हरित हाईवे नीति: अवसंरचना विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के मध्य संतुलन

हरित हाईवे नीति: अवसंरचना विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के मध्य संतुलन 21 May 2026

संदर्भ:

भारत में भारतमाला परियोजना जैसी पहलों के अंतर्गत एक्सप्रेसवे और राष्ट्रीय राजमार्गों का तीव्र विस्तार हो रहा है। यद्यपि राजमार्ग संपर्क, व्यापार और आर्थिक विकास को बढ़ावा देते हैं, लेकिन इनके कारण गंभीर पर्यावरणीय और पारिस्थितिक चुनौतियाँ भी उत्पन्न होती हैं।

भारत में राजमार्ग अवसंरचना का तीव्र विस्तार

  • भारत परिवहन दक्षता बढ़ाने हेतु विशाल एक्सप्रेसवे और राजमार्ग नेटवर्क विकसित कर रहा है।
  • दिल्ली–देहरादून एक्सप्रेसवे और दिल्ली–अमृतसर एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाएँ इस तीव्र अवसंरचनात्मक विकास को दर्शाती हैं।
  • राजमार्गों का विस्तार लॉजिस्टिक लागत कम करने, संपर्क बढ़ाने तथा आर्थिक विकास को गति देने में सहायक है।

राजमार्गों से जुड़ी पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिक चुनौतियाँ

  • राजमार्गों के किनारे प्रदूषण का संचय
    • राजमार्ग प्रदूषण संचय क्षेत्र के रूप में कार्य करते हैं क्योंकि वाहनों से होने वाले उत्सर्जन लगातार सड़कों के आसपास प्रदूषक छोड़ते रहते हैं।
    • राजमार्गों के आसपास उगाई जाने वाली फसलें वाहनों से निकलने वाले भारी धातु कणों एवं प्रदूषकों को अवशोषित कर लेती हैं।
  • भूमि विखंडन और जैव विविधता की हानि
    • राजमार्गों का निर्माण परिदृश्य विखंडन का कारण बनता है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में वन्यजीवों की आवाजाही सीमित हो जाती है।
    • राजमार्गों द्वारा उत्पन्न विभिन्न बाधाओं के कारण वन्यजीवों की आबादी अलग-थलग पड़ जाती है।
  • स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र का क्षरण
    • वाहनों की बढ़ती आवाजाही वायु प्रदूषण को बढ़ाती है। इससे राजमार्गों के आसपास के सूक्ष्म जलवायु (Microclimate) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

पारंपरिक राजमार्ग विकास से हरित हाईवे दृष्टिकोण की ओर बदलाव

  • राजमार्गों के किनारे वृक्षारोपण की पूर्ववर्ती पद्धतियाँ
    • पहले सरकारें प्रदूषण कम करने हेतु राजमार्गों के किनारे वृक्षारोपण करती थीं।
    • हालाँकि, भूमि अधिग्रहण की बढ़ती लागत ने सड़क किनारे वृक्षारोपण के लिए भूमि की उपलब्धता को सीमित कर दिया।
  • एक सतत एवं एकीकृत मॉडल की आवश्यकता
    • लेख राजमार्ग कृषि वानिकी (HFF) की ओर परिवर्तन को एक स्थायी समाधान के रूप में प्रस्तावित करता है।

राजमार्ग कृषि वानिकी (HFF): हरित राजमार्गों के लिए एक स्थायी समाधान

राजमार्ग कृषि वानिकी (HFF) क्या है?

  • राजमार्ग कृषि वानिकी (HFF) का अर्थ है किसानों के सहयोग से राजमार्गों के किनारे आर्थिक रूप से मूल्यवान वृक्षों का रोपण करना।

सामाजिक वानिकी (Social Forestry) की अवधारणा से संबंध

  • पहले सामाजिक वानिकी पर बल दिया जाता था, जिसमें किसान फ़सलों के साथ-साथ वृक्ष भी उगाते थे।
  • यह मॉडल सफल नहीं हो सका क्योंकि किसानों को:
    • बाज़ार प्रोत्साहन नहीं प्राप्त हुआ;
    • उचित बाज़ार संपर्क नहीं प्राप्त हुआ;
    • वृक्षारोपण से पर्याप्त आर्थिक लाभ नहीं प्राप्त हुआ।

राजमार्ग कृषि वानिकी (HFF) वहाँ सफल क्यों हो सकती है, जहाँ सामाजिक वानिकी असफल रही?

