संदर्भ:
भारत 2025-26 में 7.6% की अनुमानित वृद्धि दर के साथ विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है, फिर भी यह K-आकार की आर्थिक पुनर्प्राप्ति का अनुभव कर रहा है।
K-आकार की रिकवरी के बारे में
- परिभाषा: K-आकार की अर्थव्यवस्था उस स्थिति को दर्शाती है जिसमें आर्थिक झटके के बाद विभिन्न क्षेत्र, कंपनियाँ या सामाजिक समूह असमान गति से उभरते हैं—कुछ तेज़ी से विकास करते हैं, जबकि अन्य गिरावट में बने रहते हैं।
मुख्य आर्थिक शब्दावली
- आधार वर्ष (Base Year): एक मानक वर्ष जिसका उपयोग मुद्रास्फीति, GDP और मूल्य स्तर जैसे आर्थिक संकेतकों में परिवर्तन मापने के लिए संदर्भ बिंदु के रूप में किया जाता है।
- भारत वर्त्तमान में कई सांख्यिकीय गणनाओं के लिए 2022–23 को आधार वर्ष के रूप में उपयोग कर रहा है।
- क्रय शक्ति समता (Purchasing Power Parity – PPP): यह एक पद्धति है जिसका उपयोग देशों के जीवन स्तर की तुलना करने के लिए किया जाता है, इसमें मूल्य स्तर के अंतर को समायोजित किया जाता है और यह मापा जाता है कि एक मुद्रा की इकाई वास्तव में क्या खरीद सकती है।
- प्रगतिशील कराधान (Progressive Taxation): यह एक कर प्रणाली है जिसमें आय के स्तर बढ़ने के साथ कर दर भी बढ़ती है, अर्थात अधिक आय वाले लोग अपनी आय का अधिक प्रतिशत कर के रूप में देते हैं, जिससे आर्थिक असमानता कम करने में मदद मिलती है।
- गिनी गुणांक और लॉरेंज वक्र (Gini Coefficient & Lorenz Curve): ये आय या संपत्ति असमानता को मापने के लिए मानक आर्थिक उपकरण हैं।
- लॉरेंज वक्र जनसंख्या में आय के वितरण को ग्राफ़िकल रूप में दर्शाता है।
- गिनी गुणांक असमानता का संख्यात्मक माप प्रदान करता है, जो 0 (पूर्ण समानता) से 1 (पूर्ण असमानता) के बीच होता है।
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असमानता को समझना (भारत में K-आकार की वृद्धि)
- विकास संबंधी विरोधाभास: विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 (WIR 2026) के अनुसार, भारत में उच्च GDP वृद्धि के साथ-साथ आर्थिक असमानता भी बढ़ रही है, जो यह दर्शाता है कि विकास के लाभ समान रूप से वितरित नहीं हो रहे हैं।
- आय असमानता: जनसंख्या का शीर्ष 10% लगभग 58% राष्ट्रीय आय अर्जित करता है, जबकि निचला 50% केवल लगभग 15% प्राप्त करता है।

- संपत्ति का संकेन्द्रण: संपत्ति का वितरण और भी अधिक असमान है, जिसमें शीर्ष 1% के पास भारत की कुल संपत्ति का लगभग 40% है, जिसमें संपत्ति, वित्तीय निवेश और सोना शामिल हैं।
- दबाव में मध्यम वर्ग: मध्यम वर्ग का एक बड़ा हिस्सा उच्च कर भार और भारी EMI (गृह, शिक्षा, उपभोक्ता ऋण) का सामना करता है, जिससे समग्र आर्थिक वृद्धि के बावजूद उनकी संपत्ति संचय करने की क्षमता सीमित हो जाती है।
बाधाएँ और वैश्विक तुलना
- यूरोप की तुलना में अधिक असमानता: भारत में असमानता का स्तर यूरोप की तुलना में काफी अधिक है, जहाँ प्रगतिशील कराधान और सामाजिक कल्याण हस्तांतरण जैसी मजबूत पुनर्वितरण नीतियाँ आय के संकेन्द्रण को सीमित करती हैं, जिससे शीर्ष 10% लगभग 26% कुल आय अर्जित करते हैं।
- महिला श्रम भागीदारी में अंतर: एक प्रमुख संरचनात्मक समस्या महिलाओं की कम कार्यबल भागीदारी (लगभग 15%) है, जिसका कारण पितृसत्तात्मक सोच, सुरक्षित परिवहन की कमी और अपर्याप्त चाइल्डकेयर सुविधाएँ हैं।
- दोहरी विकास चुनौती: भारत को निम्न औसत प्रति व्यक्ति आय और अत्यधिक असमानता जैसी दोहरी समस्या का सामना करना पड़ रहा है, जो समावेशी विकास में बाधा डालती हैं और जीवन स्तर में व्यापक सुधार की संभावनाओं को सीमित करती हैं।
चार-सूत्रीय समाधान ढाँचा
- रोजगार सृजन: निर्माण, लॉजिस्टिक्स और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों में रोजगार को बढ़ावा देना, जिससे सभी कौशल स्तरों के लिए रोजगार के अवसर उत्पन्न हों।
- मानव पूँजी विकास: विशेष रूप से कमजोर वर्गों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश करना।
- महिला कार्यबल भागीदारी: महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी बढ़ाने के लिए चाइल्डकेयर सुविधाओं, सुरक्षित परिवहन और लचीले कार्य विकल्पों में सुधार करना।
- प्रगतिशील कराधान: पुनर्वितरणीय सार्वजनिक व्यय को सक्षम बनाने के लिए संपत्ति कर और अत्यधिक धनी लोगों पर उच्च कर लागू करना।
निष्कर्ष
भारत की K-आकार की आर्थिक रिकवरी यह स्पष्ट करती है कि उच्च आर्थिक वृद्धि को समावेशी विकास के साथ संतुलित करना आवश्यक है, जिसे रोजगार सृजन, मानव पूँजी में निवेश, महिला कार्यबल की बढ़ती भागीदारी और प्रगतिशील पुनर्वितरण नीतियों के माध्यम से सुनिश्चित किया जा सकता है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: समावेशी विकास की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? क्या भारत इस प्रकार की विकास प्रक्रिया का अनुभव कर रहा है? विश्लेषण करें तथा समावेशी विकास हेतु उपाय सुझाएँ।
(15 अंक, 250 शब्द)
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