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लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची

लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची 22 May 2026

संदर्भ:

वर्तमान में लद्दाख एक केंद्रशासित प्रदेश (UT) है, जिसका प्रशासन अनुच्छेद 239 के तहत सीधे केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है। जम्मू-कश्मीर या दिल्ली जैसे केंद्रशासित प्रदेशों के विपरीत, लद्दाख की अपनी कोई विधान सभा नहीं है।

लद्दाख की मुख्य मांगें

  • राज्य का दर्जा: लद्दाख के लोग पूर्ण राज्य का दर्जा और एक निर्वाचित विधान सभा की मांग कर रहे हैं, ताकि स्थानीय प्रतिनिधि कानून निर्माण और शासन में भाग ले सकें।
    • उनका तर्क है कि लोकतांत्रिक जवाबदेही तभी सुनिश्चित की जा सकती है जब स्थानीय समुदायों को प्रभावित करने वाले निर्णय नियुक्त नौकरशाहों के बजाय निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा लिए जाएँ।
  • छठी अनुसूची में शामिल करना: अनुच्छेद 244 के तहत, छठी अनुसूची निम्नलिखित जनजातीय क्षेत्रों पर लागू होती है:
    • असम
    • मेघालय
    • त्रिपुरा
    • मिजोरम

लद्दाख के लोग अपनी जनजातीय पहचान, संस्कृति, भूमि अधिकारों और पारंपरिक शासन प्रणालियों की रक्षा के लिए छठी अनुसूची के अंतर्गत शामिल होने की मांग कर रहे हैं।

छठी अनुसूची के लाभ

  • छठी अनुसूची के अंतर्गत स्वायत्त जिला परिषदों को भूमि, वन, संस्कृति, प्रथागत कानूनों और स्थानीय शासन जैसे विषयों पर अधिकार प्राप्त होते हैं, जिससे जनजातीय समुदायों की अधिक स्वायत्तता सुनिश्चित होती है।
  • ऐसी संवैधानिक सुरक्षा को लद्दाख की नाजुक पारिस्थितिकी और विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण के लिए आवश्यक माना जाता है।

सरकार का हालिया कदम

  • केंद्र सरकार ने हाल ही में लद्दाख में पाँच नए जिलों के गठन की घोषणा की, जिसका घोषित उद्देश्य प्रशासनिक दक्षता और विकेन्द्रीकृत शासन को बढ़ाना है।

स्थानीय प्रतिक्रिया

  • कई स्थानीय निवासियों ने प्रतिक्रिया देते हुए तर्क दिया कि “अधिक जिले का अर्थ अधिक लोकतंत्र नहीं होता,” क्योंकि केवल प्रशासनिक इकाइयों की संख्या बढ़ाने से राजनीतिक सशक्तिकरण सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।

कारण

  • जिला अधिकारी मुख्यतः उच्च नौकरशाही और केंद्र सरकार के प्रति जवाबदेह रहते हैं, न कि सीधे स्थानीय जनता के प्रति।
  • स्थानीय समूहों के अनुसार वास्तविक सशक्तिकरण के लिए निर्वाचित प्रतिनिधि और विधायी अधिकार आवश्यक हैं, केवल अतिरिक्त प्रशासनिक अधिकारी नहीं।

राज्य का दर्जा देने के विरुद्ध तर्क

  • कम जनसंख्या: विरोधियों का तर्क है कि लद्दाख का भौगोलिक क्षेत्र बहुत विशाल है, जबकि इसका जनसंख्या घनत्व अत्यंत कम है, जिससे राज्य का दर्जा प्रशासनिक रूप से कठिन और आर्थिक रूप से अव्यावहारिक हो सकता है।
  • सामरिक संवेदनशीलता: चूँकि लद्दाख की सीमाएँ चीन और पाकिस्तान से लगती हैं, इसलिए इसे राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है।
    • तर्क दिया जाता है कि प्रभावी सीमा प्रबंधन और सुरक्षा समन्वय सुनिश्चित करने के लिए प्रत्यक्ष केंद्रीय नियंत्रण आवश्यक है।
  • वित्तीय निर्भरता: एक अन्य तर्क यह है कि लद्दाख अभी भी केंद्र सरकार की वित्तीय सहायता पर बहुत अधिक निर्भर है और इसके पास स्वतंत्र रूप से राजस्व (आय) उत्पन्न करने की क्षमता सीमित है।
    • आलोचकों का मानना है कि यह क्षेत्र पर्याप्त केंद्रीय सहायता के बिना अपने प्रशासन को वित्तीय रूप से बनाए रखने में कठिनाई का सामना कर सकता है।

