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नाटो (NATO) के अंकारा शिखर सम्मेलन से भारत के लिए चेतावनी संकेत

नाटो (NATO) के अंकारा शिखर सम्मेलन से भारत के लिए चेतावनी संकेत 24 Jul 2026

संदर्भ

नाटो (NATO) के अंकारा शिखर सम्मेलन (2026) में गठबंधन ने सामूहिक रक्षा (Collective Defence) के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, रक्षा व्यय में उल्लेखनीय वृद्धि का निर्णय लिया, यूक्रेन के प्रति अपना समर्थन जारी रखा तथा एक सुदृढ़ यूरोपीय रक्षा औद्योगिक आधार (Defence Industrial Base – DIB) के विकास को प्राथमिकता दी।

इन घटनाक्रमों का भारत की रक्षा तैयारियों, रक्षा खरीद तथा आत्मनिर्भर भारत के उद्देश्यों पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।

नाटो अंकारा शिखर सम्मेलन के प्रमुख परिणाम

  • सामूहिक रक्षा की पुनर्पुष्टि : नाटो सदस्य देशों ने वॉशिंगटन संधि के अनुच्छेद 5 (Article 5) के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता दोहराई।
    • इसके अनुसार, किसी एक सदस्य देश पर हमला सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा।
  • रक्षा व्यय में वृद्धि: सभी सदस्य देशों ने 2035 तक रक्षा व्यय को GDP के 5% तक बढ़ाने का संकल्प लिया।
    • इससे पहले रक्षा व्यय का लक्ष्य GDP का 2% था।
  • यूक्रेन को निरंतर समर्थन: नाटो ने यूक्रेन की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।
  • रक्षा औद्योगिक आधार (DIB) का पुनरोद्धार: सदस्य देशों ने उच्च-प्रौद्योगिकी आधारित, उच्च उत्पादन क्षमता वाले तथा पूरे यूरोप में फैले रक्षा औद्योगिक आधार को मजबूत करने पर सहमति व्यक्त की।
    • इसका उद्देश्य सैन्य उत्पादन बढ़ाना तथा आपूर्ति संबंधी बाधाओं को कम करना है।

नाटो अपनी रक्षा क्षमताओं को क्यों सुदृढ़ कर रहा है?

  • रूस–यूक्रेन युद्ध: लंबे समय से जारी युद्ध ने यूरोप में गोला-बारूद, मिसाइलों तथा रक्षा विनिर्माण क्षमता की कमी को उजागर किया है।
  • बदलता वैश्विक सुरक्षा वातावरण: रूस और चीन से बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण नाटो का ध्यान संकट प्रबंधन से हटकर सामूहिक प्रतिरोध (Deterrence) तथा सैन्य तैयारी पर केंद्रित हो गया है।
  • अमेरिका पर निर्भरता कम करना: यूरोपीय देश अमेरिकी रक्षा उत्पादन पर अत्यधिक निर्भरता कम कर स्वदेशी रक्षा विनिर्माण क्षमता विकसित करना चाहते हैं।
  • औद्योगिक तैयारी की आवश्यकता: आधुनिक युद्धों में सटीक निर्देशित हथियार (Precision-guided Munitions), वायु रक्षा प्रणाली, ड्रोन तथा उन्नत सैन्य तकनीकों का निरंतर उत्पादन आवश्यक हो गया है।

भारत पर प्रभाव

  • वैश्विक हथियार बाजार में परिवर्तन: यूरोप की बढ़ती मांग से अंतरराष्ट्रीय हथियार बाजार क्रेता बाजार (Buyer’s Market) से विक्रेता बाजार (Seller’s Market) में बदल सकता है। इससे उन्नत रक्षा उपकरणों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
  • आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव: नाटो देशों द्वारा बड़े पैमाने पर रक्षा खरीद के कारण भारत को आवश्यक रक्षा उपकरणों एवं महत्वपूर्ण पुर्जों की आपूर्ति में विलंब हो सकता है।
  • रक्षा खरीद की लागत में वृद्धि: सैन्य उपकरणों और गोला-बारूद की वैश्विक मांग बढ़ने से आयातित रक्षा प्रणालियों की कीमतों में वृद्धि हो सकती है।
  • रक्षा आधुनिकीकरण में देरी: आयातित रक्षा प्रणालियों की आपूर्ति में विलंब से भारत के सैन्य आधुनिकीकरण कार्यक्रम प्रभावित हो सकते हैं।
  • उभरती प्रौद्योगिकी का अंतर: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर युद्ध, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, ड्रोन तथा नेटवर्क-केंद्रित युद्ध क्षमताओं के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता भारत के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक कमजोरी बन सकती है।

