चीन की बढ़ती अंतरिक्ष शक्ति और भारत के लिए निहितार्थ

चीन की बढ़ती अंतरिक्ष शक्ति और भारत के लिए निहितार्थ 2 Jun 2026

संदर्भ:

अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक अन्वेषण तक सीमित नहीं रह गया है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा, संचार, नौवहन, खुफिया जानकारी एकत्रीकरण, बैंकिंग तथा सैन्य अभियानों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका है। एक व्यापक रूप से उद्धृत सामरिक सिद्धांत कहता है:

जो अंतरिक्ष को नियंत्रित करता है, वही पृथ्वी को नियंत्रित करता है।”

जैसे-जैसे देशों की निर्भरता उपग्रहों पर बढ़ती जा रही है, बाह्य अंतरिक्ष भविष्य के संभावित संघर्षों के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभर रहा है।

अंतरिक्ष का सैन्यीकरण बनाम हथियारीकरण 

अंतरिक्ष का सैन्यीकरण 

निम्नलिखित सैन्य सहायता कार्यों के लिए अंतरिक्ष परिसंपत्तियों का उपयोग:

  • निगरानी एवं टोही (Surveillance and Reconnaissance)
  • नौवहन (Navigation)
  • संचार (Communication)
  • मिसाइल चेतावनी प्रणालियाँ (Missile Warning Systems)
  • खुफिया जानकारी एकत्र करना (Intelligence Gathering)

अंतरिक्ष का हथियारीकरण 

अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती अथवा ऐसे तंत्रों का विकास, जिन्हें अंतरिक्ष परिसंपत्तियों को नष्ट करने, निष्क्रिय करने या उनके कार्य में बाधा उत्पन्न करने के लिए निर्मित किया गया है।

अंतरिक्ष संघर्ष के जोखिम क्यों बढ़ रहे हैं?

  • प्रभावी अंतरराष्ट्रीय नियमों का अभाव: अंतरिक्ष हथियारों की तैनाती या उनके उपयोग पर प्रतिबंध लगाने वाली कोई व्यापक वैश्विक संधि विद्यमान नहीं है। वर्तमान कानूनी ढाँचे एंटी-सैटेलाइट (ASAT) क्षमताओं तथा अन्य उभरती हुई प्रति-अंतरिक्ष (Counter-Space) प्रौद्योगिकियों को विनियमित करने के लिए अभी भी अपर्याप्त हैं।
  • निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में भीड़भाड़: अधिकांश सक्रिय उपग्रह निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में केंद्रित हैं, जिससे यह क्षेत्र लगातार अधिक भीड़भाड़ वाला होता जा रहा है। वर्ष 2030 तक 36,000 से अधिक उपग्रहों की तैनाती की चीन की योजना कक्षीय भीड़भाड़, टकराव के जोखिम तथा अंतरिक्ष मलबे के निर्माण में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकती है।
  • उपग्रहों की द्वि-उपयोगी (Dual-Use) प्रकृति: आधुनिक उपग्रह संचार, नौवहन तथा निगरानी सहित नागरिक और सैन्य दोनों प्रकार के कार्य करते हैं। किसी संघर्ष की स्थिति में, उनकी सैन्य उपयोगिता के कारण विरोधी देश इन परिसंपत्तियों को निशाना बना सकते हैं, भले ही वे नागरिक आबादी के लिए कितनी भी महत्वपूर्ण क्यों न हों।

केसलर सिंड्रोम (Kessler Syndrome): उभरता हुआ खतरा

केसलर सिंड्रोम क्या है?

  • केसलर सिंड्रोम ऐसी स्थिति को संदर्भित करता है जिसमें दो उपग्रह आपस में टकरा जाते हैं और बड़ी मात्रा में अंतरिक्ष मलबा उत्पन्न होता है। यह मलबा अन्य उपग्रहों से टकराकर और अधिक मलबा उत्पन्न करता है, जिससे अंतरिक्ष में एक स्व-स्थायी श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया (Cascade Effect) शुरू हो जाती है।

केसलर सिंड्रोम के परिणाम

  • कक्षीय मलबे का अत्यधिक संचय: अंतरिक्ष मलबे की बढ़ती मात्रा कुछ कक्षीय क्षेत्रों को भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों एवं परिचालनों के लिए असुरक्षित तथा अनुपयोगी बना सकती है।
  • भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों में कठिनाई: अंतरिक्ष मलबे का उच्च घनत्व टकराव के जोखिम को काफी बढ़ा सकता है, जिससे उपग्रह प्रक्षेपण तथा अंतरिक्ष अन्वेषण मिशन अधिक चुनौतीपूर्ण और महंगे हो सकते हैं।
  • महत्वपूर्ण सेवाओं में व्यवधान: उपग्रह नेटवर्क को होने वाली क्षति वैश्विक स्तर पर संचार, नौवहन, मौसम पूर्वानुमान, बैंकिंग सेवाओं तथा सैन्य अभियानों को बाधित कर सकती है।

