संदर्भ
अंतरिक्ष अपशिष्ट की बढ़ती चुनौती पर प्रकाश डालने वाली भारतीय अंतरिक्ष स्थिति आकलन रिपोर्ट (ISSAR) 2025 को बेंगलूरू में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष यान मिशन संचालन सम्मेलन (SMOPS-2026) के दौरान जारी किया गया।
मुख्य बिंदु
- भारतीय अंतरिक्ष संपत्तियों का प्रक्षेपण (2025): वर्ष 2025 में आठ उपग्रह प्रक्षेपित किए गए और चार रॉकेट बॉडी (Rocket bodies) को कक्षा में स्थापित किया गया।
- पुनः प्रवेश और डिकमीशनिंग (Re-entry and Decommissioning): कुल 12 भारतीय वस्तुएँ वापस पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर गईं।
- इसके अतिरिक्त, IRNSS-1D उपग्रह को भू-समकालिक कक्षा (Geosynchronous orbit) से 600 किमी. ऊपर ले जाकर सेवामुक्त कर दिया गया।
- कक्षीय गतिविधि (Orbital Activity): रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर कुल 4,651 वस्तुएँ कक्षा में प्रक्षेपित की गईं और 1,911 वस्तुओं ने पृथ्वी के वायुमंडल में पुनः प्रवेश किया।
- अंतरिक्ष मौसम और प्रक्षेपण में देरी: रिपोर्ट में गंभीर भू-चुंबकीय तूफानों और LVM-3-M6 मिशन के प्रक्षेपण में हुई 41 सेकंड की देरी का भी विवरण दिया गया है।
- लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) उपग्रहों की स्थिति: लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में 86 उपग्रह मौजूद हैं, जिनमें से 27 चालू हैं और 23 निष्क्रिय हो चुके हैं।
- भू-स्थैतिक कक्षा (GEO) उपग्रहों की स्थिति: अंतरिक्ष में 32 परिचालन भू-स्थैतिक पृथ्वी कक्षा उपग्रह हैं, जिनमें से 26 अब निष्क्रिय हो चुके हैं।
- रॉकेट बॉडी अपशिष्ट (Rocket Body Debris): भारतीय रॉकेटों के हिस्सों पर रिपोर्ट में बताया गया कि अंतरिक्ष में पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) के 42 हिस्से, लॉन्च व्हीकल मार्क-3 (LVM-3) के तीन हिस्से और जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट के चार हिस्से मौजूद हैं।
- टकराव बचाव उपाय (Collision Avoidance Measures): लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) और भू-स्थैतिक पृथ्वी कक्षा (GEO) मिशनों में संभावित टक्कर से बचने के लिए चार-चार (कुल आठ) निवारक उपाय किए गए।
अंतरिक्ष अपशिष्ट के बारे में
- अंतरिक्ष अपशिष्ट (जिसे ‘ऑर्बिटल डेब्रिस’ या ‘स्पेस जंक’ भी कहा जाता है) उन बेकार, मानव निर्मित चीजों को कहते हैं, जो पृथ्वी की कक्षा में घूम रही हैं और अब कार्यशील नहीं रह गई हैं।
अंतरिक्ष अपशिष्ट के प्रकार
- निष्क्रिय उपग्रह (Defunct Satellites): ये वे गैर-परिचालन उपग्रह हैं, जो अपना जीवनकाल पूरा करने के बाद भी कक्षा में बने रहते हैं।
- रॉकेट बॉडीज: इनमें प्रक्षेपण यानों (जैसे PSLV और GSLV) के इस्तेमाल किए गए चरण शामिल हैं, जो पेलोड की तैनाती के बाद अंतरिक्ष में ही छूट जाते हैं।
- विखंडन अपशिष्ट (Fragmentation Debris): इसमें अंतरिक्ष में होने वाली टक्करों या अवशिष्ट ईंधन और बैटरी की विफलता के कारण होने वाले विस्फोटों से उत्पन्न छोटे टुकड़े शामिल हैं।
- मिशन-संबंधित वस्तुएँ: ये वे वस्तुएँ हैं, जैसे-उपकरण, बोल्ट, लेंस कैप और अन्य सामग्री जो अंतरिक्ष मिशन के दौरान गलती से छूट जाती हैं या खो जाती हैं।
अंतरिक्ष अपशिष्ट चिंता का विषय क्यों है?
