संदर्भ
नीट (NEET) प्रश्नपत्र लीक प्रकरण ने भ्रष्टाचार, संस्थागत जवाबदेही तथा शासन में पारदर्शिता को लेकर गंभीर चिंताओं को पुनः उजागर किया है। इसने इस बहस को भी पुनर्जीवित किया है कि क्या भ्रष्टाचार ‘विकसित भारत’ (Viksit Bharat) के लक्ष्य को प्राप्त करने की राह में सबसे बड़ी चुनौती है।
भ्रष्टाचार क्या है?
भ्रष्टाचार से तात्पर्य सार्वजनिक पद अथवा सौंपे गए अधिकारों का निजी लाभ के लिए दुरुपयोग करना है। यह रिश्वत (Bribery), गबन (Embezzlement), पक्षपात (Favouritism), भाई-भतीजावाद/क्रोनीवाद (Cronyism), धोखाधड़ी (Fraud) अथवा आधिकारिक शक्तियों के दुरुपयोग के रूप में सामने आता है, जिससे सुशासन, विधि का शासन (Rule of Law) तथा जनता का विश्वास कमजोर होता है।
क्या डिजिटलीकरण ने भ्रष्टाचार को कम किया है?
- सकारात्मक परिणाम: डिजिटल शासन, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), डिजिटल भुगतान तथा ई-गवर्नेंस ने छोटे स्तर के भ्रष्टाचार के अवसरों को कम किया है, पारदर्शिता बढ़ाई है, लेखा-परीक्षण (ऑडिट) के साक्ष्य-पथ (Audit Trail) को सुदृढ़ किया है तथा सेवा प्रदायगी में सुधार किया है।
- निरंतर चुनौतियाँ: केवल डिजिटलीकरण से भ्रष्टाचार का पूर्ण उन्मूलन संभव नहीं है। डिजिटल विभाजन, नए बिचौलियों का उभरना तथा प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र का अभाव अभी भी जवाबदेही को कमजोर करता है।
- सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI), 2005 की भूमिका: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 ने व्यापम घोटाला, आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाला तथा इलेक्टोरल बॉण्ड प्रकरण जैसे प्रमुख मामलों को उजागर कर पारदर्शिता एवं सार्वजनिक जवाबदेही को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ किया है।
- भारत में आरटीआई का उपयोग: भारत में प्रतिवर्ष लगभग 60 लाख आरटीआई आवेदन दायर किए जाते हैं, जिससे यह पारदर्शिता संबंधी कानूनों के उपयोग के मामले में विश्व के सबसे बड़े देशों में से एक है।
पारदर्शिता से संबंधित चिंताएँ
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (DPDP Act, 2023): इस अधिनियम में व्यापक गोपनीयता (Privacy) अपवादों के कारण यह आशंका व्यक्त की गई है कि भ्रष्टाचार से संबंधित सूचनाओं तक पहुँच सीमित हो सकती है। इससे RTI अधिनियम के उद्देश्यों को कमजोर होने का खतरा है।
- सूचना आयोग : लगातार रिक्त पदों तथा अपारदर्शी नियुक्तियों के कारण सूचना आयोगों की प्रभावशीलता कम हुई है। इससे अपीलों के निस्तारण में अनावश्यक विलंब हो रहा है।
भ्रष्टाचार-निरोधी संस्थाओं की चुनौतियाँ
- संस्थागत कमजोरी: लोकपाल, लोकायुक्त, केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) तथा प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी संस्थाओं की स्वतंत्रता, प्रभावशीलता तथा चयनात्मक प्रवर्तन के आरोपों को लेकर समय-समय पर गंभीर चिंताएँ व्यक्त की गई हैं।
- न्यायिक विलंब: भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच तथा न्यायिक निस्तारण में होने वाली देरी से दंडात्मक प्रभाव (Deterrence) कमज़ोर पड़ता है और न्याय प्रणाली के प्रति जनता का विश्वास भी प्रभावित होता है।
विधिक मुद्दे
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A: इस धारा के अनुसार, लोक सेवकों द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान लिए गए निर्णयों की जाँच प्रारंभ करने से पूर्व सरकार की पूर्व स्वीकृति आवश्यक होती है। आलोचकों का तर्क है कि यह प्रावधान जाँच प्रक्रिया में विलंब उत्पन्न कर सकता है तथा जवाबदेही को कमज़ोर कर सकता है।
