख्या वृद्धजनों की है, जो वर्ष 2050 तक बढ़कर लगभग 319 मिलियन होने का अनुमान है।
- महिला श्रम बल भागीदारी को बढ़ावा देना: यदि राज्य द्वारा सस्ती और संस्थागत बाल देखभाल सेवाएँ उपलब्ध कराई जाएँ, तो महिलाओं पर पड़ने वाला घरेलू कार्य का दोहरा बोझ कम हो सकता है। इससे महिलाएँ औपचारिक कार्यबल में शामिल हो सकेंगी, जो राष्ट्रीय आर्थिक विकास के लिए महत्त्वपूर्ण है।
- मानव पूँजी में निवेश: प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा में उच्च गुणवत्ता वाला हस्तक्षेप यह सुनिश्चित करता है कि अगली पीढ़ी अधिक स्वस्थ और अधिक उत्पादक बने। इससे दीर्घकालिक राष्ट्रीय विकास और अधिक सक्षम कार्यबल का निर्माण होता है।
भारत की केयर इकनोमी का कानूनी और नीतिगत ढाँचा
भारत में केयर इकनोमी का संचालन संविधान पर आधारित, श्रम कानूनों द्वारा समर्थित तथा वृहद सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के माध्यम से लागू किया जाता है। ये प्रावधान सुनिश्चित करते हैं कि देखभाल कार्य केवल निजी जिम्मेदारी न होकर सार्वजनिक प्राथमिकता भी हो।
- संवैधानिक आधार: संविधान “मूल कानून” के रूप में कार्य करता है, यह सुनिश्चित करता है कि महिलाएँ और देखभाल कर्मचारी न्यायपूर्ण और गरिमापूर्ण व्यवहार के अधिकारी हों।
- समानता का अधिकार (अनुच्छेद-14 और 15): ये अनुच्छेद अनुचित व्यवहार से सुरक्षा प्रदान करते हैं। अनुच्छेद-14 यह सुनिश्चित करता है कि कानून सभी को कार्यस्थल पर समान रूप से देखे, जबकि अनुच्छेद-15 किसी को केवल लिंग के कारण नौकरी से वंचित नहीं रख सकता।
- नौकरियों में समान अवसर (अनुच्छेद-16): यह सुनिश्चित करता है कि महिलाओं को सरकारी रोजगार खोजने, पदोन्नति प्राप्त करने और कार्य लाभ प्राप्त करने का समान अधिकार हो।
- निर्देशात्मक सिद्धांत (अनुच्छेद-39): ये लक्ष्य हैं, जिन्हें सरकार को पालन करना चाहिए:
- समान आजीविका (39a): पुरुष और महिलाओं को आजीविका कमाने का न्यायसंगत तरीका मिलना चाहिए।
- समान वेतन (39d): यह “समान कार्य के लिए समान वेतन” नियम है, जो लैंगिक आधारित वेतन अंतराल को कम करने के लिए आवश्यक है।
- स्वास्थ्य और सुरक्षा (39e): राज्य को कर्मचारियों के स्वास्थ्य की रक्षा करनी चाहिए और गरीबी के कारण किसी को खतरनाक कार्य करने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए।
- कार्यस्थल कल्याण (अनुच्छेद-42): यह राज्य को आवश्यक बनाता है कि वह मानवीय कार्य परिस्थितियाँ और गर्भवती कर्मचारियों के लिए मातृत्व राहत प्रदान करे।
- कर्मचारी सुरक्षा के लिए श्रम कानून: ये कानून औपचारिक देखभाल क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए कानूनी शक्ति प्रदान करते हैं।
- मातृत्व लाभ अधिनियम (2017): यह कानून महिलाओं को उनके पहले दो बच्चों के लिए 26 सप्ताह का वेतनयुक्त अवकाश प्रदान करता है। यदि नौकरी अनुमति देती है तो “वर्क फ्रॉम होम” विकल्प भी शामिल है।
- सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020): यह नया कानून असंगठित क्षेत्र की मदद के लिए बनाया गया है। यह गिग वर्कर्स और घर आधारित कर्मचारियों (जैसे घरेलू मदद) को पहली बार बीमा और मातृत्व लाभ सुरक्षा में लाता है।
