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FCRA संशोधन विधेयक 2026: विनियमन बनाम NGO पर नियंत्रण

FCRA संशोधन विधेयक 2026: विनियमन बनाम NGO पर नियंत्रण 12 Jun 2026

संदर्भ:

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) भारत में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और अन्य संस्थाओं द्वारा विदेशी धनराशि की प्राप्ति एवं उपयोग को विनियमित करता है। यह कानून मूल रूप से वर्ष 1976 में आपातकाल के दौरान लागू किया गया था, ताकि संगठनों को मिलने वाली बाह्य वित्तीय सहायता के माध्यम से भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी प्रभाव को रोका जा सके।

  • बाद में इस कानून को विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया, जिसके तहत विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया। वर्ष 2020 में किए गए संशोधनों के माध्यम से NGOs पर अधिक कड़े नियामकीय प्रावधान लागू किए गए।

FCRA संशोधन 2020 के अंतर्गत किए गए प्रमुख परिवर्तन

  • SBI नई दिल्ली FCRA खाते की अनिवार्यता: विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले NGOs को केवल स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI), नई दिल्ली शाखा में FCRA खाता खोलना अनिवार्य किया गया।
    • इसका उद्देश्य निगरानी और पारदर्शिता को बेहतर बनाना था।
  • प्रशासनिक व्यय सीमा: पहले NGOs विदेशी अंशदान से प्राप्त धनराशि का 50% तक प्रशासनिक खर्चों पर व्यय कर सकते थे।
    • इस सीमा को घटाकर 20% कर दिया गया, जिससे वेतन, किराया तथा प्रबंधन संबंधी खर्चों पर होने वाला व्यय सीमित हो गया।
  • उप-अनुदान (Sub-granting) पर प्रतिबंध: विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले बड़े NGOs अब उस धनराशि को छोटे NGOs को हस्तांतरित नहीं कर सकते।
    • उन्हें परियोजनाओं का कार्यान्वयन स्वयं प्रत्यक्ष रूप से करना होगा।

FCRA संशोधन विधेयक 2026: प्रमुख प्रावधान

सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए यह विधेयक प्रस्तुत किया है, जबकि आलोचकों का तर्क है कि इससे नागरिक समाज संगठनों पर कार्यपालिका का नियंत्रण बढ़ता है।

  • धारा 14B – पंजीकरण का स्वतः निरस्तीकरण: पहले FCRA पंजीकरण मुख्यतः नियमों के उल्लंघन के बाद रद्द किया जाता था, लेकिन अब पंजीकरण के नवीनीकरण में देरी या सरकारी स्वीकृति लंबित रहने की स्थिति में पंजीकरण स्वतः समाप्त हो सकता है। इससे NGO की किसी गलती या कदाचार के बिना भी पंजीकरण रद्द होने का जोखिम उत्पन्न होता है तथा उचित विधिक प्रक्रिया के अभाव को लेकर चिंताएँ बढ़ती हैं।
  • NGO की संपत्तियों और निधियों का हस्तांतरण: यदि किसी NGO का FCRA पंजीकरण समाप्त हो जाता है, रद्द कर दिया जाता है या स्वेच्छा से समर्पित कर दिया जाता है, तो उसकी विदेशी निधियाँ, संपत्ति और अन्य परिसंपत्तियाँ न्यायालय की अनिवार्य अनुमति के बिना सरकार द्वारा नामित किसी प्राधिकरण को हस्तांतरित की जा सकती हैं। इसमें वे परिसंपत्तियाँ भी शामिल हो सकती हैं जो आंशिक रूप से घरेलू (देशीय) धनराशि से निर्मित की गई हों। इससे अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) तथा कार्यपालिका के अतिक्रमण को लेकर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
  • निलंबन के बाद प्रतिबंध: किसी NGO के निलंबित होने के बाद वह सरकार की पूर्व अनुमति के बिना अपनी मौजूदा संपत्तियों या निधियों का उपयोग नहीं कर सकता। इससे उसके कार्य संचालन में बाधा उत्पन्न हो सकती है तथा प्रशासनिक नियंत्रण और संचालनात्मक स्वायत्तता के संबंध में चिंताएँ बढ़ सकती हैं।
  • जाँच संबंधी शक्तियाँ: पहले राज्य पुलिस और अन्य एजेंसियाँ FCRA उल्लंघनों की स्वतंत्र रूप से जाँच कर सकती थीं, लेकिन अब उन्हें जाँच प्रारंभ करने से पहले केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति प्राप्त करनी होगी। इससे शक्तियों के केंद्रीकरण तथा राज्यों की स्वायत्तता में कमी को लेकर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।

भारत में NGOs का महत्व

  • NGOs भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे लगभग 27 लाख रोजगार सृजित करते हैं, लाखों स्वयंसेवकों को सामाजिक कार्यों से जोड़ते हैं तथा देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 2% से अधिक का योगदान देते हैं।
  • किसी NGO का लाइसेंस रद्द होने से उन लाखों लाभार्थियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जो स्वास्थ्य सेवाओं, पोषण, बाल संरक्षण तथा कल्याणकारी सहायता जैसी आवश्यक सेवाओं के लिए इन संगठनों पर निर्भर हैं।

संवैधानिक चिंताएँ

  • आलोचकों का तर्क है कि NGOs पर अत्यधिक प्रतिबंध संविधान द्वारा प्रदत्त सुरक्षा और अधिकारों को कमजोर कर सकते हैं, जिसमें अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता), अनुच्छेद 19(1)(c) (संघ या संगठन बनाने की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 25–26 (धर्म की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 29–30 (अल्पसंख्यकों के अधिकार) तथा अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) शामिल हैं।

आगे की राह

  • राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी वास्तविक चिंताओं को स्वीकार करते हुए विदेशी धन के दुरुपयोग को रोकना चाहिए।
  • वास्तविक उल्लंघनों के विरुद्ध साक्ष्य-आधारित जाँच और कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
  • ऐसे व्यापक प्रतिबंधों से बचना चाहिए जो पूरे NGO क्षेत्र को प्रभावित करें।
  • लाइसेंस निलंबन या निरस्तीकरण संबंधी निर्णयों में पारदर्शिता और विधिक प्रक्रिया सुनिश्चित की जानी चाहिए।
  • नागरिक समाज संगठनों की स्वायत्तता की रक्षा करते हुए नियामकीय निगरानी को मजबूत किया जाना चाहिए।
  • सुरक्षा हितों और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं तथा संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित किया जाना चाहिए।
  • सामाजिक विकास के लिए सरकार और विश्वसनीय NGOs के बीच सहयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: FCRA संशोधन विधेयक, 2026 भारत में नागरिक समाज के ‘विनियमन’ से ‘नियंत्रण’ की ओर एक प्रतिमान परिवर्तन को दर्शाता है। इसके संवैधानिक एवं सामाजिक-आर्थिक प्रभावों के आलोक में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

FCRA संशोधन विधेयक 2026: विनियमन बनाम NGO पर नियंत्रण

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