पश्चिम एशिया संकट, 2026

2 Mar 2026

संदर्भ

संयुक्त राज्य अमेरिका–इजरायल–ईरान संघर्ष तब तीव्र हो गया, जब हवाई हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और इस्लामी क्रांतिकारी गार्ड कोर (IRGC) के वरिष्ठ अधिकारियों की मृत्यु हो गई।

  • इजरायल का “ऑपरेशन रोअरिंग लायन”, जिसे कथित रूप से इजरायली प्रधानमंत्री द्वारा नामित किया गया, ने सामरिक स्थलों को निशाना बनाया, जिससे ईरानी मिसाइल प्रतिघात और व्यापक पश्चिम एशियाई अस्थिरता उत्पन्न हुई।

अयातुल्ला अली खामेनेई के बारे में

  • अयातुल्ला अली खामेनेई एक ईरानी शिया धर्मगुरु और राजनीतिक नेता थे, जिन्होंने वर्ष 1989 से लेकर 2026 में अपनी मृत्यु तक ईरान के इस्लामी गणराज्य के सर्वोच्च नेता के रूप में सेवा की।
  • पूर्ण अधिकार: वर्ष 1989 से वे “विलायत-ए-फकीह” (इस्लामी विधिवेत्ता की अभिरक्षा) के सिद्धांत के अंतर्गत ईरान के दूसरे सर्वोच्च नेता के रूप में कार्यरत रहे, सैन्य, न्यायपालिका और विदेश नीति पर अंतिम निर्णयाधिकार रखते हुए, निर्वाचित राष्ट्रपति से ऊपर स्थान रखते थे।
  • “प्रतिरोध धुरी”: वे ईरान की क्षेत्रीय शक्ति रणनीति के शिल्पकार थे, जिन्होंने पश्चिमी और इजरायली हितों को चुनौती देने हेतु हिजबुल्ला, हमास और हूती सहित प्रतिनिधि समूहों के एक परिष्कृत गुट का निर्माण एवं उसे सशस्त्र किया।
  • प्रतिरोध अर्थव्यवस्था एवं परमाणु गौरव: उन्होंने प्रतिबंधों से उबरने के लिए ईरान के व्यापार को चीन और रूस की ओर मोड़ा तथा यूरेनियम संवर्द्धन को राष्ट्रीय संप्रभुता तथा प्रौद्योगिकीय उन्नति के अपरिवर्तनीय प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया।

शीर्ष नेतृत्व निष्कासन सिद्धांत और उत्तराधिकार संकट

  • अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या ने ईरान को अभूतपूर्व संस्थागत अंतराल की स्थिति में पहुँचा दिया है।
  • ईरानी संविधान के अनुच्छेद-111 के अंतर्गत एक अंतरिम नेतृत्व परिषद, जिसमें राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन, मुख्य न्यायाधीश मोहसनी-एजेई और अयातुल्ला अलीरेजा अराफी शामिल हैं, ने नियंत्रण प्रबंधन कर लिया है।
  • यद्यपि विशेषज्ञों की सभा को संवैधानिक रूप से उत्तराधिकारी का चयन करने का दायित्व सौंपा गया है, किंतु उन्हीं हमलों में मोजतबा खामेनेई (एक प्रमुख दावेदार) की कथित मृत्यु ने “वंशानुगत धार्मिक” मार्ग को ध्वस्त कर दिया है।
  • यह परिस्थिति इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर को शक्ति का प्राथमिक निर्णायक बना देती है, जिससे संभावित रूप से “मिलिट्री स्टेट” मॉडल उभर सकता है, जहाँ सैन्य व्यवहारिकता पारंपरिक धार्मिक पर्यवेक्षण पर वरीयता प्राप्त कर लेती है।

हालिया मुद्दे के बारे में

स्विट्जरलैंड के जेनेवा में उच्च-स्तरीय परमाणु वार्ताओं की असफलता के पश्चात्, समन्वित सैन्य अभियानों की एक शृंखला ने पश्चिम एशिया की सुरक्षा संरचना को पुनर्परिभाषित कर दिया:

  • ऑपरेशन रोअरिंग लायन (इजरायल): 28 फरवरी, 2026 को प्रारंभ किया गया, इसमें नतांज, फोर्दो और इस्फहान में स्थित ईरानी परमाणु अवसंरचना पर सटीक हवाई हमले शामिल थे।
    • यद्यपि इज़राइल का घोषित उद्देश्य “स्थायी परमाणु प्रतिगमन” है, तथापि सामरिक इतिहास यह दर्शाता है कि ऐसे हमलों से प्रायः केवल सीमित या अस्थायी सामरिक क्षरण ही प्राप्त होता है, यह पूर्ण उन्मूलन के बजाय क्षमता को कुछ वर्षों के लिए विलंबित करते हैं।

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  • ऑपरेशन एपिक फ्यूरी (संयुक्त राज्य अमेरिका): एक संयुक्त अभियान, जिसका केंद्र बैलिस्टिक मिसाइल उत्पादन स्थलों और इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर के कमांड केंद्रों का विनाश था।
    • सामरिक तर्क में प्रतिरोध पुनर्स्थापन को शासन अस्थिरता के राजनीतिक लक्ष्य के साथ संयोजित किया गया है, जैसा कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा ईरानी जनता से “अपना नेतृत्व स्वयं ग्रहण करने” की प्रत्यक्ष अपील से स्पष्ट है।

