संदर्भ:
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में गृहिणियों के आर्थिक योगदान को मान्यता देते हुए एक ऐतिहासिक निर्णय दिया है।
- न्यायालय ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरणों (MACTs) को निर्देश दिया है कि वे गृहिणियों के लिए एक न्यूनतम अनुमानित आय निर्धारित करें, ताकि सड़क दुर्घटना में उनकी मृत्यु होने की स्थिति में उनके परिवारों को उचित एवं न्यायसंगत मुआवजा प्राप्त हो सके।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है?
- गृहिणियों द्वारा किया जाने वाला अवैतनिक घरेलू कार्य (Unpaid Domestic Work) पारंपरिक रूप से आर्थिक गणनाओं में अदृश्य रहा है।
- न्यायालय अक्सर गृहिणियों की आय को शून्य मान लेते थे, जिससे उनके परिवारों को अपर्याप्त मुआवजा प्राप्त होता था।
- यह निर्णय स्वीकार करता है कि घर का प्रबंधन, बच्चों एवं बुजुर्गों की देखभाल तथा घरेलू श्रम परिवार के कल्याण और राष्ट्र-निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की प्रमुख विशेषताएँ
- न्यूनतम काल्पनिक आय: मुआवजे की गणना के लिए गृहिणियों को ₹3,000 प्रति माह की न्यूनतम अनुमानित आय प्रदान की जाएगी।
- MACTs इस न्यूनतम आय सीमा से कम आय के आधार पर मुआवजा निर्धारित नहीं कर सकते।
- समय-समय पर वृद्धि : अनुमानित आय में प्रत्येक तीन वर्ष में 10% की वृद्धि की जाएगी।
- यह प्रावधान मुद्रास्फीति (महंगाई) तथा बढ़ती जीवन-यापन लागत को ध्यान में रखता है।
- दोहरे दायित्व की मान्यता: जो महिलाएँ वेतनभोगी रोजगार के साथ-साथ घरेलू कार्य भी करती हैं, उनके मुआवजे में निम्नलिखित शामिल होंगे:
- रोजगार से प्राप्त वास्तविक आय
- घरेलू कार्यों के अतिरिक्त मूल्य का आकलन
- घरेलू देखभाल की हानि को पृथक मद के रूप में मान्यता: अब न्यायालय घरेलू देखभाल एवं घरेलू सेवाओं की हानि को मुआवजे के एक स्वतंत्र घटक के रूप में मान्यता दे सकते हैं।
- दावों का त्वरित निपटारा: समय पर न्याय सुनिश्चित करने के लिए MACT मामलों का निपटारा आदर्श रूप से एक वर्ष के भीतर किया जाना चाहिए।
शब्दावली में परिवर्तन: “गृहिणी” से “गृह-निर्माता/गृह प्रबंधक”
न्यायालय ने “गृहिणी” के स्थान पर “गृह-निर्माता/गृह प्रबंधक” शब्द को प्राथमिकता दी है।
गृह-निर्माता/गृह प्रबंधक
- गरिमा और स्वायत्तता को दर्शाता है।
- घरेलू कार्य को उत्पादक श्रम के रूप में मान्यता देता है।
- लैंगिक रूढ़ियों को मजबूत करने से बचाता है।
अवैतनिक देखभाल कार्य का आर्थिक महत्व
- समय उपयोग सर्वेक्षण के निष्कर्ष: 15–59 वर्ष आयु वर्ग की महिलाएँ प्रतिदिन लगभग 7 घंटे अवैतनिक घरेलू कार्य में व्यतीत करती हैं।
- पुरुष समान प्रकार की गतिविधियों पर प्रतिदिन 3 घंटे से भी कम समय व्यतीत करते हैं।
- देखभाल कार्य का बोझ: महिलाएँ पुरुषों की तुलना में लगभग 2.6 गुना अधिक देखभाल-संबंधी कार्य करती हैं।
- GDP में योगदान: यदि अवैतनिक घरेलू कार्य का मौद्रिक मूल्यांकन किया जाए, तो यह भारत के GDP में लगभग 15–17% का योगदान दे सकता है।
- श्रमबल भागीदारी: भारत में महिलाओं की श्रमबल भागीदारी दर निम्नलिखित कारणों से अपेक्षाकृत कम है:
- घरेलू जिम्मेदारियाँ
- बच्चों की देखभाल
- देखभाल संबंधी दायित्व
संवैधानिक आयाम
- अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार: गृहिणियों के कार्य को मान्यता देना घरेलू श्रम के अवमूल्यन से उत्पन्न भेदभाव को दूर करने में सहायता करता है।
- यह वास्तविक समानता को बढ़ावा देता है।
- अनुच्छेद 21 – गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार: मानवीय गरिमा में परिवार के भीतर किए गए मूल्यवान योगदानों की पहचान और सम्मान भी शामिल है।
- यह निर्णय अवैतनिक देखभाल कार्य की गरिमा को मान्यता प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 39(a) – आजीविका के पर्याप्त साधन: यह उन आर्थिक योगदानों को मान्यता देने के लिए प्रोत्साहित करता है, जिन्हें प्रायः औपचारिक बाजार व्यवस्था में शामिल नहीं किया जाता।
