तमिलनाडु में राज्यपाल की शक्तियों के दुरुपयोग का मुद्दा

तमिलनाडु में राज्यपाल की शक्तियों के दुरुपयोग का मुद्दा 11 May 2026

संदर्भ:

संपादकीय में वर्ष 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के बाद राज्यपाल के आचरण को लेकर उत्पन्न विवाद पर चर्चा की गई, जहाँ किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ, जिससे संवैधानिक नैतिकता, राज्यपालों की निष्पक्षता और संघवाद को लेकर चिंताएँ उत्पन्न हुईं।

तमिलनाडु चुनाव परिदृश्य

कुल सीटें: 234

परिणाम:

  • TVK (विजय की पार्टी): 108 सीटें
  • DMK: 59 सीटें
  • AIADMK: 47 सीटें

बहुमत का आँकड़ा: 118 सीटें

किसी भी दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हुआ।

संवैधानिक प्रावधान

अनुच्छेद 164: राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है। परंपरागत रूप से, सबसे बड़े दल के नेता को सरकार बनाने के लिए पहले आमंत्रित किया जाता है।

राज्यपाल पर लगाए गए आरोप

रिपोर्ट के अनुसार राज्यपाल ने:

  • सबसे बड़े दल के नेता को तुरंत सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं किया।
  • पहले बहुमत सिद्ध करने हेतु समर्थन पत्र माँगे।
  • बहुमत सिद्ध करने के लिए केवल 72 घंटे का समय दिया।

इसकी मनमाना और राजनीतिक रूप से पक्षपातपूर्ण होने के तौर पर आलोचना की गई।

स्थापित प्राथमिकता क्रम (Established Order of Preference): सरकारिया आयोग, पुंछी आयोग और वेंकटचलैया आयोग जैसे विभिन्न आयोगों ने निम्नलिखित क्रम की सिफारिश की है:

  • पूर्व-चुनावी गठबंधन (Pre-poll Alliance): पहली प्राथमिकता चुनाव से पहले बने गठबंधनों को दी जानी चाहिए।
  • सबसे बड़ा दल (Single Largest Party): यदि कोई गठबंधन न हो, तो सबसे बड़े दल को आमंत्रित किया जाना चाहिए।
  • चुनाव बाद गठबंधन (Post-poll Alliance): चुनाव के बाद बने गठबंधन को तीसरी प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

राज्यपाल की कार्रवाई की आलोचना क्यों हुई?

  • बहुमत का परीक्षण सदन में होना चाहिए: राज्यपाल को राजभवन में बहुमत का निर्धारण नहीं करना चाहिए। बहुमत का परीक्षण विधानसभा में फ्लोर टेस्ट के माध्यम से किया जाना चाहिए।
  • संवैधानिक परंपरा का उल्लंघन: सबसे बड़े एकल दल को तुरंत आमंत्रित नहीं किया गया।
  • खरीद-फरोख्त (Horse Trading) की संभावना कम समय सीमा से निम्न स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं:
    • दल-बदल
    • रिसॉर्ट राजनीति (Resort politics)
    • राजनीतिक अस्थिरता

कानूनी और नैतिक निहितार्थ

  • अनुच्छेद 164(2): मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है, राज्यपाल के प्रति नहीं।
  • फ्लोर टेस्ट की सर्वोच्चता: एस.आर. बोम्मई मामला तथा रमेश्वर प्रसाद मामला (2006) ने यह स्थापित किया कि बहुमत का परीक्षण केवल सदन के पटल (फ्लोर) पर ही किया जाना चाहिए।
  • कम समय सीमा: केवल 72 घंटे का समय बहुमत सिद्ध करने के लिए देना “रिसॉर्ट राजनीति” को बढ़ावा देता है और 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) को दरकिनार करने की स्थिति उत्पन्न करता है।