- फ्रंटलाइन देखभाल के लिए संस्थागत ढाँचे: भारतीय मॉडल एक विशाल नेटवर्क पर निर्भर करता है, जो देखभाल सीधे घर तक पहुँचाता है।
- एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS): यह आंगनवाड़ी प्रणाली का प्रबंधन करता है। ये कर्मचारी ग्रामीण भारत में बाल पोषण और प्रारंभिक शिक्षा के मुख्य प्रदाता हैं।
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM): यह ASHA कर्मचारियों को सशक्त बनाता है। हालाँकि इन्हें ‘स्वयंसेवक’ कहा जाता है, वे ग्रामीण क्षेत्रों में मातृत्व और नवजात स्वास्थ्य देखभाल के मुख्य प्रदाता हैं।
- मिशन शक्ति (पालना योजना): यह योजना कार्यरत माताओं को उनके बच्चों के लिए सुरक्षित स्थान प्रदान करके क्रेच (डे-केयर केंद्र) स्थापित करती है।
- वृद्ध और विकलांग व्यक्तियों के अधिकार: विशेष कानून सुनिश्चित करते हैं कि समाज के सबसे कमजोर सदस्यों को उचित देखभाल मिले।
- वरिष्ठ नागरिक अधिनियम (2007): यह बच्चों के लिए उनके माता-पिता की देखभाल करना कानूनी कर्तव्य बनाता है। यह सरकार को प्रत्येक जिले में वृद्धाश्रम बनाने का निर्देश भी देता है।
- विकलांग व्यक्ति अधिकार अधिनियम (2016): इसने ध्यान “दान” से “अधिकार” की ओर स्थानांतरित किया। यह 21 प्रकार की विकलांगताओं को कवर करता है और समान अवसर और पहुँच (जैसे सार्वजनिक भवनों में रैम्प) सुनिश्चित करता है।
- विकसित होती नीति: सरकार अब देखभाल कार्य के वास्तविक आर्थिक मूल्य को मापने की दिशा में अग्रसर है।
- टाइम यूज सर्वेक्षण (TUS): यह राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय (NSO) द्वारा आयोजित किया जाता है, जो महिलाओं द्वारा बिना वेतन किए गए कार्यों में बिताए गए घंटे को ट्रैक करता है।
- यह डेटा यह साबित करने के लिए उपयोग किया जाता है कि देखभाल कार्य भारत के GDP में लगभग 15% से 20% का योगदान करता है और इसे आधिकारिक राष्ट्रीय खातों का हिस्सा होना चाहिए।
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सामना करने वाली चुनौतियाँ और चिंताएँ
- ‘स्वयंसेवक’ विरोधाभास और श्रम अन्याय: भारत की कल्याण संरचना एक विशाल कार्यबल पर निर्भर है, जो कानूनी रूप से “अदृश्य” है।
- स्थिति बनाम कौशल: लगभग 3.5 मिलियन ASHA और आंगनवाड़ी कर्मचारी “स्वयंसेवक” या “मानद कर्मचारी” के रूप में वर्गीकृत हैं।
- यह लेबल उनके उच्च कौशल वाले चिकित्सा और शैक्षिक कार्य को “सामाजिक सेवा” के रूप में नजरअंदाज करता है, जिससे उन्हें औपचारिक कर्मचारियों के रूप में मान्यता नहीं मिलती।
- मानद वेतन अंतर: कानूनी न्यूनतम वेतन के बजाय ये कर्मचारी छोटे “मानदेय” प्राप्त करते हैं।
- वर्ष 2024–25 में विरोध प्रदर्शनों से पता चला कि कई ASHA कर्मचारी केवल ₹2,000–₹3,500 मासिक स्थिर प्रोत्साहन के रूप में कमाते हैं, जो जीवनयापन की लागत से बहुत कम है।
- सुरक्षा घाटा: चूँकि वे “कर्मचारी” नहीं हैं, इसलिए उन्हें EPF, वेतनभोगी मातृत्व अवकाश और पेंशन योजनाओं से बाहर रखा जाता है, जिससे वृद्धावस्था में वित्तीय असुरक्षा बनी रहती है।