- उच्च वेग का खतरा: अंतरिक्ष अपशिष्ट अत्यंत उच्च गति (लगभग 28,000 किमी/घंटा) से यात्रा करता है, जिसके कारण छोटे टुकड़े भी परिचालन उपग्रहों को गंभीर क्षति पहुँचा सकते हैं या उन्हें पूरी तरह नष्ट कर सकते हैं।
- सक्रिय उपग्रहों के लिए जोखिम: अपशिष्ट की मौजूदगी टक्कर की संभावना को बढ़ाती है, जिससे सक्रिय उपग्रहों के कामकाज और उनकी लंबी उम्र को खतरा होता है।
- अंतरिक्ष मिशनों को खतरा: अंतरिक्ष अपशिष्ट मानवयुक्त और मानवरहित मिशनों, जिनमें अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं, के लिए महत्त्वपूर्ण खतरा पैदा करता है।
- केसलर सिंड्रोम (Kessler Syndrome): अपशिष्ट का संचय टक्करों की एक शृंखला (चैन रिएक्शन) शुरू कर सकता है, जिसे ‘केसलर सिंड्रोम’ कहा जाता है। इससे भविष्य में कुछ कक्षाएँ उपयोग के अयोग्य हो सकती हैं।
- उदाहरण के लिए: वर्ष 2009 में, एक निष्क्रिय रूसी उपग्रह एक अमेरिकी मौसम उपग्रह से टकरा गया था, जिससे अपशिष्ट के हजारों टुकड़े उत्पन्न हुए थे।
- आर्थिक लागत: अपशिष्ट के कारण उपग्रहों की सुरक्षा (Shielding), टक्कर से बचने के अभ्यास (maneuvers) और अंतरिक्ष संचालन के लिए उच्च बीमा प्रीमियम की लागत बढ़ जाती है।
अंतरिक्ष अपशिष्ट को कम करने के लिए वैश्विक पहल
- संयुक्त राष्ट्र बाह्य अंतरिक्ष मामलों का कार्यालय (UNOOSA): इसने बाहरी अंतरिक्ष गतिविधियों की दीर्घकालिक स्थिरता को बढ़ावा देने और मिशन पूरा होने के बाद उपग्रहों के सुरक्षित निपटान को प्रोत्साहित करने हेतु दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
- अंतर-एजेंसी अंतरिक्ष अपशिष्ट समन्वय समिति (IADC): यह अपशिष्ट के शमन पर तकनीकी निर्देश प्रदान करती है और मिशन समाप्त होने के बाद उपग्रहों को कक्षा से हटाने के लिए “25-वर्षीय नियम” की सिफारिश करती है।
- सक्रिय अपशिष्ट हटाना (Active Debris Removal – ADR): ADR पहल उन्नत प्रौद्योगिकियों के माध्यम से मौजूदा अंतरिक्ष अपशिष्ट को खत्म करने पर ध्यान केंद्रित करती है।
- क्लीयरस्पेस-1 जैसे मिशनों का लक्ष्य रोबोटिक आर्म्स, जाल और हारपून (harpoons) जैसे तरीकों का उपयोग करके अपशिष्ट को पकड़ना और हटाना है।
- कानूनी और नियामक ढाँचा: ‘बाह्य अंतरिक्ष संधि’ (Outer Space Treaty) यह स्थापित करती है कि राष्ट्र अंतरिक्ष में प्रक्षेपित की गई अपनी वस्तुओं के लिए उत्तरदायी हैं।
भारत की पहल
- परियोजना नेत्रा (NETRA): ISRO ने स्वदेशी अंतरिक्ष स्थिति जागरूकता (SSA) क्षमताओं को विकसित करने के लिए परियोजना नेत्रा की शुरुआत की है।
- इसका उद्देश्य परिचालन उपग्रहों की सुरक्षा के लिए अंतरिक्ष अपशिष्ट पर नजर रखना और संभावित टकराव के जोखिमों का पूर्वानुमान लगाना है।
- ISRO की सुरक्षित और सतत् संचालन प्रबंधन प्रणाली (ISRO’s System for Safe and Sustainable Operations Management – IS 4 OM): टकराव के जोखिम उत्पन्न करने वाली वस्तुओं की निरंतर निगरानी के लिए इसे वर्ष 2022 में स्थापित किया गया था।
- अपशिष्ट से मुक्त अंतरिक्ष मिशन (DFSM) 2030: ISRO ने भारत की अंतरिक्ष गतिविधियों को वर्ष 2030 तक अपशिष्ट से मुक्त बनाने के लिए एक दीर्घकालिक पहल के रूप में अपशिष्ट से मुक्त अंतरिक्ष मिशन (DFSM) 2030 का शुभारंभ किया है।
आगे की राह
- वैश्विक सहयोग और नियमों को सुदृढ़ बनाना: अंतरिक्ष अपशिष्ट को प्रभावी ढंग से कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना और बाध्यकारी वैश्विक नियमों की दिशा में आगे बढ़ना आवश्यक है।
- उदाहरण के लिए, संयुक्त राष्ट्र बाह्य अंतरिक्ष मामलों के कार्यालय और अंतर-एजेंसी अंतरिक्ष अपशिष्ट समन्वय समिति के अंतर्गत ढाँचों को सुदृढ़ किया जा सकता है, ताकि सभी अंतरिक्ष यात्री देशों द्वारा अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके।
- सक्रिय अपशिष्ट हटाने की तकनीकों को बढ़ावा देना: देशों को मौजूदा अंतरिक्ष अपशिष्ट को हटाने के लिए सक्रिय अपशिष्ट हटाने (ADR) तकनीकों में निवेश और तैनाती करनी चाहिए।
- उदाहरण के लिए, क्लियरस्पेस-1 जैसे मिशनों का उद्देश्य रोबोटिक आर्म्स और अन्य उन्नत तकनीकों का उपयोग करके निष्क्रिय उपग्रहों को हटाना है।
- डेटा साझाकरण और SSA प्रणालियों को उन्नत बनाना: अपशिष्ट पर नजर रखने और टकरावों को रोकने के लिए बेहतर अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता (SSA) प्रणालियाँ और वास्तविक समय डेटा साझाकरण आवश्यक हैं।
- ISRO की परियोजना नेत्रा और वैश्विक ट्रैकिंग नेटवर्क जैसी पहलें निगरानी क्षमताओं को महत्त्वपूर्ण रूप से बढ़ा सकती हैं।