चीन की विस्तारित अंतरिक्ष क्षमताएँ

  • 2007: एंटी-सैटेलाइट (ASAT) परीक्षण: चीन ने एक मिसाइल की सहायता से अपने ही एक उपग्रह को सफलतापूर्वक नष्ट कर अपनी एंटी-सैटेलाइट (ASAT) क्षमता का प्रदर्शन किया। इस परीक्षण ने यह प्रदर्शित किया कि संघर्ष की स्थिति में चीन विरोधी देशों के उपग्रहों को निशाना बनाने तथा संभावित रूप से उन्हें निष्क्रिय करने की क्षमता रखता है।
  • 2015: बाह्य-वायुमंडलीय अवरोधन यान (Exo-Atmospheric Vehicle) परीक्षण: चीन ने एक ऐसे बाह्य-वायुमंडलीय अवरोधन यान का परीक्षण किया जो पृथ्वी के वायुमंडल से परे कार्य करने में सक्षम था। इस परीक्षण ने उन प्रौद्योगिकियों में हुई प्रगति को प्रदर्शित किया जो अंतरिक्ष-आधारित परिसंपत्तियों को लक्ष्य बनाने या उनसे संलग्न होने में सक्षम हो सकती हैं।
  • 2022: रोबोटिक उपग्रह संचालन: चीन ने कक्षा में उपग्रहों को संचालित, डॉक तथा पुनः स्थानांतरित करने की क्षमता का प्रदर्शन किया। यद्यपि ये प्रौद्योगिकियाँ उपग्रहों की मरम्मत एवं सेवा के लिए उपयोगी हैं, किंतु इनमें विरोधी देशों की अंतरिक्ष परिसंपत्तियों के विरुद्ध संभावित सैन्य उपयोग की क्षमता भी निहित है।
  • 2024: उपग्रह डॉगफाइटिंग (Dogfighting) प्रदर्शन: रिपोर्टों के अनुसार, चीनी उपग्रहों ने कक्षा में ऐसे जटिल संचालन किए जो हवाई युद्ध की रणनीतियों से मिलते-जुलते थे। इन प्रदर्शनों ने अंतरिक्ष में गतिशील संचालन क्षमता तथा संभावित प्रति-अंतरिक्ष अभियानों में चीन की बढ़ती विशेषज्ञता को दर्शाया।

चीन का दीर्घकालिक अंतरिक्ष दृष्टिकोण

  • 2036 तक मानव चंद्र मिशन: चीन का लक्ष्य वर्ष 2036 तक चीनी अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर उतारना है। यह उसके मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी तथा एक प्रमुख अंतरिक्ष शक्ति के रूप में उसकी स्थिति को और अधिक सुदृढ़ करेगी।
  • 2040 तक परमाणु-शक्ति चालित अंतरिक्ष परिवहन: चीन की योजना परमाणु ऊर्जा से संचालित अंतरिक्ष यान एवं प्रणोदन प्रणालियाँ विकसित करने की है, जिससे गहरे अंतरिक्ष की खोज अधिक तीव्र, कुशल और दीर्घ-दूरी तक संभव हो सकेगी।
  • 2050 तक अंतरिक्ष-आधारित सौर ऊर्जा: चीन अंतरिक्ष में सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की योजना बना रहा है, जो कक्षा में सौर ऊर्जा एकत्र कर उसे पृथ्वी पर प्रेषित कर सकेंगे।
  • खगोलीय पिंडों से संसाधन निष्कर्षण: चीन चंद्रमा एवं क्षुद्रग्रहों से महत्वपूर्ण खनिजों एवं दुर्लभ संसाधनों के खनन की संभावनाओं का अध्ययन कर रहा है, ताकि भविष्य की औद्योगिक एवं तकनीकी आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।

चीन में निजी अंतरिक्ष क्षेत्र का उदय

चीनी निजी कंपनियाँ वैश्विक प्रतिस्पर्धियों को चुनौती देने लगी हैं।

प्रमुख उदाहरण:

  • लैंडस्पेस (LandSpace)
  • आईस्पेस (iSpace)
  • वनस्पेस (OneSpace)

ये कंपनियाँ चीन की राज्य-नेतृत्व वाली अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं की पूरक हैं।

उपग्रह क्षमताओं की तुलनात्मक समीक्षा

देश

उपग्रहों की अनुमानित संख्या

संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)