- अदृश्यता और “देखभाल दंड”: देखभाल कार्य अक्सर आर्थिक योजना में गिना नहीं जाता क्योंकि यह सीधे बिल या रसीद उत्पन्न नहीं करता।
- GDP से बहिष्कार: एक गृहिणी जो प्रतिदिन 10–12 घंटे काम करती है, राष्ट्रीय स्थिरता और मानव पूँजी में योगदान करती है, फिर भी यह श्रम GDP गणना में शामिल नहीं है।
- लैंगिक समय गरीबी: वर्ष 2019 के टाइम यूज़ सर्वे के अनुसार, भारतीय महिलाएँ अपने दिन का 16.4% बिना वेतन वाले घरेलू काम में बिताती हैं, जबकि पुरुष केवल 1.7% समय देते हैं।
- यह अंतर ‘टाइम पाॅवर्टी’ उत्पन्न करता है, जहाँ महिलाओं के पास आत्म-देखभाल, शिक्षा या कॅरियर विकास के लिए समय नहीं बचता।
- सामाजिक मान्यताएँ: देखभाल को अक्सर “प्राकृतिक महिला गुण” के रूप में देखा जाता है, न कि तकनीकी पेशा के रूप में। इससे “देखभाल दंड” उत्पन्न होता है,
- जहाँ पेशेवर देखभाल भूमिकाएँ भी कम वेतन वाली होती हैं क्योंकि उन्हें घरेलू कार्यों का विस्तार माना जाता है।
- अवसंरचना और निवेश में अंतर: भौतिक देखभाल सुविधाओं की कमी बोझ को फिर से व्यक्तिगत घर पर डाल देती है।
- बाल देखभाल संकट: अपर्याप्त क्रेच और अधिक बोझ वाले आंगनवाड़ी केंद्र कई महिलाओं को महिला श्रम बल भागीदारी (FLFP) से बाहर होने के लिए मजबूर करते हैं।
- वृद्ध होती आबादी: भारत की जनसांख्यिकीय संरचना में परिवर्तन का आशय है कि वर्ष 2030 तक वरिष्ठ नागरिकों और वृद्धावस्था अवसंरचना में $4.8–$8.4 बिलियन निवेश की आवश्यकता होगी।
- मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा: मानसिक स्वास्थ्य अवसंरचना में लगातार निवेश की कमी सामान्य कार्यबल उत्पादकता और सामाजिक लचीलापन को कमजोर करती है।
- नीति असंगति और माप की कमी: नई सरकारी लक्ष्यों और मौजूदा कर्मचारियों के व्यवहार में असंगति मौजूद है।
- कौशल अंतर: जबकि केंद्रीय बजट 2026-27 नए देखभाल कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने पर ध्यान केंद्रित करता है, यह मौजूदा कर्मचारियों (जैसे ASHA) के लिए NSQF प्रमाणन और उच्च वेतन पाने के लिए “ब्रिज कोर्स” या मार्ग प्रदान करने में विफल रहता है।
- डेटा की दुर्लभता: जबकि टाइम यूज सर्वे उपलब्धि था, इस तरह का डेटा संग्रह अनियमित है। बिना नियमित, लैंगिक-वर्गीकृत डेटा के, देखभाल कार्य आर्थिक योजना में “ब्लाइंड स्पॉट” बना रहता है।
- राजकोषीय उपेक्षा: हालाँकि वित्त वर्ष 2025–26 में जेंडर बजट 8.86% तक बढ़ा, आलोचकों का कहना है कि यह नए लक्षित खर्च के कारण नहीं, बल्कि पुराने योजनाओं के बेहतर “पुनःवर्गीकरण” के कारण है, न कि पर्पल इकॉनोमी पर किए गए नए खर्च के कारण।।
- कानूनी शून्यता: भारत वर्तमान में एक समर्पित राष्ट्रीय नीति का अभाव है, जो देखभाल को सार्वजनिक वस्तु के रूप में मानती हो।
- न्यायिक मान्यता बनाम विधायी मौन: उच्च न्यायालयों (जैसे-मद्रास और दिल्ली) ने गृहिणी के गैर-आर्थिक योगदान को परिवार की संपत्ति के लिए महत्त्वपूर्ण मानना शुरू किया है।
