संदर्भ
पंचायती राज मंत्रालय की एक हालिया रिपोर्ट 1992 के 73वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के तहत संवैधानिक मान्यता के बावजूद ग्राम सभाओं में घटती भागीदारी को रेखांकित करती है।
संवैधानिक पृष्ठभूमि
- 73वें संवैधानिक संशोधन (1992) ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया।
- ग्राम सभा में एक गाँव के सभी पंजीकृत मतदाता शामिल होते हैं।
- यह सहभागी लोकतंत्र की आधारशिला है।
प्रमुख चुनौतियाँ
- भागीदारी की थकान: ग्राम सभा की बैठकों में घटती उपस्थिति बढ़ती जन-उदासीनता को दर्शाती है, और केवल बैठकों की संख्या बढ़ाने से सार्थक भागीदारी में सुधार नहीं होता है।
- योजनागत क्रियान्वयन: ग्राम सभाएँ स्थानीय विकास प्राथमिकताओं पर विचार-विमर्श और निर्णय लेने की बजाय तेजी से केंद्र प्रायोजित योजनाओं को मंजूरी देने वाले मंच बन गई हैं।
- सार्थक परिणामों का अभाव: निर्णयों के खराब क्रियान्वयन और कथित अप्रभावीपन के कारण नागरिक ग्राम सभा की बैठकों में भाग लेने के लिए हतोत्साहित होते हैं।
- भागीदारी के बिना तकनीक: डिजिटल शासन ने रिकॉर्ड रखने में तो सुधार किया है, लेकिन यह आमने-सामने के सार्थक विचार-विमर्श का विकल्प नहीं हो सकता है और अक्सर डिजिटल रूप से वंचित नागरिकों को बाहर कर देता है।
- आर्थिक बहिष्करण: बैठकों में शामिल होने की अवसर लागत दैनिक वेतन भोगियों को हतोत्साहित करती है, जिससे भागीदारी आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति वाले समूहों की ओर झुक जाती है।
- वित्तीय निर्भरता: बद्ध अनुदानों पर अत्यधिक निर्भरता तथा सीमित वित्तीय स्वायत्तता पंचायतों को स्थानीय स्तर पर पहचानी गई विकासात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने से रोकती है।
- PESA का कमजोर कार्यान्वयन: कम उपस्थिति और ग्राम सभा की सहमति का हेरफेर PESA अधिनियम के तहत परिकल्पित जनजातीय स्वशासन की भावना को कमजोर करता है।
परिणाम
- स्थानीय शासन पर संभ्रांत वर्ग का नियंत्रण: सक्रिय जनभागीदारी के अभाव में अक्सर राजनीतिक रूप से जुड़े लोग, दबंग जाति समूह या आर्थिक रूप से शक्तिशाली परिवार जैसे प्रभावशाली स्थानीय संभ्रांत वर्ग निर्णय प्रक्रिया पर हावी हो जाते हैं। इसके कारण संसाधनों का पक्षपातपूर्ण आवंटन होता है, हाशिए पर पड़े समूहों का बहिष्करण, तथा ऐसे निर्णय लिए जाते हैं जो व्यापक समुदायों की बजाय निजी हितों की पूर्ति करते हैं।
- कमजोर जवाबदेही: जब ग्राम सभाएँ प्रभावी ढंग से कार्य नहीं करती हैं, तो निर्वाचित प्रतिनिधियों और अधिकारियों को सीमित सार्वजनिक संवीक्षा का सामना करना पड़ता है। विकास कार्य, वित्तीय व्यय और लाभार्थियों का चयन बिना किसी जाँच के रह जाता है, जिससे भ्रष्टाचार, सार्वजनिक धन के दुरुपयोग, पक्षपात तथा खराब सेवा वितरण का जोखिम बढ़ जाता है।
- नागरिक भागीदारी में गिरावट: गैर-समावेशी बैठकों, पारदर्शिता की कमी और निरर्थक परिणामों के बार-बार के अनुभव लोगों को ग्राम सभा की बैठकों में शामिल होने से हतोत्साहित करते हैं। इससे सार्वजनिक उदासीनता उत्पन्न होती है, विकास कार्यक्रमों के प्रति सामुदायिक स्वामित्व की भावना में कमी तथा सहभागी लोकतंत्र की संस्कृति कमजोर होती है।
- स्थानीय स्वायत्तता में कमी: कमजोर ग्राम सभाएँ स्थानीय प्राथमिकताओं की पहचान करने और स्वतंत्र निर्णय लेने की गांवों की क्षमता को कमजोर करती हैं। परिणामस्वरूप, नियोजन और कार्यान्वयन तेजी से ऊपर से नीचे की ओर तथा नौकरशाही केंद्रित हो जाता है, जिससे 73वें संवैधानिक संशोधन के तहत परिकल्पित विकेंद्रीकृत शासन की भावना सीमित हो जाती है।