सामरिक विकास – ‘स्कॉर्पियन स्ट्राइक” का उदय

  • वर्ष 2026 का संघर्ष सैन्य मामलों में क्रांति के प्रतिमान परिवर्तन को चिह्नित करता है। ऑपरेशन एपिक फ्यूरी में टास्क फोर्स स्कॉर्पियन स्ट्राइक का युद्धक पदार्पण हुआ, जिसमें LUCAS (कम-लागत मानवरहित युद्धक आक्रमण प्रणाली) का उपयोग किया गया।
  • अस्पष्ट समता: संयुक्त राज्य अमेरिका ने पूर्व में ईरान के शाहेद ड्रोन जैसे कम-खर्च वाले युद्ध मॉडल को समझकर उसी तरह की तकनीक विकसित कर ली।।
  • सामरिक प्रभाव: बड़े पैमाने पर उत्पादित, व्यययोग्य स्वायत्त ड्रोन से ईरानी वायु रक्षा को संतृप्त कर, संयुक्त राज्य अमेरिका ने उच्च-मूल्य मानव-संचालित संसाधनों को जोखिम में डाले बिना “वृहद स्तर पर सटीकता” प्राप्त की, जिससे पश्चिम एशियाई युद्ध के लागत-विनिमय अनुपात में मौलिक परिवर्तन हुआ।

  • ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 4 (ईरान): ‘मल्टी-वेब’ प्रतिघाती हमला, जिसमें अनमैन्ड एरियल व्हीकल्स (UAVs) और मिसाइलों का उपयोग करते हुए बहरीन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत में संयुक्त राज्य केंद्रीय कमान  (CENTCOM) के ठिकानों को निशाना बनाया गया।
    • युद्ध क्षेत्र का तटस्थ अरब राज्यों तक विस्तार यह संकेत देता है कि यदि उसकी संप्रभु भूमि पर कोई हमला होता है, तो ईरान उसका जवाब इस प्रकार देना चाहता है कि पूरे क्षेत्र को उसकी कीमत चुकानी पड़े।

तटस्थता का अंत (The End of Neutrality)

  • ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 4 द्वारा खाड़ी के परिष्कृत “मिसाइल कवच” को भेदने के साथ क्षेत्रीय परिदृश्य हिंसक रूप से विस्तारित हुआ।
  • दुबई- एक प्रमुख बिंदु: संयुक्त अरब अमीरात में तीन प्रवासी श्रमिकों की मृत्यु और अबू धाबी में एतिहाद टॉवर्स परिसर की क्षति ने “तटस्थ सुरक्षित आश्रयों” की मिथ्या धारणा को तोड़ दिया है।
  • भू-राजनैतिक पुनर्संरेखण: इसके परिणामस्वरूप तत्काल कूटनीतिक विच्छेद हुआ, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात ने तेहरान से अपने राजदूत को वापस बुला लिया।
    • भारत के लिए, इसका अर्थ है कि “तटस्थ” खाड़ी में उसका प्रवासी समुदाय अब ईरान या इजरायल के प्रत्यक्ष युद्ध क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्तियों जितना ही संवेदनशील है।

वर्तमान संघर्ष के कारण

दीर्घकालिक “सामरिक अस्पष्टता” के युग को समाप्त करने हेतु अनेक सामरिक एवं आंतरिक कारक एक साथ अभिसरित हुए:

  • परमाणु सीमा: ईरान के 60% संवर्द्धित यूरेनियम का भंडार (लगभग 440 किलोग्राम) एक निर्णायक स्तर तक पहुँच गया।
    • निम्न स्तर का संवर्द्धन जहाँ यूरेनियम, नागरिक ऊर्जा उत्पादन तथा चिकित्सीय अनुसंधान हेतु प्रयुक्त होता है, वहीं 60% संवर्द्धन का कोई सामान्य नागरिक ऊर्जा औचित्य नहीं है और यह 90% शस्त्र-ग्रेड सामग्री की दिशा में एक लघु तकनीकी अंतर का संकेतक है।

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  • बेगिन सिद्धांत: इजरायल ने अपने स्थापित पूर्व-आक्रामक सुरक्षा सिद्धांत का अवलंबन किया, जिसके अंतर्गत किसी भी क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी को सामूहिक विनाश के अस्त्र—विशेषतः परमाणु अस्त्र—प्राप्त करने से रोकना उसका राष्ट्रीय सुरक्षा अधिदेश है।
    • इजरायल का तर्क है कि “परमाणु ब्रेकआउट” की प्रतीक्षा करना, अब उसकी सुरक्षा दृष्टि से व्यवहार्य विकल्प नहीं रह गया है।
    • सिद्धांत का ऐतिहासिक अनुप्रयोग
      • वर्ष 1981: ऑपरेशन ओपेरा (इराक) – बगदाद के समीप ओसिराक परमाणु रिएक्टर का विनाश; यह सिद्धांत का प्रथम औपचारिक प्रयोग था।
      • वर्ष 2007: ऑपरेशन ऑर्चर्ड (सीरिया) – सीरियाई मरुस्थल में स्थित अल-किबार प्रतिष्ठान, जो उत्तर कोरियाई डिजाइन वाला गुप्त प्लूटोनियम रिएक्टर था, को ध्वस्त किया गया।
      • वर्ष 2025–2026: ईरान संघर्ष – जून 2025 (ऑपरेशन राइजिंग लायन) तथा फरवरी 2026 (ऑपरेशन एपिक फ्यूरी) के दौरान संयुक्त राज्य–इजरायल द्वारा ईरान के अनेक परमाणु एवं मिसाइल प्रतिष्ठानों पर संयुक्त प्रहार किए गए।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका में आंतरिक राजनीतिक संकेत: उग्रता का स्तर प्रतिरोध विश्वसनीयता बनाए रखने तथा घरेलू राजनीतिक समीक्षा के मध्य सहयोगियों को आश्वस्त करने की आवश्यकता से भी प्रभावित हो सकता है।