- कन्नैयन नायडू बनाम कमसाला अम्मल (2023) में, अदालत ने माना कि घरेलू श्रम महिलाओं को संपत्ति में समान भाग का अधिकार देता है।
- कानूनों की कमी: इन न्यायिक निर्णयों के बावजूद, कोई संघीय कानून नहीं है, जो बिना वेतन वाले देखभाल कर्मचारियों के लिए सामाजिक सुरक्षा या पेंशन अनिवार्य करे।
रोजगार लाभ की तुलना: औपचारिक क्षेत्र बनाम ‘स्वयंसेवी’ देखभाल कार्यकर्ता
| विशेषता |
औपचारिक क्षेत्र का कर्मचारी (जैसे, नर्स/शिक्षक) |
‘स्वयंसेवी’ देखभाल कार्यकर्ता (ASHA/आंगनवाड़ी) |
| कानूनी स्थिति |
श्रम कानूनों के तहत ‘कर्मचारी’ के रूप में मान्यता प्राप्त। |
‘सम्मानित’ या ‘स्वयंसेवी’ के रूप में वर्गीकृत। |
| मुख्य वेतन |
निश्चित मासिक वेतन (न्यूनतम वेतन से ऊपर)। |
मानधन (अक्सर न्यूनतम वेतन से कम)। |
| सेवा की निरंतरता |
स्थायी या निश्चित अवधि के अनुबंध। |
इच्छा अनुसार या अस्थायी प्रकृति (हालाँकि कार्य स्थायी)। |
| मातृत्व लाभ |
26 सप्ताह का वेतनयुक्त अवकाश (मातृत्व लाभ अधिनियम)। |
कोई एकरूप नीति नहीं; राज्य-विशिष्ट दया पर निर्भर। |
| सेवानिवृत्ति |
भविष्य निधि (PF) और ग्रेच्युटी। |
कोई औपचारिक पेंशन नहीं; केवल स्वैच्छिक योगदान योजनाएँ। |
| कार्य समय |
8 घंटे की निर्धारित शिफ्टें और ओवरटाइम वेतन। |
अनिर्धारित घंटे; आपातकाल में अक्सर 24/7 उपलब्ध। |
| कॅरियर वृद्धि |
स्पष्ट पदोन्नति और वेतन वृद्धि। |
कार्य स्थिर लेकिन कोई औपचारिक पदोन्नति मार्ग नहीं। |
भारत द्वारा किए गए प्रयास
- राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढाँचा (NSQF): सरकार वर्तमान में देखभाल कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण को राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप कर रही है, ताकि इस क्षेत्र को मानकीकृत और पेशेवर बनाया जा सके।
- मिशन शक्ति (पालना योजना): इस पहल का उद्देश्य अंगनवाड़ी-सहित डे-केयर केंद्र स्थापित करना है, ताकि बच्चों के लिए सुरक्षित, राज्य-समर्थित वातावरण उपलब्ध हो और माताएँ औपचारिक रोजगार में भाग ले सकें।
- प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन (PM-SYM): यह एक स्वैच्छिक और योगदान आधारित पेंशन योजना है, जिसका उद्देश्य असंगठित श्रमिकों, जिनमें देखभाल क्षेत्र के कर्मचारी भी शामिल हैं, के लिए वृद्धावस्था सुरक्षा प्रदान करना है।
- आयुष्मान भारत विस्तार: सरकार ने हाल ही में प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) के तहत सभी ASHA कार्यकर्ताओं, अंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायकों को स्वास्थ्य बीमा कवरेज का विस्तार किया है।
वैश्विक रूप से श्रेष्ठ प्रथाएँ एवं अंतरराष्ट्रीय पहल

- वैश्विक फाउंडेशन – बीजिंग प्लेटफॉर्म फॉर एक्शन (1995): यह पहला प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समझौता था जिसने बिना भुगतान किए गए घरेलू कार्य को गंभीर आर्थिक मुद्दा बताया।
- कार्य को दृश्य बनाना: इसने देशों को प्रेरित किया कि वे टाइम-यूज सर्वेक्षणों का उपयोग करके यह ट्रैक करें कि महिलाएँ घर पर कितनी मुफ्त श्रम करती हैं।
