संदर्भ
जैसे-जैसे भारत अपने वैश्विक व्यापार वार्ताओं को आगे बढ़ा रहा है, सभी वस्तुओं को समान सौदेबाजी के साधन के रूप में देखने का प्रलोभन हो सकता है। हालाँकि, भारत को विदेशी शराब और तंबाकू उत्पादों को कम सीमा शुल्क पर देश में प्रवेश करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।
- यह केवल अर्थशास्त्र या संरक्षणवाद का प्रश्न नहीं है। बल्कि यह एक संवैधानिक, नैतिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी अनिवार्यता है।
संवैधानिक और नैतिक दायित्व
- अनुच्छेद 47 और राज्य के नीति-निर्देशक तत्व: संविधान का अनुच्छेद 47 राज्य को यह निर्देश देता है कि वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पेय और नशीले पदार्थों के निषेध का प्रयास करे।
- संविधान की भावना: व्यापार और आर्थिक नीतियां संवैधानिक नैतिकता के अनुरूप होनी चाहिए।
- राष्ट्रीय हित को नागरिकों के स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण से अलग नहीं किया जा सकता।
सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंताएं
- लत और मृत्यु दर: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भारत में लगभग 4 करोड़ लोग शराब की लत से पीड़ित हैं, जबकि तंबाकू के सेवन से प्रत्येक वर्ष 10 लाख से अधिक मौतें होती हैं। जो एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या को दर्शाता है।
- उपभोग का कोई सुरक्षित स्तर नहीं: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और द लैंसेट (The Lancet) द्वारा उद्धृत अध्ययनों से संकेत मिलता है कि शराब के सेवन का कोई सुरक्षित स्तर नहीं है, क्योंकि थोड़ी मात्रा भी स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचा सकती है।
- रोगों का बोझ: शराब का सेवन कई प्रकार के कैंसर, हृदय संबंधी रोगों, यकृत विकारों और भारत में गैर-संचारी रोगों की व्यापक वृद्धि से जुड़ा हुआ है।
- स्वास्थ्य चेतावनी प्रस्ताव: अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य निकायों ने शराब की बोतलों पर अनिवार्य चेतावनी लेबल लगाने का प्रस्ताव दिया है, जो कैंसर और अन्य बीमारियों से इसके संबंध को उजागर करते हैं।
- राज्य स्तर पर प्रतिबंध: गुजरात, बिहार, नागालैंड और मिजोरम जैसे राज्यों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए शराबबंदी लागू की है।
वैश्विक और सिद्धांत आधारित दृष्टिकोण
- WTO वार्ता रणनीति: भारत विश्व व्यापार संगठन (WTO) में शराब और तंबाकू के मुद्दे पर एक सिद्धांत आधारित रुख अपना सकता है, जैसा कि उसने सस्ती जेनेरिक दवाओं के मामले में किया है।
- अपरिवर्तनीय सार्वजनिक स्वास्थ्य सीमा: शराब और तंबाकू जैसे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक उत्पादों पर शुल्क और नियामक नियंत्रण को सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए गैर-परक्राम्य सुरक्षा उपायों के रूप में माना जा सकता है।
निष्कर्ष
भारत को व्यापार वार्ताओं में एक दृढ़, स्वास्थ्य-प्रथम दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, ताकि आर्थिक विकास एक अधिक स्वस्थ और सामाजिक रूप से जिम्मेदार समाज के संवैधानिक दृष्टिकोण के साथ संरेखित हो सके।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: क्या शराब और तंबाकू जैसे हानिकारक उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं में अलग तरीके से देखा जाना चाहिए? समालोचनात्मक चर्चा कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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