सरकार के दृष्टिकोण की आलोचना

  • पितृसत्तात्मक राज्य” (Paternalistic State) का तर्क
    • लेखक सरकार के दृष्टिकोण को “पितृसत्तात्मक” बताते हैं, जिसका अर्थ है कि राज्य नागरिकों को निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त रूप से शामिल किए बिना यह मान लेता है कि उसे पता है कि उनके लिए क्या सर्वोत्तम है।
    • इस मानसिकता की तुलना औपनिवेशिक काल के उन तर्कों से की जाती है, जिनमें ब्रिटिश शासक कहते थे कि भारतीय स्वशासन के लिए तैयार नहीं हैं और इसलिए बाह्य नियंत्रण आवश्यक है।

प्रतितर्क (Counter Arguments)

अरुणाचल प्रदेश का उदाहरण

  • अरुणाचल प्रदेश भी एक कम जनसंख्या वाला और रणनीतिक रूप से संवेदनशील सीमावर्ती राज्य है, फिर भी इसे वर्ष 1987 में पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया गया था।
  • यह उदाहरण दर्शाता है कि केवल सामरिक महत्व के आधार पर लद्दाख को लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व से वंचित नहीं किया जा सकता।

कम जनसंख्या कोई बाधा नहीं

  • नागालैंड, मिजोरम और सिक्किम जैसे राज्यों को अपेक्षाकृत कम जनसंख्या होने के बावजूद राज्य का दर्जा प्रदान किया गया था।
  • अतः, कम जनसंख्या घनत्व को लोकतांत्रिक अधिकारों और राजनीतिक स्वायत्तता से वंचित करने का वैध आधार नहीं माना जा सकता।

वित्तीय निर्भरता का तर्क कमजोर है

  • बिहार और उत्तर प्रदेश सहित कई भारतीय राज्य वित्तीय सहायता के लिए केंद्र सरकार पर अत्यधिक निर्भर हैं।
  • इसलिए केवल आर्थिक निर्भरता के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी क्षेत्र को लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक सुरक्षा मिलनी चाहिए या नहीं।

स्थानीय विधान सभा का महत्व

उदाहरण: लद्दाख में सौर परियोजना

  • चांगथांग में प्रस्तावित एक बड़े सौर ऊर्जा परियोजना ने चांगपा पशुपालकों के चराई अधिकारों, पारिस्थितिकीय स्थिरता, स्थानीय लोगों के रोजगार के अवसरों तथा भूमि अधिग्रहण की शर्तों को लेकर चिंताएँ उत्पन्न की हैं।
  • स्थानीय समुदायों का तर्क है कि निर्वाचित विधानमंडल के अभाव में ऐसे परियोजनाओं पर प्रश्न उठाने या निर्णयकर्ताओं को जवाबदेह ठहराने के लिए कोई प्रभावी लोकतांत्रिक मंच उपलब्ध नहीं है।

समस्या

  • विधानसभा के अभाव में, महत्वपूर्ण विकासात्मक और पर्यावरणीय निर्णय अक्सर पर्याप्त जन परामर्श या स्थानीय भागीदारी के बिना लिए जाते हैं।

नैतिक मुद्दा

  • सत्तारूढ़ दल ने अपने वर्ष 2019 के चुनावी घोषणापत्र में लद्दाख को छठी अनुसूची का दर्जा देने का वादा किया था, लेकिन यह वादा अभी तक पूरा नहीं हुआ है।
  • इस विलंब ने राजनीतिक जवाबदेही, नैतिक शासन और नागरिकों से किए गए चुनावी वादों की विश्वसनीयता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न की हैं।

निष्कर्ष

  • भारत की संवैधानिक शक्ति उसकी विविधता को समायोजित करने की क्षमता में निहित है, न कि सभी क्षेत्रों और समुदायों पर एकरूपता थोपने में।
  • लद्दाख के लोगों द्वारा उठाई गई मांगें संवैधानिक ढाँचे के भीतर लोकतांत्रिक भागीदारी, सांस्कृतिक संरक्षण और राजनीतिक सम्मान की आकांक्षाओं को दर्शाती हैं।
  • अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक सुरक्षा न केवल राष्ट्रीय एकीकरण को मजबूत कर सकती है, बल्कि सामरिक रूप से महत्वपूर्ण सीमावर्ती क्षेत्रों में लोगों की भागीदारी और सुरक्षा की भावना को भी सुदृढ़ कर सकती है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: प्रशासनिक विकेंद्रीकरण, राजनीतिक प्रतिनिधित्व (Political Agency) का विकल्प नहीं हो सकता। लद्दाख में हाल ही में नए जिलों के गठन तथा उसे छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची

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