- भार साझा करना: इसने विचार प्रस्तुत किया कि देखभाल केवल “महिला का काम” नहीं होना चाहिए। बल्कि इसे पुरुष और महिला दोनों के बीच साझा किया जाना चाहिए, और इसे सरकार एवं बाजार द्वारा समर्थित किया जाना चाहिए।
- अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) मानक: ILO देखभाल कार्य को पेशेवर और उत्पादक गतिविधि मानता है, जिसे कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए।
- ‘5R’ रोडमैप: यह केयर इकनोमी को सुधारने का सर्वोत्तम मार्गदर्शन है:
- मान्यता (Recognize): राष्ट्रीय सांख्यिकी में बिना भुगतान किए गए कार्य को गिनें।
- कम करना (Reduce): तकनीक और अवसंरचना का उपयोग करके घरेलू कार्य आसान बनाएँ।
- पुनर्वितरण (Redistribute): भार महिलाओं से राज्य और पुरुषों की ओर स्थानांतरित करें।
- पुरस्कार (Reward): पेशेवर देखभाल कार्यकर्ताओं के लिए उचित वेतन और लाभ सुनिश्चित करें।
- प्रतिनिधित्व (Represent): देखभाल कार्यकर्ताओं को यूनियनों में शामिल होने और अपनी आवाज उठाने का अवसर दें।
- अभिसमय संख्या 156 (परिवारिक जिम्मेदारियाँ): यह कामगारों को केवल इसलिए निकालने या खराब व्यवहार करने से रोकता है, क्योंकि उन्हें बच्चे या बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करनी है।
- अभिसमय संख्या 183 (गर्भावस्था सुरक्षा): यह सुनिश्चित करता है कि गर्भवती कार्यकर्ताओं को छुट्टी, स्वास्थ्य सेवा और नौकरी की सुरक्षा मिले। यह सिखाता है कि अगली पीढ़ी का पालन-पोषण केवल निजी समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
- संयुक्त राष्ट्र (UN) पहल: UN केयर इकनोमी को लैंगिक समानता और आर्थिक विकास के लिए एक पुल के रूप में देखता है।
- सतत् विकास लक्ष्य (SDGs)
- SDG 5.4: बिना भुगतान किए गए कार्य का मूल्यांकन बेहतर सार्वजनिक सेवाओं और सामाजिक कानूनों के माध्यम से किया जाए।
- SDG 8 & 10: देखभाल क्षेत्र में “उचित रोजगार” सृजित करना और “देखभाल गरीबी” से उत्पन्न अमीर और गरीब के बीच अंतर को कम करना।
- महिला सशक्तीकरण पैनल: इस समूह ने पहचाना कि बिना भुगतान किए गए श्रम महिलाओं को कार्यबल में शामिल होने से रोकने वाली प्रमुख बाधा है। उन्होंने सुझाव दिया कि देखभाल सेवाओं पर खर्च करना किसी भी देश के लिए स्मार्ट विकास रणनीति है।
- UN Women: यह देखभाल-संवेदनशील बजटिंग का समर्थन करता है, जिसका अर्थ है कि सरकार विशेष रूप से नर्सरी और बुजुर्ग केंद्रों जैसी चीजों के लिए धन आरक्षित करे।
- सफल वैश्विक मॉडल: विभिन्न देश अपनी देखभाल आवश्यकताओं को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिए अलग-अलग मॉडल अपनाते हैं।
- नॉर्डिक मॉडल (नॉर्वे और डेनमार्क): इन देशों में देखभाल को सार्वजनिक वस्तु की तरह माना जाता है, जैसे स्वच्छ जल या सड़कें।
- वे टैक्स राशि का उपयोग करके सभी के लिए उच्च गुणवत्ता वाली बाल देखभाल और बुजुर्ग देखभाल प्रदान करते हैं। इसका परिणाम विश्व में सबसे अधिक महिला रोजगार दर के रूप में सामने आता है।
- फ्रेंच “वाउचर” सिस्टम (CESU): फ्रांस में CESU नामक प्रणाली का उपयोग किया जाता है, जो परिवारों के लिए घरेलू सहायकों को नियुक्त करना आसान बनाती है।