8,000+

चीन

1,900+

भारत

लगभग 60

भारत के लिए रणनीतिक चिंता

  • महाशक्तियों के विशाल उपग्रह समूह (Satellite Constellations): संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के पास हजारों उपग्रह हैं, जो उन्हें अंतरिक्ष अभियानों में उच्च स्तर की अतिरिक्त क्षमता तथा लचीलापन प्रदान करते हैं।
  • उपग्रह हानि का सीमित प्रभाव: अपने विशाल उपग्रह समूहों (Constellations) के कारण, कुछ उपग्रहों के नष्ट होने या निष्क्रिय हो जाने से संयुक्त राज्य अमेरिका अथवा चीन की परिचालन क्षमताओं पर कोई विशेष प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है।
  • भारत की तुलनात्मक संवेदनशीलता: भारत का अपेक्षाकृत छोटा उपग्रह नेटवर्क उसे अधिक संवेदनशील बनाता है, क्योंकि कुछ महत्वपूर्ण उपग्रहों की क्षति भी राष्ट्रीय सुरक्षा तथा आवश्यक सेवाओं को प्रभावित कर सकती है।

ताइवान परिदृश्य और अंतरिक्ष युद्ध

संभवतः भविष्य के किसी संघर्ष का पहला चरण

  • उपग्रह जैमिंग (Satellite Jamming): विरोधी देश उपग्रह संकेतों को बाधित करने का प्रयास कर सकते हैं, जिससे संचार और नौवहन प्रणालियाँ प्रभावित हो सकती हैं।
  • सिग्नल व्यवधान (Signal Disruption): इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप के माध्यम से सैन्य एवं नागरिक उपग्रह नेटवर्क की कार्यक्षमता को कमजोर किया जा सकता है।
  • अंतरिक्ष अवसंरचना पर साइबर हमले: भूमि-आधारित नियंत्रण केंद्रों तथा उपग्रह नियंत्रण प्रणालियों को साइबर युद्ध के माध्यम से निशाना बनाया जा सकता है।
  • सूचना युद्ध: संघर्ष के प्रारंभिक चरणों में सूचना प्रवाह एवं जन-धारणाओं को नियंत्रित करना एक प्रमुख उद्देश्य बन सकता है।

सामरिक उद्देश्य

  • निगरानी प्रणालियों को अंधा बनाना: शत्रु की सैन्य गतिविधियों और सैनिकों की आवाजाही पर निगरानी रखने की क्षमता को बाधित या निष्क्रिय करना।
  • संचार नेटवर्क को बाधित करना: कमांड, नियंत्रण तथा समन्वय क्षमताओं को कमजोर करना।
  • सूचना परिवेश पर नियंत्रण: जनमत को प्रभावित करना तथा सामरिक एवं रणनीतिक निर्णय-निर्माण प्रक्रिया को प्रभावित करना।

अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की संवेदनशीलताएँ 

उपग्रहों पर निर्भर महत्वपूर्ण प्रणालियाँ

  • नौवहन: नाविक (NavIC – Navigation with Indian Constellation) भारत द्वारा विकसित एक क्षेत्रीय उपग्रह-आधारित स्थिति निर्धारण एवं नेविगेशन सेवा है, जो भारत तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में सटीक स्थान और दिशा संबंधी जानकारी प्रदान करती है।
  • पृथ्वी अवलोकन उपग्रह
    • Cartosat श्रृंखला : उच्च-रिज़ॉल्यूशन इमेजिंग एवं मानचित्रण।
    • RISAT श्रृंखला : रडार इमेजिंग एवं सभी मौसमों में निगरानी।
  • संचार
    • GSAT श्रृंखला : संचार एवं प्रसारण सेवाएँ प्रदान करती है।

उपग्रह व्यवधान के संभावित परिणाम

  • सीमा निगरानी में गिरावट: संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों की निगरानी में कमी।
  • नौवहन प्रणाली की विफलता: सैन्य एवं नागरिक नौवहन सेवाएँ प्रभावित हो सकती हैं।
  • संचार व्यवस्था में बाधा : रणनीतिक संचार तथा आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र प्रभावित हो सकते हैं।
  • सैन्य परिचालन संबंधी चुनौतियाँ: स्थितिजन्य जागरूकता में कमी तथा युद्धक प्रभावशीलता का ह्रास।

भारत की वर्तमान शक्तियाँ

मिशन शक्ति (Mission Shakti), 2019

  • भारत ने निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में एक उपग्रह को नष्ट करके सफलतापूर्वक एंटी-सैटेलाइट (ASAT) क्षमता का प्रदर्शन किया।
  • इस मिशन ने भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में स्थापित किया जिनके पास विश्वसनीय प्रति-अंतरिक्ष (Counter-Space) क्षमताएँ हैं।

