संदर्भ
शिक्षा सुधारों का विषय हाल ही में शिक्षा सुधारों के समर्थक सोनम वांगचुक के अनिश्चितकालीन अनशन के बाद एक बार पुनः चर्चा में आया है। इस अनशन का उद्देश्य भारत की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक एवं संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता की ओर राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित करना है।
यह मुद्दा इस तथ्य को उजागर करती है कि शिक्षा में स्थायी सुधार केवल राजनीतिक नेतृत्व बदलने से नहीं, बल्कि संस्थागत परिवर्तन से ही संभव है।
शैक्षिक सुधार क्यों आवश्यक हैं?
- भारत विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में से एक है, जो उसकी जनसांख्यिकीय शक्ति का प्रमुख आधार है।
- यदि युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगारोन्मुख कौशल तथा आलोचनात्मक चिंतन विकसित करने के अवसर नहीं मिलते, तो यही जनसांख्यिकीय लाभांश भविष्य में जनसांख्यिकीय बोझ में बदल सकता है।
- शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि नवाचार, उत्तरदायी नागरिकता तथा राष्ट्र निर्माण के लिए सक्षम मानव संसाधन तैयार करना भी होना चाहिए।
भारत की शिक्षा व्यवस्था की प्रमुख चुनौतियाँ
- रटने पर आधारित परीक्षा प्रणाली
- वर्तमान परीक्षा प्रणाली में समझ और विश्लेषण की अपेक्षा याद करने की क्षमता को अधिक महत्त्व दिया जाता है।
- विद्यार्थी विषय को समझने के बजाय पाठ्यपुस्तक की सामग्री को दोहराने पर अधिक ध्यान देते हैं।
- इससे आलोचनात्मक चिंतन, रचनात्मकता तथा समस्या-समाधान क्षमता का विकास बाधित होता है।
- कोचिंग संस्कृति का बढ़ता प्रभाव
- प्रवेश परीक्षाओं ने समानांतर कोचिंग उद्योग को बढ़ावा दिया है।
- परिवारों को कोचिंग संस्थानों पर भारी आर्थिक व्यय करना पड़ता है।
- अधिकांश कोचिंग संस्थान समग्र शिक्षा के बजाय केवल परीक्षा तकनीक और दोहराव पर केंद्रित रहते हैं।
- इससे शैक्षिक असमानता बढ़ती है तथा विद्यार्थियों पर अत्यधिक मानसिक दबाव पड़ता है।
- शिक्षकों की गुणवत्ता में गिरावट
- शिक्षा की गुणवत्ता का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्धारक शिक्षक होते हैं।
- अनेक शिक्षकों को पर्याप्त व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा निरंतर कौशल विकास के अवसर नहीं मिलते।
- समाज में शिक्षण पेशे का सम्मान धीरे-धीरे कम हुआ है।
उक्ति : “कोई भी शिक्षा व्यवस्था अपने शिक्षकों की गुणवत्ता से ऊपर नहीं उठ सकती।”
- शिक्षकों के बड़ी संख्या में रिक्त पद
- विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थानों तथा अन्य संस्थानों में हजारों पद रिक्त हैं।
- शिक्षकों की कमी का सीधा प्रभाव विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता तथा कक्षा शिक्षण की गुणवत्ता पर पड़ता है।
- शिक्षा और समाज के बीच कमजोर संबंध
- शिक्षा का उद्देश्य समाज निर्माण के बजाय केवल रोजगार प्राप्ति तक सीमित होता जा रहा है।
- अनेक विद्यार्थी समुदाय, ग्रामीण विकास तथा लोकसेवा की वास्तविकताओं को समझे बिना ही शिक्षा पूरी कर लेते हैं।
- क्षेत्रीय अनुभव आधारित शिक्षा के सीमित अवसर व्यावहारिक ज्ञान को कमजोर करते हैं।
- सरकारी विद्यालयों पर घटता जनविश्वास
- अनेक सरकारी विद्यालयों में योग्य शिक्षकों, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों तथा डिजिटल सुविधाओं की कमी बनी हुई है।
- परिणामस्वरूप, अभिभावक अवसर मिलने पर निजी विद्यालयों को प्राथमिकता देते हैं।
- शैक्षणिक स्वायत्तता का अभाव