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  • ईरान में शासन-स्थिरता संबंधी चिंताएँ: बाह्य संघर्ष, विशेषतः आर्थिक दबाव अथवा आंतरिक असंतोष की स्थितियों में, अभिजात वर्गीय एकजुटता सुदृढ़ करने और राष्ट्रवादी भावनाओं को संगठित करने का माध्यम बन सकता है।
  • बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता: ईरान की दीर्घ-मारक क्षमता वाली बैलिस्टिक मिसाइल प्रणाली इजरायल तथा पश्चिम एशिया में संयुक्त राज्य के सैन्य अड्डों के लिए प्रत्यक्ष सामरिक चुनौती प्रस्तुत करती है।
  • प्रतिनिधि युद्ध रणनीति: ईरान राज्य विहीन सशस्त्र समूहों के माध्यम से प्रभाव-विस्तार करता है तथा प्रत्यक्ष पारंपरिक युद्ध से परहेज़ करता है।
    • हिजबुल्ला: इजरायल के विरुद्ध लक्षित व्यापक रॉकेट एवं मिसाइल भंडार के साथ ईरान की उत्तरी प्रतिरोध क्षमता का प्रमुख अंग है।
    • हमास: गाजा में सक्रिय ईरान-समर्थित संगठन, जिसका इजरायल के साथ संघर्ष क्षेत्रीय अस्थिरता को तीव्र करता है।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम के बारे में

  • अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने चेतावनी दी है कि ईरान अब “ऐसी सामग्री का उत्पादन करने वाला एकमात्र परमाणु-अस्त्र विहीन राज्य” है, जिसे उसने “गंभीर चिंता” का विषय बताया है।
  • एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने तीन स्थलों—लाविसान-शियान, वरामिन तथा तुर्कुजाबाद—पर परमाणु सामग्री एवं गतिविधियों की घोषणा नहीं की।
  • ये स्थल 2000 के दशक के प्रारंभ तक सक्रिय एक अघोषित परमाणु कार्यक्रम से संबंधित थे।

तकनीकी स्थिति एवं ‘ब्रेकआउट’ परिदृश्य

  • भंडार: नवीनतम हमलों से पूर्व ईरान के पास लगभग 441 किलोग्राम 60% संवर्द्धित यूरेनियम उपलब्ध था। यदि इसे आगे संवर्द्धित किया जाए, तो यह अनुमानतः लगभग 10 परमाणु अस्त्रों के निर्माण हेतु पर्याप्त हो सकता है।
  • “इस्फहान” सुरंग परिसर: इस सामग्री का एक बड़ा भाग इस्फहान स्थित सुदृढ़ भूमिगत परिसर में संगृहीत होने का अनुमान है। सेटेलाइट इमेज में वहाँ तीव्र वाहन गतिविधियाँ देखी गई है, जिससे संकेत मिलता है कि ईरान संभावित वायु-प्रहारों से इस सामग्री की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहा है।
  • ब्रेकआउट समय: प्रभावी रूप से अत्यल्प। तकनीकी दृष्टि से ईरान के पास शस्त्र-ग्रेड यूरेनियम उत्पादन हेतु आवश्यक सामग्री एवं प्रौद्योगिकीय दक्षता उपलब्ध है, यद्यपि सेंट्रीफ्यूज कक्षों पर हालिया प्रहारों ने उसकी भौतिक क्षमता को आंशिक रूप से मंद किया है।

यूरेनियम संवर्द्धन

  • यूरेनियम संवर्द्धन वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से प्राकृतिक यूरेनियम में यूरेनियम-235 समस्थानिक की सांद्रता बढ़ाई जाती है।
  • इसका उद्देश्य इसे परमाणु रिएक्टरों के ईंधन के रूप में उपयोग योग्य बनाना अथवा उच्च संवर्द्धन स्तर पर परमाणु अस्त्र निर्माण के लिए उपयुक्त बनाना है।
  • प्राकृतिक यूरेनियम की संरचना: प्राकृतिक यूरेनियम में लगभग 99.3% यूरेनियम-238 तथा लगभग 0.7% यूरेनियम-235 होता है।
    • यूरेनियम-235 विखंडनीय समस्थानिक है, जो परमाणु शृंखला अभिक्रिया को स्थिर बनाए रख सकता है, जबकि यूरेनियम-238 विखंडनीय नहीं है।
  • संवर्द्धन स्तर
    • निम्न-संवर्द्धित यूरेनियम: 3–5% यूरेनियम-235 (अधिकांश परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों में प्रयुक्त)।
    • शस्त्र-ग्रेड यूरेनियम: 90% या अधिक यूरेनियम-235 (परमाणु अस्त्रों में प्रयुक्त)।
  • अप्रसार संबंधी चिंताएँ: यूरेनियम संवर्द्धन की सतत् निगरानी की जाती है, क्योंकि यह द्वैध-उपयोग प्रौद्योगिकी है—जिसका प्रयोग शांतिपूर्ण ऊर्जा उद्देश्यों तथा सैन्य अस्त्र-निर्माण दोनों के लिए किया जा सकता है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य – ईरान–इजरायल संबंधों के चार चरण