- सरकार इन वाउचरों का ट्रैक रखती है ताकि कार्यकर्ताओं को पेंशन और स्वास्थ्य बीमा मिले, जिससे “अनौपचारिक” या छुपा हुआ श्रम समस्या से बचा जा सके।
वैश्विक देखभाल शृंखला (Global Care Chain)
- वैश्विक देखभाल शृंखला एक ऐसा तंत्र है, जिसमें देखभाल की जिम्मेदारियाँ एक महिला से दूसरी महिला को हस्तांतरित होती हैं, अक्सर सीमाओं को पार करते हुए और विभिन्न सामाजिक-आर्थिक स्तरों में फैली होती हैं।
- यह घटना तब उभरती है, जब अधिक सुविधा प्राप्त समुदायों की महिलाएँ कार्यबल में शामिल होती हैं, जिससे एक “देखभाल संबंधी अंतराल” उत्पन्न होप्ता है, जिसे प्रायः प्रवासी महिलाएँ और हाशिए पर रहने वाली महिलाएँ भरती हैं।
- परिणामस्वरूप, सामाजिक-आर्थिक स्तर की सबसे निचली महिलाओं की स्थिति सबसे असुरक्षित होती है और वे शृंखला के सबसे नीचे रह जाती हैं।
SDG 5 – लैंगिक समानता
- संयुक्त राष्ट्र का सतत् विकास लक्ष्य 5 (SDG 5) लैंगिक समानता और महिलाओं के सशक्तीकरण को प्राप्त करने का लक्ष्य रखता है।
- लक्ष्य 5.4 वर्ष 2030 तक विशेष रूप से बिना भुगतान किए गए देखभाल और घरेलू कार्य की मान्यता और मूल्यांकन के लिए सार्वजनिक सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा और सहायक नीतियों के माध्यम से इसे सुनिश्चित करता है, साथ ही घर के कार्यों को साझा करने को बढ़ावा देता है, विशेष रूप से निम्न और मध्यम आय वाले देशों में।
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आगे की राह
- औपचारिक मान्यता और पेशेवर गरिमा: पहला कदम यह है कि पेशेवर स्वास्थ्य और पोषण सेवाओं को “स्वयंसेवा” कहकर उपेक्षित नहीं किया जाए। इन कार्यों को पूर्ण रूप से पेशेवर और कानूनी मान्यता दी जानी चाहिए।
- ‘सम्मान राशि’ से वेतन तक: वर्तमान में कर्मचारियों को दिए जाने वाले छोटे-छोटे “धन्यवाद” भुगतान को राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन (National Floor Minimum Wage) से बदलना आवश्यक है। यह सुनिश्चित करेगा कि हर कार्यकर्ता अपनी जीवन यापन आवश्यकताओं को पूरा कर सके।
- कानूनी कर्मचारी स्थिति: फ्रंटलाइन स्टाफ को स्थायी कर्मचारी बनाया जाना चाहिए।
- यह आवश्यकता 2025 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय (धरम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) द्वारा भी समर्थित है, जिसमें कहा गया कि यदि सरकार को कोई कार्य निरंतर करना है तो किसी कर्मचारी को हमेशा “अस्थायी” नहीं रखा जा सकता।
- अदृश्य कार्य की गणना: सरकारों को टाइम-यूज सर्वेक्षण और “सैटेलाइट अकाउंट्स” का उपयोग कर बिना वेतन वाले घरेलू कार्यों का आर्थिक मूल्यांकन करना चाहिए। जैसा कि बीजिंग प्लेटफॉर्म फॉर एक्शन में सुझाव दिया गया है, “यदि आप इसे नहीं मापेंगे, तो आप इसके लिए बजट नहीं बना सकते।”
- कौशल विकास और कॅरियर वृद्धि: केवल नए कर्मचारियों की भर्ती करने के बजाय, मौजूदा लाखों महिलाओं की मदद करनी चाहिए, जो पहले से ही यह कार्य कर रही हैं, ताकि उन्हें उन्नति और विशेषज्ञ भूमिकाओं में स्थान मिल सके।