- विश्वविद्यालयों को अत्यधिक प्रशासनिक नियंत्रण का सामना करना पड़ता है।
- पाठ्यक्रम एवं शैक्षणिक निर्णयों पर अत्यधिक नियंत्रण नवाचार, अनुसंधान तथा संस्थागत उत्कृष्टता को सीमित करता है।
- विद्यालयों के प्रदर्शन में पारदर्शिता की कमी
- ऐसी कोई समग्र सार्वजनिक व्यवस्था उपलब्ध नहीं है, जिसमें निम्नलिखित जानकारी उपलब्ध हो—
- शिक्षकों के रिक्त पद
- विद्यार्थियों के अधिगम परिणाम
- अवसंरचना की गुणवत्ता
- विद्यालयों का प्रदर्शन
- शिक्षा में अपर्याप्त निवेश
- कोठारी आयोग (1964–66) ने शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत व्यय करने की अनुशंसा की थी।
- किंतु वर्तमान में शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय लगभग 3–4 प्रतिशत के आसपास है, जिससे आधारभूत संरचना एवं गुणवत्ता सुधार प्रभावित होते हैं।
- नीतियों में बार-बार परिवर्तन
- राजनीतिक परिवर्तन के साथ शिक्षा नीतियों में भी बार-बार बदलाव होता है।
- दीर्घकालिक संस्थागत व्यवस्था के अभाव में सुधारों की निरंतरता प्रभावित होती है।
शिक्षा क्षेत्र में दस प्रमुख सुधार
- परीक्षा प्रणाली में सुधार
- दक्षता आधारित मूल्यांकन अपनाया जाए।
- विषय की समझ, आलोचनात्मक चिंतन, रचनात्मकता तथा समस्या-समाधान क्षमता का मूल्यांकन किया जाए।
- स्मरण-आधारित परीक्षाओं पर निर्भरता कम की जाए।
- मूल्यांकन प्रणाली को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के उद्देश्यों के अनुरूप बनाया जाए।
- कोचिंग संस्कृति को कम करना
- वर्ष भर में अनेक परीक्षा अवसर उपलब्ध कराए जाएँ।
- एक ही उच्च-दांव वाली परीक्षा पर निर्भरता कम की जाए।
- विद्यालयी प्रदर्शन तथा सतत मूल्यांकन को अधिक महत्व दिया जाए।
- प्रवेश परीक्षाओं को रटने के बजाय समझ पर आधारित बनाया जाए।
- राष्ट्रीय शिक्षक उत्कृष्टता अभियान प्रारंभ किया जाए
- प्रतिभाशाली युवाओं को शिक्षण पेशे से जोड़ने के प्रयास किए जाएँ।
- शिक्षक शिक्षा, निरंतर व्यावसायिक विकास तथा मार्गदर्शन कार्यक्रमों को सुदृढ़ किया जाए।
- शिक्षकों की सामाजिक प्रतिष्ठा एवं व्यावसायिक सम्मान बढ़ाया जाए।
- फ़िनलैंड, सिंगापुर तथा जापान जैसे देशों से सीख ली जाए, जहाँ शिक्षण अत्यंत सम्मानित पेशा है।
- निर्धारित समय सीमा में शिक्षकों की भर्ती
- सभी रिक्त शिक्षकीय पदों पर तीन माह के भीतर नियुक्ति पूरी की जाए।
- सभी संस्थानों में पारदर्शी एवं योग्यता आधारित भर्ती सुनिश्चित की जाए।
- शिक्षक की कमी के कारण होने वाले शिक्षण व्यवधानों को समाप्त किया जाए।
- शिक्षा को समाज से पुनः जोड़ा जाए
- इंटर्नशिप, सामुदायिक सेवा तथा ग्रामीण क्षेत्र में अनिवार्य सहभागिता कार्यक्रम प्रारंभ किए जाएँ।
- स्थानीय समुदायों के साथ सहभागिता के माध्यम से अनुभव आधारित शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए।
- शैक्षणिक उपलब्धियों के साथ उत्तरदायी नागरिकता का विकास किया जाए।
- सरकारी विद्यालयों में विश्वास बहाल किया जाए
- निम्नलिखित के लिए न्यूनतम राष्ट्रीय मानक निर्धारित किए जाएँ—
- कक्षाएँ
- प्रयोगशालाएँ
- पुस्तकालय
- डिजिटल अवसंरचना
- सभी विद्यार्थियों को सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति से परे समान गुणवत्ता वाली शिक्षा उपलब्ध कराई जाए तथा विद्यालयों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
- शैक्षणिक स्वायत्तता को बढ़ावा दिया जाए
- विश्वविद्यालयों को निम्नलिखित क्षेत्रों में अधिक स्वतंत्रता दी जाए—
- पाठ्यक्रम निर्माण
- शिक्षण पद्धति