वर्ष 2026 को समझने हेतु इसे चार विशिष्ट ऐतिहासिक चरणों के परिप्रेक्ष्य में देखना आवश्यक है:

  • सामरिक सहयोग (1948–1979): “परिधि सिद्धांत” के अंतर्गत ईरान और इजरायल अरब राष्ट्रवाद के विरुद्ध मौन सहयोगी रहे है (उदाहरणतः प्रोजेक्ट फ्लॉवर मिसाइल अनुसंधान एवं विकास)।
  • वैचारिक विच्छेद (1979–1990): इस्लामी क्रांति ने इजरायल को “लिटिल सैटन” के रूप में परिभाषित किया, यद्यपि ईरान–इराक युद्ध के दौरान गोपनीय व्यावहारिकता विद्यमान रही (ईरान–कॉन्ट्रा प्रकरण)
  • प्रछन्न युद्ध (1990–2020): “प्रतिरोध धुरी” (हिजबुल्ला/हमास) के माध्यम से प्रॉक्सी वॉर तथा फिफ्थ जनरेशन युद्ध की शुरुआत (स्टक्सनेट, 2010) इसकी प्रमुख विशेषताएँ रहीं।
  • प्रत्यक्ष संघर्ष (2021–2026): राज्य-से-राज्य प्रत्यक्ष विनिमय, जिसका चरम वर्ष 2026 के सघर्षों में हुआ, जहाँ उद्देश्य “निरोध” से “शासन-अस्थिरता” की ओर परिवर्तित हुआ।

वर्तमान परिदृश्य

  • सामरिक क्षरण: प्रारंभिक युद्ध-क्षति आकलन इंगित करते हैं कि ईरानी सेंट्रीफ्यूज संयंत्रों और मिसाइल भंडारण सुविधाओं को महत्त्वपूर्ण क्षति पहुँची है, यद्यपि ईरान का “परमाणु ज्ञान” और वैज्ञानिक विशेषज्ञता अक्षुण्ण है।
  • कूटनीतिक गतिरोध: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद वीटो-राजनीति के कारण निष्क्रिय बनी हुई है; रूस और चीन इन प्रहारों को संप्रभुता का उल्लंघन बताते हैं, जबकि पश्चिमी शक्तियाँ इन्हें “पूर्वानुमानित आत्मरक्षा” की आवश्यक कार्रवाई के रूप में समर्थन देती हैं।
  • संकर युद्ध का विकास (साइबर आयाम): वर्ष 2026 का संघर्ष “गतिज” युद्धक्षेत्र से आगे बढ़ चुका है।
    • ईरानी सेंट्रीफ्यूज समूहों के विरुद्ध स्टक्सनेट 3.0 के कथित प्रयोग तथा इजरायल और उसके सहयोगियों के जल एवं विद्युत ग्रिड पर ईरानी साइबर परीक्षण ‘फिफ्थ जनरेशन’ युद्ध की ओर संक्रमण को दर्शाते हैं।
      • स्टक्सनेट, एक संगणकीय वायरस है, जिसका उपयोग ईरान के नतांज परमाणु स्थल पर यूरेनियम संवर्द्धन सुविधा पर आक्रमण हेतु किया गया था; इसे “औद्योगिक मशीनरी पर प्रथम सार्वजनिक रूप से ज्ञात साइबर-आक्रमण” माना जाता है।
    • भारत के लिए यह एक गंभीर संवेदनशीलता को रेखांकित करता है—जहाँ इसके “डिजिटल प्रसार” की संभावना है तथा जहाँ क्षेत्रीय अस्थिरता भारतीय महत्त्वपूर्ण अवसंरचना अथवा मुंबई स्थित समुद्र-तलीय केबल स्थलों पर साइबर आक्रमणों में परिवर्तित हो सकती है।

