संदर्भ:
केंद्र सरकार ने मई 2026 में आगामी संसद सत्र की प्रतीक्षा करने के बजाय एक अध्यादेश जारी करके सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश संख्या में वृद्धि की। इस कदम ने अनुच्छेद 123 के दुरुपयोग तथा कानून-निर्माण प्रक्रिया में संसद की घटती भूमिका को लेकर चिंताओं को पुनः जीवित कर दिया है।
अध्यादेशों का अत्यधिक उपयोग चिंता का विषय क्यों है?
- संसदीय लोकतंत्र का क्षरण: संसद लोकतांत्रिक विचार-विमर्श, बहस और जवाबदेही का प्रमुख मंच है।
- बार-बार अध्यादेशों का जारी होना निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका को दरकिनार करता है और विधायी जाँच-पड़ताल को कमजोर बनाता है।
- कार्यपालिका द्वारा विधायी शॉर्टकट: अध्यादेशों की व्यवस्था को आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए एक असाधारण साधन के रूप में परिकल्पित किया गया था, न कि सामान्य विधायी प्रक्रिया के विकल्प के रूप में।
- जब संसद सत्र में नहीं होती, तब सरकारें अध्यादेशों का उपयोग कानून बनाने के लिए एक त्वरित विधायी शॉर्टकट के रूप में करती हैं।
- विचार-विमर्श आधारित कानून-निर्माण में गिरावट: विधेयकों को अक्सर सीमित चर्चा और बहस के साथ पारित कर दिया जाता है।
- कानूनों को वैधता और व्यापक स्वीकार्यता तर्कसंगत विचार-विमर्श तथा सार्वजनिक जाँच-परख से प्राप्त होता है।
- संसदीय समितियों का कमजोर होना: संसदीय समितियाँ द्विदलीय परीक्षण, गहन समीक्षा तथा विशेषज्ञ परामर्श का महत्वपूर्ण मंच प्रदान करती हैं।
- 15वीं लोकसभा में लगभग 71% विधेयकों को समितियों के पास भेजा गया था, जबकि 17वीं लोकसभा में यह संख्या घटकर लगभग 16% रह गई।
- विधायी कार्य के लिए सीमित समय: कई महत्वपूर्ण विधेयक अत्यंत कम समय में प्रस्तुत और पारित कर दिए जाते हैं।
- पर्याप्त चर्चा के अभाव से कानूनों की गुणवत्ता और जवाबदेही प्रभावित होती है।
- प्रश्नकाल का क्षरण: प्रश्नकाल कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण संसदीय तंत्र है।
- बार-बार होने वाले व्यवधान संसद के निगरानी कार्य को कमज़ोर करते हैं।
- दल-बदल विरोधी कानून का प्रभाव: सांसद अक्सर अपने व्यक्तिगत विवेक, स्वतंत्र निर्णय या अंतरात्मा के अनुसार मतदान नहीं कर पाते हैं।
- इससे दल के नेतृत्व की शक्ति बढ़ती है और संसद में स्वतंत्र तथा सार्थक बहस-विमर्श की गुंजाइश सीमित हो जाती है।
न्यायिक अवलोकन
- आर.सी. कूपर मामला (1970): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि अध्यादेश जारी करने की शक्ति न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
- यदि अध्यादेश दुर्भावनापूर्ण (Mala Fide) उद्देश्य से जारी किया गया हो, तो न्यायालय उसे निरस्त कर सकता है।
- डी.सी. वाधवा मामला (1987): सर्वोच्च न्यायालय ने अध्यादेशों को बार-बार पुनः जारी (Re-promulgation) करने की प्रथा की आलोचना की।
- न्यायालय ने इसे “संविधान के साथ धोखाधड़ी” (Fraud on the Constitution) करार दिया।
आगे की राह
- संसदीय समितियों को सशक्त बनाना: महत्वपूर्ण विधेयकों के लिए समिति जाँच को अनिवार्य बनाया जाए।
- द्विदलीय सहभागिता तथा विशेषज्ञ परामर्श को प्रोत्साहित किया जाए।
- अध्यादेशों के उपयोग का विनियमन: अध्यादेश जारी करने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने हेतु अधिक स्पष्ट संवैधानिक परंपराएँ और मानदंड विकसित किए जाने चाहिए।
- अनुच्छेद 123 के प्रयोग के लिए विस्तृत और ठोस औचित्य प्रस्तुत करना अनिवार्य किया जाना चाहिए।
- विचार-विमर्श आधारित प्रक्रियाओं को सुदृढ़ बनाना: महत्वपूर्ण विधेयकों के लिए न्यूनतम बहस और चर्चा की अवधि सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- विपक्षी दलों की पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
- प्रश्नकाल का पुनर्जीवन: प्रश्नकाल को बार-बार निलंबित या कमजोर किए जाने से बचाया जाए।
- जवाबदेही संबंधी तंत्रों को और मजबूत बनाया जाए।
- विधायी अनुसंधान सहायता को सुदृढ़ बनाना: सांसदों के लिए पेशेवर अनुसंधान एवं विश्लेषण सेवाओं का विस्तार किया जाना चाहिए।
- साक्ष्य-आधारित कानून-निर्माण तथा प्रभावी जाँच को बढ़ावा दिया जाए।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: अध्यादेश मार्ग का नियमित उपयोग तथा विधायी जाँच को दरकिनार करना भारत के संसदीय लोकतंत्र में गहरे संस्थागत क्षरण को दर्शाता है। विश्लेषण कीजिए। संसद की विचार-विमर्शात्मक क्षमता को पुनर्स्थापित करने हेतु आवश्यक संरचनात्मक सुधारों का सुझाव दीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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