- लोकतंत्र का क्षरण: ग्राम सभा ग्रामीण भारत में प्रत्यक्ष लोकतंत्र की नींव है। इसका अप्रभावी कामकाज लोगों की भागीदारी, पारदर्शिता तथा सामूहिक निर्णय प्रक्रिया को कमजोर करता है, जिससे पंचायती राज संस्थाओं में जन-विश्वास में कमी और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण तथा स्वशासन के संवैधानिक दृष्टिकोण से समझौता होता है।
आगे की राह
- धन, कार्य और कर्मी (3F – Funds, Functions and Functionaries) को सुदृढ़ करना
- धन: स्थानीय प्राथमिकताओं के आधार पर धन का उपयोग करने में अधिक लचीलेपन के साथ ग्राम पंचायतों को समय पर, पर्याप्त और पूर्वानुमेय वित्तीय हस्तांतरण सुनिश्चित करना।
- कार्य: सरकार के उच्च स्तरों द्वारा अत्यधिक नियंत्रण और ओवरलैप से बचते हुए, ग्यारहवीं अनुसूची के तहत सभी संवैधानिक रूप से अनिवार्य विषयों को स्पष्ट रूप से हस्तांतरित करना।
- कर्मी: पंचायतों को समर्पित और पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित कर्मचारी प्रदान करना, जिससे प्रभावी स्थानीय शासन के लिए तकनीकी, प्रशासनिक और वित्तीय सहायता सुनिश्चित हो सके।
- नागरिक भागीदारी में सुधार:
- जागरूकता अभियान: सूचित भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए स्कूलों, स्वयं सहायता समूहों, नागरिक समाज संगठन तथा डिजिटल प्लेटफॉर्मों के माध्यम से निरंतर ग्राम सभा जागरूकता तथा प्रक्रियात्मक साक्षरता अभियान शुरू करना।
- दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों के लिए सशुल्क भागीदारी: ग्राम सभा की बैठकों में भाग लेने वाले दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों को मुआवजा या मजदूरी की प्रतिपूर्ति प्रदान करना, जिससे भागीदारी की अवसर लागत कम हो सके।
- बैठकों का बेहतर शेड्यूलिंग: महिलाओं, युवाओं और हाशिए पर पड़े समुदायों तक विशेष पहुंच, अग्रिम सूचना और समाधानपरक सुविधा के साथ सुविधाजनक समय और सुलभ स्थानों पर बैठकें आयोजित करना।
- वित्तीय स्वायत्तता का विस्तार
- अबद्ध अनुदान: अवद्ध और फॉर्मूला-आधारित अनुदानों की हिस्सेदारी बढ़ाना, जिससे पंचायतें अत्यधिक शर्तों के बिना स्थानीय-विशिष्ट विकासात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम हो सकें।
- मजबूत स्थानीय राजस्व सृजन: डिजिटल कर प्रशासन और क्षमता निर्माण द्वारा समर्थित, स्थानीय करों, शुल्कों और उपयोगकर्ता प्रभारों को लगाने, एकत्रण तथा कुशलतापूर्वक प्रबंधित करने के लिए पंचायतों को सशक्त बनाना।
- ग्राम सभा की शक्तियों को मजबूत करना
- वास्तविक विकेंद्रीकरण: ग्राम सभाओं को केवल परामर्शदात्री निकाय मानने की बजाय योजना, बजट, निगरानी और सामाजिक अंकेक्षण में वास्तविक निर्णय अधिकार सुनिश्चित करना।
- PESA के तहत स्थानीय सहमति का सम्मान: अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण, खनन, वन संसाधनों और पुनर्वास से संबंधित मामलों में ग्राम सभाओं की स्वतंत्र, पूर्व तथा सूचित सहमति को अनिवार्य बनाकर पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 को कठोरता से लागू करना।
महत्त्वपूर्ण शब्दावली
- भागीदारी में कमी
- निर्मित सहमति
- योजना-क्रियान्वयन
- लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण
- आर्थिक बहिष्करण
निष्कर्ष
लोकतंत्र चुनावों के साथ समाप्त नहीं होता है। यह तभी सार्थक बनता है, जब नागरिक सशक्त ग्राम सभाओं के माध्यम से स्थानीय निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भागीदारी करते हैं।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. “भारत में विकेंद्रीकृत लोकतंत्र अपनी स्वायत्तता खो रहा है, और केवल केंद्रीय योजनाओं के लिए एक कार्यान्वयन संस्था बनकर रह गया है।” पेसा (PESA) और स्थानीय वित्तपोषण से जुड़े मुद्दों के आलोक में इस कथन का परीक्षण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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