ल्यूकस कामिकाजे ड्रोन का युद्धक पदार्पण

  • प्रथम युद्धक तैनाती: संयुक्त राज्य केंद्रीय कमान ने टास्क फोर्स स्कॉर्पियन स्ट्राइक के माध्यम से ल्यूकस ड्रोन की आधिकारिक तैनाती की।
    • इसे टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों के साथ ईरानी सैन्य स्थलों पर प्रहार हेतु प्रयोग किया गया, जिससे यह प्रायोगिक अवस्था से आगे बढ़कर संयुक्त राज्य की आक्रामक क्षमता का अभिन्न घटक बन गया।
  • तकनीकी स्थिति एवं उत्पत्ति: स्पेक्ट्रेवर्क्स द्वारा विकसित ल्यूकस एक “एक-मार्गीय” परिभ्रमण आयुध है, जिसे ईरानी शाहेद-136 के विपरीत अभियांत्रिकी द्वारा विकसित किया गया।
    • यह 40 पाउंड विस्फोटक भार वहन करता है तथा इसकी अनुमानित मारक सीमा 500 मील है। इसकी लगभग 35,000 डॉलर की निम्न इकाई लागत इसे व्यापक स्तर पर तैनात करने योग्य बनाती है।
  • सामरिक संतृप्ति रणनीति: पारंपरिक मानवरहित हवाई वाहनों के विपरीत, ल्यूकस को व्यययोग्य रूप में अभिकल्पित किया गया है।
    • यह इस रणनीति के माध्यम से शत्रु की वायु-रक्षा प्रणालियों को संख्या-बल से युक्त करता है, जिससे प्रतिद्वंद्वी को कम-लागत लक्ष्यों पर महँगे अवरोधक अस्त्रों का प्रयोग करना पड़ता है।
  • युद्ध-प्रेरित परिष्करण: संयुक्त राज्य की सैन्य प्रणाली ल्यूकस को सक्रिय युद्ध-परिस्थिति में परीक्षण कर रही है।
    • तीव्र इलेक्ट्रॉनिक व्यवधान वाले वातावरण में संचालन से वास्तविक समय का डेटा प्राप्त होता है, जिससे नेविगेशन एल्गोरिदम और प्रतिरोधी सॉफ्टवेयर में त्वरित संशोधन संभव होता है तथा पारंपरिक अधिप्राप्ति प्रक्रियाओं की मंद गति को दरकिनार किया जाता है।
  • युद्ध का रूपांतरण: ल्यूकस की प्रभावशीलता इस वैश्विक प्रवृत्ति को पुष्ट करती है कि लघु, स्वायत्त प्रणालियाँ अब वे सामरिक परिणाम प्रदान कर रही हैं, जो पूर्व में लड़ाकू विमानों या बख्तरबंद डिवीजनों से संबद्ध थे।
    • भविष्य के संघर्षों की प्रकृति क्रमशः नेटवर्क-संबद्ध स्वायत्त प्रहारों द्वारा निर्धारित होने की संभावना है, जो पारंपरिक युद्ध-लॉजिस्टिक्स और अग्रिम पंक्ति के मानव जोखिम को सीमित करते हैं।

संघर्ष और उसका वैश्विक प्रभाव

  • ऊर्जा आघात: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के ऐतिहासिक आकलन के अनुसार, कच्चे तेल के मूल्य में 10 डॉलर की वृद्धि से वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 0.2% की गिरावट आती है।
    • ब्रेंट कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुँचने के साथ विश्व गंभीर मंदी के दबावों का सामना कर रहा है।
  • समुद्री असुरक्षा: संघर्ष ने होर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 21% वहन करता है, को उच्च-जोखिम क्षेत्र में परिवर्तित कर दिया है।
    • इसके परिणामस्वरूप युद्ध-जोखिम बीमा प्रीमियम में दस गुना वृद्धि तथा केप ऑफ गुड होप मार्ग से वाणिज्यिक जहाजों के पुनर्निर्देशन की उच्च लागत सामने आई है।
  • चीन की सामरिक गणना: चीन सामरिक अवसरवाद की नीति अपनाता है।
    • यद्यपि वह ऊर्जा आपूर्ति के संदर्भ में संवेदनशील है, तथापि यदि संयुक्त राज्य की सैन्य परिसंपत्तियाँ पश्चिम एशिया में दीर्घकाल तक संलग्न रहती हैं, तो एशिया की ओर अमेरिकी रणनीतिक पुनर्संतुलन क्षमता सीमित हो सकती है, जिससे चीन को संरचनात्मक लाभ प्राप्त होता है।

पश्चिम एशिया में भारत की सामरिक समुद्री उपस्थिति

पश्चिम एशिया में भारत की सैन्य उपस्थिति संप्रभु “किलेबंद” अड्डों पर आधारित नहीं है, बल्कि रणनीतिक पहुँच समझौतों और लॉजिस्टिक नोड्स के एक परिष्कृत नेटवर्क पर आधारित है। यह “लाइट फुटप्रिंट” रणनीति भारत को स्थायी विदेशी ठिकानों के राजनीतिक दायित्व से बचते हुए समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अनुमति देती है।