- अनुच्छेद 39(d) – समान कार्य के लिए समान वेतन: यह उस सिद्धांत का समर्थन करता है कि श्रम, चाहे भुगतानयुक्त हो या अवैतनिक, मान्यता और उचित मूल्यांकन का पात्र है।
न्यायिक विकास
- लता वाधवा बनाम बिहार राज्य (2001): सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया कि गृहिणियों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं का आर्थिक मूल्य होता है।
- अरुण कुमार अग्रवाल बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी (2010): सर्वोच्च न्यायालय ने गृहिणियों के योगदान का मूल्यांकन केवल उनके पति की आय के एक हिस्से के रूप में करने की प्रथा को अस्वीकार कर दिया।
- कीर्ति बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2021): सर्वोच्च न्यायालय ने गृहिणियों के लिए भी वेतनभोगी व्यक्तियों के समान भविष्य की आय संभावनाओं को मान्यता प्रदान की।
- वर्तमान निर्णय (2026): मुआवजे के निर्धारण हेतु न्यूनतम आय की एक स्पष्ट और निश्चित आधार-सीमा स्थापित करता है।
चिंताएँ एवं सीमाएँ
- सीमित प्रयोज्यता: निर्धारित अनुमानित आय का प्रावधान केवल दुर्घटना मुआवजा मामलों में ही लागू होगा।
- यह गृहिणियों को नियमित आय या सामाजिक सुरक्षा प्रदान नहीं करता।
- बीमा प्रीमियम पर दबाव: अधिक मुआवजा भुगतान के कारण निम्नलिखित में वृद्धि हो सकती है:
- बीमा कंपनियों की देनदारियाँ बढ़ सकती हैं।
- मोटर बीमा प्रीमियम में वृद्धि हो सकती है।
- संरचनात्मक समस्याएँ बनी रहती हैं: मृत्यु के बाद दी गई मान्यता निम्नलिखित समस्याओं का समाधान नहीं करती:
- बाल देखभाल सुविधाओं का अभाव
- महिलाओं की सीमित कार्यबल भागीदारी
- श्रम का लैंगिक विभाजन
आगे की राह
- राष्ट्रीय लेखा प्रणाली में सुधार: अवैतनिक देखभाल कार्य का आकलन करने हेतु सैटेलाइट अकाउंट्स विकसित किए जाएँ।
- महिलाओं के अदृश्य श्रम को आर्थिक आँकड़ों और सांख्यिकीय गणनाओं में दृश्यमान तथा मान्यता प्रदान की जाए।
- बाल देखभाल अवसंरचना का विस्तार: किफायती एवं सुलभ बाल देखभाल तथा डे-केयर केंद्रों की स्थापना की जाए।
- महिलाओं पर देखभाल-संबंधी दायित्वों और बोझ को कम किया जाए।
- सामाजिक सुरक्षा को सुदृढ़ करना: गृहिणियों के लिए निम्नलिखित माध्यमों से लक्षित सहायता एवं समर्थन प्रदान किया जाए:
- बीमा योजनाएँ
- पेंशन कवरेज
- कल्याणकारी उपाय
- क्षमता निर्माण: MACT के न्यायाधीशों एवं बीमा अधिकारियों को निर्णय के एकसमान एवं प्रभावी क्रियान्वयन हेतु प्रशिक्षण प्रदान किया जाए।
- मुआवजा प्रदान करने की प्रक्रियाओं को सरल, सुलभ और अधिक प्रभावी बनाया जाए।
निष्कर्ष
- सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय अवैतनिक घरेलू श्रम के आर्थिक एवं सामाजिक मूल्य को मान्यता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
- यद्यपि यह निर्णय गृहिणियों के परिवारों के लिए मुआवजा न्याय को सुदृढ़ करता है, तथापि भारत की अर्थव्यवस्था और समाज में गृहिणियों के योगदान को पूर्ण रूप से मान्यता देने एवं समर्थन प्रदान करने के लिए सामाजिक सुरक्षा, बाल देखभाल अवसंरचना तथा राष्ट्रीय लेखा प्रणाली में व्यापक सुधार की आवश्यकता हैं।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: गृहिणियों को वित्तीय मूल्यांकन के माध्यम से ‘राष्ट्र-निर्माता’ के रूप में मान्यता देना वास्तविक समानता प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, किन्तु यह महिलाओं की आर्थिक भागीदारी में मौजूद संरचनात्मक बाधाओं को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं है। विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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