- प्रमुख कारण: कमजोर प्रवर्तन, न्यायिक विलंब, राजनीतिक हस्तक्षेप, भाई-भतीजावादी पूँजीवाद (Crony Capitalism), संस्थागत पारदर्शिता का अभाव, व्हिसलब्लोअर (सूचनादाता) संरक्षण की अपर्याप्त व्यवस्था तथा कमजोर शिकायत निवारण तंत्र भ्रष्टाचार को निरंतर बनाए रखने वाले प्रमुख कारण हैं।
भ्रष्टाचार का प्रभाव
- शासन पर प्रभाव: विधि के शासन को कमजोर करता है। संस्थागत प्रभावशीलता एवं जनता के विश्वास में कमी लाता है।
- अर्थव्यवस्था पर प्रभाव: निवेश को हतोत्साहित करता है, व्यापार करने की लागत बढ़ाता है, आर्थिक दक्षता को कम करता है।
- समाज पर प्रभाव: शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य सार्वजनिक सेवाओं तक समान पहुँच को बाधित करता है। सामाजिक एवं आर्थिक असमानताओं को बढ़ाता है।
- लोकतंत्र पर प्रभाव: पारदर्शिता एवं जवाबदेही को कमजोर करता है। लोकतांत्रिक संस्थाओं में नागरिकों के विश्वास को कम करता है।
- नैतिकता पर प्रभाव: सार्वजनिक प्रशासन में ईमानदारी (Integrity), सत्यनिष्ठा (Probity) तथा नैतिक मूल्यों का ह्रास करता है।
संवैधानिक एवं विधिक ढाँचा
- संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है।
- अनुच्छेद 19(1)(a): सूचना के अधिकार का संवैधानिक आधार प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 21: जीवन एवं गरिमा के अधिकार के अंतर्गत पारदर्शी एवं जवाबदेह शासन का समर्थन करता है।
- प्रमुख अधिनियम
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988
- लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013
- व्हिसलब्लोअर्स संरक्षण अधिनियम, 2014
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023
आगे की राह
- पारदर्शिता को सुदृढ़ करना: पारदर्शिता एवं गोपनीयता के बीच उचित संतुलन बनाए रखते हुए RTI व्यवस्था को और मजबूत किया जाए।
- संस्थागत सुधार: लोकपाल, लोकायुक्त, CVC, CBI तथा सूचना आयोगों में पारदर्शी नियुक्तियाँ सुनिश्चित की जाएँ तथा उनकी कार्यात्मक स्वतंत्रता बढ़ाई जाए।
- समयबद्ध न्याय: भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच एवं न्यायिक प्रक्रिया को तेज़ किया जाए ताकि दंड का प्रभाव बढ़ सके।
- शिकायत निवारण प्रणाली को मजबूत करना: नागरिकों की शिकायतों के समयबद्ध समाधान हेतु व्यापक शिकायत निवारण कानून बनाया जाए।
- व्हिसलब्लोअर्स की सुरक्षा: भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग को प्रोत्साहित करने के लिए व्हिसलब्लोअर्स संरक्षण अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
- समावेशी डिजिटल शासन को बढ़ावा देना: डिजिटल शासन का विस्तार करते हुए डिजिटल विभाजन को कम किया जाए, ताकि नए प्रकार के भ्रष्टाचार एवं बहिष्करण को रोका जा सके।
- नैतिक शासन को सुदृढ़ करना: सार्वजनिक प्रशासन में ईमानदारी, पारदर्शिता, नागरिक सहभागिता तथा संस्थागत जवाबदेही को बढ़ावा दिया जाए।
निष्कर्ष
भ्रष्टाचार सुशासन, समावेशी विकास तथा विधि के शासन के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बना हुआ है। विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल सशक्त कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि स्वतंत्र एवं प्रभावी संस्थाएँ, त्वरित न्याय, अधिक पारदर्शिता, नैतिक सार्वजनिक प्रशासन तथा नागरिक जवाबदेही की मजबूत संस्कृति का विकास भी अनिवार्य है।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (UPSC CSE Mains 2018, GS Paper-IV)
प्रश्न : भ्रष्टाचार सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों के ह्रास का परिणाम है। इस कथन के संदर्भ में भ्रष्टाचार के कारणों, उसके दुष्प्रभावों तथा उसे रोकने के उपायों पर चर्चा कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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