  • ओमान-रणनीतिक आधार स्तंभ: ओमान इस क्षेत्र में भारत का सबसे महत्त्वपूर्ण सुरक्षा साझेदार बना हुआ है, जो उत्तरी अरब सागर और फारस की खाड़ी के लिए प्रवेश द्वार का कार्य करता है।
    • दुक्म बंदरगाह: भारत की समुद्री रणनीति का “क्राउन ज्वेल”। यहाँ भारत के पास एक समर्पित लॉजिस्टिक एवं रखरखाव संबंधी समझौता है, जो भारतीय नौसेना को होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर विमानवाहक पोत समूहों का समर्थन करने में सक्षम गहरे जल का केंद्र प्रदान करता है।
    • रस अल हद्द: एक महत्त्वपूर्ण खुफिया नोड। इस स्थान पर भारत एक लिसनिंग पोस्ट (इलेक्ट्रॉनिक निगरानी स्टेशन) संचालित करता है, जो अरब सागर में नौसैनिक यातायात और संचार की निगरानी करता है, ठीक पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के सामने।
    • मस्कट नौसैनिक अड्डा: भारत यहाँ संस्थागत ‘बर्थिंग’ अधिकार और कार्गो-हैंडलिंग सुविधाओं तक पहुँच बनाए रखता है, जिससे गश्त पर तैनात भारतीय युद्धपोतों की स्थायी उपस्थिति सुनिश्चित होती है।
  • ईरान – लॉजिस्टिक एवं संपर्क द्वार: यद्यपि मुख्यतः एक वाणिज्यिक परियोजना है, चाबहार बंदरगाह पर भारत द्वारा संचालित शहीद बेहेश्ती टर्मिनल, दोहरे उपयोग वाली सामरिक संर्क्चना की भूमिका निभाता है।
    • “ग्वादर काउंटर”: चाबहार, पाकिस्तान को बायपास करते हुए भारत को मध्य एशिया से जोड़ता है और चीनी-वित्तपोषित अवसंरचना के विरुद्ध सामरिक संतुलन प्रदान करता है।
    • वर्ष 2026 की सुरक्षा स्थिति: क्षेत्रीय ड्रोन युद्ध में वृद्धि तथा अमेरिका–ईरान–इजरायल तनाव के कारण वर्ष 2026 के केंद्रीय बजट में बंदरगाह हेतु पूर्व निर्धारित 120 मिलियन डॉलर की प्रतिबद्धता पूर्ण की गई, परंतु वर्ष 2026–27 के लिए कोई नई आवंटन राशि नहीं की गई।
      • भारत वर्तमान में इस उच्च-जोखिम क्षेत्र में तीव्र विस्तार की बजाय सुरक्षा सुदृढ़ीकरण और कूटनीतिक सावधानी को प्राथमिकता दे रहा है।
  • संयुक्त अरब अमीरात (UAE) – इंटरऑपरेबिलिटी साझेदार: UAE के साथ संबंध क्रेता-विक्रेता मॉडल से आगे बढ़कर गहन रक्षा साझेदारी में परिवर्तित हो चुके हैं, जिसे जनवरी 2026 के रणनीतिक रक्षा साझेदारी ढाँचा समझौते द्वारा औपचारिक रूप दिया गया था।
    • एकीकृत पहुँच: यह कोई पारंपरिक सैन्य अड्डा नहीं है; समझौता भारतीय परिसंपत्तियों को “संस्थागत अंतरसंचालनीयता” प्रदान करता है।
    • इससे आपातकालीन रखरखाव, ईंधन भरने तथा त्वरित तैनाती के लिए UAE की सुविधाओं का निर्बाध उपयोग संभव होता है।
    • संचालनात्मक केंद्र: डेजर्ट ईगल (वायु सेना) और जायेद तलवार (नौसेना) जैसे संयुक्त अभ्यासों ने अल धफरा वायु अड्डे सहित UAE प्रतिष्ठानों को भारतीय कर्मियों एवं उपकरणों के लिए परिचित मंच में परिवर्तित कर दिया है।

संघर्ष और भारत पर उसका प्रभाव

  • व्यापक आर्थिक दबाव: भारत को प्रतिवर्ष 125 अरब डॉलर से अधिक प्रेषण (Remittances) प्राप्त होता है; क्षेत्रीय श्रम बाजार में संकुचन भारतीय परिवारों की आय पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।
    • साथ ही, तेल कीमतों में वृद्धि भारत के चालू खाता घाटे (CAD) को बढ़ाती है तथा खाद्य एवं परिवहन क्षेत्रों में मुद्रास्फीति को बढ़ावा देती है।
  • संपर्क में स्थायित्त्व: संकट ने भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक कॉरिडोर (IMEC) को प्रभावी रूप से बाधित कर दिया है।
    • यह भू-आर्थिक व्यवधान चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के मध्य एशिया मार्गों को अपेक्षाकृत अधिक स्थिर विकल्प के रूप में सशक्त कर सकता है।

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  • आपूर्ति व्यवधान जोखिम: यह संघर्ष होर्मुज जलडमरूमध्य से ऊर्जा प्रवाह को प्रभावित कर सकता है, जो भारत के खाड़ी आयातों के लिए एक महत्त्वपूर्ण मार्ग है।
    • वर्ष 2025 में भारत ने लगभग 90% LPG, 40% LNG और 35% कच्चे तेल का आयात फारस की खाड़ी से किया; अतः किसी भी व्यवधान का सीधा प्रभाव ईंधन की आपूर्ति पर पड़ेगा।
  • आयात बिल एवं मुद्रास्फीति में वृद्धि: तनाव बढ़ने से वैश्विक कच्चे तेल एवं गैस कीमतें, मालभाड़ा और बीमा लागत बढ़ती हैं, जिससे ऊर्जा आयात बिल, चालू खाता घाटा तथा संभावित मुद्रास्फीति दबाव बढ़ता है।
  • प्रवासी सुरक्षा एवं “एक्सोडस” का पैमाना: खाड़ी में 90 लाख से अधिक भारतीय निवास करते हैं। पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध की स्थिति वर्ष 1990 के कुवैत एयरलिफ्ट से भी बड़ी मानवीय चुनौती प्रस्तुत कर सकती है।
    • बड़े पैमाने पर वापसी केवल लॉजिस्टिक संकट ही नहीं उत्पन्न करेगी, बल्कि केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में “रेमिटेंस में कमी” के रूप में आर्थिक संकट भी उत्पन्न करेगी।
    • I2U2 की कूटनीतिक दुविधा: वर्ष 2026 के संकट ने I2U2 समूह (भारत, इजरायल, UAE, अमेरिका) को प्रभावी रूप से निष्क्रिय कर दिया है।
      • भारत एक “रणनीतिक बिंदु” की स्थिति में है, जहाँ दो साझेदार (इजरायल/अमेरिका) तीसरे महत्त्वपूर्ण साझेदार (ईरान) के साथ सक्रिय संघर्ष में हैं, जबकि चौथा (UAE) लक्षित तटस्थ पक्ष है।
      • इस परिस्थिति में भारत को खाद्य एवं ऊर्जा सहयोग आधारित “मिनीलैटरल सहयोग” से हटकर “संघर्ष प्रबंधन” की दिशा में कदम बढ़ाना पड़ रहा है।