ऐतिहासिक उदाहरण: दोहरे मापदंड

  • गोवा 2017: कांग्रेस (17 सीटें) सबसे बड़ा दल था। भाजपा के पास केवल 13 सीटें थीं।
    • राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने भाजपा को आमंत्रित किया — सबसे बड़े दल की पूरी तरह अनदेखी करते हुए।
  • मणिपुर 2017: कांग्रेस के पास 28 सीटें थीं, भाजपा के पास 21 सीटें थीं। कुल सीटें 60 थीं।
    • राज्यपाल ने बड़ी कांग्रेस पार्टी के बजाय भाजपा को प्राथमिकता दी।
  • कर्नाटक 2018: भाजपा सबसे बड़ा दल था (104 सीटें), लेकिन कांग्रेस–जेडीएस गठबंधन के पास मिलकर 115 सीटें थीं।
    • राज्यपाल वजुभाई वाला ने भाजपा को आमंत्रित किया और फ्लोर टेस्ट के लिए 15 दिन का समय दिया।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने इसे घटाकर 1 दिन कर दिया (रात्रिकालीन सुनवाई के माध्यम से)।

अल्पमत सरकार — एक वैध संवैधानिक अवधारणा

अनुच्छेद 164(2): मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। कोई सरकार तभी गिरती है जब वह अविश्वास प्रस्ताव हार जाती है — न कि राज्यपाल के दरवाजे पर।

भारत में अल्पमत सरकारों के उदाहरण

  • अटल बिहारी वाजपेयी (1996): राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा द्वारा प्रधानमंत्री नियुक्त किए गए। 13 दिनों के बाद इस्तीफा दे दिया — फ्लोर टेस्ट से वंचित नहीं किया गया।
  • पी. वी. नरसिम्हा राव (1993): अल्पमत सरकार थी। उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव केवल 1 वोट से जीतकर सरकार बचाई।
  • मनमोहन सिंह — UPA-1 (2004): बाहरी समर्थन वाली अल्पमत गठबंधन सरकार थी। इसने अपना 5 वर्षीय कार्यकाल पूरा किया।

प्रमुख संवैधानिक अवधारणाएँ

  • संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality): संविधान की भावना और मूल्यों का पालन करना, न कि केवल राजनीतिक सुविधा के आधार पर कार्य करना।
  • सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism): ऐसी व्यवस्था जिसमें केंद्र और राज्य समन्वय तथा पारस्परिक सम्मान के साथ मिलकर कार्य करते हैं।
  • फ्लोर टेस्ट (Floor Test): एक विधायी प्रक्रिया जिसके माध्यम से यह निर्धारित किया जाता है कि सरकार को सदन में बहुमत का समर्थन प्राप्त है या नहीं।
  • दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law): दसवीं अनुसूची के अंतर्गत ऐसे कानूनी प्रावधान, जिनका उद्देश्य विधायकों के राजनीतिक दल-बदल को रोकना है।
  • संवैधानिक पदों की निष्पक्षता (Neutrality of Constitutional Offices): संवैधानिक पदाधिकारियों को बिना किसी राजनीतिक पक्षपात के निष्पक्ष रूप से कार्य करना चाहिए।

आगे की राह 

  • राज्यपालों को स्थापित परंपराओं का पालन करना चाहिए: राज्यपालों को सरकार गठन के लिए दलों को आमंत्रित करते समय संवैधानिक परंपराओं और स्थापित आयोगों की सिफारिशों के अनुसार कार्य करना चाहिए।
  • फ्लोर टेस्ट की सर्वोच्चता होनी चाहिए: बहुमत का निर्धारण केवल विधानसभा में फ्लोर टेस्ट के माध्यम से ही किया जाना चाहिए।
  • समय सीमा उचित होनी चाहिए: बहुमत सिद्ध करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए, ताकि राजनीतिक अस्थिरता और “खरीद-फरोख्त” (Horse-Trading) से बचा जा सके।
  • राजनीतिक निष्पक्षता सुनिश्चित की जानी चाहिए: राज्यपाल और अन्य संवैधानिक पदाधिकारियों को किसी भी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में न जाकर निष्पक्ष रूप से कार्य करना चाहिए।

निष्कर्ष

राज्यपाल से अपेक्षा की जाती है कि वे एक निष्पक्ष संवैधानिक प्राधिकारी के रूप में कार्य करें, न कि केंद्र में सत्तारूढ़ दल के प्रतिनिधि के रूप में। विवेकाधिकार का मनमाना प्रयोग संघवाद, लोकतांत्रिक नैतिकता और संवैधानिक शासन को कमजोर करता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: एक त्रिशंकु विधानसभा (Hung Assembly) में सरकार गठन के समय राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ अक्सर पक्षपात के आरोपों को जन्म देती हैं। इस संदर्भ में संबंधित संवैधानिक प्रावधानों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

(10 अंक, 150 शब्द)

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