- “ब्रिज” दृष्टिकोण: वर्तमान ASHA और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए ब्रिज कोर्स और पूर्व शिक्षा की मान्यता (Recognition of Prior Learning – RPL) प्रमाण-पत्र उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
- यह उनके वर्षों के अनुभव को पेशेवर योग्यता के रूप में मान्यता देता है और उन्हें उच्च वेतन वाले विशिष्ट कार्यों में जाने का अवसर प्रदान करता है।
- कॅरियर संरचना (Mobility): स्पष्ट “कॅरियर सीढ़ी” बनाकर, एक सीमित और बंद-समाप्ति स्वयंसेवक भूमिका को जीवनपर्यंत पेशेवर कॅरियर में बदला जा सकता है।
- देखभाल को कठोर अवसंरचना मानना: हमें देखभाल पर होने वाले खर्च को कल्याण कार्यक्रम के रूप में नहीं बल्कि आर्थिक निवेश के रूप में देखना चाहिए।
- मुख्य अवसंरचना: बाल देखभाल केंद्र, वृद्ध देखभाल और विकलांग सहायता के लिए वित्त पोषण उसी प्राथमिकता के साथ किया जाना चाहिए, जैसे हम सड़कें, पुल या ऊर्जा परियोजनाओं का निर्माण करते हैं।
- देखभाल-संवेदनशील बजटिंग: सार्वजनिक बजट में स्पष्ट रूप से दिखाया जाना चाहिए कि देखभाल सेवाओं पर कितना खर्च किया जा रहा है और यह महिलाओं के जीवन और रोजगार को कैसे सशक्त बना रहा है। यह UN Women की रणनीतियों के अनुरूप है, जो आर्थिक उत्पादकता बढ़ाने में सहायक है।
- पुनर्वितरण – भार साझा करना: देखभाल कार्य केवल महिलाओं का जिम्मा नहीं है, यह एक सामाजिक साझा जिम्मेदारी है।
- पुरुषों के साथ साझा करना: माता-पिता की वेतनयुक्त छुट्टी और लचीले कार्य घंटे जैसी नीतियाँ पुरुषों को घर में समान जिम्मेदारी निभाने में सक्षम बनाती हैं।
- राज्य के साथ साझा करना: सस्ती क्रेच सेवाओं के लिए मिशन शक्ति (पालना) योजना का विस्तार महिलाओं को कार्यबल में बनाए रखने में मदद करता है। यह भारत को “विकसित भारत 2047” लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक है और SDG 5.4 का मुख्य अंग है।
- सहिष्णुता और सुरक्षा: देखभाल प्रणाली इतनी मजबूत होनी चाहिए कि आधुनिक समय के संकटों और आपदाओं को प्रभावी ढंग से सँभाल सके।
- सुरक्षा जाल: प्रत्येक देखभाल कार्यकर्ता—जिसमें घरेलू सहायक भी शामिल हैं—को सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा और पेंशन योजनाओं से संरक्षित किया जाना चाहिए ताकि उनकी वृद्धावस्था सुरक्षित रहे।
- जलवायु और संकट योजना: महामारी या जलवायु आपदा के समय घरेलू देखभाल का बोझ अत्यधिक बढ़ जाता है। ऐसे में सार्वजनिक देखभाल प्रणालियाँ विकसित करनी होंगी, जो इन आपदाओं को सहन कर सकें ताकि महिलाएँ परिवार की देखभाल के कारण अपनी नौकरी छोड़ने के लिए बाध्य न हों।
निष्कर्ष
देखभाल कार्य को मान्यता देना न केवल बेहतर कल्याण सेवाओं के लिए आवश्यक है, बल्कि समाज में असमान लैंगिक संबंधों को बदलने के लिए भी अनिवार्य है। जब तक बिना वेतन और कम वेतन वाली देखभाल श्रम को मान्यता नहीं दी जाएगी, घटाया नहीं जाएगा, पुनर्वितरित नहीं किया जाएगा और उचित पुरस्कार नहीं दिया जाएगा, भारत में वास्तविक लैंगिक समानता अधूरी ही रहेगी।