भारत का बजटीय “सुरक्षात्मक संतुलन” और संपर्क गतिरोध

भारत के केंद्रीय बजट 2026–27 ने चाबहार बंदरगाह के लिए कोई नई धनराशि आवंटित न करके  सामरिक स्तर पर पीछे हटने का संकेत दिया।

  • शुल्क परिहार: यह “रणनीतिक विराम” ईरान के साथ संलग्न राष्ट्रों पर ट्रंप प्रशासन द्वारा प्रस्तावित 25 प्रतिशत शुल्क-धमकी के प्रत्यक्ष प्रत्युत्तर के रूप में देखा जा रहा है।
  • गलियारा परिवर्तन: अरब क्षेत्रीय अवसंरचना को हुए प्रत्यक्ष क्षति के कारण भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा अवरुद्ध हो चुका है, जिससे नई दिल्ली “संपर्क अवरोध” की स्थिति का सामना कर रही है।
  • यद्यपि अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारा एक सैद्धांतिक विकल्प के रूप में विद्यमान है, परंतु अस्थिर ईरान पर इसकी निर्भरता के कारण यह वर्तमान वित्तीय वर्ष के लिए एक “स्थगित परिसंपत्ति” के समान बना हुआ है।

भारत और इजरायल की विशेष रणनीतिक पहल

हाल ही में दोनों राष्ट्रों (25–26 फरवरी, 2026) ने आधिकारिक रूप से संबंधों को शांति, नवाचार और समृद्धि के लिए एक विशेष रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक उन्नत किया।

  • रक्षा सह-विकास: क्रेता-विक्रेता मॉडल से आगे बढ़ते हुए, 10 अरब डॉलर की नई रक्षा रूपरेखा कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सक्षम ड्रोन, अर्द्धचालक तथा इजरायली “आयरन डोम” प्रौद्योगिकी को भारत की वायु-रक्षा संरचना में एकीकृत करने पर केंद्रित है।
  • आर्थिक एकीकरण: 23 फरवरी, 2026 को औपचारिक मुक्त व्यापार समझौता वार्ताएँ प्रारंभ हुईं। इसका उद्देश्य क्षेत्रीय अस्थिरता के कारण द्विपक्षीय व्यापार में आई गिरावट (वित्त वर्ष 24–25 में 3.62 अरब डॉलर) को पलटना है।
  • प्रौद्योगिकीय समेकन: एक नई महत्त्वपूर्ण एवं उभरती प्रौद्योगिकी साझेदारी प्रारंभ की गई है, जिसमें क्वांटम संगणना, साइबर सुरक्षा और जैव-प्रौद्योगिकी को शामिल किया गया है।
  • श्रम एवं डिजिटल गतिशीलता: एक ऐतिहासिक समझौते के अंतर्गत पाँच वर्षों में 50,000 तक भारतीय श्रमिकों को इजरायल जाने की अनुमति दी गई है। इसके अतिरिक्त, भारत की एकीकृत भुगतान प्रणाली को इजरायल के भुगतान पारितंत्र में एकीकृत किया जा रहा है।
  • भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा: संघर्ष के बावजूद, दोनों राष्ट्रों ने भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारे को चीन के प्रभाव के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक विकल्प के रूप में पुनः पुष्टि की।

भारत और ईरान-रणनीतिक संतुलन की चुनौती

ईरानी अवसंरचना पर अमेरिका–इजरायल सैन्य हमलों तथा विस्तारित अमेरिकी प्रतिबंधों की आशंका के बाद संबंध गंभीर दबाव में हैं।

  • चाबहार बंदरगाह-“रणनीतिक विराम”: यद्यपि भारत ने फरवरी 2026 में अपनी 120 मिलियन डॉलर की प्रतिबद्धता पूरी की, किंतु केंद्रीय बजट 2026 में कोई नई धनराशि आवंटित नहीं की गई।
    • भारत वर्तमान में अमेरिकी प्रतिबंध छूट के अंतर्गत कार्य कर रहा है, जिसकी अवधि 26 अप्रैल, 2026 को समाप्त हो रही है, जिससे भविष्य का निवेश अत्यधिक अनिश्चित हो गया है।
  • अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारा: यह रूस और मध्य एशिया तक पहुँचने के लिए “पूर्वी मार्ग” बना हुआ है।
    • हालाँकि, होर्मुज जलडमरूमध्य की हालिया नाकाबंदी ने इस मार्ग को लॉजिस्टिक दृष्टि से उच्च-जोखिम युक्त और महँगा बना दिया है।
  • ऊर्जा एवं आर्थिक सुरक्षा उपाय: अमेरिका के द्वितीयक प्रतिबंधों से बचने हेतु भारत ईरान से शून्य तेल आयात की नीति का पालन कर रहा है। नई दिल्ली वर्तमान में वर्ष 2026 की वैश्विक तेल मूल्य-वृद्धि को संतुलित करने के लिए सामरिक पेट्रोलियम भंडार का उपयोग कर रही है।
  • चीन का प्रतिरोध: ईरान में भारत की उपस्थिति यूरेशियाई पारगमन मार्गों पर पूर्ण चीन–ईरान एकाधिकार को रोकने हेतु एक महत्त्वपूर्ण भू-राजनीतिक आधार का कार्य करती है, यद्यपि सक्रिय परियोजनाओं में वर्तमान “स्थायित्व” की स्थिति है।
  • विश्व बंधु कूटनीति: भारत तनाव-शमन के लिए एक निष्पक्ष स्वर के रूप में कार्य कर रहा है, दोनों पक्षों के मित्र होने की अपनी विशिष्ट स्थिति का उपयोग करते हुए ईरान में निवासरत 9,000 भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहा है।