- अनुसंधान की प्राथमिकताएँ
- सरकार का ध्यान संस्थानों के सूक्ष्म प्रबंधन के बजाय अधिगम परिणामों पर होना चाहिए।
- शैक्षणिक स्वतंत्रता नवाचार, अनुसंधान तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रोत्साहित करती है।
- शिक्षा संबंधी सार्वजनिक डैशबोर्ड विकसित किया जाए
- एक राष्ट्रीय वास्तविक समय आधारित शिक्षा डैशबोर्ड तैयार किया जाए, जिसमें निम्नलिखित जानकारी उपलब्ध हो—
- शिक्षकों के रिक्त पद
- अवसंरचना की स्थिति
- विद्यार्थियों के अधिगम परिणाम
- विद्यालयों के प्रदर्शन संकेतक
- सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध होने से जवाबदेही तथा नीति निर्माण दोनों में सुधार होगा।
- शिक्षा में सार्वजनिक निवेश बढ़ाया जाए
- शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय को कोठारी आयोग तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 द्वारा अनुशंसित सकल घरेलू उत्पाद के 6 प्रतिशत तक बढ़ाया जाए।
- निवेश विशेष रूप से निम्न क्षेत्रों में बढ़ाया जाए—
- विद्यालयी अवसंरचना
- डिजिटल शिक्षा
- शिक्षक प्रशिक्षण
- अनुसंधान एवं नवाचार
- स्वतंत्र राष्ट्रीय शिक्षा सुधार आयोग की स्थापना
- एक वैधानिक एवं स्वतंत्र शिक्षा सुधार आयोग स्थापित किया जाए।
- आयोग के प्रमुख कार्य हों—
- राष्ट्रीय मानक निर्धारित करना।
- सुधारों के क्रियान्वयन का मूल्यांकन करना।
- अधिगम परिणामों का आकलन करना।
- समय-समय पर संसद को प्रतिवेदन प्रस्तुत करना।
- ऐसी संस्था राजनीतिक परिवर्तन से परे सुधारों की निरंतरता सुनिश्चित करेगी।
शिक्षा सुधारों को समर्थन देने वाली सरकारी पहलें
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020
- राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा, 2023
- निपुण भारत मिशन
- प्रधानमंत्री स्कूल फॉर राइजिंग इंडिया विद्यालय
- समग्र शिक्षा अभियान
- डिजिटल इंडिया तथा दीक्षा मंच
- स्वयं तथा स्वयं प्रभा
आगे की राह
- परीक्षा प्रणाली को स्मरण-आधारित से दक्षता-आधारित बनाया जाए।
- शिक्षकों की भर्ती तथा निरंतर व्यावसायिक विकास को सुदृढ़ किया जाए।
- प्रवेश परीक्षा सुधारों के माध्यम से कोचिंग पर निर्भरता कम की जाए।
- शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय को सकल घरेलू उत्पाद के 6 प्रतिशत तक बढ़ाया जाए।
- संस्थागत जवाबदेही के साथ शैक्षणिक स्वायत्तता सुनिश्चित की जाए।
- इंटर्नशिप, सामुदायिक सेवा तथा ग्रामीण सहभागिता के माध्यम से अनुभव आधारित शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए।
- स्वतंत्र वैधानिक शिक्षा सुधार आयोग के माध्यम से सुधारों को संस्थागत स्वरूप दिया जाए।
- पारदर्शिता, सुशासन तथा अधिगम परिणामों में सुधार के लिए प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग किया जाए।
निष्कर्ष
भारत का जनसांख्यिकीय लाभ तभी आर्थिक प्रगति का सशक्त आधार बन सकती है, जब उसे गुणवत्तापूर्ण, समावेशी तथा भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा का समर्थन प्राप्त हो। शिक्षा सुधारों का लक्ष्य रटने की प्रवृत्ति, कोचिंग पर अत्यधिक निर्भरता तथा प्रशासनिक नियंत्रण से आगे बढ़कर ऐसी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए, जो आलोचनात्मक चिंतन, नवाचार, समावेशिता और आजीवन सीखने की संस्कृति को प्रोत्साहित करे।
निबंध
प्रश्न : “कोई भी शिक्षा व्यवस्था अपने शिक्षकों की गुणवत्ता से ऊपर नहीं उठ सकती।”
— मैकिंज़ी रिपोर्ट (2007) (1000-1200 शब्द )
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