सामरिक प्रतिरोधक क्षमता 

संभावित विरोधियों को इस पर विचार करना चाहिए:

  • प्रतिशोधी क्षमता: भारत अंतरिक्ष में किसी भी शत्रुतापूर्ण कार्रवाई का जवाब देने की क्षमता रखता है।
  • कक्षीय मलबे का जोखिम: उपग्रहों पर किसी भी हमले से उत्पन्न मलबा सभी अंतरिक्ष उपयोगकर्ताओं के लिए खतरा बन सकता है।
  • केसलर सिंड्रोम (Kessler Syndrome) की संभावना: बड़े पैमाने पर उपग्रहों के विनाश से अंतरिक्ष मलबे की श्रृंखलाबद्ध वृद्धि हो सकती है, जिससे वैश्विक अंतरिक्ष अवसंरचना को गंभीर क्षति पहुँचने का खतरा उत्पन्न हो सकता है।

भारत के लिए नीतिगत सुझाव

  • निजी अंतरिक्ष उद्योग को सशक्त बनाना: निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी को प्रोत्साहित करके ISRO पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना तथा अंतरिक्ष क्षेत्र में नवाचार, निवेश और प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देना।
    • जैसे:
      • उपग्रह निर्माण
      • प्रक्षेपण सेवाएँ (Launch Services)
      • अंतरिक्ष स्टार्टअप
      • वाणिज्यिक अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र
  • उपग्रह अतिरिक्तता (Satellite Redundancy) का निर्माण: कुछ बड़े उपग्रहों पर निर्भर रहने के बजाय वितरित उपग्रह समूहों (Distributed Satellite Constellations) का विकास करना, ताकि किसी एक या कुछ उपग्रहों के निष्क्रिय होने पर भी संपूर्ण प्रणाली की कार्यक्षमता बनी रहे।
  • भूमि-आधारित अवसंरचना को सुरक्षित बनाना:
    • भौतिक सुरक्षा (Physical Security): भू-आधारित नियंत्रण एवं संचार केंद्रों को तोड़फोड़, जासूसी तथा भौतिक हमलों से सुरक्षित रखना।
    • साइबर सुरक्षा (Cyber Security): निम्नलिखित खतरों के विरुद्ध सुरक्षा को मजबूत किया जाए:
      • हैकिंग
      • मैलवेयर हमले
      • इलेक्ट्रॉनिक युद्ध
      • डेटा चोरी एवं डेटा उल्लंघन
  • अंतरराष्ट्रीय डेटा-साझाकरण साझेदारियों का विस्तार: निम्नलिखित देशों एवं संगठनों के साथ सहयोग को और मजबूत करना:
    • संयुक्त राज्य अमेरिका
    • फ्रांस
    • जापान
  • सामरिक “रेड लाइन्स” निर्धारित करना: भारत को स्पष्ट रूप से यह परिभाषित करना चाहिए कि कौन-सी गतिविधियाँ उसकी अंतरिक्ष परिसंपत्तियों पर हमला मानी जाएँगी।
    • साथ ही, अंतरिक्ष में शत्रुतापूर्ण कार्रवाई की स्थिति में संभावित कूटनीतिक, आर्थिक, साइबर तथा सैन्य प्रतिक्रियाओं को स्पष्ट रूप से संप्रेषित किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

  • भविष्य के संघर्षों का विस्तार तेजी से अंतरिक्ष क्षेत्र तक हो सकता है। चीन अंतरिक्ष क्षेत्र में अपनी तकनीकी, वाणिज्यिक तथा सैन्य क्षमताओं का तीव्र विस्तार कर रहा है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता तथा दीर्घकालिक अंतरिक्ष हितों की रक्षा के लिए भारत को मजबूत एवं लचीले उपग्रह नेटवर्क, निजी क्षेत्र की उन्नत क्षमताएँ, अंतरराष्ट्रीय साझेदारियाँ तथा विश्वसनीय प्रतिरोधक तंत्र विकसित करने होंगे।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: बाह्य अंतरिक्ष (Outer Space) प्रमुख शक्तियों के बीच सामरिक प्रतिस्पर्धा का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बनकर उभर रहा है। चीन की बढ़ती प्रति-अंतरिक्ष (Counter-Space) क्षमताओं के भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा एवं अंतरिक्ष परिसंपत्तियों पर पड़ने वाले प्रभावों का परीक्षण कीजिए। भारत की अंतरिक्षीय लचीलापन (Space Resilience) को सुदृढ़ करने हेतु आवश्यक उपाय सुझाइए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

चीन की बढ़ती अंतरिक्ष शक्ति और भारत के लिए निहितार्थ

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