संबद्ध अंतरराष्ट्रीय विधि

सैन्य कार्रवाइयों ने वैश्विक विधिक मानदंडों पर गहन बहस को जन्म दिया है:

  • संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद-51: संयुक्त राज्य अमेरिका और इजरायल ने आसन्न परमाणु खतरे के विरुद्ध व्यक्तिगत अथवा सामूहिक आत्मरक्षा के निहित अधिकार का दावा किया है।
  • कैरोलाइन परीक्षण: समर्थकों का तर्क है कि ये हमले अंतरराष्ट्रीय विधि के आवश्यकता और अनुपातिकता संबंधी मानकों को पूरा करते हैं, यह कहते हुए कि परमाणु खतरा तत्काल और अत्यधिक था, जिससे किसी अन्य साधन का विकल्प नहीं था और विचार-विमर्श के लिए कोई समय नहीं था।
  • परमाणु अप्रसार संधि: यदि सैन्य हस्तक्षेप के बावजूद ईरान सफलतापूर्वक परमाणु क्षमता प्राप्त कर लेता है, तो अंतरराष्ट्रीय अप्रसार मानदंडों की विश्वसनीयता मूल रूप से कमजोर हो सकती है, जिससे क्षेत्रीय हथियारों की प्रतिस्पर्द्धा आरंभ होने की आशंका है।

आगे की राह

  • आर्थिक प्रभाव: भारत को अत्यधिक मूल्य-अस्थिरता से घरेलू अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने हेतु तत्काल अपने सामरिक पेट्रोलियम भंडार को सक्रिय करना चाहिए तथा दीर्घकालिक तेल आयात अनुबंधों की मूल्य सुरक्षा करनी चाहिए।
  • रणनीतिक संतुलन: भारत को किसी विशिष्ट शक्ति-गुट के साथ प्रत्यक्ष संरेखण से बचना चाहिए, इजरायल के साथ शांत रक्षा-संबंध बनाए रखते हुए ओमान अथवा संयुक्त अरब अमीरात को परोक्ष संवाद माध्यम के रूप में उपयोग कर क्षेत्रीय तनाव-शमन को प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • रक्षा आत्मनिर्भरता: भारत को इजरायल के साथ अपने भू-भाग पर रक्षा विनिर्माण साझेदारियों को तीव्र गति से आगे बढ़ाना चाहिए। इससे पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय स्थिरता की परवाह किए बिना उच्च-प्रौद्योगिकी उपकरणों के लिए सुरक्षित उत्पादन आधार सुनिश्चित होगा।
  • राष्ट्रीय गैस ग्रिड एवं सामरिक भंडार: वर्तमान सामरिक पेट्रोलियम भंडार से आगे बढ़ते हुए, भारत को उर्वरक एवं विद्युत क्षेत्रों को द्रवीकृत प्राकृतिक गैस के तात्कालिक बाजार मूल्य-अस्थिरता से सुरक्षित रखने हेतु सामरिक गैस भंडार पर एक राष्ट्रीय नीति को शीघ्र लागू करना चाहिए।
  • मिशन समुद्र मंथन: सरकार को ‘गहरे समुद्री अन्वेषण’ को राष्ट्रीय सुरक्षा की आपात प्राथमिकता के रूप में ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि पश्चिम एशिया से संबंधित 88 प्रतिशत आयात-निर्भरता भारत की “कमजोर कड़ी” बनी हुई है, और इसे कम करना सामरिक दृष्टि से अत्यावश्यक है
  • “विश्व बंधु” परोक्ष संवाद पहल: भारत को अपनी विशिष्ट स्थिति का उपयोग करते हुए अरब सागर में एक “समुद्री तनाव-शमन क्षेत्र” की स्थापना को प्रोत्साहित करना चाहिए, जिससे वाणिज्यिक ऊर्जा प्रवाह को “प्रतिरोध धुरी” और अन्य आक्रामक अभियान की वैचारिक संघर्ष-स्थिति से सुरक्षित रखा जा सके।

निष्कर्ष

वर्ष 2026 का पश्चिम एशिया संकट, भारत को रणनीतिक अस्पष्टता से सुदृढ़ राज्य-नीति की ओर अग्रसर होने के लिए बाध्य करता है। इजरायल के साथ उच्च-प्रौद्योगिकी रक्षा सहयोग को सुदृढ़ करते हुए, भारत को होर्मुज जलडमरूमध्य अवरोध तथा प्रतिबंध-जोखिमों के विरुद्ध संतुलन रणनीति अपनानी होगी, ताकि अपने ऊर्जा हितों और यूरेशियाई संपर्क महत्त्वाकांक्षाओं को सुरक्षित किया जा सके।

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