संदर्भ:
हाल ही में विजय के नेतृत्व वाली पार्टी की तमिलनाडु में चुनावी जीत के बाद ध्वनि प्रदूषण पर चर्चा फिर से तेज हो गई।
संबंधित तथ्य
- पार्टी का चुनाव चिन्ह “सीटी” (Whistle) था, जिसके कारण समर्थकों ने सड़कों पर सीटी बजाकर बड़े स्तर पर जश्न मनाया, जिससे अत्यधिक ध्वनि उत्पन्न हुई।
- एक सीटी की आवाज़ लगभग 104 से 116 डेसिबल (dB) तक उत्पन्न कर सकती है, जबकि मानव कानों के लिए सुरक्षित सीमा केवल 85 dB होती है।
- इस स्थिति की तुलना 2010 फीफा विश्व कप से की गई, जहाँ वुवुज़ेला (Vuvuzela) के अत्यधिक शोर के कारण प्रसारणकर्ताओं को विशेष फ़िल्टर का उपयोग करना पड़ा था क्योंकि कमेंट्री सुनाई नहीं दे रही थी।
सामाजिक और आर्थिक असमानता: विभिन्न सामाजिक वर्गों द्वारा ध्वनि प्रदूषण के अनुभव और उससे निपटने के तरीके में एक स्पष्ट अंतर देखा जाता है:
- संपन्न वर्ग: ध्वनि को रोकने के लिए साउंडप्रूफ कांच और उच्च-स्तरीय अवसंरचना का खर्च वहन कर सकते है, ठीक वैसे ही जैसे वे वायु प्रदूषण से बचाव के लिए एयर प्यूरीफायर का उपयोग करते हैं।
- गरीब वर्ग: कारखानों में काम करने वाले श्रमिक और भीड़भाड़ वाली झुग्गियों में रहने वाले लोगों के पास लगातार शोर से बचने का कोई उपाय नहीं होता। यह केवल ऐसा नहीं है कि वे इसके “आदी” हो जाते हैं; बल्कि इसका उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
- संवेदनशील समूह: उच्च शोर वाले क्षेत्रों (कारखानों, हवाई अड्डों या राजमार्गों के पास) में रहने वाले बच्चों में संज्ञानात्मक क्षमता में कमी और सीखने के विकास में धीमापन देखा जाता है।
स्वास्थ्य प्रभाव और चिकित्सीय परिणाम: ध्वनि प्रदूषण एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है, जिसके निम्नलिखित प्रमाणित प्रभाव हैं:
- श्रवण क्षमता की हानि: लगभग 6.3 करोड़ (63 मिलियन) भारतीय श्रवण बाधा से पीड़ित हैं। वैश्विक स्तर पर, लगभग 16% श्रवण हानि कार्यस्थल के शोर के कारण होती है।
- हृदय संबंधी समस्याएँ: दीर्घकालिक शोर के कारण एंडोथीलियल डिसफंक्शन होता है, जिसमें रक्त वाहिकाओं की भीतरी परत क्षतिग्रस्त हो जाती है, जिससे उच्च रक्तचाप और हृदयाघात का जोखिम बढ़ जाता है।
- स्वस्थ जीवन वर्षों की हानि: केवल यातायात से उत्पन्न शोर के कारण प्रतिवर्ष लगभग 16 लाख (1.6 मिलियन) स्वस्थ जीवन वर्ष की हानि होती हैं।
- व्यावसायिक जोखिम: पुडुचेरी में किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 13% श्रमिकों ने शोर के कारण अपनी सुनने की क्षमता खो दी, और उद्योग संबंधी आँकड़े बताते हैं कि 49% औद्योगिक श्रमिक ध्वनि स्तरों से नकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं।
नियामक ढाँचा और निगरानी: इस मुद्दे को नियंत्रित करने वाला प्रमुख नियम ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 है। इन नियमों के अंतर्गत क्षेत्रों को चार श्रेणियों (ज़ोन) में विभाजित किया गया है, जिनके लिए विशिष्ट ध्वनि सीमाएँ निर्धारित हैं:
- औद्योगिक क्षेत्र
- वाणिज्यिक क्षेत्र
- आवासीय क्षेत्र
- मौन क्षेत्र (स्कूलों और अस्पतालों के आसपास)
- इन स्तरों की निगरानी के लिए, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने 2011 में राष्ट्रीय परिवेशीय ध्वनि निगरानी नेटवर्क की स्थापना की। हालाँकि, यह नेटवर्क अत्यंत अपर्याप्त है, क्योंकि 14 वर्षों बाद भी केवल 7 महानगरों में 70 निगरानी केंद्र ही स्थापित किए गए हैं।
- आंकड़ों से पता चलता है कि इन स्टेशनों में से 80% लगातार निर्धारित सीमा से अधिक ध्वनि स्तर दर्ज करते हैं। इसके अलावा, 2022 की संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम रिपोर्ट में मुरादाबाद को विश्व का दूसरा सबसे शोरगुल वाला शहर बताया गया, हालाँकि भारत सरकार इस दावे से असहमत है।
प्रवर्तन में विद्यमान चुनौतियाँ: भारत में ध्वनि प्रदूषण के प्रभावी नियंत्रण में कई कारक बाधा उत्पन्न करते हैं:
- जागरूकता की कमी: वायु प्रदूषण के विपरीत, ध्वनि को अक्सर जीवन का एक “सामान्य” हिस्सा माना जाता है, और पश्चिमी देशों की तुलना में उल्लंघनकर्ताओं के लिए आपराधिक दायित्व की कमी पाई जाती है।
- अपर्याप्त संसाधन: सरकार के पास ध्वनि स्तर (डेसिबल सीमा) की प्रभावी निगरानी और प्रवर्तन के लिए पर्याप्त अधिकारी नहीं हैं।
- राजनीतिक और धार्मिक संवेदनशीलताएँ: लाउडस्पीकरों से होने वाले शोर को नियंत्रित करने के प्रयास अक्सर धार्मिक या राजनीतिक रंग ले लेते हैं, जिससे अधिकारी “धर्म-विरोधी” कहे जाने के डर से कार्रवाई करने में हिचकिचाते हैं।
- “फ्रीबी” संस्कृति: वे संसाधन, जो बेहतर परिवहन अवसंरचना पर खर्च किए जा सकते थे (जिससे निजी वाहनों और हॉर्न के उपयोग की आवश्यकता कम होती), अक्सर लोकलुभावन सब्सिडी योजनाओं पर खर्च हो जाते हैं।
निष्कर्ष
- ध्वनि प्रदूषण भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त जीवन के अधिकार का उल्लंघन है, क्योंकि निरंतर हानिकारक शोर वाले वातावरण में गरिमापूर्ण जीवन संभव नहीं है।
- हालाँकि वर्ष 2000 के नियमों के माध्यम से कानूनी ढाँचा विद्यमान है, फिर भी बेहतर प्रवर्तन, विस्तृत निगरानी नेटवर्क और “संस्कृति” तथा “शोर” के बीच स्पष्ट अंतर की अत्यंत आवश्यकता है ताकि जन स्वास्थ्य की सुरक्षा की जा सके।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 जैसे कानूनी सुरक्षा उपायों के बावजूद भारतीय शहरों में ध्वनि स्तर लगातार बढ़ रहा है। ध्वनि प्रदूषण के प्रभावी नियंत्रण में बाधा डालने वाली सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए तथा इसके शमन हेतु व्यापक उपाय सुझाइए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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