  •  बाज़ार-आधारित प्रोत्साहन व्यवस्था
    • किसान व्यावसायिक रूप से लाभकारी वृक्ष प्रजातियाँ उगाएँगे जिनकी बाज़ार में अधिक मांग है।
    • भारत लगभग ₹70,000 करोड़ मूल्य का लकड़ी आयात करता है, जिससे घरेलू उत्पादन की बड़ी संभावना निर्मित होती है।
  •  व्यावसायिक रूप से महत्त्वपूर्ण वृक्ष प्रजातियाँ
    • पॉपलर
    • बाँस
    • सागौन
    • मालाबार नीम
    • गमेलिना
  • किसानों की आय में वृद्धि
    • किसान इन वृक्षों की लकड़ी की बिक्री कर अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं।
    • वानिकी आधारित गतिविधियों से ग्रामीण रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।

राजमार्ग कृषि वानिकी (HFF) के पर्यावरणीय लाभ

  •  माइक्रोक्लाइमेट (Microclimate) में सुधार: राजमार्गों के किनारे लगाए गए वृक्ष स्थानीय माइक्रोक्लाइमेट को बेहतर बनाते हैं।
  • कार्बन अवशोषण और जलवायु कार्रवाई
    • वृक्ष वातावरण से कार्बन अवशोषित कर जलवायु परिवर्तन को कम करने में मदद करते हैं।
    • किसानों को कार्बन क्रेडिट के माध्यम से भी लाभ मिल सकता है।
  • प्रदूषण प्रभाव में कमी
    • वृक्षावरण आसपास की फसलों को वाहन प्रदूषण से सीधे प्रभावित होने से बचाता है।
  • घरेलू लकड़ी उद्योग को सशक्त बनाना
    • घरेलू लकड़ी उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता घटेगी।
    • यह “मेक इन इंडिया” पहल को भी मजबूत करेगा।

राजमार्ग कृषि वानिकी (HFF) हेतु प्रस्तावित द्वि-स्तरीय ढाँचा

  • टियर-I ढाँचा: सघन वृक्षारोपण क्षेत्र: राजमार्गों के 100 मीटर के भीतर केवल वृक्षारोपण को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • टियर-II ढाँचा: मिश्रित कृषि क्षेत्र:
    • 100 मीटर से आगे किसान निम्न मॉडल अपना सकते हैं:
      • मिश्रित कृषि प्रणाली
      • फसल-वृक्ष संयोजन
      • पारंपरिक कृषि

राजमार्ग कृषि वानिकी (HFF) को बढ़ावा देने हेतु नीतिगत समर्थन

  • राष्ट्रीय ट्रांजिट पास प्रणाली (2023)
    • सरकार ने वर्ष 2023 में राष्ट्रीय ट्रांजिट पास प्रणाली शुरू की।
    • यह “वन नेशन, वन पास” सिद्धांत पर आधारित है।
    • अब लकड़ी को एकल परमिट प्रणाली के माध्यम से राज्यों के बीच परिवहन किया जा सकता है।

राजमार्ग कृषि वानिकी (HFF) को लागू करते समय मुख्य सावधानियाँ

  • एकल फसल वृक्षारोपण से बचाव: पारिस्थितिक असंतुलन को रोकने के लिए एक ही वृक्ष प्रजाति का अत्यधिक रोपण करने से बचना चाहिए।
  • देशी और स्थानीय प्रजातियों को प्राथमिकता: आक्रामक विदेशी प्रजातियों की बजाय देशी और मिश्रित प्रजातियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • क्षेत्र-विशिष्ट वृक्षारोपण रणनीति
    • वृक्षों का चयन स्थानीय जलवायु एवं पारिस्थितिकी के अनुसार होना चाहिए।
    • सूखा-प्रवण क्षेत्रों में यूकेलिप्टस जैसी अधिक जल खपत वाली प्रजातियों से बचना चाहिए।
  • वृक्षारोपण प्रयासों के साथ हरित गतिशीलता भी जारी रहनी चाहिए: राजमार्गों के किनारे वृक्षारोपण निम्नलिखित आवश्यकताओं का स्थान नहीं ले सकता:
    • इलेक्ट्रिक मोबिलिटी
    • हरित ऊर्जा संक्रमण
    • सतत परिवहन प्रणाली

निष्कर्ष

  • भारत का राजमार्ग विस्तार केवल बुनियादी ढाँचा निर्माण तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे पर्यावरणीय रूप से सतत (Sustainable) मॉडल अपनाना चाहिए।
  • बुनियादी ढाँचा विकास के साथ राजमार्ग कृषि वानिकी (HFF) को एकीकृत करने से एक साथ पारिस्थितिकीय लचीलापन बढ़ाया जा सकता है, किसानों की आय में वृद्धि की जा सकती है, घरेलू लकड़ी उत्पादन को सुदृढ़ किया जा सकता है, तथा जलवायु कार्रवाई में योगदान दिया जा सकता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: “भारत में राजमार्गों को केवल परिवहन अवसंरचना के रूप में नहीं, बल्कि पारिस्थितिक एवं सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य के रूप में देखा जाना चाहिए।” प्रस्तावित राजमार्ग कृषि वानिकी (HFF) मॉडल के संदर्भ में इस कथन की समीक्षा कीजिए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

हरित हाईवे नीति: अवसंरचना विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के मध्य संतुलन

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