संदर्भ
हाल ही में एक अमेरिकी पनडुब्बी ने श्रीलंका के पास अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ईरानी फ्रिगेट (IRIS Dena) को टॉरपीडो से निशाना बनाया, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में कानूनी और सुरक्षा संबंधी चिंताएँ उत्पन्न हो गई हैं।
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टॉरपीडो के बारे में
- टॉरपीडो एक स्व-चालित, सिगार के आकार का जल के नीचे चलने वाला हथियारयुक्त विमान होता है, जिसे पनडुब्बियों, सतही युद्धपोतों या विमानों से दुश्मन के जहाजों या पनडुब्बियों को नष्ट करने के लिए तैनात किया जाता है।
- यह जल के भीतर ही संचालित होता है और लक्ष्य के संपर्क में आने पर या उसके निकट पहुँचने पर उसे समाप्त कर देता है।
उपयोग
- पनडुब्बी-रोधी युद्ध (ASW): हल्के टॉरपीडो हेलीकॉप्टरों और जहाजों द्वारा पनडुब्बियों का पता लगाकर उन्हें नष्ट करने के लिए उपयोग किए जाते हैं।
- एंटी-सरफेस वारफेयर (ASuW): भारी टॉरपीडो पनडुब्बियों द्वारा बड़े जहाजों को नष्ट करने के लिए उपयोग किए जाते हैं।
- रक्षात्मक उपाय: आधुनिक नौसैनिक संघर्षों में अन्य टॉरपीडो का मुकाबला करने के लिए भी इनका उपयोग किया जाता है।
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हिंद महासागर क्षेत्र में अमेरिकी हमले के बारे में
- श्रीलंका के पास घटना: एक अमेरिकी पनडुब्बी ने गाले से लगभग 40 समुद्री मील दूर ईरानी युद्धपोत (IRIS Dena) पर हमला किया, जिससे भारी जनहानि हुई और जहाज डूब गया।
- समुद्री अभ्यास में भागीदारी: यह ईरानी फ्रिगेट इससे पहले विशाखापत्तनम में भारतीय नौसेना द्वारा आयोजित इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026 और मिलन नौसैनिक अभ्यास में भाग ले चुका था।
- पश्चिम एशियाई संघर्ष का विस्तार: इस हमले ने चल रहे अमेरिका–इजरायल–ईरान संघर्ष को पश्चिम एशिया से आगे बढ़ाकर हिंद महासागर क्षेत्र तक पहुँचा दिया।
- खोज और बचाव प्रतिक्रिया: श्रीलंकाई नौसेना ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री खोज और बचाव अभिसमय के तहत बचाव अभियान चलाकर कई नाविकों को बचाया।
- भारतीय समुद्री खोज और बचाव क्षेत्र (ISRR) में खोज एवं बचाव (SAR) मिशनों के क्रियान्वयन और समन्वय की जिम्मेदारी भारतीय तटरक्षक बल की होती है।
समुद्री खोज और बचाव अभिसमय (SAR), 1979
- अंतरराष्ट्रीय समुद्री खोज और बचाव अभिसमय (SAR), 1979, एक महत्त्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) द्वारा विकसित किया गया है।
- उद्देश्य: यह सुनिश्चित करना कि समुद्र में कहीं भी कोई घटना होने पर संकट में पड़े लोगों के बचाव का समन्वय एक सुव्यवस्थित अंतरराष्ट्रीय प्रणाली के माध्यम से किया जाए।
- यह समुद्री कानून में एक महत्त्वपूर्ण कमी को पूरा करता है, क्योंकि यह केवल समुद्र में संकटग्रस्त लोगों की सहायता की आवश्यकता चिह्नित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उस सहायता को संगठित करने की व्यवस्था भी प्रदान करता है।
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हिंद महासागर में हुए हमले से जुड़ी प्रमुख चिंताएँ
- समुद्री संघर्ष की तीव्रता में वृद्धि: अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में सैन्य संघर्ष से हिंद महासागर के वैश्विक संघर्ष के विस्तारित क्षेत्र बनने का खतरा बढ़ जाता है।
- समुद्री कानून के तहत कानूनी अस्पष्टता: समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS) मुख्यतः शांतिकालीन समुद्री गतिविधियों को नियंत्रित करता है और नौसैनिक युद्ध को स्पष्ट रूप से विनियमित नहीं करता है।

- भारत के लिए सुरक्षा प्रभाव: यह घटना भारत के समुद्री के पास हुई, जिससे नौसैनिक सुरक्षा और समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं।
- वैश्विक शिपिंग के लिए जोखिम: संघर्ष की तीव्रता बढ़ने से ऊर्जा परिवहन और व्यापार के लिए उपयोग होने वाले महत्त्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
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UNCLOS के अंतर्गत परिभाषित प्रमुख क्षेत्र
- समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS), 1982 समुद्री सीमाओं, नौवहन अधिकारों और समुद्री संसाधनों के प्रबंधन को नियंत्रित करने के लिए एक कानूनी ढाँचा स्थापित करता है।
- उत्पत्ति: UNCLOS ने वर्ष 1958 के पूर्व जिनेवा कन्वेंशन का स्थान लिया और समुद्र के कानून पर तीसरे संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (1973–1982) से उभरकर समुद्रों के लिए एक व्यापक कानून बनाया।
- प्रमुख समुद्री क्षेत्र: क्षेत्रीय समुद्र (12 समुद्री मील तक)
- तटीय राज्य पूर्ण संप्रभुता का प्रयोग करते हैं, हालाँकि विदेशी जहाजों को निर्दोष मार्ग का अधिकार प्राप्त होता है।
- सन्निकट क्षेत्र (24 समुद्री मील तक): तटीय राज्य सीमा शुल्क, आव्रजन, कराधान और प्रदूषण से संबंधित कानूनों को लागू कर सकते हैं।
- विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (EEZ) (200 समुद्री मील तक): तटीय राज्यों को समुद्री संसाधनों की खोज और दोहन का विशेष अधिकार होता है, जबकि नौवहन की स्वतंत्रता बनी रहती है।
- महाद्वीपीय शेल्फ: तटीय राज्यों को समुद्र तल के संसाधनों पर संप्रभु अधिकार प्राप्त होते हैं, जो क्षेत्रीय समुद्र से आगे बढ़कर 200 समुद्री मील से भी अधिक तक विस्तारित हो सकते हैं।
- हाई सी/अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र: राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर के क्षेत्र, जहाँ सभी राज्यों को नौवहन, उड़ान और वैज्ञानिक अनुसंधान की स्वतंत्रता प्राप्त होती है।
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आगे की राह
- समुद्री शासन को सुदृढ़ करना: वैश्विक जलक्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए देशों को अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों और मानकों का पालन करना चाहिए।
- कूटनीतिक तरीके से संघर्ष का समाधान: अंतरराष्ट्रीय विवादों को सैन्य तनाव बढ़ाने के बजाय संवाद और बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए।
- क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना: सुरक्षित समुद्री मार्ग सुनिश्चित करने के लिए भारत और क्षेत्रीय शक्तियों को हिंद महासागर क्षेत्र में सहयोग को मजबूत करना चाहिए।
- नौसैनिक युद्ध के लिए कानूनी ढाँचे की स्पष्टता: वैश्विक समुदाय को UNCLOS के प्रावधानों के साथ-साथ समुद्री युद्ध से संबंधित अधिक स्पष्ट कानूनी दिशा-निर्देश विकसित करने चाहिए।