उदाहरण

जनरल इलेक्ट्रिक एयरोस्पेस (GE Aerospace) द्वारा एलसीए तेजस (LCA Tejas) कार्यक्रम के लिए F-404 लड़ाकू विमान इंजन की आपूर्ति में हुई देरी यह दर्शाती है कि वैश्विक मांग बढ़ने से भारत की रक्षा उत्पादन समय-सीमा प्रभावित हो सकती है।

भारत की रक्षा नीति के लिए महत्त्व

  • आत्मनिर्भरता की आवश्यकता: बदलते वैश्विक रक्षा बाजार ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की आवश्यकता को और अधिक महत्त्वपूर्ण बना दिया है।
  • रणनीतिक स्वायत्तता 
    • स्वदेशी रक्षा उत्पादन भारत को स्वतंत्र विदेश एवं सुरक्षा नीति अपनाने में सक्षम बनाता है।
    • आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती: घरेलू विनिर्माण भू-राजनीतिक संकटों के दौरान बाहरी निर्भरता को कम करता है।
    • तकनीकी प्रगति: उन्नत रक्षा तकनीकों में निवेश भारत की दीर्घकालिक सैन्य प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करता है।
    • रक्षा निर्यात की संभावना: मजबूत स्वदेशी रक्षा उद्योग भारत को विश्वसनीय रक्षा निर्यातक के रूप में स्थापित कर सकता है।

चुनौतियाँ

  • आयात पर निर्भरता: भारत अभी भी रक्षा प्लेटफॉर्मों एवं महत्वपूर्ण तकनीकों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है।
  • तकनीकी अंतर: कई रणनीतिक क्षेत्रों में उन्नत रक्षा तकनीकों के विकास की स्वदेशी क्षमता अभी सीमित है।
  • उत्पादन संबंधी बाधाएँ: विनिर्माण क्षमता, परीक्षण अवसंरचना तथा निजी क्षेत्र की सीमित भागीदारी रक्षा उत्पादन को प्रभावित करती है।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्धा: नाटो देशों की बढ़ती खरीद से अन्य आयातक देशों के लिए उन्नत रक्षा उपकरणों की उपलब्धता कम हो सकती है।
  • अनुसंधान एवं विकास (R&D): स्वदेशी अनुसंधान, नवाचार एवं प्रौद्योगिकी विकास में अपर्याप्त निवेश तकनीकी आत्मनिर्भरता की गति को धीमा करता है।

आगे की राह 

  • स्वदेशी रक्षा विनिर्माण को सुदृढ़ करना: आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत महत्वपूर्ण रक्षा उपकरणों के घरेलू उत्पादन में तेजी लाई जाए।
  • रक्षा अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा देना: अनुसंधान एवं विकास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, ड्रोन तथा अगली पीढ़ी की रक्षा तकनीकों में निवेश बढ़ाया जाए।
  • रक्षा साझेदारियों का विविधीकरण: सीमित आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम करते हुए विभिन्न रणनीतिक साझेदारों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाया जाए।
  • रक्षा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना: निजी क्षेत्र, MSMEs तथा स्टार्ट-अप्स की रक्षा विनिर्माण में भागीदारी बढ़ाई जाए।
  • आपूर्ति श्रृंखला को लचीला बनाना: महत्वपूर्ण पुर्जों, इंजन, सेमीकंडक्टर तथा रणनीतिक सामग्रियों के स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा दिया जाए।
  • रक्षा निर्यात को प्रोत्साहन: गुणवत्ता, प्रतिस्पर्धात्मकता एवं उत्पादन क्षमता में सुधार कर भारत को वैश्विक रक्षा निर्यातक के रूप में स्थापित किया जाए।

निष्कर्ष

नाटो का अंकारा शिखर सम्मेलन यह दर्शाता है कि बढ़ते रक्षा व्यय और औद्योगिक विस्तार के कारण वैश्विक रक्षा बाजार अधिक प्रतिस्पर्धी होता जा रहा है। भारत के लिए यह बदलता भू-राजनीतिक परिदृश्य आत्मनिर्भरता, स्वदेशी रक्षा विनिर्माण तथा उन्नत सैन्य प्रौद्योगिकियों में निवेश की आवश्यकता को और अधिक महत्त्वपूर्ण बनाता है, जिससे दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता तथा राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (UPSC CSE Mains 2020, GS Paper-II)

प्रश्न : भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy)’ की अवधारणा का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक परिवर्तनों के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता पर चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न (UPSC CSE Prelims 2023)

प्रश्न : निम्नलिखित देशों में से कौन-सा/से उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) का सदस्य/सदस्य हैं?

  1. फ़िनलैंड
  2. स्वीडन
  3. यूक्रेन

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए :

(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b) केवल 1 और 2

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