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आस्था, संविधान और आध्यात्मिकता

आस्था, संविधान और आध्यात्मिकता 25 Mar 2026

संदर्भ

हाल ही में केदारनाथ-बद्रीनाथ मंदिर समिति ने घोषणा की कि मंदिर में प्रवेश के लिए गैर-हिंदुओं को एक शपथपत्र देना होगा, जिसमें वे सनातन धर्म में अपनी आस्था व्यक्त करें।

पृष्ठभूमि

  • पवित्र स्थल के रूप में मंदिर: समिति ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए उचित ठहराया कि केदारनाथ (उत्तराखंड) मुख्यतः एक पवित्र आध्यात्मिक स्थल है, न कि एक पर्यटन स्थल। इसलिए इसके धार्मिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए कुछ प्रतिबंध आवश्यक हैं।
  • मंदिर परिसर में आचरण का नियमन: आध्यात्मिक वातावरण को बनाए रखने के लिए समिति ने सख्त ड्रेस कोड लागू किया है और मंदिर परिसर के भीतर फोटोग्राफी तथा वीडियोग्राफी पर प्रतिबंध लगाया है।
  • पारंपरिक मानदंडों का उल्लेख: समिति का कहना है कि ये उपाय पूरी तरह नए नहीं हैं, बल्कि आदि शंकराचार्य से जुड़े पारंपरिक नियमों का ही अनुपालन हैं, जिन्हें केदारनाथ मंदिर के पुनरुद्धार का श्रेय दिया जाता है।

आदि शंकराचार्य का अद्वैत वेदांत गैर-द्वैतवाद का प्रतिपादन करता है, जिसमें कहा गया है कि केवल ब्रह्म (परम सत्य) ही वास्तविक है, जबकि यह संसार माया (भ्रम) द्वारा निर्मित एक अभिव्यक्ति है, और व्यक्तिगत आत्मा (आत्मा) ब्रह्म के समान ही है।

धर्म बनाम आध्यात्मिकता

  • संस्थागत व्यवस्था के रूप में धर्म: धर्म एक संगठित प्रणाली है, जिसमें विश्वास, अनुष्ठान, शास्त्र और औपचारिक पहचान (जैसे—हिंदू, मुस्लिम) शामिल होते हैं, जिनका पालन अनुयायी एक संरचित सामाजिक ढाँचे के भीतर करते हैं।
  • आंतरिक अनुभव के रूप में आध्यात्मिकता: आध्यात्मिकता एक व्यक्तिगत और आंतरिक खोज है, जिसमें व्यक्ति जीवन के अर्थ और आत्मा या उच्चतर सत्य से जुड़ने का प्रयास करता है। यह व्यक्तिपरक होती है और बाह्य रूप से सत्यापित नहीं की जा सकती।
  • धर्म से परे आध्यात्मिकता: आध्यात्मिकता केवल संगठित धर्म तक सीमित नहीं है।

संवैधानिक चिंताएँ

  • कानून के समक्ष समानता: केदारनाथ मंदिर में प्रवेश के लिए केवल गैर-हिंदुओं से शपथपत्र की मांग करना असमान व्यवहार और धार्मिक भेदभाव संबंधी चिंताएँ उत्पन्न करता है, जो संभावित रूप से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन हो सकता है।
  • धार्मिक भेदभाव का निषेध: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 राज्य को नागरिकों के साथ धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है, जिससे धर्म-आधारित प्रवेश शर्तें संवैधानिक रूप से विवादास्पद बन जाती हैं।
  • विवेक और धर्म की स्वतंत्रता: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 व्यक्तियों को धर्म का पालन और प्रचार करने की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है, और आलोचकों का तर्क हैं कि आस्था की अनिवार्य घोषणाएँ इस स्वतंत्रता का उल्लंघन कर सकती हैं।

कानूनी उदाहरण

  • सबरीमला निर्णय (2018): इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य (2018) में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सभी व्यक्तियों पर लागू होता है और केवल आस्था के आधार पर मंदिर प्रवेश में बहिष्कार या भेदभाव को उचित ठहराया नहीं जा सकता।
  • शिरूर मठ मामला (1954): कमिश्नर, हिंदू धार्मिक एंडॉवमेंट्स बनाम श्री लक्ष्मिंद्र तीर्थ स्वामीयर (1954) में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने “आवश्यक धार्मिक प्रथा (ERP)” सिद्धांत विकसित किया, जिसके अनुसार केवल वही प्रथाएँ जिन्हें किसी धर्म के लिए अनिवार्य माना जाता है, अनुच्छेद 25 के तहत संवैधानिक संरक्षण प्राप्त करती हैं।
    • ERP परीक्षण के तहत, यदि गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना कोई आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है, तो न्यायालय ऐसे प्रतिबंधों को संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन मानते हुए निरस्त कर सकता है।

भारत की समावेशी परंपरा

  • तीर्थ स्थलों की समावेशी प्रकृति: भारत के कई प्रमुख तीर्थ स्थल, जैसे हाजी अली दरगाह, स्वर्ण मंदिर और राम मंदिर, ऐतिहासिक रूप से विभिन्न धर्मों के श्रद्धालुओं के लिए खुले रहे हैं।
  • बहुलतावाद की सभ्यतागत भावना: भारत की धार्मिक परंपराएँ अक्सर खुलापन (openness) और सह-अस्तित्व पर जोर देती हैं, जहाँ पवित्र स्थल केवल पूजा के स्थान ही नहीं बल्कि साझा सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक भी होते हैं।
  • हिंदू चिंतन में सहिष्णुता: हिंदू दार्शनिक परंपराएँ लंबे समय से बहुलतावाद और स्वीकृति के विचारों से जुड़ी रही हैं, जो बहिष्कार के बजाय समावेशन को प्रोत्साहित करती हैं।

निष्कर्ष

आस्था और आध्यात्मिकता अत्यंत व्यक्तिगत विषय हैं, जिन्हें शपथपत्र जैसी प्रशासनिक प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं किया जा सकता।

  • इसलिए, पवित्र स्थलों का प्रबंधन करते समय धार्मिक परंपराओं की पवित्रता को संविधान में निहित समानता, विवेक की स्वतंत्रता और भारत की लंबे समय से चली आ रही बहुलतावादी भावना के साथ संतुलित करना चाहिए।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: भारतीय संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता पर होने वाली बहसें पश्चिमी देशों की बहसों से किस प्रकार भिन्न हैं?

 (10 अंक, 150 शब्द)

आस्था, संविधान और आध्यात्मिकता

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